CBI Investigation: पंजाब में सरकारी तबादलों, तैनातियों और टेंडरों में कथित भ्रष्टाचार की जांच CBI को सौंपने के आदेश को चुनौती देने वाली पंजाब सरकार की याचिका पर Supreme Court में आज होने वाली सुनवाई टल गई है। अब इस मामले पर कल यानी अगले दिन सुनवाई होगी। देखा जाए तो यह मामला पंजाब की राजनीति के लिए बेहद संवेदनशील है, क्योंकि इसमें मुख्यमंत्री कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं का नाम भी घसीटा गया है।
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आधी रात 1:42 बजे दाखिल की गई पेटिशन
और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। जब पूरा देश सो रहा था, पंजाब सरकार के वकील जाग रहे थे। मामला इतना गंभीर था कि सरकार ने बिना कोई देर किए आधी रात को करीब 1:42 बजे Supreme Court में स्पेशल लीव पेटिशन (SLP) दाखिल कर दी। यह पेटिशन Punjab and Haryana High Court के उस आदेश के खिलाफ थी जिसमें तबादलों, पोस्टिंग और टेंडरों में रिश्वतखोरी की जांच CBI को सौंप दी गई थी।
वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने तुरंत सुनवाई की मांग की। चीफ जस्टिस ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि वे बुधवार या गुरुवार को सुनवाई करने की कोशिश करेंगे। विकास सिंह की दलील थी कि आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों को देखते हुए मनगढ़ंत मामले उछाले जा रहे हैं। उन्होंने CBI जांच को संघीय ढांचे की सीधी उल्लंघना बताया। यह दलील अपने आप में काफी वजनदार है, क्योंकि अगर संघीय ढांचे का मुद्दा टिक गया तो पूरा मामला ही पलट सकता है।
कैप्टन अमरिंदर सिंह का 2020 वाला फैसला बना ढाल
दिलचस्प बात यह है कि वित्त मंत्री Harpal Singh Cheema ने सोमवार को एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि Captain Amarinder Singh सरकार ने नवंबर 2020 में CBI को पंजाब में जांच करने के लिए दी गई ‘आम सहमति’ वापस ले ली थी। इसका सीधा मतलब यह है कि पंजाब सरकार के मुताबिक CBI के पास इस मामले में जांच करने का कोई कानूनी अधिकार ही नहीं है। चीमा ने भी इसे संघीय ढांचे में दखल करार दिया।
समझने वाली बात है कि यह दलील पंजाब सरकार की सबसे मजबूत ढाल है। अगर आम सहमति वापस ली जा चुकी है, तो CBI की एंट्री पर सवाल खड़ा होना लाजिमी है। लेकिन दूसरी तरफ हाई कोर्ट का आदेश भी अपने आप में बहुत ठोस है।
हाई कोर्ट ने क्यों सौंपी CBI को जांच?
अगर गौर करें तो Punjab and Haryana High Court के चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की बेंच ने निखिल सराफ की जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए CBI को FIR दर्ज कर तुरंत जांच शुरू करने का आदेश दिया था। अदालत ने CBI को दो महीने के अंदर रिपोर्ट सौंपने को भी कहा है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि इस मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी, राजनीतिक नेता और पुलिस व सिविल प्रशासन के उच्च पदाधिकारी शामिल हैं। ऐसे में पंजाब पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती। यही वजह है कि मामला CBI के हवाले किया गया। अदालत ने ED द्वारा PMLA की धारा 66(2) के तहत साझा की गई जानकारी के आधार पर CBI को FIR दर्ज करने के आदेश दिए।
ED ने लिखे थे 3 पत्र, पुलिस ने नहीं की FIR
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ED ने सबसे पहले 30 जुलाई को पंजाब के DGP को पत्र भेजा था। उसके बाद दो और पत्र लिखे गए। लेकिन अदालत ने नोट किया कि दो महीने बीत जाने के बावजूद पंजाब पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की। अदालत के शब्दों में, पंजाब पुलिस की अब तक की कार्रवाई संतोषजनक नहीं है।
निखिल सराफ ने अपनी याचिका में सरकारी पदों पर तैनात व्यक्तियों और उच्च अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे। मुख्यमंत्री कार्यालय के कुछ व्यक्तियों पर भी उंगली उठाई गई थी। यह पूरा मामला अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर है और कल की सुनवाई तय करेगी कि CBI जांच जारी रहेगी या पंजाब सरकार की दलीलें रंग लाएंगी।
जानें पूरा मामला
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने निखिल सराफ की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकारी तबादलों, तैनातियों और टेंडरों में भ्रष्टाचार की CBI जांच का आदेश दिया था। ED की ओर से PMLA की धारा 66(2) के तहत साझा जानकारी और DGP को लिखे गए तीन पत्रों के आधार पर यह फैसला आया। पंजाब सरकार ने इस आदेश को संघीय ढांचे का उल्लंघन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में SLP दाखिल की है।
मुख्य बातें (Key Points)
- पंजाब सरकार ने आधी रात 1:42 बजे सुप्रीम कोर्ट में SLP दाखिल की, सुनवाई एक दिन के लिए टली
- हाई कोर्ट ने तबादलों और टेंडरों में भ्रष्टाचार की CBI जांच का आदेश दिया, 2 महीने में रिपोर्ट मांगी
- वित्त मंत्री चीमा का दावा: कैप्टन सरकार ने 2020 में CBI की आम सहमति वापस ले ली थी
- ED ने DGP को 3 पत्र लिखे, लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की: हाई कोर्ट













