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The News Air - Breaking News - Assam Uniform Civil Code: तीसरा राज्य बना असम, UCC Bill पास, ST को छूट

Assam Uniform Civil Code: तीसरा राज्य बना असम, UCC Bill पास, ST को छूट

असम विधानसभा ने विपक्ष के विरोध के बीच यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल पारित किया, नॉर्थ ईस्ट का पहला राज्य बना, अनुसूचित जनजाति को कानून से बाहर रखा गया

Ajay Kumar by Ajay Kumar
गुरूवार, 28 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय, सियासत
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Uniform Civil Code
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Assam Uniform Civil Code Bill Passed: असम ने इतिहास रच दिया है। राज्य विधानसभा ने कल यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल पारित कर दिया, जिससे असम उत्तराखंड और गुजरात के बाद देश का तीसरा राज्य बन गया है जहां यह कानून लागू होगा। देखा जाए तो यह नॉर्थ ईस्ट का पहला राज्य है जिसने यह साहसिक कदम उठाया है।

यह कदम इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि नॉर्थ ईस्ट एथनिकली सेंसिटिव क्षेत्र है, जहां ट्राइबल कम्युनिटीज की बड़ी आबादी है। लेकिन भाजपा सरकार ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए यह बिल पास करा लिया। हालांकि, अनुसूचित जनजातियों (ST) को इस कानून से बाहर रखा गया है।

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क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड?

समझने वाली बात है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड का सीधा अर्थ है – एक समान नागरिक संहिता। यानी सभी धर्मों के लोगों के लिए शादी, तलाक, संपत्ति, गोद लेने जैसे मामलों में एक ही कानून लागू होगा।

फिलहाल भारत में प्लूरल लीगल सिस्टम चलता है। हिंदुओं के लिए हिंदू मैरिज एक्ट 1955, मुस्लिमों के लिए शरीयत कानून, ईसाइयों के लिए इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट और पारसियों के लिए अलग कानून है। ट्राइबल्स के लिए उनके खुद के कस्टमरी लॉ चलते हैं।

यूसीसी यह कहता है कि चाहे आप किसी भी धर्म के हों, सिविल मामलों में सभी के लिए एक समान कानून होना चाहिए। क्रिमिनल लॉ, कॉन्ट्रैक्ट लॉ और टैक्सेशन तो पहले से ही सभी के लिए एक जैसा है, लेकिन फैमिली लॉ में अभी भी अंतर है।

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संविधान का अनुच्छेद 44: डीपीएसपी में है UCC

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यूसीसी का उल्लेख हमारे संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) में है। यह कहता है कि राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुरक्षित करने का प्रयास करेगा।

लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। यानी कोर्ट में जाकर आप इसे लागू करने की मांग नहीं कर सकते क्योंकि यह मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) में नहीं है।

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डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूसीसी चाहते थे, लेकिन उस समय हालात अनुकूल नहीं थे। माइनॉरिटी ग्रुप्स का विरोध था। इसलिए इसे डीपीएसपी में डाल दिया गया ताकि भविष्य में लागू किया जा सके।

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असम में UCC इतना महत्वपूर्ण क्यों?

अगर गौर करें तो असम का यूसीसी सिर्फ एक साधारण कानून नहीं है। यह कई कारणों से अहम है:

एथनिकली सेंसिटिव: असम में कई जातीय समूह हैं – असमिया, बंगाली, बोडो, मुस्लिम आबादी। यहां एथनिक टेंशन की हिस्ट्री है।

रिलीजियसली पोलराइज्ड: धार्मिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र है। माइग्रेशन पॉलिटिक्स भी यहां बड़ा मुद्दा है।

ट्राइबल आबादी: नॉर्थ ईस्ट में ट्राइबल कम्युनिटीज का अपना कस्टमरी लॉ है। सिक्स्थ शेड्यूल के तहत उन्हें ऑटोनॉमी मिली हुई है।

इसलिए यहां यूसीसी लागू करना राजनीतिक रूप से बेहद जोखिम भरा था।

सिक्स्थ शेड्यूल: ST को क्यों छूट?

समझने वाली बात है कि सिक्स्थ शेड्यूल बेहद शक्तिशाली प्रावधान है। यह नॉर्थ ईस्ट के ट्राइबल एरियाज को विशेष स्वायत्तता देता है।

असम में बोडोलैंड जैसे क्षेत्र सिक्स्थ शेड्यूल के तहत आते हैं। यहां ऑटोनॉमस काउंसिल हैं, जो अपने परंपरागत कानून चला सकती हैं।

इसलिए असम सरकार ने अनुसूचित जनजातियों (ST) को यूसीसी से बाहर रखा है। यह एक राजनीतिक और सामाजिक संतुलन का कदम है ताकि ट्राइबल कम्युनिटीज में विरोध न हो।

असम UCC बिल की मुख्य विशेषताएं

1. बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध (Ban on Polygamy):

यह बिल की सबसे बड़ी विशेषता है। अब असम में कोई भी एक साथ एक से अधिक पति या पत्नी नहीं रख सकता, चाहे वह किसी भी धर्म का हो।

मुस्लिम पर्सनल लॉ में चार शादियों की अनुमति थी, लेकिन अब यह खत्म। अगर आप दूसरी शादी करना चाहते हैं तो पहले तलाक लेना अनिवार्य होगा।

2. शादी का अनिवार्य पंजीकरण:

सभी शादियों का कानूनी रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा। चाहे आप हिंदू तरीके से शादी करें या मुस्लिम निकाह, रजिस्ट्रेशन जरूरी।

इससे फायदा:

  • बाल विवाह रुकेगा
  • धोखाधड़ी वाली शादियों पर रोक
  • महिलाओं को कानूनी संरक्षण
  • मेंटेनेंस राइट्स की सुरक्षा

3. तलाक का उचित पंजीकरण:

तीन तलाक जैसी एकतरफा प्रथाएं बंद। तलाक के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया अनिवार्य।

4. लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन:

यह सबसे विवादास्पद प्रावधान है। अगर कोई जोड़ा बिना शादी के साथ रह रहा है तो उन्हें भी रजिस्ट्रेशन कराना होगा।

सरकार का तर्क: महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए यह जरूरी है। कई बार पुरुष शादी का झूठा वादा कर महिला के साथ रहते हैं और फिर छोड़ देते हैं।

विपक्ष का तर्क: यह निजता के अधिकार (Article 21) का उल्लंघन है। सरकार प्राइवेट लाइफ में दखल दे रही है।

5. बेटियों को समान संपत्ति अधिकार:

बेटियों को विरासत में बराबर का हक मिलेगा। इनहेरिटेंस में जेंडर आधारित भेदभाव खत्म।

6. शादी के लिए समान मानक:

शादी की योग्यता, कानूनी वैधता आदि सभी के लिए स्टैंडर्डाइज हो जाएंगे।

भाजपा का एजेंडा: 2014 से लगातार अमल

दिलचस्प बात यह है कि 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद से भाजपा अपने मैनिफेस्टो को लागू करने में जुटी है:

  • आर्टिकल 370 हटाना (अगस्त 2019)
  • राम मंदिर निर्माण (भूमि पूजन 2020)
  • यूसीसी (राज्य स्तर पर शुरुआत)

कहने का मतलब साफ है कि भाजपा अपने आइडियोलॉजिकल एजेंडे को क्रमिक रूप से लागू कर रही है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार पूरे देश में एक साथ यूसीसी नहीं ला रही। संभवतः बैकलैश के डर से। इसलिए भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू करवाया जा रहा है।

विपक्ष का विरोध: क्या हैं आपत्तियां?

असम विधानसभा में विपक्ष ने जमकर विरोध किया। उनके मुख्य तर्क:

1. धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन:
अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। पर्सनल लॉ धर्म से जुड़े हैं, इसलिए इन्हें संरक्षण मिलना चाहिए।

यूसीसी डीपीएसपी में है, लेकिन अनुच्छेद 25 मौलिक अधिकार है। तो मौलिक अधिकार को ज्यादा महत्व मिलना चाहिए।

2. बहुसंख्यकवाद का खतरा:
विपक्ष का आरोप है कि यूसीसी हिंदू फैमिली लॉ स्ट्रक्चर जैसा ही है। मुस्लिमों पर हिंदू मेजॉरिटी के नॉर्म्स थोपे जा रहे हैं।

3. सांस्कृतिक विविधता का क्षरण:
भारत की खूबसूरती उसकी प्लूरलिज्म, मल्टीकल्चरलिज्म और विविधता में है। सबको एक जैसा बनाने से यह खत्म होगा।

4. निजता का हनन:
लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन से सरकार निजी जीवन में दखल दे रही है।

उत्तराखंड और गुजरात से तुलना

अगर गौर करें तो उत्तराखंड पहला आधुनिक राज्य था जिसने 2024 में यूसीसी लागू किया। वहां भी लिव-इन रजिस्ट्रेशन, कॉमन मैरिज रूल, संपत्ति सुधार शामिल थे।

गुजरात ने भी इसे लागू किया।

असम का मॉडल इनसे मिलता-जुलता है लेकिन:

  • एंटी-पॉलीगैमी पर ज्यादा जोर
  • ट्राइबल एक्जेंपशन (ST को छूट)
  • माइग्रेशन पॉलिटिक्स के संदर्भ में

गोवा में पहले से ही पुर्तगाली युग का कॉमन सिविल कोड चल रहा है, हालांकि वहां भी कुछ छूट हैं।

क्या राज्य खुद से UCC ला सकते हैं?

बिल्कुल। शादी, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार – ये सभी विषय समवर्ती सूची (Concurrent List) में हैं। इसका मतलब संसद और राज्य विधानसभा दोनों ही कानून बना सकते हैं।

इसलिए असम का यूसीसी कानूनी रूप से वैध है।

राष्ट्रीय प्रभाव: क्या होगा आगे?

असम के फैसले से:

  • अन्य भाजपा शासित राज्य प्रोत्साहित होंगे
  • राष्ट्रीय स्तर पर यूसीसी के लिए दबाव बढ़ेगा
  • सुप्रीम कोर्ट में चुनौती संभव (अनुच्छेद 25 के आधार पर)

कहने का मतलब साफ है कि यह बहस अभी खत्म नहीं हुई। यह तो शुरुआत है।

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मुख्य बातें (Key Points)
  • असम ने यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल पारित किया, उत्तराखंड और गुजरात के बाद तीसरा राज्य
  • नॉर्थ ईस्ट का पहला राज्य, राजनीतिक रूप से साहसिक कदम
  • अनुसूचित जनजातियों (ST) को कानून से बाहर रखा गया, सिक्स्थ शेड्यूल की वजह से
  • बहुविवाह (पॉलीगैमी) पर पूर्ण प्रतिबंध, सभी धर्मों पर लागू
  • शादी और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण, लिव-इन रिलेशनशिप भी रजिस्टर करना होगा
  • बेटियों को समान संपत्ति अधिकार, जेंडर आधारित भेदभाव खत्म
  • विपक्ष का विरोध: धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और सांस्कृतिक विविधता पर खतरा
  • संविधान के अनुच्छेद 44 (DPSP) में यूसीसी का उल्लेख, लेकिन अनिवार्य नहीं

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) क्या है और यह क्यों जरूरी है?

उत्तर: यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है सभी धर्मों के नागरिकों के लिए शादी, तलाक, संपत्ति, गोद लेने जैसे सिविल मामलों में एक समान कानून। फिलहाल हर धर्म के अपने पर्सनल लॉ हैं। UCC समर्थकों का कहना है कि इससे कानूनी एकरूपता आएगी और महिलाओं को बेहतर सुरक्षा मिलेगी। लेकिन विरोधियों का मानना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता को प्रभावित करेगा।

प्रश्न 2: असम के UCC में अनुसूचित जनजातियों (ST) को छूट क्यों दी गई?

उत्तर: नॉर्थ ईस्ट में ट्राइबल कम्युनिटीज को सिक्स्थ शेड्यूल के तहत विशेष स्वायत्तता मिली हुई है। उनके अपने परंपरागत कानून और ऑटोनॉमस काउंसिल हैं। अगर ST पर UCC लागू किया जाता तो बड़ा विरोध हो सकता था और सामाजिक अशांति फैल सकती थी। इसलिए राजनीतिक और सामाजिक संतुलन के लिए उन्हें छूट दी गई है।

प्रश्न 3: लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन को लेकर विवाद क्यों है?

उत्तर: असम के UCC में लिव-इन रिलेशनशिप को भी रजिस्टर कराना अनिवार्य किया गया है। सरकार का तर्क है कि इससे महिलाओं को शोषण से बचाव मिलेगा और उन्हें मेंटेनेंस राइट्स मिलेंगे। लेकिन विपक्ष और आलोचकों का कहना है कि यह निजता के अधिकार (Article 21) का उल्लंघन है और सरकार लोगों की प्राइवेट लाइफ में दखल दे रही है। यह बहस जारी है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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