Supreme Court Tiranga Protest का मामला अब सिर्फ राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा असर आम कारोबारियों की जेब पर पड़ना शुरू हो गया है। दिल्ली के सेंट्रल दिल्ली इलाके, खासकर कनॉट प्लेस और जंतर मंतर के आसपास चल रहे लगातार प्रोटेस्ट को लेकर दुकानदारों और व्यापारियों ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनका कहना है कि प्रोटेस्ट की वजह से लगने वाली सुरक्षा बैरिकेडिंग से उनका बिजनेस बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इतना बड़ा संकेत दे दिया कि जरूरत पड़ने पर कारोबारियों को मुआवजा भी दिया जा सकता है।
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दो ट्रेडर्स एसोसिएशन पहुंचे कोर्ट, क्या था आरोप
दिल्ली किराना कमेटी और दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट एसोसिएशन नाम के दो व्यापारी संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उनका कहना था कि प्रोटेस्ट से जुड़ी पुलिस सुरक्षा व्यवस्था और बैरिकेड्स की वजह से ग्राहक दुकानों तक आने से डरते हैं, जिससे उन्हें रोजाना भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इससे रोजाना 200 से 250 करोड़ रुपए तक का नुकसान हो रहा है। हालांकि, इतनी बड़ी रकम का सटीक आकलन करना अपने आप में एक मुश्किल काम माना जा रहा है।
तिरंगा मार्च और डिटेंशन से शुरू हुआ पूरा विवाद
मामले की जड़ में है “लहरा दो तिरंगा” कार्यक्रम, जिसे 16 अक्तूबर शाम 5 बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में आयोजित करने की घोषणा की गई थी। यह आयोजन कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से बुलाया गया था। इसका मकसद यह संदेश देना था कि जिस तरह जंतर मंतर पर सौरव दास और आशुतोष रंका को तिरंगा फहराने की कोशिश में रोका और डिटेन किया गया, क्या अब देश में तिरंगा लहराना भी गुनाह हो गया है।
मार्च से ठीक पहले पार्टी के अभिजीत दीपके और आयशा की चीफ नेहा बोरा को पुलिस ने डिटेन कर लिया। बाद में नेहा बोरा को रिहा कर दिया गया, जबकि अभिजीत दीपके को कोर्ट में पेश किया जाना था।
कई बड़े नेता आए समर्थन में
इस डिटेंशन के बाद कई राजनीतिक दलों ने नाराजगी जताई।
| नेता/पार्टी | बयान |
|---|---|
| ममता बनर्जी, तृणमूल कांग्रेस | इसे अघोषित आपातकाल जैसा बताया |
| अरविंद केजरीवाल | तिरंगा लहराना गुनाह कैसे हुआ, सवाल उठाया |
| एमके स्टालिन, डीएमके | डिटेन एक्टिविस्ट को तुरंत रिहा करने की मांग |
| अखिलेश यादव | नेहा बोरा को रिहा करने की अपील की |
NDMC ने बंद किया सेंट्रल पार्क
व्यापारियों के नुकसान की एक बड़ी वजह न्यू दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल (NDMC) का फैसला भी रहा। कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा तिरंगा मार्च की घोषणा के बाद एनडीएमसी ने प्रशासनिक कारणों से सेंट्रल पार्क को 16 और 17 अक्तूबर को बंद रखने का फैसला किया। समझने वाली बात है कि यही बंदिश सीधे-सीधे वहां के दुकानदारों की कमाई पर असर डाल रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने की। कोर्ट ने स्वीकार किया कि छोटे व्यापारी, हॉकर्स और स्टॉल ओनर्स को इस वजह से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और उनकी आजीविका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसीलिए कोर्ट ने साफ चेतावनी दी कि अगर हालात नहीं सुधरे और संतुलन नहीं बना, तो अदालत इस मामले में सीधा हस्तक्षेप करेगी, क्योंकि यहां लोगों की रोजी-रोटी का सवाल जुड़ा है।
कॉकरोच जनता पार्टी का क्या है पक्ष
पार्टी की तरफ से तर्क दिया जा रहा है कि समस्या उनकी वजह से नहीं, बल्कि सरकार के अनुचित प्रतिबंधों की वजह से है। उनका कहना है कि वे पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से मार्च निकालना चाहते हैं, लेकिन सरकार पूरे सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट को ही बंद कर देती है, जिससे आम कारोबार प्रभावित होता है।
खान मार्केट में भी हुआ नुकसान
कनॉट प्लेस अकेला इलाका नहीं है जहां व्यापारियों ने नुकसान की शिकायत की। खान मार्केट के व्यापारियों ने भी दावा किया है कि दिल्ली में चल रहे प्रोटेस्ट की वजह से उन्हें रोजाना 5 से 7 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। और यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सीजन दिवाली, दशहरा और छठ पूजा जैसे बड़े त्योहारों का है, जब सबसे ज्यादा कमाई होती है।
संविधान क्या कहता है राइट टू प्रोटेस्ट पर
यहां समझने वाली बात यह है कि संविधान शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट को गैरकानूनी नहीं मानता। यह एक संवैधानिक अधिकार है और किसी भी लोकतांत्रिक देश में इसे छीना नहीं जा सकता। लेकिन राइट टू प्रोटेस्ट का मतलब यह भी नहीं कि प्रदर्शनकारियों को पब्लिक स्पेस पर असीमित कब्जे का अधिकार मिल जाए। दूसरी ओर, अनुच्छेद 19(1)(g) में व्यापार करने का अधिकार भी दर्ज है, लेकिन इसमें भी कुछ हद तक प्रतिबंध हैं।
| अनुच्छेद | प्रावधान |
|---|---|
| अनुच्छेद 19(1)(a)/(b) | शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार |
| अनुच्छेद 19(1)(g) | व्यापार करने का अधिकार |
| अनुच्छेद 21 | जीवन और निजी स्वतंत्रता की सुरक्षा |
अनुच्छेद 21 भी इस मामले में अहम है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे जीवन, आजीविका और मानवीय गरिमा की सुरक्षा से जोड़कर व्याख्यायित किया है। 1985 के एक पुराने मामले में भी यही सिद्धांत दिया गया था कि सार्वजनिक प्राधिकरण मनमाने और गैरकानूनी प्रतिबंध नहीं लगा सकते।
मुआवजे की बात आई तो उठा बड़ा सवाल
इससे साफ होता है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह तक संकेत दे दिया कि अगर प्रोटेस्ट इसी तरह लगातार चलते रहे और भारी पुलिस बंदोबस्त जारी रहा, तो व्यापारियों को मुआवजा भी दिया जा सकता है। सवाल उठता है कि आखिर यह मुआवजा देगा कौन? जाहिर है, प्रदर्शनकारी तो यह भुगतान नहीं करेंगे, आखिरकार यह जिम्मेदारी सरकार यानी जनता के पैसे पर ही आ जाएगी।
समाधान के तौर पर क्या सुझाव दिए जा रहे
डेज़िग्नेटेड प्रोटेस्ट लोकेशन जैसे सुझाव पहले से चर्चा में हैं। हाल ही में सरकार ने जंतर मंतर को डीनोटिफाई कर बुराड़ी, रामलीला मैदान, सीडब्ल्यूजी ग्राउंड और शाहदरा जैसी जगहें आवंटित करने का फैसला लिया। हालांकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ये जगहें काफी दूर हैं और रामलीला मैदान जैसी जगह के लिए पैसे देकर बुकिंग करानी पड़ती है, जो प्रोटेस्ट की मूल भावना के ही खिलाफ है।
मुख्य बातें (Key Points)
- व्यापारी संगठनों ने प्रोटेस्ट से रोजाना 250 करोड़ के नुकसान का दावा किया।
- सुप्रीम कोर्ट ने छोटे व्यापारियों की आजीविका पर चिंता जताते हुए हस्तक्षेप की चेतावनी दी।
- कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके और नेहा बोरा तिरंगा मार्च से पहले डिटेन हुए।
- कोर्ट ने जरूरत पड़ने पर मुआवजे तक का संकेत दिया है।













