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विश्व स्तर पर मौजूद हैं सात हजार दुर्लभ रोग, इनमें से 80 फीसदी हैं, आनुवांशिक: विशेषज्ञ

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023
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विश्व स्तर
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जालंधर (The News Air): विश्व स्तर पर इस समय सात हजार से अधिक दुर्लभ रोग मौजूद हैं, और इनमें से 80 प्रतिशत आनुवांशिक रोग हैं जो दुनिया की छह से आठ प्रतिशत आबादी को प्रभावित करते हैं। एंडोगैमी (करीबी रिश्तेदारों के बीच विवाह) के प्रचलन ने देश के कुछ क्षेत्रों में उच्च आनुवांशिक रोग (आरजीडी) को बढ़ावा दिया है। ऐसे मामले गरीबों के बीच बड़े पैमाने पर रिपोर्ट किए जाते हैं। डॉ बीआर अंबेडकर स्टेट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, मोहाली में ‘आनुवंशिक रोगों द्वारा उत्पन्न चुनौतियाँ’ विषय पर एक सेमिनार में मुख्य भाषण देने के बाद निवारक स्वास्थ्य के लिए भारतीय चिकित्सा अकादमी के प्रधान अन्वेषक डॉ नरेश पुरोहित ने यूनीवार्ता को बताया कि अपर्याप्त प्रारंभिक निदान प्रणाली और आश्चर्यजनक रुप से उच्च उपचार लागत दुर्लभ आनुवंशिक रोगों (आरजीडी) को एक जटिल चुनौती बनाती है।

डॉ पुरोहित ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति एक हजार लोगों पर एक या उससे कम दुर्लभ बीमारियों के प्रसार का अनुमान है। भारत में ऐसे पांच से 10 करोड़ रोगी होने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि एंडोगैमी के प्रचलन ने देश के कुछ क्षेत्रों में उच्च आरजीडी को बढ़ावा दिया है। ऐसे मामले गरीबों के बीच रिपोर्ट किए जाते हैं और यह समाचार तभी बनते हैं जब प्रभावित परिवारों के इलाज के भारी खर्च को पूरा करने के लिए मदद की मांग सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है। उन्होंने बताया कि दुर्लभ बीमारियों के लिए राष्ट्रीय नीति 2021, प्रमुख चुनौतियों के रुप में जागरुकता, अनुसंधान और सार्वजनिक नीति की कमी को रेखांकित करती है।

उन्होंने कहा कि आमतौर पर, उचित निदान के लिए छह से सात साल लगते हैं। तब तक बच्चे की हालत काफी बिगड़ चुकी होती है। आरजीडी के निदान के लिए भविष्य में तेज, किफायती डायग्नोस्टिक्स विकसित करना महत्वपूर्ण होगा। उन्होंने खुलासा किया कि स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी, एक विकार जो मांसपेशियों को कमजोर करता है और गति को सीमित करता है, सिकल सेल एनीमिया, प्राथमिक इम्यूनोडिफीसिअन्सी विकारों के रुप और मायोपैथी और डिस्ट्रोफी जो प्रगतिशील पेशी अध:पतन का कारण बनते हैं, आरजीडी स्पेक्ट्रम के तहत वर्गीकृत कुछ बीमारियां हैं। उन्होंने कहा कि इन विकारों में से लगभग 95 प्रतिशत में कोई एफडीए-अनुमोदित उपचार नहीं है।

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भारत की आरजीडी रणनीति महामारी विज्ञान के आंकड़ों की कमी से बाधित है। नीति उपलब्ध होने पर उपचारों की अनुपस्थिति और निषेधात्मक रुप से महंगी दवाओं की समस्या को रेखांकित करती है। उन्होंने कहा कि कुछ आरजीडी के इलाज पर 15 करोड़ से 20 करोड़ रुपये का खर्च आता है। प्राथमिक परीक्षण में अक्सर 30,000 रुपये से अधिक का खर्च आ सकता है। उन्होंने कहा, ‘‘बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग सुनिश्चित करने के लिए इन लागतों को काफी हद तक कम करना होगा। व्यापक स्क्रीनिंग होना अत्यधिक वांछनीय है, क्योंकि इसके बाद हम उन माता-पिता को परामर्श प्रदान कर सकते हैं, जो आरजीडी के वाहक हैं। राष्ट्र में प्रसव पूर्व निदान के लिए गैर-इनवेसिव प्रक्रियाएं भी हो सकती हैं, लेकिन इसके लिए कुछ उच्च विज्ञान की आवश्यकता होती है।’’

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