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सीएम केजरीवाल ने 16वें केंद्रीय वित्त आयोग के गठन से पहले केंद्रीय वित्त मंत्री को पत्र लिखा

The News Air Team by The News Air Team
मंगलवार, 25 जुलाई 2023
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Arvind Kejriwal

Arvind Kejriwal

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नई दिल्ली, 25 जुलाई (The News Air) मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्रीय करों में दिल्ली के वाजिब हिस्से को लेकर पुरजोर तरीके से मांग उठाई है। केंद्रीय वित्त मंत्री को पत्र लिखकर सीएम अरविंद केजरीवाल ने पिछले 23 वर्षों में दिल्ली के लोगों के साथ हुए भेदभाव को उजागर किया है। इसके साथ ही आगामी 16वें केंद्रीय वित्त आयोग में इसपर ध्यान देने का आग्रह किया है। क्योंकि दिल्लीवासियों ने आयकर में 1.78 लाख करोड़ का भुगतान किया, लेकिन केंद्र ने वित्त वर्ष 2023-24 में दिल्ली की हिस्सेदारी जीरो कर दी है। इसके अलावा केंद्रीय करों में दिल्ली का हिस्सा पिछले 23 वर्षों से रुका हुआ है। वित्त वर्ष 2022-2023 में दिल्ली को केवल 350 करोड़ मिले जबकि उसे 7,378 करोड़ मिलने चाहिए थे। सीएम केजरीवाल ने दिल्ली को एक अनूठा मामला मानकर इसे 16वें वित्त आयोग के संदर्भ की शर्तों में शामिल करने का अनुरोध किया है।

भारत के राजकोषीय संघवाद की दृष्टि से 16वां वित्त आयोग महत्वपूर्ण है, जिसे जल्द ही गठित किया जाएगा। इसकी सिफारिशें 1 अप्रैल 2026 से आने वाले पांच साल तक लागू होंगी। सीएम अरविंद केजरीवाल ने वित्तीय मामलों में दूसरे राज्यों के समान कार्य करने वाले विधानमंडल के साथ-साथ एक अद्वितीय केंद्र शासित प्रदेश के रूप में दिल्ली को प्राप्त विशेष स्थिति पर बल दिया। उन्होंने पत्र के जरिए कहा है कि मैं आपका ध्यान उस भेदभाव की ओर आकर्षित करना चाहता हूं जो दिल्ली के लोग पिछले 23 वर्षों से झेल रहे हैं। दिल्लीवासियों के प्रति केंद्र सरकार के इस सौतेलेपन और अनुचित व्यवहार को दिल्ली सरकार द्वारा अनगिनत बार उजागर किया गया है। दिल्ली सरकार ने केंद्रीय करों में वैध हिस्से के लिए कई बार अनुरोध किया है, लेकिन इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की गई है। जैसा कि आप अच्छी तरह से जानती हैं कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच एक अद्वितीय (‘सुई जेनेरिस’) दर्जा प्राप्त है। हालांकि यह विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश की व्यापक श्रेणी में आता है। यह वित्तीय मामलों में अन्य राज्यों के समान ही काम कर रहा है। इसकी 1 दिसंबर 1993 से एक अलग संगठित निधि है।

अपने पत्र में सीएम ने आगे लिखा है कि दिल्ली के बजट की फंडिंग का पैटर्न कमोबेश दूसरे राज्यों के समान ही है। छोटे बचत ऋणों की सेवा सहित दिल्ली सरकार के वित्तीय लेनदेन अन्य राज्यों की तरह अपने स्वयं के संसाधनों से पूरे किए जा रहे हैं। दिल्ली अपनी आय में से स्थानीय निकायों को धन भी हस्तांतरित कर रही है। लेकिन इसके बावजूद दिल्ली सरकार को दूसरे राज्यों की तरह न तो केंद्रीय करों के हिस्से में से वैध राशि मिलती है और न ही अपने स्थानीय निकायों के संसाधनों की पूर्ति के लिए कोई हिस्सा मिलता है।

मुख्यमंत्री ने चिंता व्यक्त की कि एक अलग संगठित निधि होने और अन्य राज्यों की तरह अपने वित्त का प्रबंधन करने के बावजूद दिल्ली पिछले दो दशकों से केंद्रीय करों में अपनी वैध हिस्सेदारी से वंचित है। दिल्ली की हिस्सेदारी 2001-02 से आश्चर्यजनक रूप से 350 करोड़ रुपये से कम पर स्थिर है, जबकि वित्त वर्ष 2023-24 में इसका बजट बढ़कर 73,760 करोड़ रुपये हो गया है। दिल्ली की तरह समान आबादी वाले पड़ोसी राज्यों की तुलना करने पर असमानता साफ तौर पर दिखती है। हरियाणा को वित्त वर्ष 2022-23 में केंद्रीय करों के पूल से 10,378 करोड़ और पंजाब को 17,163 करोड़ मिले, जबकि दिल्ली को केवल 350 करोड़ मिले। अरविंद केजरीवाल ने जोर देकर कहा कि अगर निष्पक्षता से व्यवहार किया जाए तो दिल्ली का हिस्सा 7,378 करोड़ होना चाहिए था।

इसके अलावा सीएम अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की वित्तीय दुर्दशा की ओर ध्यान आकर्षित किया। दिल्ली के 2 करोड़ लोगों की प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन जैसी आवश्यक सेवाएं प्रदान करने के बावजूद एमसीडी को केंद्र सरकार से कोई अनुदान राशि नहीं मिली है। शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) का गठन 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन के आधार पर किया गया था। इनका सुचारू और कुशल कामकाज सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि यूएलबी को पर्याप्त वित्तीय संसाधन मिलें। इसका अनुसरण करते हुए 14वें और 15वें केंद्रीय वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों के लिए बार-बार सहायता राशि दी गई। 14वें केंद्रीय वित्त आयोग ने 2015-2020 के लिए स्थानीय निकायों को 2,87,436 करोड़ रुपये की अनुदान सहायता राशि दी। इसी तरह 15वें केंद्रीय वित्त आयोग ने वर्ष 2021-26 के लिए 4,36,361 करोड़ रुपये की सिफारिश की है। शहरी स्थानीय निकायों को प्रत्येक वर्ष के लिए प्रति व्यक्ति 500 रुपये दिए गए हैं।

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लेकिन दिल्ली का शहरी स्थानीय निकाय एमसीडी पिछले कुछ वर्षों से बेहद अन्यायपूर्ण व्यवहार का सामना कर रहा है। उसे केंद्र सरकार से कुछ भी नहीं मिल रहा है। एमसीडी वर्तमान में 2 करोड़ दिल्लीवासियों को सेवाएं प्रदान करती है। दूसरे राज्यों की यूएलबी की तरह प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रदान करने के लिए जिम्मेदार है। केंद्रीय वित्त आयोगों की उपरोक्त सिफारिशों के आधार पर फंड की कमी से जूझ रही एमसीडी को 2015 से अतिरिक्त 7000 करोड़ रुपये मिलने हैं। यह एमसीडी के लिए एक वरदान होता, जो भारी बजट घाटे का सामना कर रही है। जिससे वेंडर्स को देर से भुगतान हो रहा है। कर्मचारियों के वेतन में देरी हो रही है, जिससे वह अपनी पूरी क्षमता से काम करने में सक्षम नहीं है।

मुख्यमंत्री ने केंद्रीय वित्त मंत्री से दिल्ली को एक अनूठे मामले के रूप में मान्यता देने और इसे 16वें वित्त आयोग के संदर्भ की शर्तों में शामिल करने का आह्वान किया है। उन्होंने पत्र के जरिए कहा है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की दिल्ली सरकार कई वर्षों से वित्तीय भेदभाव का मुद्दा उठाती रही है। पिछले संवादों के जरिए यह बताया गया है कि केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण दिल्ली का नाम वित्त आयोग के ‘संदर्भ की शर्तों’ से हटा दिया गया है और यह कर हस्तांतरण के दायरे में नहीं आता है। इसलिए दूसरे राज्यों की तरह व्यवहार नहीं किया जाता है। लेकिन दिल्ली “विधानमंडल के साथ केंद्र शासित प्रदेश” का एक अनूठा मामला है। दिल्ली अन्य राज्यों के समान ही अपने वित्त का प्रबंधन खुद करती है। ऐसे में मेरा अनुरोध है कि कृपया दिल्ली को एक अद्वितीय मामला मानें और अपेक्षित प्रक्रिया का पालन करते हुए इसे 16वें वित्त आयोग के संदर्भ की शर्तों में शामिल करें। अब समय आ गया है कि दिल्ली के साथ न्याय किया जाए। दूसरे राज्यों की तरह दिल्ली को उसका उचित हिस्सा मिले। दिल्लीवासी आपकी मदद के लिए हमेशा आभारी रहेंगे।

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