Dawood Ibrahim Official Report: भारत का सबसे बड़ा भगोड़ा और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम आज भी देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। एक सीनियर IPS ऑफिसर द्वारा तैयार की गई ऑफिशियल रिपोर्ट में दाऊद इब्राहिम के पूरे क्राइम नेटवर्क, D Company के विस्तार, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से उसके गहरे संबंधों और 1993 मुंबई बम ब्लास्ट में उसकी भूमिका का चौंकाने वाला खुलासा किया गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, साल 1995 तक दाऊद का सालाना टर्नओवर 2000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था और उसने भारत भर में 5000 से ज्यादा गैंगस्टर्स का एक खतरनाक नेटवर्क खड़ा कर लिया था।
पुलिस के हेड कांस्टेबल का बेटा कैसे बना अंडरवर्ल्ड का बेताज बादशाह
Dawood Ibrahim Official Report में सबसे पहले उसकी पृष्ठभूमि का जिक्र किया गया है। दाऊद इब्राहिम मुंबई पुलिस के एक हेड कांस्टेबल का बेटा था और कोंकणी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखता था। उसका परिवार मूल रूप से रत्नागिरी जिले का रहने वाला बताया जाता है।
बचपन से ही दाऊद का पढ़ाई में कोई मन नहीं था। अपने आसपास के अपराधिक माहौल ने उसे तेजी से क्राइम की दुनिया की ओर खींच लिया। छोटी-मोटी चोरी और गुंडागर्दी से शुरू हुआ उसका सफर धीरे-धीरे बड़े अपराधों तक पहुंच गया। बढ़ती उम्र के साथ उसने अपने इलाके में बाहुबल का खेल शुरू कर दिया और लोगों को डराना-धमकाना उसका रोजमर्रा का काम बन गया।
करीम लाला के गैंग से शुरू हुआ Dawood Ibrahim का क्राइम करियर
करीब 20 साल की उम्र में दाऊद ने मुंबई के मशहूर स्मगलर और डॉन अब्दुल करीम शेर खान पठान का गैंग ज्वाइन कर लिया, जिसे करीम लाला के नाम से जाना जाता था। करीम लाला के गैंग में दाऊद का शुरुआती काम स्मगलिंग के कंसाइनमेंट को एक जगह से दूसरी जगह सुरक्षित तरीके से पहुंचाना था, ताकि पुलिस और राइवल गैंग्स दोनों से बचाव हो सके।
इसके अलावा, जो छोटे गैंगस्टर्स कंसाइनमेंट या एक्सटॉर्शन के बीच में पैसे छुपा लेते थे, उनसे वसूली करना भी दाऊद की जिम्मेदारी थी। लेकिन यही काम करीम लाला के दो भांजे आलमजेब और अमीरजादा भी किया करते थे, जो बाद में दाऊद के सबसे बड़े दुश्मन बने।
दो लाख की गद्दारी से शुरू हुआ मुंबई अंडरवर्ल्ड का सबसे खूनी गैंगवॉर
Dawood Ibrahim Official Report में एक ऐसी घटना का जिक्र है जिसने मुंबई अंडरवर्ल्ड की पूरी तस्वीर ही बदल दी। एक बार आलमजेब ने एक कस्टम ऑफिसर को किडनैप कर लिया, जिसने करीम लाला के सोने के कंसाइनमेंट को पकड़ लिया था। छुड़ाने के बदले करीब 2 लाख रुपये की डिमांड रखी गई।
जब सामने वाली पार्टी मान गई तो पैसे लेने के लिए दाऊद इब्राहिम को भेजा गया। लेकिन यहीं दाऊद के दिमाग में गद्दारी का पहला बीज पड़ा। उसने उन 2 लाख में से बड़ा हिस्सा अपनी जेब में रख लिया और बहुत कम रकम आलमजेब को सौंपी। जब इस बेईमानी का पर्दाफाश हुआ तो दोनों पठान भाइयों और दाऊद के बीच जबरदस्त विवाद खड़ा हो गया। दाऊद को गैंग से निकाल दिया गया और बुरी तरह मारा-पीटा भी गया।
इसी गद्दारी के बाद मुंबई अंडरवर्ल्ड के इतिहास का सबसे खूनी गैंगवॉर शुरू हुआ। दाऊद ने अपना अलग गैंग बना लिया, जो “दाऊद गैंग” के नाम से तेजी से मशहूर होने लगा। हाजी मस्तान और करीम लाला ने दोनों गुटों के बीच सुलह कराने की कई कोशिशें कीं, लेकिन सब बेकार रहीं।
गुजरात तक फैलाया D Company का जाल
दाऊद इब्राहिम ने स्मगलिंग से कमाए पैसे को अलग-अलग जगहों पर लगाना शुरू किया। उसने न सिर्फ मुंबई में बल्कि गुजरात और कोंकण के इलाकों में भी अपना नेटवर्क फैला लिया। उसके चार भाई साबिर, इकबाल, अनीस और नूरा भी इस क्राइम नेटवर्क में शामिल हो गए और सक्रिय रूप से उसकी मदद करने लगे।
दाऊद खुद अपने रिक्रूट्स को चुनता था। उनकी काबिलियत परखकर उन्हें मुंबई, गुजरात, कर्नाटक और कोंकण के अलग-अलग इलाकों में तैनात कर देता था। इस बीच जब कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने स्मगलिंग पर सख्ती शुरू की तो पुराने डॉन पीछे हट गए। हाजी मस्तान ने स्मगलिंग छोड़कर राजनीति में कदम रख लिया। यूसुफ पटेल रियल एस्टेट में चला गया। करीम लाला ने अपना गैंग आलमजेब और अमीरजादा को सौंप दिया।
इस पूरे क्रैकडाउन ने दाऊद को एक खुला मैदान दे दिया। अब वो मुंबई अंडरवर्ल्ड का “अनडिस्प्यूटेड डॉन” बनने की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा था।
भाई साबिर की हत्या ने दाऊद को बदला लेने की आग में झोंका
1970 के आखिरी सालों में दाऊद गैंग और पठान गैंग के बीच राइवलरी और खतरनाक होती गई। दोनों गुट एक-दूसरे के लोगों पर हमले करने लगे। दाऊद से जुड़े एक पत्रकार पर पठान गैंग ने हमला कराया। बदले में दाऊद ने आलमजेब गैंग के सैद बाटला पर हमला किया, जो बुरी तरह घायल हुआ लेकिन बच गया।
1981 में आलमजेब ने एक बड़ा अटैक प्लान किया, जिसमें कुख्यात मन्या सुर्वे को भी शामिल किया गया। इस हमले में दाऊद तो बच निकला, लेकिन उसके बड़े भाई साबिर इब्राहिम का कत्ल कर दिया गया। उसी रात दाऊद के घर के पास भी हमला हुआ, लेकिन वो किसी तरह बच गया।
साबिर की मौत ने दाऊद को पूरी तरह बदल दिया। अब उसका एकमात्र लक्ष्य बदला लेना था। आलमजेब ने जब महसूस किया कि दाऊद का नेटवर्क और रिसोर्सेज उससे कहीं ज्यादा बड़े हो चुके हैं, तो उसने मुंबई छोड़कर गुजरात को अपना बेस बना लिया, क्योंकि वहां उसके पुलिस और प्रशासन में पुराने संपर्क थे।
कोर्ट रूम में जज के सामने हुआ मुंबई अंडरवर्ल्ड का पहला कत्ल
6 सितंबर 1983 का दिन मुंबई अंडरवर्ल्ड के इतिहास में एक काला अध्याय बनकर दर्ज हुआ। अमीरजादा को एक केस में सेशन कोर्ट में पेशी के लिए लाया गया था। दाऊद ने इस मौके का फायदा उठाया और बड़ा राजन यानी राजन नायर की मदद से अपने शार्प शूटर डेविड परदेसी को कोर्ट में भेजा।
डेविड परदेसी एक दुबला-पतला कम उम्र का लड़का था, जिसने कोर्ट परिसर में जज के ठीक सामने अमीरजादा को गोली मार दी। यह मुंबई अंडरवर्ल्ड के इतिहास का पहला ऐसा कत्ल था जो किसी कोर्ट रूम में जज की मौजूदगी में हुआ। डेविड परदेसी को मौके पर ही पुलिस ने पकड़ लिया और बाद में दाऊद इब्राहिम का नाम सामने आया।
बेल पर रहते हुए 5 अपराध करने के बावजूद मिलती रही जमानत
Dawood Ibrahim Official Report में न्यायिक व्यवस्था की खामियों पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। दाऊद पर पहले से कई क्रिमिनल केस चल रहे थे। कार्डन बंदर रॉबरी केस में उसे चार साल की कठोर कारावास की सजा हो चुकी थी, लेकिन वो बेल पर बाहर था और हाईकोर्ट में अपील पेंडिंग थी।
1984 में जब उसके वकील ने एक और केस में अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की, तो पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने कोर्ट को बताया कि दाऊद एक सजायाफ्ता अपराधी है, जो बेल पर रहते हुए भी पांच नए क्रिमिनल ऑफेंस कर चुका है और जांच अभी जारी है। इसके बावजूद सेशन कोर्ट ने उसे अग्रिम जमानत दे दी।
यह हमारी न्यायिक व्यवस्था की एक ऐसी कमजोरी थी जिसका दाऊद इब्राहिम ने भरपूर फायदा उठाया। जमानत मिलते ही उसने बिजनेसमैन और बिल्डरों का अपहरण, फिरौती वसूली और स्मगलिंग को और आक्रामक तरीके से बढ़ा दिया। उसने कमाए हुए पैसों को रियल एस्टेट, बॉलीवुड प्रोडक्शन और प्रॉपर्टी में लगाना शुरू कर दिया।
1985 में भारत छोड़कर हमेशा के लिए दुबई भागा दाऊद
जब हाईकोर्ट से दाऊद को बरी कर दिया गया, तो मुंबई पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, जो स्वीकार भी हो गई। दाऊद को नोटिस भी जारी हुआ। अब दाऊद समझ चुका था कि कभी भी उसकी गिरफ्तारी हो सकती है। यही वो समय था जब 1985 के अंत में दाऊद इब्राहिम मुंबई और भारत को हमेशा के लिए छोड़कर दुबई चला गया।
दुबई में दाऊद ने शानो-शौकत की जिंदगी शुरू कर दी। भारतीय पत्रकार उससे मिलने दुबई जाते थे और उसकी मेहमाननवाजी के किस्से मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री तक गूंजते थे। बड़े फिल्म स्टार्स, नामी राजनेताओं और बड़ी हस्तियों को दाऊद दुबई बुलाता था और उनकी खातिरदारी करता था। यहां तक कि बॉलीवुड में अफवाहें उड़ती थीं कि एक मशहूर फिल्म अभिनेत्री के साथ दाऊद का अफेयर था और उनसे उसकी एक बेटी भी थी।
दुबई से बैठकर चलाता रहा पूरे भारत में क्राइम का कारोबार
सुरक्षा एजेंसियों ने पाया कि दाऊद के दुबई भागने के बाद भी उसकी क्रिमिनल एक्टिविटीज में कोई कमी नहीं आई, बल्कि वो और ज्यादा कुशलता से ऑपरेट करने लगा। उसने भारत में अपने भरोसेमंद गुर्गों के जरिए मुंबई, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, हैदराबाद और नागपुर तक अपना क्राइम नेटवर्क फैला लिया।
रोमेश शर्मा नाम के एक बेहद प्रभावशाली शख्स की गिरफ्तारी ने यह साबित किया कि दाऊद की पहुंच भारतीय राजनीतिक सेटअप में शीर्ष स्तर तक हो चुकी थी। अहमदाबाद का डॉन अब्दुल लतीफ दाऊद का एक अहम लेफ्टिनेंट था, जिसे बाद में पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया गया। यूपी का किडनैपिंग किंग बबलू श्रीवास्तव दाऊद का हिटमैन बताया जाता है, जिसने मुंबई में ऑर्गेनाइज्ड किडनैपिंग की शुरुआत की।
रमा नायक और अरुण गवली से खूनी जंग: किलिंग और काउंटर किलिंग
दुबई से बैठे-बैठे दाऊद ने अपने गुर्गे रमा नायक को मुंबई का पूरा काम सौंप दिया। लेकिन जब रमा नायक खुद बहुत ताकतवर हो गया, तो दाऊद ने उसे खतरा मानना शुरू कर दिया। दाऊद ने एक खतरनाक चाल चली: रमा नायक के राइट हैंड बाबू रेशम को पहले गिरफ्तार कराया और फिर पुलिस लॉकअप में ही उसका कत्ल करा दिया।
इसके बाद दाऊद ने रमा नायक को झूठी जानकारी दी कि बाबू रेशम की हत्या के पीछे मुंबई के बड़े होटलियर महेश ढोलकिया का हाथ है। रमा नायक ने बदला लेने के लिए अरुण गवली की मदद से महेश ढोलकिया की दिनदहाड़े हत्या करा दी। लेकिन जब सच्चाई सामने आई कि यह सब दाऊद की साजिश थी, तो रमा नायक ने दाऊद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
दाऊद ने जवाब में पुलिस को रमा नायक के ठिकाने की टिप दे दी और 1988 में एक एनकाउंटर में रमा नायक को मार गिराया गया। रमा नायक की मौत के बाद गैंग की कमान अरुण गवली के हाथ में आ गई।
JJ हॉस्पिटल शूटआउट और दाऊद-गवली गैंगवॉर का खूनी दौर
अरुण गवली और दाऊद इब्राहिम के बीच किलिंग और काउंटर किलिंग का एक लंबा और खूनी दौर चला, जिसने मुंबई की सड़कों पर खून की नदियां बहा दीं। गवली ने दाऊद के क्लोज एड सतीश राजन की हत्या करा दी। बदले में दाऊद ने गवली के करीबी अशोक जोशी और उसकी पूरी गैंग का सफाया करा दिया। गवली ने दाऊद के हवाला मैनेजर महेश चौड़िया को किडनैप कर मार डाला। दाऊद ने गवली के भाई किशोर गवली को खत्म करा दिया।
1992 में गवली ने दाऊद के बहनोई इस्माइल पारकर की अपने हिटमैन शैलेश हलदनकर से हत्या करा दी। इसके जवाब में दाऊद ने जो किया वो मुंबई अंडरवर्ल्ड के इतिहास की सबसे खौफनाक घटनाओं में से एक था: JJ हॉस्पिटल में दाऊद गैंग ने AK-47 से करीब 400 गोलियां बरसाईं। यह शूटआउट इसी खूनी राइवलरी का नतीजा था।
1993 बॉम्बे ब्लास्ट: Dawood Ibrahim बना आतंक का चेहरा
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दाऊद का रवैया पूरी तरह बदल गया। उसकी टेरर एक्टिविटीज, पाकिस्तान से उसके लिंक्स और ISI के साथ संबंध खुलकर सामने आए। दाऊद ने गुजरात और मुंबई के बंदरगाहों के रास्ते RDX की सप्लाई कराई और टाइगर मेमन के जरिए इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया।
1993 के बॉम्बे बम ब्लास्ट में सैकड़ों बेगुनाह लोगों की जान गई और दाऊद आतंक का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरा। इस ब्लास्ट का असर D Company पर भी पड़ा: गैंग में सांप्रदायिक विभाजन साफ दिखने लगा। जितने भी हिंदू गैंगस्टर्स थे, उन्होंने D Company छोड़ना शुरू कर दिया और गैंग पूरी तरह मुस्लिम गैंगस्टर्स के हाथ में आ गई।
सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, 1993 के ब्लास्ट के बाद भी दाऊद ने गुजरात और मुंबई के बंदरगाहों के जरिए हथियार और विस्फोटक सामग्री की तस्करी जारी रखी।
बिहार का टेलीकॉम डिपार्टमेंट दे रहा था दाऊद को कम्युनिकेशन सुविधा
1999 में एक और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया। जी न्यूज़ चैनल ने 12 अगस्त को एक खबर चलाई जिसमें बिहार के हजारीबाग की टेलीकॉम एडवाइजरी कमेटी का आरोप था कि लोकल डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन का लॉन्ग डिस्टेंस टेलीफोन यूनिट दाऊद इब्राहिम को गैरकानूनी तरीके से कम्युनिकेशन सुविधा मुहैया करा रहा है।
आरोप यह था कि यह यूनिट दाऊद को मध्य-पूर्वी देशों से मुंबई, दिल्ली और भारत के अन्य शहरों से जोड़ती है। उसे प्राइवेट टेलीफोन एक्सचेंज लाइंस दी गई थीं। इसमें सीनियर DoT ऑफिसर की भी संलिप्तता पाई गई और CBI जांच की मांग की गई।
6000 करोड़ का साम्राज्य और ISI का संरक्षण
CBI के अनुमान के मुताबिक, 1995 तक Dawood Ibrahim का सालाना टर्नओवर 2000 करोड़ रुपये आंका गया था, जो बाद में बढ़कर 6000 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गया। दाऊद के निवेश शिपिंग, फूड प्रोसेसिंग, गारमेंट एक्सपोर्ट, होटल्स, रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन जैसे कई सेक्टर्स में फैले हुए हैं।
पाकिस्तान के अलावा लंदन, स्विट्जरलैंड, लागोस, दुबई और मुंबई में उसके मल्टीपल ऑफिसेस ऑपरेट करते हैं, जहां से वो अपना घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों नेटवर्क हैंडल करता है। आज दाऊद ISI के संरक्षण में पाकिस्तान में है, जहां उसे पाकिस्तानी मिलिट्री, पॉलिटिकल और फाइनेंशियल बैकिंग मिलती है।
Dawood Ibrahim की वो आदतें जो इस रिपोर्ट ने उजागर कीं
ऑफिशियल रिपोर्ट में दाऊद की “डुअल पर्सनैलिटी” का भी जिक्र है। एक तरफ वो अपने गुर्गों के लिए बेहद क्रूर और निर्दयी शासक की तरह था। जरा-सी शक होने पर अपने ही आदमी को बेरहमी से खत्म करा देता था। लेकिन दूसरी तरफ, अपने समुदाय और लॉयल गैंग मेंबर्स के परिवारों के लिए वो बेहद उदार था।
घायल गैंग मेंबर्स पर लाखों रुपये खर्च करता था, उनके परिवारों की देखभाल करता था, और इसी वजह से उसके गुर्गे उसके प्रति पूरी तरह वफादार रहते थे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दाऊद औपचारिक रूप से अनपढ़ था, लेकिन उसने बाद में थोड़ी-बहुत अंग्रेजी सीखी। इसके बावजूद हजारों लोगों के नेटवर्क को मैनेज करने की उसकी क्षमता एजेंसियों को भी हैरान करती थी।
दिलचस्प बात यह भी है कि दुबई में शारजाह में क्रिकेट मैच देखते समय दाऊद अपने बॉक्स में दो छोटे भारतीय तिरंगे रखता था और शारजाह में तिरंगा लहराते हुए भी देखा गया था। लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उसका रवैया पूरी तरह बदल गया।
आम नागरिकों पर इस रिपोर्ट का क्या मतलब है
यह रिपोर्ट सिर्फ एक अपराधी की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारी न्यायिक, प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्था की उन खामियों का आईना है जिनका फायदा उठाकर एक पुलिसकर्मी का बेटा दुनिया का सबसे खतरनाक अपराधी बन गया। बार-बार जमानत मिलना, सरकारी टेलीकॉम विभाग से गैरकानूनी सुविधाएं मिलना, और राजनीतिक संरक्षण जैसे कारक बताते हैं कि सिस्टम की कमजोरियां कैसे एक साधारण अपराधी को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी बना सकती हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
- Dawood Ibrahim Official Report के अनुसार, दाऊद ने 1995 तक भारत में 5000 से ज्यादा गैंगस्टर्स का नेटवर्क खड़ा कर लिया था और उसका सालाना टर्नओवर 2000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था।
- करीम लाला के गैंग से गद्दारी के बाद मुंबई अंडरवर्ल्ड का सबसे खूनी गैंगवॉर शुरू हुआ, जिसमें दाऊद गैंग, पठान गैंग और अरुण गवली गैंग के बीच किलिंग और काउंटर किलिंग का लंबा सिलसिला चला।
- 1985 में भारत छोड़कर दुबई भागने के बाद भी दाऊद ने दूर बैठकर पूरे भारत में अपना क्राइम साम्राज्य चलाया और 1993 मुंबई बम ब्लास्ट को अंजाम दिया।
- आज दाऊद पाकिस्तान में ISI के संरक्षण में है, उसका टर्नओवर करीब 6000 करोड़ रुपये आंका गया है और शिपिंग, रियल एस्टेट, होटल्स जैसे कई सेक्टर्स में उसके अंतरराष्ट्रीय निवेश हैं।







