कैप्टन और कप्तान कांग्रेस दोनों से परेशान


Sandeep Pandit
पंडित संदीप

अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री कैप्टन के खिलाफ ट्विटर जंग छेड़ तंग करने वाले सिद्धू दल के कप्तान भले ही बन गए, पर कैप्टन के खिलाफ ना उनके तेवर बदले न ही उनके कलेवर। भले ही ट्विटर को थोड़ा विराम लग गया हो, पर वार अभी जारी है। कांग्रेस के मैदान में खुलकर खेल रहे नए कप्तान कैप्टन को एक कोने में समेट पूरी की पूरी कांग्रेस पर अपनी धाक जमाने के लिए नित्य नए हथकंडे अपना रहे हैं। महाराजा के माफी मांगने की मांग को सिरे से दरकिनार कर गर्व से खड़े सिद्धू ने आगाज़ वाले दिन दिल्ली दरबार को दिखा दिया कि जंग भी जारी है  मंच पर कैप्टन ने खुद का कुछ यूं बड़ा बना की सिद्धू को बचपना याद आ गया। सिद्धू भी कहाँ रुकने वाले थे, कैप्टन के बराबर से उठे… हवा में बल्ला लहराने की अदा बिखेर वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन से आँखें चुरा भूतपूर्व मुख्यमंत्री भट्टल के चरण चूम प्यासे और कुएं का जुमला उछाल किसानों के निशाने पर आ गए। पहले ही भाषण में किसान विरोधी का तगमा उठा सिद्धू आंदोलनकारी किसानों का अपमान कर बिना बात ही आफत और विरोध का तूफान मोल ले लिया।

वैसे एक बात तो साफ है कि लंबी जुबान और लंबा धागा उलझता जरूर है, सिद्धू को बातों के बतासे बांट बवाल मचाने का हुनर हासिल है, इसी हुनर के दम पर कैप्टन को घेर 10 जनपथ से कप्तान के रथ पर सवार हो सिद्धू जब से पंजाब आए हैं, कांग्रेस और कैप्टन दोनों की राहों में कांटे बो रहे हैं। चार कार्यकारी प्रधान को साथ ले कैप्टन से रूबरू होने सिद्धू चिट्ठी लेकर पहुंचे और अपने ही मुख्यमंत्री को काम करने का अल्टीमेटम दे दिया, पर राजा जी भी ठहरे राजा… कहां बचकानी बातों में आने वाले थे। अपने ही दल के सीएम कैप्टन को लपेटने पहुंचे कप्तान सिद्धू बेरंग लिफाफे की तरह मुख्यमंत्री कार्यालय से लौटा दिए गए। अब बिना पते की चिट्ठी ले सिद्धू दिल्ली दरबार की ओर दौड़ पड़े हैं, देखना दिलचस्प होगा कि कैप्टन और कांग्रेस के लिए कप्तान राजधानी से क्या नई मुसीबतों की सौगात ले कर लौटते हैं।

    कांग्रेस की चुनी हुई सरकार के मुखिया कैप्टन साहब की कार्यशैली ने कांग्रेस को पहले ही बैकफुट पर ला खड़ा किया है, उस पर कैप्टन के ही खिलाफ खुलेआम फ्रंट फुट से हिट करने को आमदा कप्तान की साजिशों ने पहले से ही परेशान कांग्रेस के जख्मों को और गहरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कैप्टन और कप्तान की जंग में घायल कांग्रेस पंजाब की जमीन पर पड़ी कराह, लहूलुहान हो छटपटा रही है। कैप्टन और कप्तान के अघोषित युद्ध के मध्यस्थ रावत साहब ने भी अब तंग हो पंजाब छोड़ने का मन बना लिया मालूम होता है। दोनों की मनुहार कर हार गए हरीश ने हरिद्वार की ओर रुख करना ही अपने भविष्य के लिए आवश्यक और सुरक्षित मान लिया मालूम होता है। दो धड़ों में बंटी कांग्रेस जमीन पर पहले ही चित पड़ी है, उस कमजोर कांग्रेस को उठा मजबूत करने के बजाय प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश सरकार के मुखिया के बीच खिंची तलवार को जनता तमाशा समझ देख रही है। लेकिन यह खेल तमाशा जनता के अरमानों पर कुठाराघात से कम नहीं है  नाक की लड़ाई बना भिड़े सिद्धू और महाराज पहले कुर्सी कुर्सी खेलने में मशगूल रहे, जिसमें सिद्धू ने महाराज को भारी अंतर से हरा बाजी अपने नाम कर ली, हारे हुए महाराज ने फिर माफी माफी का खेल शुरू किया उस माफीनामा को भी सिद्धू ने सरेआम फाड़ कर फेंक दिया, अब जब सिद्धू मुख्यमंत्री दरबार में चिट्ठी बम ले नए हथियार के साथ के साथ हमलावर हो पहुंचे तो महाराजा ने सिद्धू का लिफाफे मजमून भाप बिना खोले ही लौटा दिया। बड़े आराम से यह कह कर कि जो सोच कर आए हो सरकार वो पहले ही कर रही है।

कैप्टन खेमा अपनी सियासत की चाल चल रहा है, नए कप्तान के साथी भी अपने अपने वार से प्रहार करने को बेताब हैं। दोनों बड़े बड़े कांग्रेसियों को जूझता लड़ता झगड़ता चुप सहमी कांग्रेस देख रही है। कांग्रेस मन ही मन जरूर सोच रही होगी कब यह युद्ध खत्म हो? कब दोनों खेमा शांत हो? कब कैप्टन और कप्तान अपने अहम को छोड़ मेरी सुध लेंगे? कांग्रेस कैप्टन और कप्तान के चक्कर में पिस रही है। पंजाब खुली आँखों से ये सब देख रहा है, काश दिल्ली दरबार भी कांग्रेसियों के युद्ध में पिछड़ती, सिमटती, सिसकती कांग्रेस के बचाने की कोशिश करता। काश आलाकमान कैप्टन और कप्तान से ज्यादा कांग्रेस हित में सोच पाता, सोचेंगे तो जरूर पर तब क्या फायदा होगा जब चिड़िया खेत ही चुन जाएगी।


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