BJP Punjab Elections 2027 को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पंजाब के मोगा में ‘बदलाव रैली’ को संबोधित करते हुए बड़ा ऐलान किया कि भारतीय जनता पार्टी 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में अकेले दम पर सभी 117 सीटों पर लड़ेगी। यह ऐलान ऐसे वक्त में आया है जब पंजाब विधानसभा में बीजेपी के पास महज 2 विधायक हैं और 2022 के चुनाव में पार्टी का वोट शेयर सिर्फ 6.6 फीसदी रहा था। अमित शाह ने अपनी रैली में आम आदमी पार्टी की सरकार पर जमकर हमला बोला और कांग्रेस को भी निशाने पर लिया। बदले में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बीजेपी को ‘स्कूटर पार्टी’ करार दे दिया।
अमित शाह ने मोगा की रैली में क्या-क्या कहा?
अमित शाह ने अपनी रैली की शुरुआत ‘सत श्री अकाल’, ‘वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह’ और ‘भारत माता की जय’ से की। उन्होंने पंजाब के युवाओं को ‘जिगर का टुकड़ा’ बताया और कहा कि अब बीजेपी पंजाब में ‘छोटा भाई’ नहीं रही। यह बयान सीधे तौर पर शिरोमणि अकाली दल के साथ पुराने गठबंधन की ओर इशारा था, जहां बीजेपी हमेशा जूनियर पार्टनर के तौर पर चुनाव लड़ती थी।
अमित शाह ने आम आदमी पार्टी की सरकार पर सीधा हमला करते हुए कहा कि यह सरकार दरअसल अरविंद केजरीवाल का ATM है और पंजाब से पैसा कमाकर दिल्ली भेज रही है। उन्होंने एक तीखा जुमला भी कसा कि “पंजाब को हंसाने वाला नहीं, शासन करने वाला चाहिए।” यह तंज सीधे भगवंत मान पर था, जो राजनीति में आने से पहले कॉमेडियन थे।
BJP Punjab Elections 2027: बीजेपी ने गिनाए आप सरकार के ‘फेल’ मुद्दे
अमित शाह ने मोगा की रैली में आम आदमी पार्टी सरकार की कई कमजोरियां गिनाईं। उन्होंने नशे की समस्या, बिगड़ती कानून-व्यवस्था, धर्म परिवर्तन, भ्रष्टाचार और ‘वादा खिलाफी’ यानी वादों से मुकरने को प्रमुख मुद्दों के तौर पर उठाया। कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में कृषि बजट करीब 22,000 करोड़ रुपए होता था, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में यह बढ़कर 1,400 करोड़ (संभवतः लाख करोड़ का संदर्भ) तक पहुंच गया है।
अमित शाह ने कांग्रेस को 1984 के सिख दंगों पर भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की सरकार ने अकाल तख्त पर टैंक चढ़ा दिए थे। यह बयान सिख समुदाय की भावनाओं से सीधे जुड़ता है और बीजेपी इस मुद्दे को बार-बार उठाकर कांग्रेस को कमजोर करने की रणनीति अपनाती रही है।
बीजेपी के बड़े वादे: नशा-मुक्ति से लेकर एंटी कन्वर्जन लॉ तक
BJP Punjab Elections 2027 के लिए अमित शाह ने कई बड़े वादे किए। उन्होंने कहा कि बीजेपी की सरकार आने पर सबसे पहला बिल एंटी कन्वर्जन लॉ (धर्म परिवर्तन विरोधी कानून) लाया जाएगा। इसके अलावा सत्ता में आने के 2 साल के भीतर पंजाब से नशे के कारोबार को जड़ से मिटाने का दावा किया। पंजाब सरकार पर भारी कर्ज का हवाला देते हुए उन्होंने ‘डबल इंजन सरकार’ का फॉर्मूला पेश किया, यानी केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी की सरकार होने पर पंजाब का विकास तेजी से होगा।
इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी द्वारा हाल ही में आदमपुर एयरपोर्ट का नाम बदलकर ‘श्री गुरु रविदास महाराज जी एयरपोर्ट’ रखने का जिक्र भी किया गया, जिसे अमित शाह ने दलित समुदाय के सम्मान के तौर पर पेश किया।
नंबरों की जमीनी हकीकत: क्या कहते हैं आंकड़े?
BJP Punjab Elections 2027 की चर्चा में सबसे अहम सवाल यही है कि आंकड़े बीजेपी के पक्ष में कितने हैं। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में 117 सीटों पर हुई वोटिंग में आम आदमी पार्टी ने 42.3 फीसदी वोट शेयर के साथ 92 सीटें जीतीं। कांग्रेस को 18 सीटें मिलीं, शिरोमणि अकाली दल को 3 और बीजेपी को महज 2 सीटें मिलीं, जिसमें वोट शेयर सिर्फ 6.6 फीसदी रहा।
हालांकि, अमित शाह ने अपनी रैली में 2024 के लोकसभा चुनावों का हवाला दिया, जहां पंजाब में बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर 19 फीसदी तक पहुंच गया था। उन्होंने दावा किया कि असम, हरियाणा, उत्तराखंड और मणिपुर जैसे राज्यों में भी जब लोकसभा में बीजेपी का वोट शेयर 19 फीसदी के आसपास था, तो अगले विधानसभा चुनाव में वहां बीजेपी की सरकार बनी। 2024 के लोकसभा इलेक्शन के पोस्ट-पोल सर्वे में यह भी सामने आया कि पंजाब में अपर कास्ट हिंदू वोट का 56 फीसदी बीजेपी के पास गया था।
लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों की राजनीति में जमीन-आसमान का फर्क होता है। लोकसभा में 19 फीसदी वोट शेयर का मतलब यह नहीं कि विधानसभा में भी वही परिणाम दोहराया जा सके। पंजाब की स्थानीय राजनीति, किसानों का गुस्सा और सिख समुदाय की भावनाएं विधानसभा चुनावों में बिल्कुल अलग भूमिका निभाती हैं।
बीजेपी-अकाली दल गठबंधन का इतिहास और टूटन
BJP Punjab Elections 2027 की रणनीति को समझने के लिए बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के गठबंधन का पुराना इतिहास जानना जरूरी है। 1967 में अकाली दल, जनसंघ (बीजेपी का पूर्ववर्ती संगठन) और सीपीआई(एम) ने मिलकर पंजाब में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई थी। इसके बाद 1996 में अकाली दल ने बीजेपी के साथ औपचारिक गठबंधन किया, जो 1997 के विधानसभा चुनाव से पहले हुआ। दोनों पार्टियों को जोड़ने वाली कोई वैचारिक समानता नहीं थी, बल्कि कांग्रेस एक ‘कॉमन दुश्मन’ थी।
2012 में इस गठबंधन ने चुनाव जीता, जहां अकाली दल को 56 और बीजेपी को 12 सीटें मिलीं। लेकिन 2007 से 2017 का दौर इस गठबंधन के लिए उतार-चढ़ाव भरा रहा। ड्रग ट्रैफिकिंग के मामले, अवैध खनन, गैंगवार की घटनाएं और बादल परिवार पर ट्रांसपोर्ट सेक्टर में एकाधिकार के आरोप लगे। नतीजतन 2017 में यह गठबंधन बुरी तरह हारा, अकाली दल को 15 और बीजेपी को सिर्फ 3 सीटें मिलीं।
2020 में जब किसान आंदोलन शुरू हुआ और बीजेपी सरकार ने तीन विवादास्पद कृषि कानून लाए, तो शिरोमणि अकाली दल ने गठबंधन तोड़ दिया। पंजाब आधारित पार्टी होने के नाते यह फैसला अकाली दल के लिए जरूरी था, क्योंकि पंजाब की जनता किसानों के पक्ष में खड़ी थी और बीजेपी के खिलाफ गुस्सा चरम पर था।
बीजेपी की ‘चाणक्य नीति’: किस वोटर ग्रुप पर कैसी नजर?
BJP Punjab Elections 2027 की तैयारी में बीजेपी की रणनीति अलग-अलग वोटर ग्रुप्स को टारगेट करने पर केंद्रित दिख रही है। पहला और सबसे मजबूत आधार अर्बन हिंदू वोटर है, जो पहले से बीजेपी का समर्थक रहा है। लोकसभा चुनावों में इस वर्ग का बड़ा हिस्सा बीजेपी को वोट देता रहा है।
दूसरा बड़ा ग्रुप दलित समुदाय है, जो पंजाब की आबादी का करीब एक-तिहाई और मतदाताओं का लगभग 38 फीसदी हिस्सा है। प्रधानमंत्री मोदी का डेरा बलना (जालंधर) दौरा हो या आदमपुर एयरपोर्ट का नाम बदलना, ये सब दलित समुदाय तक पहुंच बनाने की कोशिशें मानी जा रही हैं।
तीसरा ग्रुप नॉन-जाट ओबीसी समुदाय है, जिसमें सैनी और गुर्जर जैसी जातियां शामिल हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के जरिए बीजेपी इस वर्ग में अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से मजहबी सिख और वाल्मीकि समुदाय को आकर्षित करने का प्रयास जारी है।
सिख वोटर्स के लिए बीजेपी करतारपुर कॉरिडोर, लंगर की खरीद पर जीएसटी में छूट और 1984 के दंगों का मुद्दा उठाती रहती है। 1984 का मुद्दा एक साथ दो काम करता है: सिख समुदाय में हमदर्दी जगाना और कांग्रेस पर हमला करना।
बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी: किसान और छात्र
BJP Punjab Elections 2027 में बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती किसान समुदाय है। तीन विवादास्पद कृषि कानूनों और उसके बाद हुए किसान आंदोलन ने पंजाब के किसानों में बीजेपी के प्रति गहरा गुस्सा पैदा किया है। 2024 के लोकसभा चुनावों में पंजाब के आधे से ज्यादा किसानों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया था।
दूसरी बड़ी चुनौती छात्र समुदाय है। पंजाब यूनिवर्सिटी में हाल ही में एक लेक्चर का आयोजन हुआ जिसमें बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड मेंबर इकबाल सिंह लालपुरा और आरएसएस के उत्तर क्षेत्रीय प्रचारक प्रमुख बनवीर सिंह वक्ता थे। छात्रों ने इस लेक्चर का विरोध किया और आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी में आरएसएस की विचारधारा थोपने की कोशिश की जा रही है। पंजाब यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता (ऑटोनोमी) को लेकर सीनेट और सिंडिकेट वाले मामले में भी छात्रों ने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किए थे।
पंजाब में 2024 के लोकसभा चुनावों में अमृतपाल सिंह जैसे रैडिकल सिख नेता ने खडूर साहिब से जीत दर्ज की और इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले बेअंत सिंह के बेटे सरबजीत सिंह खालसा ने फरीदकोट से जीत हासिल की। यह दर्शाता है कि पंजाब में एक तबका ऐसा भी है जो रैडिकल राजनीति की ओर झुक रहा है, और बीजेपी इस डर को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकती है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया: ‘स्कूटर पार्टी’ से ‘100 सीटों’ तक
अमित शाह की मोगा रैली के बाद विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बीजेपी को ‘स्कूटर पार्टी’ करार दिया, क्योंकि पंजाब विधानसभा में उनके पास सिर्फ 2 सीटें हैं। भगवंत मान ने यह भी कहा कि बीजेपी की रैली में स्टेज पर बैठे ज्यादातर लोग दूसरी पार्टियों से आए हुए हैं, चाहे वो कांग्रेस हो या खुद आम आदमी पार्टी।
उधर शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने दावा किया कि 2027 में अकाली दल 100 सीटें जीतेगी। उन्होंने कहा कि दिल्ली आधारित पार्टियां सिर्फ राज करना चाहती हैं, राज्य की भलाई नहीं। सुखबीर बादल का यह तर्क इसलिए मजबूत माना जा रहा है क्योंकि अकाली दल पंजाब की सबसे पुरानी और मजबूत स्थानीय पार्टी है, जबकि बीजेपी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस तीनों का मुख्यालय और दिल बसता दिल्ली में है।
क्या बीजेपी की मशीनरी को कम आंकना ठीक होगा?
BJP Punjab Elections 2027 को लेकर एक बात जो नजरअंदाज नहीं की जा सकती, वह है बीजेपी की संगठनात्मक ताकत। बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। उसके पास जबरदस्त वित्तीय ताकत है, आरएसएस का जमीनी नेटवर्क है और उसकी पहुंच देश के कोने-कोने तक है। विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते हैं कि चुनाव आयोग भी बीजेपी के पक्ष में रहता है।
लेकिन पंजाब की राजनीति बाकी राज्यों से बिल्कुल अलग है। यहां की सियासत में किसान सबसे बड़ी ताकत हैं और जब तक बीजेपी किसानों का भरोसा नहीं जीतती, 2 सीटों से बहुमत तक का सफर बेहद मुश्किल रहेगा। पंजाब में ‘सरबत दा भला’ यानी सबकी भलाई की सोच गहरी जड़ें जमाए हुए है। यहां अलग-अलग समुदाय, जाति और पृष्ठभूमि के लोग मिलजुलकर रहते हैं। ऐसे में ध्रुवीकरण की राजनीति कितनी कारगर होगी, यह 2027 में ही पता चलेगा।
एक और अहम सवाल है: बीजेपी जिस एंटी कन्वर्जन लॉ को अपनी सबसे बड़ी पिच बना रही है, क्या वह पूरे पंजाब को आकर्षित कर पाएगी? क्योंकि पंजाब में धर्म परिवर्तन का मुद्दा जरूर चर्चा में है, लेकिन जो लोग अपनी मर्जी से धर्म बदल रहे हैं, खासकर अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग, उन्हें रोकना बीजेपी के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- BJP Punjab Elections 2027 को लेकर अमित शाह ने मोगा में ‘बदलाव रैली’ में ऐलान किया कि बीजेपी सभी 117 सीटों पर अकेले लड़ेगी, जबकि पार्टी के पास अभी सिर्फ 2 विधायक हैं।
- 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 6.6% था, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में यह बढ़कर 19% हो गया, जिसे बीजेपी अपनी रणनीति की सफलता मान रही है।
- बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती किसान समुदाय का गुस्सा और छात्रों में बढ़ता विरोध है, जबकि पार्टी दलित वोटर्स, अर्बन हिंदू और ओबीसी वर्ग को टारगेट कर रही है।
- भगवंत मान ने बीजेपी को ‘स्कूटर पार्टी’ कहा, जबकि सुखबीर बादल ने 2027 में अकाली दल की 100 सीटें जीतने का दावा किया।








