Social Media Ban For Children Supreme Court –देश की सबसे बड़ी अदालत Supreme Court ने नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सबसे बड़ा सवाल उठा दिया है। कोर्ट ने साफ-साफ पूछा है—जब भारत का कानून 18 साल से कम उम्र के बच्चे को जमीन का टुकड़ा या साइकिल तक खरीदने का कानूनी अधिकार नहीं देता, तो Facebook, Instagram, Snapchat जैसी विदेशी कंपनियां 13 साल के बच्चे का अकाउंट कैसे बनवा रही हैं?
आज बात आपके घर के सबसे बड़े खतरे की। बात आपके उस बच्चे की, जिसके हाथ में दिन-रात स्मार्टफोन चिपका रहता है। बात उस Instagram रील्स की, उस Snapchat की, उस Facebook और TikTok जैसी दुनिया की जहां आपके मासूम बच्चे हर सेकंड एक बड़े जाल में फंस रहे हैं।
लेकिन अब… अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस पर सबसे बड़ा प्रहार किया है। कानून की धज्जियां उड़ाकर यह डिजिटल कंपनियां हमारे बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कैसे कर सकती हैं?
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28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
दरअसल 28 सितंबर को Supreme Court के Chief Justice Suryakant, Justice Joy Malya Bakshi और Justice V Mohana की पीठ में एक बहुत बड़ी याचिका पर सुनवाई हुई।
याचिका किसने लगाई? एक NGO Just Rights for Children Alliance ने। अदालत में याचिकाकर्ता के वकील सीनियर एडवोकेट HS Phoolka ने जो बात रखी, उसने केंद्र सरकार से लेकर टेक कंपनियों तक की नींद उड़ा दी।
वकील ने क्या कहा जिसने कोर्ट रूम में हलचल मचा दी?
सीनियर एडवोकेट फूलका ने अदालत से कहा: “साहब, Indian Contract Act के तहत 18 साल से कम उम्र का बच्चा कोई कानूनी समझौता कर ही नहीं सकता। जब वह समझौता कर ही नहीं सकता, तो यह टेक कंपनियां नियम-शर्तों वाले बॉक्स पर टिक करवाकर 13 साल के बच्चे का अकाउंट कैसे खोल रही हैं? यह पूरी तरह से void है।”
यानी कानून की नजर में अमान्य है, गैरकानूनी है। देखा जाए तो यह सीधे-सीधे बड़ी टेक कंपनियों के खिलाफ एक बड़ा आरोप था।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से क्या कहा?
और जानते हैं इस पर अदालत ने क्या कहा? Justice Joy Malya Bakshi ने केंद्र सरकार के Solicitor General Tushar Mehta से सीधे-सीधे कहा: “सिर्फ खोखली गाइडलाइन से काम नहीं चलेगा। दिशा-निर्देश तो सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाते हैं। अब वक्त आ गया है कि इसे IT नियमों के तहत एक बाध्यकारी कानूनी प्रावधान बनाया जाए।”
अदालत का सीधा आदेश था: “अपनी टेक्नोलॉजी और सॉफ्टवेयर को भारतीय कानून के मुताबिक ढालिए। सॉफ्टवेयर भारत के संविधान और कानून से ऊपर नहीं हो सकता।”
यह दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट अब बड़ी टेक कंपनियों की मनमानी बर्दाश्त नहीं करेगा।
सरकार का क्या जवाब आया?
इस पर सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि सरकार इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से ले रही है और इस पर कड़ा कानूनी ढांचा तैयार करेगी।
अब आप सोच रहे होंगे कि अगर यह कानून बन गया तो बदलाव क्या आएगा?
याचिका में मांगे गए तीन बड़े बदलाव
याचिका में तीन बेहद कड़े और बड़े सुझाव दिए गए हैं:
1. माता-पिता की मर्जी अनिवार्य
18 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा बिना अपने माता-पिता की लिखित या डिजिटल सहमति के सोशल मीडिया पर अकाउंट नहीं बना पाएगा।
2. अभिभावकों की eKYC जरूरी
सिर्फ एक क्लिक करने से काम नहीं चलेगा। बच्चे के अकाउंट के लिए माता-पिता का eKYC यानी Aadhaar या सरकारी पहचान पत्र अनिवार्य होगा।
3. उम्र का कड़ा वेरिफिकेशन
टेक कंपनियों को ऑटोमेटेड Age Verification और Content Filtering Tool लगाने होंगे।
आज क्या है हकीकत?
आज Facebook और Snapchat जैसे प्लेटफार्म 13 साल की उम्र में ही बच्चे को अकाउंट बनाने की छूट दे देते हैं। बच्चा अपनी फर्जी उम्र डालता है और साइबर दुनिया के गहरे दलदल में कूद जाता है।
चिंता का विषय यह है कि यह लड़ाई सिर्फ एक अकाउंट खोलने या बंद करने की नहीं है। यह लड़ाई हमारे बच्चों की सुरक्षा की है।
बच्चों पर क्या खतरा है?
याचिका में साफ-साफ कहा गया है कि सख्त से सख्त कानून के बावजूद यह इंटरनेट प्लेटफार्म बच्चों को Child Sexual Abuse Material (CSAM) और अश्लील कंटेंट को फैलाने से रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं।
इसके अलावा:
- ऑनलाइन बुलिंग और साइबर स्टॉकिंग का खतरा
- डार्क वेब का जाल
- मानसिक Depression और आत्महत्या के मामले
18 साल से कम उम्र के बच्चे मानसिक रूप से इतने परिपक्व नहीं होते कि वो इन डिजिटल दरिंदों का सामना कर सकें।
जब कानून वोट नहीं देने देता, तो सोशल मीडिया क्यों?
सीनियर एडवोकेट HS Phoolka ने कोर्ट में बहुत पते की बात कही: “जब कानून उन्हें वोट देने का अधिकार 18 साल से पहले नहीं देता, जब कानून उन्हें गाड़ी चलाने का लाइसेंस 18 साल से पहले नहीं देता, तो फिर सोशल मीडिया के इस खतरनाक जाल में उन्हें अकेले बिना पहरेदार के कैसे छोड़ा जा सकता है?”
समझने वाली बात यह है कि हमें नए Data Protection Bill का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। मौजूदा भारतीय कानून ही नाबालिगों के कॉन्ट्रैक्ट पर रोक लगाता है।
अब गेंद सरकार के पाले में
Supreme Court का रुख एकदम साफ है। टेक कंपनियों की मनमानी अब भारत में नहीं चलेगी। विदेशी कंपनियों को अपने सॉफ्टवेयर और अपनी बिजनेस मॉडल को भारत के कानूनों के हिसाब से बदलना होगा।
बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन की आजादी हो या उनकी सुरक्षा का मजबूत कवच—फैसला अब आने वाला है।
हैरान करने वाली बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय देशों में पहले से ही बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सख्त कानून हैं। लेकिन भारत में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया था।
उम्मीद की किरण यह है कि अब सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद सरकार जल्द ही एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करेगी।
मुख्य बातें (Key Points)
- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा—18 साल से कम उम्र के बच्चे कानूनी समझौता नहीं कर सकते, तो सोशल मीडिया अकाउंट कैसे बना रहे हैं?
- Just Rights for Children Alliance की याचिका पर सुनवाई
- कोर्ट ने कहा—सॉफ्टवेयर भारतीय संविधान से ऊपर नहीं
- माता-पिता की अनुमति, eKYC और Age Verification अनिवार्य करने की मांग
- Child Sexual Abuse Material, साइबर बुलिंग और डिप्रेशन का बढ़ता खतरा











