CBI Probe Punjab मामले में मंगलवार को एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी मोड़ आ गया। पंजाब सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी है, जिसमें सरकारी तबादलों, पोस्टिंग, अनुकूल नीतियां बनाने और टेंडरों में रिश्वत के आरोपों की जांच CBI को सौंपी गई थी।
‘आप’ सरकार ने बिना देर किए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और आधिकारिक बयान जारी करके कहा कि हाई कोर्ट के सोमवार के फैसले को चुनौती देने के लिए पेटिशन दायर की गई है। यह कदम बताता है कि मामला कितना गंभीर है और सरकार इसे किसी भी कीमत पर CBI के हवाले नहीं करना चाहती।
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हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
समझने वाली बात है कि यह फैसला रातोंरात नहीं आया। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की बेंच ने 14 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखा था और सोमवार को सुनाया।
बेंच ने अपने फैसले में साफ कहा कि इस मामले में मुख्यमंत्री दफ्तर के वरिष्ठ अधिकारियों, राजनीतिक नेताओं और पुलिस एवं सिविल प्रशासन के उच्च पदाधिकारियों का जिक्र होने की वजह से निष्पक्ष जांच पंजाब पुलिस नहीं कर सकती। और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी।
अदालत ने ED द्वारा PMLA की धारा 66(2) के तहत साझा की गई जानकारी के आधार पर CBI को FIR दर्ज करके तुरंत जांच शुरू करने का आदेश दिया। साथ ही दो महीने के अंदर रिपोर्ट अदालत को सौंपने को कहा।
पंजाब सरकार का तर्क: CBI का अधिकार क्षेत्र नहीं
दिलचस्प बात यह है कि पंजाब सरकार का मुख्य तर्क कानूनी है, राजनीतिक नहीं। वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि अमरिंदर सरकार ने नवंबर 2020 में CBI को पंजाब में जांच करने के लिए दी गई ‘आम सहमति’ (General Consent) वापस ले ली थी।
इसका मतलब यह है कि पंजाब सरकार के मुताबिक CBI के पास राज्य में बिना विशेष अनुमति के जांच करने का अधिकार क्षेत्र ही नहीं है। यह एक ऐसा कानूनी पेंच है जो सुप्रीम कोर्ट में बहस का मुख्य मुद्दा बनेगा।
अगर गौर करें तो यह मामला सिर्फ एक राज्य का नहीं है। देश के कई गैर-भाजपा शासित राज्यों ने CBI की ‘आम सहमति’ वापस ली है, जिससे केंद्र और राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर टकराव लगातार बढ़ रहा है।
आम आदमी पर क्या असर?
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस जांच का दायरा बहुत बड़ा है। सरकारी तबादले, पोस्टिंग, नीतियां और टेंडर: ये सब सीधे तौर पर आम जनता की जिंदगी से जुड़े हैं। अगर इनमें भ्रष्टाचार हुआ है, तो उसका खामियाजा आम करदाता को भुगतना पड़ता है।
सवाल उठता है कि अगर जांच CBI नहीं करेगी, तो क्या पंजाब पुलिस अपने ही आला अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं के खिलाफ निष्पक्ष जांच कर पाएगी? हाई कोर्ट को इसी बात पर शक था।
जानें पूरा मामला
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सरकारी तबादलों, पोस्टिंग, अनुकूल नीतियों और टेंडरों में रिश्वत के आरोपों की CBI जांच का आदेश दिया था। ED द्वारा PMLA के तहत साझा जानकारी के आधार पर यह फैसला आया। पंजाब सरकार का कहना है कि CBI की ‘आम सहमति’ 2020 में वापस ली जा चुकी है, इसलिए CBI को जांच का अधिकार नहीं। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
मुख्य बातें (Key Points)
- पंजाब सरकार ने CBI जांच के हाई कोर्ट आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
- मामला सरकारी तबादलों, पोस्टिंग और टेंडरों में रिश्वत के आरोपों से जुड़ा है।
- हाई कोर्ट ने CBI को 2 महीने में जांच रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया था।
- पंजाब सरकार का तर्क: 2020 में CBI की ‘आम सहमति’ वापस ली जा चुकी है।












