Government Media Control: अगर किसी को पूरे देश की राय पर नियंत्रण करना है, तो न्यूज़ एजेंसियां, अखबार और टीवी चैनल – तीनों पर कब्जा जरूरी है। ये तीनों अगर चाहें तो लोगों को सरकार के समर्थन या विरोध में खड़ा करने का दम रखते हैं। क्योंकि आम जनता खुद तो लोकेशन पर जाकर जानकारी कंफर्म नहीं करती, वो तो इन सबके माध्यम से जो बताया जाता है वही मानती है।
अब अगर ये तीनों मिलकर बैक-टू-बैक न्यूज़ देने लगें कि अगले क्वार्टर में भारत सुपरपावर हो जाएगा, तो आप अलग-अलग विभागों में RTI डालकर खुद सारा डाटा तो कंफर्म नहीं करते। आप मान लेते हैं। देखा जाए तो न्यूज़ मीडिया किसी भी देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है। इसीलिए इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ (Fourth Pillar of Democracy) भी कहा जाता है।
लेकिन सवाल यह है – क्या यह चौथा स्तंभ वास्तव में स्वतंत्र है? या फिर सरकारों के पास इसे नियंत्रित करने के तरीके हैं? आज हम इसी की पूरी कहानी समझेंगे।
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मीडिया – सरकार का असली विपक्ष या नियंत्रित हथियार?
गवर्नमेंट का असली विपक्ष जो होता है, वो मीडिया ही होता है – कम से कम सिद्धांत में तो यही कहा जाता है। दुनियाभर की सरकारें जब युद्ध वगैरह पर जाती हैं, तो सैनिकों से पहले न्यूज़ मीडिया को तैयार करती हैं, ताकि लोगों को समझाया जा सके कि यह युद्ध करना देश के लिए कितना जरूरी है।
जब हमारा देश आजाद हुआ, तो महात्मा गांधी जी ने “इंडियन ओपिनियन” नाम से एक अखबार चलाया था। नेहरू जी ने “नेशनल हेराल्ड” नाम से एक न्यूज़पेपर चलाया था। उद्देश्य क्या था? ताकि वे लोगों को असलियत समझा सकें कि वे जो गरीबी में जी रहे हैं, गुलामी में हैं, वह उनकी अपनी गलतियों की वजह से नहीं, बल्कि अंग्रेजों की गलतियों की वजह से है।
तभी सारे लोग एकजुट हो पाए। अगर आज की तरह उस समय अखबार ब्रिटिशर्स के हाथों बिक जाते, तो बड़ी आसानी से सबको समझा दिया जाता कि ईस्ट इंडिया कंपनी देश के लिए कितनी फायदेमंद है।
समझने वाली बात यह है कि जब एक राजनीतिक पार्टी न्यूज़ मीडिया को कंट्रोल कर लेती है, तब वो लोगों को वो चीज भी इनडायरेक्टली समझा पाती है जो वो खुलेआम नहीं बोल सकती।
वोट भी नियंत्रित सूचना से प्रभावित होता है
आप जो वोट देते हैं किसी कैंडिडेट को, वो आप देते हैं उपलब्ध जानकारी के आधार पर। उस कैंडिडेट के बारे में। अगर वो जानकारी ही गलत हो, तो आपको लग रहा है कि आप अपनी मर्जी से वोट दे रहे हैं, लेकिन आपसे वोट डलवाया जा रहा है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह कोई षड्यंत्र सिद्धांत नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक सच्चाई है। जिसका उदाहरण हम आगे देखेंगे।
विज्ञापन – मीडिया की जीवनरेखा और सरकार का हथियार
चाहे न्यूज़पेपर हो या फिर टीवी चैनल, सबके अस्तित्व के लिए विज्ञापन कितना जरूरी है। और भारत के अंदर जो सबसे बड़ा विज्ञापनदाता (Advertiser) है, वो है केंद्रीय और राज्य सरकारें।
एक कंपनी के मुकाबले सरकार के पास हजारों योजनाएं, ऑफर्स, विभाग और प्रोजेक्ट्स होते हैं प्रमोट करने के लिए। जैसे:
- सरकारी बैंकों की अलग-अलग योजनाएं
- लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (LIC)
- अलग-अलग टूरिज्म बोर्ड्स
- रेलवे
- सरकारी औद्योगिक इकाइयां
- माइनिंग कंपनियां
बहुत सारे विज्ञापन होते हैं जो सरकारी होते हैं और ये इनको करवाने होते हैं। ध्यान रखिएगा, ये जो मैं विज्ञापन की बात कर रहा हूं, ये सरकारी विज्ञापन की बात है। जो राजनीतिक पार्टियां चुनाव के समय विज्ञापन करती हैं, वो अलग है।
इससे हमने भले ही आखिरी लोकसभा चुनाव में 60,000 करोड़ से ज्यादा खर्च किए हों, भले ही हम पूरे विश्व में चुनाव में सबसे ज्यादा पैसा खर्च करते हों, लेकिन इन सबसे कहीं ज्यादा पैसा हमारी सरकार को अपनी अलग-अलग सरकारी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए खर्च करना होता है।
दिलचस्प बात यह है कि जब कोई राजनीतिक पार्टी जीतकर सत्ता में आती है, तो उसके हाथ में यह शक्ति होती है कि विज्ञापन किसको देना है।
सरकार – मीडिया की सबसे बड़ी ग्राहक
मोटे तौर पर आप इस तरीके से इसे समझ लीजिए कि सरकार इन न्यूज़पेपर, न्यूज़ एजेंसियों और टीवी चैनलों की सबसे बड़ी कस्टमर है। यानी ग्राहक है।
और यह हमेशा से चलता आया है कि केंद्र सरकार हो, पहले की सरकारें हों, राज्य सरकारें हों – उनके खिलाफ जब भी न्यूज़ मीडिया लिखता है, तो उनके विज्ञापन बंद हो जाते हैं।
समझने वाली बात यह है कि यह केवल एक पार्टी की बात नहीं है। सभी राजनीतिक दल, जब सत्ता में आते हैं, यही करते हैं।
2019 का केस – रफाल डील और बंद विज्ञापन
2019 के चुनाव के समय द हिंदू न्यूज़पेपर ने रफाल डील में कई सारी अनियमितताओं को लेकर BJP के खिलाफ एक सीरीज चला दी थी। इसी तरह टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक सीरीज चलाई थी जिसमें उन्होंने लोकसभा चुनावों के समय PM मोदी के मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट को वायलेट करने पर खबरें चलाना शुरू कर दी थी।
और फिर जब 2019 में सरकार जीतकर आई, तो टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिंदू, इकोनॉमिक टाइम्स, द टेलीग्राफ और एबीपी (जिसे आनंदा बाजार पत्रिका कहते हैं) जैसे न्यूज़पेपर के विज्ञापन बंद कर दिए गए थे।
यह कहना था अधीर रंजन चौधरी का, जो कांग्रेस के नेता हैं। अधीर रंजन चौधरी ने लोकसभा में खड़े होकर कहा कि BJP सरकार यह जानबूझकर कर रही है। और यह भी कहा कि BJP ने DAVP (Directorate of Advertising and Visual Publicity) जो विभाग है, उसे कहकर विज्ञापन बंद करा दिया क्योंकि इन्होंने BJP के खिलाफ नेगेटिव रिपोर्टिंग की।
उन्होंने यह भी कहा कि इसके बाद टाइम्स ऑफ इंडिया के MD विनीत जैन को मल्टिपल चक्कर लगाने पड़े PMO में, तब जाकर दोबारा विज्ञापन मिला उन्हें।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह एक तरफा आरोप नहीं है। जब विज्ञापन रुकते हैं, तो मीडिया संस्थान के लिए यह गंभीर वित्तीय संकट बन जाता है।
कांग्रेस भी करती थी यही – 248 करोड़ का खेल
अब कांग्रेस के नेता BJP को तो आरोपित कर रहे थे, लेकिन जब वे खुद सत्ता में थे, तो वे खुद भी यही कर रहे थे।
कांग्रेस ने 2014 के चुनाव से 3 साल पहले 248 करोड़ खर्च किए थे। इसमें से:
- 138 करोड़ प्रिंट मीडिया पर
- 72.9 करोड़ टीवी पर
और जो कांग्रेस का “भारत निर्माण” कैंपेन था, उस पर भी कांग्रेस ने 2010 से 2014 के बीच में 421 करोड़ खर्च किए थे।
| अवधि | विज्ञापन बजट | मुख्य माध्यम |
|---|---|---|
| 2011-2014 (3 वर्ष) | ₹248 करोड़ | प्रिंट (₹138 cr) + टीवी (₹72.9 cr) |
| भारत निर्माण कैंपेन | ₹421 करोड़ | मिश्रित |
और ज्यादातर विज्ञापन उन्हें ही मिले थे जो कांग्रेस सरकार के खिलाफ खुलकर बात नहीं करते थे, थोड़े सॉफ्ट रहते थे कांग्रेस के लिए।
इससे साफ होता है कि यह प्रथा नई नहीं है और केवल एक पार्टी तक सीमित भी नहीं है।
आम आदमी पार्टी – पंजाब में विज्ञापन बंद करने का केस
आम आदमी पार्टी का भी वही हाल है। पंजाब में अजीत समाचार सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबारों में से एक है। जब आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अपने मेनिफेस्टो में लिखे हुए वादे पूरे नहीं किए, तो उन अधूरे वादों की रिपोर्ट अजीत समाचार के एग्जीक्यूटिव एडिटर सतनाम सिंह मानक ने अपने न्यूज़पेपर में छापनी शुरू कर दी।
तो जब उन्होंने यह सब शुरू किया, तो 2023 की शुरुआत में आम आदमी पार्टी ने इस न्यूज़पेपर के:
- पहले डिस्प्ले ऐड बंद करवा दिए
- फिर जो टेंडर वाले ऐड्स थे, उनको बंद करवा दिया
- और जो सरकार के प्रेस नोटिस वगैरह आते थे (जो सबको मिलते थे), वो भी बंद करवा दिए
अब अजीत समाचार जो न्यूज़पेपर है, उसे फाइनेंस मैनेज करने में बहुत दिक्कत आ रही है और आज की तारीख तक इनके विज्ञापन दोबारा से शुरू नहीं किए गए हैं।
आम आदमी पार्टी ने यही चीज पंजाबी ट्रिब्यून के साथ भी की थी। लेकिन वो जल्दी समझ गए, तो उनके विज्ञापन शुरू कर दिए गए। लेकिन अजीत समाचार के एग्जीक्यूटिव एडिटर सतनाम सिंह खुलेआम कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी के जिन मुद्दों पर हम रिपोर्ट कर रहे हैं, उसे इनडायरेक्टली रोकने के लिए कहा गया है। और अगर हम यह करते रहेंगे, तो हमें विज्ञापन कभी नहीं मिलेंगे।
चिंता का विषय यह है कि यह प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। जब सरकार मीडिया की जीवनरेखा – यानी विज्ञापन – को नियंत्रित करती है, तो मीडिया का स्वतंत्र रहना बेहद मुश्किल हो जाता है।
उत्तर प्रदेश – Network 18 को सबसे ज्यादा विज्ञापन
उत्तर प्रदेश का उदाहरण लें, तो अप्रैल 2020 और मार्च 2021 में – एक साल के अंदर – 160.31 करोड़ सिर्फ टीवी विज्ञापन पर खर्च किए गए।
इसमें सबसे ज्यादा पैसा Network 18 को मिला। और मार्च 2022 के आसपास यह फंड मिला था। उसके बाद से अगर आप रिपोर्टिंग देखेंगे, तो Network 18 रिपोर्टिंग करते हुए, इंटरव्यू लेते हुए अपने जो विज्ञापनदाता हैं, उनके खिलाफ सॉफ्ट दिखेंगे।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह कोई आरोप नहीं, बल्कि एक पैटर्न है जो विज्ञापन वितरण के आंकड़ों और रिपोर्टिंग के विश्लेषण से सामने आता है।
समझने वाली बात यह है कि जब किसी मीडिया संस्थान को किसी सरकार से भारी मात्रा में विज्ञापन मिलते हैं, तो उनकी रिपोर्टिंग में वह तटस्थता नहीं रह पाती जो पत्रकारिता की आत्मा है।
DAVP – सरकारी विज्ञापन वितरण का केंद्र
DAVP (Directorate of Advertising and Visual Publicity) वह विभाग है जो केंद्र सरकार की ओर से विज्ञापन वितरित करता है। यह सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करता है।
DAVP की भूमिका:
- केंद्र सरकार के सभी विज्ञापनों को प्रिंट, डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जारी करना
- यह तय करना कि किस मीडिया संस्थान को कितना विज्ञापन मिलेगा
- विज्ञापन दरें और नीतियां निर्धारित करना
राज्य सरकारों के अपने विज्ञापन विभाग होते हैं जो यही काम करते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि DAVP के पास यह शक्ति है कि वह किसी भी मीडिया संस्थान को विज्ञापन से वंचित कर सकता है। और जब यह शक्ति राजनीतिक रूप से इस्तेमाल की जाती है, तो यह मीडिया की स्वतंत्रता के लिए खतरा बन जाती है।
मीडिया की दुविधा – सच्चाई या अस्तित्व?
अब मीडिया संस्थानों के सामने एक बड़ी दुविधा है:
विकल्प 1: निडर होकर सच्ची रिपोर्टिंग करें, सरकार की गलतियों को उजागर करें – लेकिन सरकारी विज्ञापन खो दें और वित्तीय संकट में फंस जाएं
विकल्प 2: सरकार के प्रति नरम रुख अपनाएं, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप रहें या हल्की आलोचना करें – और विज्ञापन प्राप्त करते रहें
ज्यादातर मीडिया संस्थान दूसरा विकल्प चुनते हैं क्योंकि उन्हें अपना व्यवसाय चलाना है, कर्मचारियों को वेतन देना है।
राहत की बात यह है कि अभी भी कुछ मीडिया संस्थान हैं जो पहला विकल्प चुनते हैं और वित्तीय कठिनाइयों के बावजूद निडर पत्रकारिता करते हैं। लेकिन उनकी संख्या लगातार घट रही है।
विज्ञापन नियंत्रण – लोकतंत्र के लिए खतरा
जब सरकार मीडिया का सबसे बड़ा विज्ञापनदाता हो और उस शक्ति का इस्तेमाल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए करे, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। क्योंकि:
जनता को सही जानकारी नहीं मिलती: अगर मीडिया डरकर सच नहीं बोलता, तो जनता को पूरी तस्वीर नहीं मिलती
सरकार की जवाबदेही नहीं रहती: जब मीडिया सवाल नहीं पूछता, तो सरकार बेलगाम हो जाती है
भ्रष्टाचार बढ़ता है: बिना मीडिया जांच के, भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं रहता
लोकतंत्र कमजोर होता है: सूचित मतदाता लोकतंत्र की नींव हैं। गलत सूचना पर आधारित निर्णय लोकतंत्र को कमजोर करते हैं
उम्मीद की किरण यह है कि डिजिटल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों का उदय हो रहा है जो सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर नहीं हैं।
समाधान क्या है?
इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है?
स्वतंत्र विज्ञापन वितरण निकाय: एक स्वायत्त निकाय हो जो राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त हो और निष्पक्ष रूप से विज्ञापन वितरित करे
पारदर्शिता: विज्ञापन वितरण की पूरी जानकारी सार्वजनिक हो – किसे कितना मिला, किस आधार पर
कानूनी सुरक्षा: मीडिया को विज्ञापन वापस लेने के खिलाफ कानूनी सुरक्षा मिले
वैकल्पिक राजस्व मॉडल: मीडिया संस्थान सब्सक्रिप्शन, सदस्यता और अन्य तरीकों से राजस्व जुटाएं
जागरूक पाठक: जनता को यह समझना होगा कि किस मीडिया को कितना सरकारी विज्ञापन मिल रहा है और वह उनकी रिपोर्टिंग को कैसे प्रभावित कर सकता है
इससे साफ होता है कि यह समस्या केवल मीडिया या सरकार की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य – महात्मा गांधी से आज तक
जैसा कि हमने शुरुआत में देखा, स्वतंत्रता संग्राम में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। महात्मा गांधी का “इंडियन ओपिनियन”, नेहरू का “नेशनल हेराल्ड” – ये सब जनजागरण के उपकरण थे।
लेकिन आज स्थिति उलट गई है। जो मीडिया जनता को जागरूक करने का काम करता था, वह अब कई बार जनता को गुमराह करने का उपकरण बन गया है।
यह बदलाव कैसे हुआ? विज्ञापन-आधारित व्यवसाय मॉडल और सरकार की बढ़ती शक्ति ने मिलकर मीडिया की स्वतंत्रता को कमजोर कर दिया है।
मुख्य बातें (Key Points)
• मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाता हैं; DAVP के माध्यम से विज्ञापन वितरण नियंत्रित होता है जिसका इस्तेमाल मीडिया को प्रभावित करने के लिए किया जाता है
• 2019 में रफाल डील पर रिपोर्टिंग के बाद Times of India, The Hindu, Economic Times जैसे अखबारों के विज्ञापन रोके गए; कांग्रेस ने 2010-2014 में ₹421 करोड़ “भारत निर्माण” पर खर्च किए
• आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अजीत समाचार और पंजाबी ट्रिब्यून के विज्ञापन रोके जब उन्होंने अधूरे वादों पर रिपोर्टिंग की; UP में Network 18 को 160 करोड़ के विज्ञापन मिले
• विज्ञापन नियंत्रण से जनता को सही जानकारी नहीं मिलती, सरकार की जवाबदेही खत्म होती है और लोकतंत्र कमजोर होता है; समाधान: स्वतंत्र वितरण निकाय, पारदर्शिता और वैकल्पिक राजस्व मॉडल











