Indian Youth Unemployment Living Parents: सुबह के 8 बजे हैं। रसोई में मां पराठे बना रही है, पिताजी अखबार पढ़ रहे हैं और टेबल पर एक 30 साल का युवक बैठा है। कुछ नहीं कहा जा रहा, लेकिन इस खामोशी में बहुत कुछ कहा जा रहा है। पिताजी अखबार पलटते हुए पूछते हैं – “फॉर्म भरा?” मां पराठा रखती है और धीरे से कहती है – “शर्मा जी के बेटे का रिश्ता पक्का हो गया।”
यह दृश्य शायद आपके घर का हो या आपके पड़ोसी के घर का। समझने वाली बात यह है कि यह सिर्फ भारत की कहानी नहीं है – दुनिया भर में यह समस्या बढ़ रही है।
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2023 में इटली के पाविया शहर में एक 75 साल की मां कोर्ट गई। उसने अपने दो बेटों – एक 40 साल का और दूसरा 42 साल का – को घर से निकालने की अपील की। दोनों नौकरी करते थे लेकिन न घर में एक रुपया देते थे और न कोई काम करते थे।
जज ने क्या कहा? उन्होंने कहा कि कानून में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि एक वयस्क बच्चा माता-पिता के घर में उनकी मर्जी के खिलाफ सिर्फ रिश्ते की वजह से रह सके। दोनों बेटों को 18 दिसंबर तक घर खाली करने का आदेश दे दिया गया।
अब जरा सोचिए – क्या भारत में कभी कोई मां ऐसा करेगी? इसका जवाब आपको पता है और इसी जवाब में पूरी कहानी छुपी है।
दुनिया भर में युवा क्यों रह रहे हैं माता-पिता के साथ?
Pew Research के आंकड़ों के मुताबिक, 18 से 34 साल के युवाओं में कितने लोग अपने माता-पिता के साथ रहते हैं – इसके चौंकाने वाले आंकड़े हैं:
• डेनमार्क में 16%
• स्वीडन में 17%
• फिनलैंड में 18%
• अमेरिका में लगभग 33% (यानी हर तीन में से एक)
• इटली में 71%
• ग्रीस में 73%
• क्रोएशिया में 77%
अब एक और आंकड़ा देखिए – लोग घर छोड़ते आमतौर पर किस उम्र में हैं? Eurostat के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक:
• फिनलैंड में 21.4 साल
• डेनमार्क में 21.8 साल
• पूरे यूरोप का औसत 26.3 साल
• इटली और स्पेन में 30.2 साल
• क्रोएशिया में लगभग 31.5 साल
दिलचस्प बात यह है कि एक ही महाद्वीप में एक देश के नौजवान 21 में घर छोड़ देते हैं और दूसरे देश में 31 साल में – यानी लगभग 10 साल का फर्क!
भारत में क्या है स्थिति?
CSDS और लोकनीति के एक बड़े सर्वे में 19 राज्यों के 15 से 34 साल के हजारों नौजवानों से बात की गई। इसमें से 65% अपने माता-पिता के साथ ही रह रहे थे। 30 से 34 साल के लोगों में हर तीन में से एक अभी भी माता-पिता के साथ रह रहा था।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस सर्वे ने उन लोगों को अलग गिना था जो अपनी पत्नी या पति के साथ रह रहे हैं। भारत में शादी के बाद भी बेटा अक्सर उसी घर में रहता है – बस अब उसकी पत्नी भी उसके साथ होती है। यानी भारत में असली आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है।
क्या युवा आलसी हैं? बिल्कुल नहीं!
यहां एक आंकड़ा है जो पूरी बात को बदल कर रख देता है। Eurostat ने एक और चीज देखी – जिन देशों में नौजवान जल्दी घर छोड़ देते हैं, वहां रोजगार भी ज्यादा होता है:
• नीदरलैंड्स में 20 से 29 साल के 84% लोग काम कर रहे हैं
• जर्मनी में 77%
• डेनमार्क में करीब 75%
• इटली में सिर्फ 47.6% युवा काम कर रहे हैं (पूरे यूरोप में सबसे कम)
और यही इटली है जहां लोग सबसे देर से घर छोड़ते हैं। मतलब साफ है – घर छोड़ना आदत से नहीं होता, नौकरी पर निर्भर है। जहां नौकरी उपलब्ध है, वहां नौजवान अपने आप घर छोड़कर चले जाते हैं।
भारत में बेरोजगारी का असली चेहरा
ILO (International Labour Organization) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के बेरोजगारों में पढ़े-लिखे नौजवानों का हिस्सा साल 2000 में 35.2% था। यह 2022 में बढ़कर हो गया है 65.7%।
एक बार फिर से सुनिए – आज भारत के हर तीन बेरोजगार में से दो पढ़े-लिखे हैं!
PLFS 2025 के मुताबिक देश में बेरोजगारी 3.1% है। लेकिन 15 से 29 साल के नौजवानों में यह 9.9% है – यानी करीब तीन गुना।
सरकारी नौकरी का सपना
अब वो आंकड़ा देखिए जो इस पूरी कहानी की असली कुंजी है। उसी CSDS सर्वे में पूछा गया – अगर चुनने का मौका मिले तो आप कौन सी नौकरी चाहेंगे?
• 65% लोगों ने कहा – सरकारी नौकरी
• 19% ने कहा – अपना बिजनेस
• सिर्फ 7% ने कहा – प्राइवेट नौकरी
यूपी पुलिस भर्ती की कहानी
उत्तर प्रदेश 2024 पुलिस कांस्टेबल की भर्ती। पोस्ट निकली थी करीब 60,244। कितने फॉर्म भरे गए? करीब 48 लाख! यानी एक पोस्ट पर करीब 80 लोग।
फरवरी 2024 में परीक्षा हुई। उसके बाद पेपर लीक की खबर आई और परीक्षा रद्द हो गई। दोबारा परीक्षा अगस्त में हुई।
अगर गौर करें तो जरा एक सेकंड के लिए उस एक लड़के के बारे में सोचिए जो उन 48 लाख में से एक था। उसने एक साल पढ़ाई की, कोचिंग की फीस भरी, शायद शहर में कमरा लिया होगा, परीक्षा दी होगी। फिर पता चला – पेपर लीक हो गया।
अब वो क्या करेगा? वो वापस घर चला जाएगा और 6 महीने और इंतजार करेगा। और 6 महीने में हर सुबह वही टेबल, वही अखबार और वही सवाल – “फॉर्म भर दिया?”
शादी का बाजार क्या कह रहा है?
घर में एक लाइन बहुत बोली जाती है – “शादी कर दो, सब ठीक हो जाएगा। जिम्मेदारी आएगी तो अपने आप सुधर जाएगा।”
लेकिन अब दूसरी तरफ देखिए। 22 दिसंबर 2022 को महाराष्ट्र का सोलापुर। 50 कुंवारे लड़के दूल्हे के कपड़ों में घोड़े पर बैठकर, बैंड-बाजे के साथ कलेक्टर के दफ्तर पहुंचे। उनकी मांग थी – हमें दुल्हन दिलवा दीजिए।
और यह मजाक नहीं है। उनमें एक थे शिलवांत खिरसागर। उनकी उम्र है 29 साल। उनके लिए 25 रिश्ते आए और 25 ने मना कर दिया। क्यों? क्योंकि वह गांव में डेयरी का काम करते थे और शहर में उनके पास नौकरी नहीं थी।
दोनों बातों को एक साथ रखिए। घर कहता है – पहले शादी कर लो। शादी का बाजार कहता है – पहले नौकरी लग जाए। और लड़का बीच में फंस जाता है।
नौकरी के बिना उसे रिश्ता नहीं मिलता। रिश्ते के बिना उसकी इज्जत नहीं होती।
शादी की लागत – एक गणित
Jefferies की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एक औसत शादी पर करीब ₹12 लाख खर्च होते हैं। एक औसत भारतीय परिवार की साल भर की कमाई होती है करीब ₹4 लाख।
यानी एक दिन की शादी = 3 साल की कमाई के बराबर खर्चा!
उसी रिपोर्ट के मुताबिक, एक बच्चे की 18 साल की पढ़ाई पर (नर्सरी से ग्रेजुएशन तक) करीब ₹6 लाख खर्च होते हैं। यानी शादी पढ़ाई से दो गुना महंगी है!
अब इसको उस टेबल से जोड़िए जहां:
• बेटा बेरोजगार है
• पिताजी की नौकरी या खेती से घर चल रहा है
• बेटा कोचिंग की फीस ले रहा है (पिताजी की बचत से)
• फिर घर वालों ने सोचा – शादी कर दो, सुधर जाएगा
• शादी पर 3 साल की कमाई और लग गई (अक्सर कर्जा लेकर)
• अब उसी एक कमाई पर एक और इंसान भी आ गया
• साल-दो साल में एक बच्चा भी पैदा हो जाता है
कमाने वाला एक ही है। खाने वाले धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं। जो बचत बुढ़ापे के लिए थी, वो पहले कोचिंग में गई, फिर शादी में गई।
यही वो तरीका है जिससे एक ठीक-ठाक परिवार बिना किसी हादसे के धीरे-धीरे गरीबी की तरफ खिसकता चला जाता है।
माता-पिता के साथ रहना गलत नहीं
ईमानदारी से देखिए – माता-पिता के साथ रहना कोई गलत काम नहीं है। हमारे यहां साथ रहना सिर्फ मजबूरी नहीं है, वो देखभाल भी है। बूढ़े माता-पिता अकेले नहीं होते। बच्चे दादा-दादी के साथ बड़े हो जाते हैं। किराया भी बच जाता है।
Pew Research के आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि अमेरिका जैसे देश में भी अब ज्यादा नौजवान माता-पिता के पास लौट रहे हैं – क्योंकि घर बहुत महंगे हो गए हैं।
यानी दुनिया धीरे-धीरे वही कर रही है जो हम हमेशा से करते आए हैं।
असली समस्या क्या है?
असली समस्या यह नहीं है कि 30 साल का बेटा माता-पिता के घर में रह रहा है। वो इटली में भी रह रहा है, क्रोएशिया में भी रह रहा है।
असली समस्या यह है कि वो वहीं इंतजार कर रहा है।
घर में रहना समस्या नहीं है। घर में इंतजार करना समस्या है। इंतजार कर रहा है:
• एक फॉर्म का
• एक रिजल्ट का
• एक पेपर लीक के बाद दोबारा परीक्षा के
• एक सरकारी नौकरी का जिसके लिए 80 लोग एक कुर्सी के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं
जब तक वो इंतजार खत्म नहीं होता, तब तक वो घर से निकल नहीं सकता, न शादी कर सकता है, न अपने माता-पिता का सहारा बन सकता है। और उस इंतजार का बिल पूरे परिवार की बचत से भरा जा रहा है।
समाधान क्या हो सकता है?
पांच चीजें हैं जो हम कर सकते हैं:
पहला: इंतजार की एक तारीख तय कर लीजिए – दो अटेम्प्ट या तीन साल। उसके बाद प्लान B। और यह तारीख पूरा घर मिलकर तय करे।
दूसरा: प्लान B बाद में नहीं, साथ में शुरू करिए। तैयारी के साथ कोई हुनर, कोई पार्ट टाइम काम, कोई अप्रेंटिसशिप। प्लान B को हार की तरह मत देखिए।
तीसरा: घर में कुछ न कुछ आपका योगदान होना चाहिए – चाहे ₹2000 महीना हो, चाहे घर की पूरी जिम्मेदारी।
चौथा: शादी को समाधान मत बनाइए। शादी बेरोजगारी ठीक नहीं करती – वो उसे दोगुना कर देती है।
पांचवां: वो जो पूछते हैं “क्या कर रहे हो?” – इसकी जगह पूछना चाहिए “कैसा चल रहा है?”
मुख्य बातें (Key Points)
• भारत में 65% युवा (15-34 साल) माता-पिता के साथ रह रहे हैं
• देश के हर तीन बेरोजगार में से दो पढ़े-लिखे हैं (65.7%)
• 65% युवा सरकारी नौकरी चाहते हैं, सिर्फ 7% प्राइवेट में
• असली समस्या घर में रहना नहीं, बल्कि नौकरी का इंतजार करना है













