IDFC First Bank Fraud: एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) ने एक ऐसे बैंकिंग घोटाले में तीसरी बड़ी गिरफ्तारी की है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। IDFC फर्स्ट बैंक की चंडीगढ़ ब्रांच से हरियाणा सरकार, चंडीगढ़ प्रशासन और दो निजी स्कूलों के बैंक खातों से कुल 645 करोड़ रुपये गबन किए गए। ED ने सोमवार को बताया कि 29 मई को रियल एस्टेट कारोबारी विकरम वधवा को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) के तहत गिरफ्तार किया गया है।
और बस यहीं से खुलने लगी इस पूरे घोटाले की परतें…
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विकरम वधवा पर क्या आरोप हैं?
ED का दावा है कि विकरम वधवा को इस पूरे घोटाले के हिस्से के तौर पर 70 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम मिली थी। देखा जाए तो वधवा सिर्फ पैसा लेने वाला नहीं था। एजेंसी के मुताबिक उसने गैरकानूनी तरीके से कमाए गए इस पैसे को इकट्ठा करने, अलग-अलग जगह ट्रांसफर करने और छिपाने में अहम भूमिका निभाई।
PMLA की धारा 19 के तहत गिरफ्तारी के बाद वधवा को एक विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां जज ने उसे चार दिन की ED कस्टडी में भेज दिया है। चिंता का विषय यह है कि सरकारी खातों से इतनी बड़ी रकम कैसे गायब हो गई और किसी को पता तक नहीं चला।
645 करोड़ का गबन कैसे हुआ?
हैरान करने वाली बात यह है कि यह घोटाला बैंक के अपने ही कर्मचारियों ने अंजाम दिया। ED की जांच में जो मोडस ऑपरेंडी सामने आई है, वह किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं:
सबसे पहले, बैंक के रिलेशनशिप मैनेजर और ब्रांच स्टाफ ने ऐसे सरकारी खातों को निशाना बनाया जिनमें भारी रकम FD के रूप में पड़ी थी। फिर फर्जी चेक बनाए गए, बैंक स्टेटमेंट में हेराफेरी की गई और अंदरूनी सुरक्षा जांच को बायपास किया गया।
इसके बाद पैसा सीधे शेल कंपनियों में ट्रांसफर कर दिया गया। Capco Fintech Services, Swastik Desh Projects, RS Traders और SRR Planning Gurus Pvt Ltd जैसी कंपनियां बनाई गईं, जो आरोपियों के परिवार के सदस्यों, ड्राइवरों और PA के नाम पर खोली गई थीं।
समझने वाली बात है कि पैसे का ट्रैक मिटाने के लिए “लेयरिंग” का तरीका अपनाया गया। 200 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम ज्वैलर्स को ट्रांसफर की गई, जिन्होंने बदले में कैश दिया। यह कैश फिर सरकारी अफसरों और कारोबारियों में बांटा गया। बाकी पैसा रियल एस्टेट और अन्य संपत्तियों में लगाया गया।
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पहले कौन पकड़ा गया था?
ED ने इस मामले में पहले ही दो बड़ी गिरफ्तारियां कर चुकी है। 11 मई 2026 को बैंक के पूर्व ब्रांच मैनेजर रिभव ऋषि (जिसे इस घोटाले का मास्टरमाइंड माना जा रहा है) और पूर्व रिलेशनशिप मैनेजर अभय कुमार को PMLA के तहत गिरफ्तार किया गया था। ग्यारह दिनों की ED कस्टडी में पूछताछ के बाद दोनों को न्यायिक हिरासत यानी जेल भेज दिया गया।
उम्मीद की किरण यह है कि ED अभी भी पूरे मनी ट्रेल को ट्रेस कर रही है और इस नेटवर्क से जुड़े बाकी लोगों की पहचान जारी है।
कैसे पकड़ में आया यह घोटाला?
दिलचस्प बात यह है कि यह घोटाला तब पकड़ में आया जब फरवरी 2026 में हरियाणा सरकार के एक विभाग ने अपना अकाउंट बंद करके दूसरे बैंक में फंड ट्रांसफर करने की रिक्वेस्ट दी। जब रिकॉर्ड मिलाए गए तो विभाग के अपने हिसाब-किताब और बैंक सिस्टम में दिख रहे बैलेंस में भारी अंतर सामने आया। इसके बाद बैंक ने अंदरूनी जांच शुरू की और पूरा फर्जीवाड़ा सामने आ गया।
IDFC फर्स्ट बैंक ने इसके बाद इस ब्रांच के जिम्मेदार कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया और KPMG से फॉरेंसिक ऑडिट कराई। बैंक ने प्रभावित सरकारी विभागों को गबन की गई रकम वापस भी कर दी है। वहीं हरियाणा सरकार ने अपने विभागों को IDFC फर्स्ट बैंक और AU Small Finance Bank में सरकारी फंड रखना या लेनदेन करना तुरंत बंद करने का निर्देश दिया है।
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आम आदमी पर इसका क्या असर?
सवाल उठता है कि अगर सरकारी खातों से करोड़ों रुपये इतनी आसानी से उड़ाए जा सकते हैं, तो आम खाताधारकों के पैसे कितने सुरक्षित हैं? यह मामला बैंकिंग सिस्टम की अंदरूनी सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इससे साफ होता है कि RBI और बैंकों को अपने इंटरनल ऑडिट मैकेनिज्म को और मजबूत करने की जरूरत है, खासकर बड़े सरकारी खातों के लिए।
मुख्य बातें (Key Points)
- ED ने IDFC फर्स्ट बैंक के 645 करोड़ के गबन मामले में रियल एस्टेट कारोबारी विकरम वधवा को गिरफ्तार किया, यह तीसरी गिरफ्तारी है
- आरोप है कि वधवा को 70 करोड़ से ज्यादा की रकम मिली और उसने पैसा छिपाने में अहम भूमिका निभाई
- शेल कंपनियों और ज्वैलर्स के जरिए पैसे की लेयरिंग की गई ताकि ट्रेल मिट सके
- बैंक के पूर्व ब्रांच मैनेजर रिभव ऋषि और रिलेशनशिप मैनेजर अभय कुमार पहले ही गिरफ्तार हो चुके हैं












