Election Commission Controversy India: देश के इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया में आंतरिक मतभेद का मामला गरमाता जा रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार और बाकी के दो इलेक्शन कमिश्नरों – डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी – के बीच कई महत्वपूर्ण निर्णयों को लेकर असहमति रही है।
देखा जाए तो यह सिर्फ एक आंतरिक मामला नहीं रह गया है। विपक्षी पार्टियां अब चीफ इलेक्शन कमिश्नर के इंपीचमेंट की मांग कर रही हैं। यहां तक कि अरविंद केजरीवाल ने मांग की है कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर को गिरफ्तार किया जाए और उनके कार्यकाल में हुए सभी चुनाव दोबारा कराए जाएं।
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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 महीनों में दोनों इलेक्शन कमिश्नरों – संधू जी और जोशी जी – ने कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई थी। यह आपत्तियां नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाताओं को हटाने, हटाए गए मतदाताओं को बहाल करने, फॉर्म 6, पश्चिम बंगाल में मतदाताओं से संबंधित अपीलों, ERO नेट, ECI नेट जैसे कई मुद्दों को लेकर थीं।
क्या है पूरा विवाद?
समझने वाली बात यह है कि यहां मुद्दा सिर्फ मतभेद का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या जो भी महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए – चाहे वोटर रजिस्ट्रेशन को लेकर हों, वोटर डिलीशन को लेकर हों, वोटर रिस्टोरेशन को लेकर हों या टेक्नोलॉजिकल कंट्रोल को लेकर हों – क्या वे आपस में सहमति बनाकर लिए गए?
इंडियन एक्सप्रेस का आरोप है कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार ने कई बार अकेले निर्णय ले लिए और बाकी के दो इलेक्शन कमिश्नरों को उनके बारे में नहीं बताया गया।
कैसे काम करता है इलेक्शन कमीशन?
अगर गौर करें तो आज के समय में हमारे इलेक्शन कमीशन में तीन सदस्य होते हैं। वर्तमान में चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार हैं और दो इलेक्शन कमिश्नर हैं – डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर “First Among Equals” होते हैं। यानी अगर कोई निर्णय लेना है और आपस में मतभेद होता है, तो आर्टिकल 324 के मुताबिक पहले तो सभी को मिलकर सर्वसम्मति से निर्णय लेने की कोशिश करनी चाहिए।
लेकिन अगर फिर भी बात नहीं बनती है, तो तीनों इलेक्शन कमिश्नरों के बीच वोटिंग होगा और जो बहुमत में रहेगा, उसका निर्णय मान्य होगा। मतलब अगर चीफ इलेक्शन कमिश्नर कुछ कह रहे हैं लेकिन बाकी के दो इलेक्शन कमिश्नरों का कुछ और कहना है, तो उन दोनों की बात मानी जाएगी।
फॉर्म 6 को लेकर क्या था विवाद?
पहला बड़ा मुद्दा फॉर्म 6 को लेकर है। जब किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में नहीं होता है – जैसे कोई 18 साल का हुआ – तो उसे फॉर्म 6 भरना होता है।
हाल ही में इलेक्शन कमीशन ने फॉर्म 6 में कुछ अतिरिक्त प्रश्न जोड़ दिए। जैसे – क्या पिछले SIR में आपका नाम था? क्या ग्रैंड पेरेंट्स का नाम पिछली वोटर लिस्ट में था? क्या आपके किसी पेरेंट का नाम पहले दर्ज था?
इन अतिरिक्त प्रश्नों को लेकर संधू जी और जोशी जी ने आपत्ति उठाई। उनका कहना था कि फॉर्म 6 में बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के बदलाव नहीं किए जा सकते। अगर सरकार कानून में संशोधन करती है तभी ऐसे परिवर्तन किए जा सकते हैं।
विवेक जोशी जी ने मई 2026 में यह चिंता व्यक्त की थी और संधू जी ने 13 अगस्त को औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई थी।
SIR क्या है और इससे क्यों मतभेद?
SIR (Special Intensive Revision) एक ऐसा अभ्यास होता है जिसमें इलेक्शन कमीशन यह जांचता है कि मतदाता सूची सही है या नहीं। इसमें पात्र नागरिक, सही पते, डुप्लीकेट एंट्री नहीं होनी चाहिए – यह सब देखा जाता है।
आपको याद होगा, पिछले साल बिहार चुनाव से पहले पहली बार SIR किया गया था। इसमें बहुत से लोगों के नाम हटाए गए थे। फिर धीरे-धीरे पूरे देश में यह अभ्यास चला और 30 राज्यों में लगभग 13 करोड़ नामों को जांचा गया।
दिलचस्प बात यह है कि 13 करोड़ नागरिकों के वोटिंग अधिकार नहीं छीने गए। अगर किसी को लगता है कि गलती से उनका नाम हटा दिया गया है, तो वे उचित तरीके से आपत्ति दर्ज करा सकते हैं।
वोटर डेटाबेस के नियंत्रण पर विवाद
दूसरा बड़ा मुद्दा वोटर डेटाबेस के नियंत्रण को लेकर है। परंपरागत रूप से, किसी इलाके में कितने लोगों का नाम वोटर लिस्ट में होगा – यह निर्णय काफी विकेंद्रीकृत तरीके से लिया जाता था।
यहां मुख्य व्यक्ति Electoral Registration Officer (ERO) होता था। ERO की जिम्मेदारी होती थी – रोल तैयार करना, दावों और आपत्तियों को देखना, नामों को जोड़ना और हटाना।
इंडियन एक्सप्रेस का कहना है कि ERO आमतौर पर सब डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (SDM) हुआ करता था। लेकिन हाल ही में इलेक्शन कमीशन ने कुछ वेबसाइट और ऐप लॉन्च किए – जैसे ERO Net और ECI Net।
ERO Net का उपयोग electoral roll management के लिए किया जाता है। ECI Net एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां 40 एप्लिकेशन और पोर्टल्स को मर्ज कर दिया गया। इसे 22 जनवरी 2026 को लॉन्च किया गया था।
केंद्रीकरण की चिंता
विवेक जोशी जी ने मई 2026 में इसी को लेकर आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि कहीं न कहीं पूरे इलेक्टोरल रोल डेटाबेस को केंद्रीकृत करने की कोशिश की जा रही है।
पहले यह विकेंद्रीकृत था – जमीनी स्तर पर SDM और ERO तय करते थे कि किसका नाम रहेगा। लेकिन यह प्लेटफॉर्म लॉन्च करके ऊपरी स्तर से बदलाव करने की कोशिश हो रही थी।
इसलिए जोशी जी ने कहा कि इसका उचित ऑडिट मैकेनिज्म होना चाहिए – कौन इस प्लेटफॉर्म को एक्सेस कर सकता है, कौन बदलाव कर सकता है।
संचार में पारदर्शिता का अभाव?
तीसरा बड़ा मुद्दा यह था कि इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के नाम पर जो संदेश जनता को भेजे जा रहे थे, उनमें बाकी के इलेक्शन कमिश्नरों से सहमति नहीं ली गई।
16 अप्रैल 2026 को संधू जी ने लिखा कि बहुत सारे संदेश जनता को भेजे जा रहे हैं – इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के नाम पर। लेकिन उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया जा रहा है।
उनका कहना था कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर खुद निर्णय ले लेते हैं और संदेश भेज दिया जाता है। यह सही नहीं होना चाहिए।
इलेक्शन कमीशन का जवाब
जैसे ही यह रिपोर्ट सामने आई, इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया ने तुरंत काउंटर किया। उन्होंने कहा कि आंतरिक नोट्स और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हैं। अगर हर समय सब एक ही बात पर सहमत रहेंगे, तो यह तानाशाही होगी।
लिखित आपत्तियां काफी सामान्य हैं। तकनीकी सुझाव दिए जा रहे थे। आंतरिक चेक और बैलेंस भी सामान्य हैं।
इलेक्शन कमीशन का कहना है कि SIR और बाकी जो निर्णय हैं, अंततः तीनों कमिश्नरों ने मिलकर ही लिए। हो सकता है कुछ असहमति रही हो, कुछ मुद्दे रहे हों। लेकिन जब अंतिम निर्णय लिया गया, वह आपसी सहमति के बाद ही लिया गया था।
ऐतिहासिक तुलना
अगर गौर करें तो पहले भी इस तरह की चीजें हुई हैं। 2009 में जब UPA सरकार सत्ता में थी, तो एन. गोपालस्वामी और नवीन चावला के बीच मतभेद हुए थे।
एन. गोपालस्वामी चीफ इलेक्शन कमिश्नर थे। उन्होंने सरकार से कहा था कि नवीन चावला किसी पार्टी का पक्ष ले रहे हैं। उन्होंने सरकार से नवीन चावला को हटाने की मांग की थी। लेकिन सरकार ने उनकी बात नहीं मानी और चावला जी आगे चलकर चीफ इलेक्शन कमिश्नर भी बन गए।
2019 में अशोक लवासा का मामला भी हुआ था। उस समय लोकसभा चुनाव के दौरान इलेक्शन कमिश्नर अशोक लवासा बहुमत के निर्णयों से खुश नहीं थे। मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट से संबंधित शिकायतों को लेकर उन्होंने असहमति जताई थी।
उन्होंने कहा था कि चूंकि वह अल्पमत में हैं, इसलिए उनकी असहमति दर्ज की जाए। इलेक्शन कमीशन ने कहा कि असहमति फाइल में दर्ज होगी लेकिन अंतिम आदेश में नहीं लिखी जाएगी। इसको लेकर भी विवाद हुआ था।
मुख्य बातें (Key Points)
• चीफ इलेक्शन कमिश्नर और दो अन्य कमिश्नरों के बीच 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज हुईं
• विवाद फॉर्म 6, ERO Net, ECI Net और वोटर डेटाबेस नियंत्रण को लेकर हैं
• विपक्ष ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर के इंपीचमेंट की मांग की है
• इलेक्शन कमीशन ने कहा कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए













