CTE Brain Disease Research : टोरंटो (कनाडा)। कनाडा के वैज्ञानिक एक ऐसी दिमागी बीमारी की पहचान करने के नजदीक पहुंच गए हैं, जिसकी पुष्टि अब तक सिर्फ मौत के बाद ही संभव थी। खोजकर्ताओं का मानना है कि नई तकनीक के जरिए Chronic Traumatic Encephalopathy (CTE) की जीवित मरीजों में पहचान की जा सकेगी।
देखा जाए तो यह चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है। टोरंटो स्थित Centre for Addiction and Mental Health (CAMH) में चल रहे शोध प्रॉजेक्ट के तहत वैज्ञानिक एक विशेष रेडियो एक्टिव ट्रेसर की वर्तोन कर रहे हैं।
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क्या है CTE और कैसे होती है यह बीमारी?
विशेषज्ञों के अनुसार Chronic Traumatic Encephalopathy (CTE) एक ऐसी दिमागी बीमारी है जो सिर पर बार-बार लगने वाली चोटों के कारण कई सालों बाद विकसित हो सकती है। ये चोटें संपर्क वाली खेलों जैसे फुटबॉल, हॉकी, मुक्केबाजी के दौरान लग सकती हैं। या फिर बम धमाकों से पैदा होने वाली सदमे की लहरों का नतीजा हो सकती हैं।
हैरान करने वाली बात यह है कि यह बीमारी लाइलाज और धीरे-धीरे बढ़ने वाली है। भले ही कुछ मरीज दूसरों से बेहतर हालत में रहते हों, लेकिन गंभीर मामलों में यह स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि व्यक्ति अपनी पहले वाली शख्सियत से बिलकुल अलग हो जाता है।
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CTE के लक्षण: कैसे पहचानें?
CTE के संभावी लक्षणों में:
• याददाश्त का घटना
• उलझन और भ्रम की स्थिति
• व्यवहार में अचानक बदलाव
• उदासीनता और डिप्रेशन
• चिंता और पैनिक अटैक
• संतुलन बनाए रखने में मुश्किल
• कंपन (ट्रेमर)
• खुदकुशी के विचार
• लगातार बौद्धिक गिरावट
समझने वाली बात यह है कि ये लक्षण अक्सर डिमेंशिया के विभिन्न रूपों जैसे लगते हैं, इसलिए सही निदान बेहद मुश्किल हो जाता है।
नई तकनीक: PET और MRI स्कैन का इस्तेमाल
शोधकर्ता एक विशेष रेडियो एक्टिव ट्रेसर (आधिकारिक नाम: 18F-OXD-2314) की वर्तोन कर रहे हैं, जो दिमाग में CTE से संबंधित टाउ (tau) प्रोटीन की मौजूदगी को उजागर कर सकता है। इसके लिए PET (Positron Emission Tomography) और MRI स्कैन तकनीकों की मदद ली जा रही है।
अगर गौर करें तो tau प्रोटीन का असामान्य जमाव CTE की पहचान है। अब तक यह केवल पोस्टमॉर्टम के दौरान ही देखा जा सकता था। लेकिन नई तकनीक इसे जीवित व्यक्ति के दिमाग में देखना संभव बना रही है।
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सैनिक ब्रेंडन हाइंज़ की कहानी
शोध में हिस्सा ले रहे साबका कैनेडियन फौजी ब्रेंडन हाइंज़, जिन्होंने 27 साल फौज में सेवा निभाई है, पैनिक अटैक, डिप्रेशन, गुस्से के दौरे और याददाश्त कमजोर होने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि उन्हें शक है कि ये लक्षण CTE के कारण हो सकते हैं, जो फौजी सेवा के दौरान बार-बार धमाकों के संपर्क में आने से विकसित हुई। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सैनिकों में CTE के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
CTE का इतिहास: कब आया सामने?
CTE की ओर दुनिया का ध्यान 2000 के दशक की शुरुआत में खिंचा था, जब नाइजीरियन-अमेरिकी न्यूरोपैथोलॉजिस्ट डॉ. बेनेट ओमालू ने अमेरिकी फुटबॉल खिलाड़ी माइक वेबस्टर के दिमाग में इस बीमारी की पहचान की।
उसके बाद पेशेवर खिलाड़ियों में CTE के सैकड़ों मामलों की मौत के बाद पुष्टि हो चुकी है। इनमें:
• कम से कम 18 साबका National Hockey League खिलाड़ी
• 340 से अधिक साबका National Football League खिलाड़ी
इससे साफ होता है कि यह समस्या कितनी व्यापक है।
31 मई को पेश किए गए शुरुआती नतीजे
31 मई को वसदेव और बोइलो ने लॉस एंजिल्स में हुई Society of Nuclear Medicine and Molecular Imaging की कॉन्फ्रेंस में अपनी शुरुआती खोजें पेश कीं।
उन्होंने वैज्ञानिकों के जमावड़े को बताया कि उनकी खोज जीवित मरीजों में CTE के संकेत पहचानने में सफल दिखाई दे रही है। इस छोटे अध्ययन में सात स्वस्थ व्यक्ति और संभावित CTE से पीड़ित तीन सेवामुक्त खिलाड़ी शामिल थे।
राहत की बात यह है कि प्रारंभिक परिणाम उत्साहवर्धक हैं। हालांकि अभी और बड़े पैमाने पर अध्ययन की जरूरत है।
भविष्य की संभावनाएं
खोजकर्ताओं का कहना है कि अगर यह तकनीक सफल साबित होती है तो CTE की शुरुआती चरण में पहचान संभव हो सकेगी। इससे:
• मरीजों को समय पर इलाज मिल सकेगा
• भविष्य में नई दवाइयों और इलाज तरीकों का विकास संभव होगा
• खिलाड़ियों और सैनिकों को बेहतर चिकित्सा सुरक्षा मिलेगी
• सुरक्षा मानकों में सुधार होगा
हाइंज़ ने आशा जताई है कि अगर वह जीवित अवस्था में CTE की पुष्टि होने वाले पहले मरीजों में शामिल होते हैं, तो वह इस बीमारी से लड़ने वालों में भी आगे रहेंगे।
कहने का मतलब साफ है कि यह शोध न सिर्फ वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण भी है।
मुख्य बातें (Key Points)
• कनाडा के वैज्ञानिकों ने CTE को जीवित मरीजों में पहचानने की नई तकनीक विकसित की
• विशेष रेडियो एक्टिव ट्रेसर (18F-OXD-2314) और PET-MRI स्कैन का इस्तेमाल
• CTE सिर पर बार-बार चोट लगने से होती है, खिलाड़ियों और सैनिकों में ज्यादा
• 340+ NFL खिलाड़ियों में मौत के बाद CTE की पुष्टि हो चुकी है
• शुरुआती परिणाम उत्साहवर्धक, भविष्य में इलाज की नई संभावनाएं













