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The News Air - Breaking News - बातचीत के बीच बड़ा धमाका: US Iran Strike, Bandar Abbas में तबाही

बातचीत के बीच बड़ा धमाका: US Iran Strike, Bandar Abbas में तबाही

शांति वार्ता चल रही थी दोहा में, उसी बीच अमेरिकी सेना ने दक्षिणी ईरान के सामरिक बंदर अब्बास पोर्ट पर किया जबरदस्त सैन्य हमला

Ajay Kumar by Ajay Kumar
मंगलवार, 26 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय
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US Iran Strike, Bandar Abbas
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US Iran Strike: दुनिया की नजरें कतर की राजधानी दोहा पर टिकी थीं, जहां शांति वार्ता के लिए ईरानी वार्ताकार पहुंच रहे थे। लेकिन ठीक उसी वक्त अमेरिकी सेना ने दक्षिणी ईरान पर जबरदस्त हमला बोल दिया। निशाना बनाया गया Bandar Abbas के सामरिक बंदरगाह को, जो ईरान की नौसैनिक ताकत का सबसे अहम केंद्र माना जाता है। यह हमला इतना बड़ा था कि एक तरफ बातचीत हो रही थी और दूसरी तरफ बम बरस रहे थे।

देखा जाए तो यह आधुनिक भू-राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है। एक तरफ डिप्लोमेसी, दूसरी तरफ युद्ध। अमेरिका का कहना है कि यह “आत्मरक्षा” में किया गया ऑपरेशन था, लेकिन सवाल उठता है कि शांति वार्ता के ठीक बीच में यह जरूरी क्यों हो गया?

US Central Command (CENTCOM) की ओर से जारी बयान के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने Iranian Revolutionary Guard Corps (IRGC) की तेज रफ्तार नौसैनिक नावों को तबाह कर दिया, जो कथित तौर पर Strait of Hormuz में नौसैनिक माइन बिछाने की कोशिश कर रही थीं। इसके साथ ही बंदर अब्बास शहर के पास स्थित एक सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल लॉन्च साइट को भी निशाना बनाया गया।

🔍 यह भी पढ़ें- बड़ा खुलासा! China’s Double Game With Iran, ईरान को छोड़ US से मिला हाथ

दक्षिणी ईरान पर अमेरिकी हमले की पूरी कहानी

हैरान करने वाली बात यह है कि जब ईरान के वरिष्ठ वार्ताकार Qatar की राजधानी दोहा में शांति वार्ता के लिए पहुंच रहे थे, ठीक उसी समय अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने ईरान के दक्षिणी हिस्से में कई ठिकानों पर हमला किया। यूएस सेंट्रल कमांड ने इस ऑपरेशन को “सेल्फ-डिफेंस स्ट्राइक्स” बताया है।

अमेरिकी सेना ने निशाना बनाया:

  • बंदर अब्बास बंदरगाह के पास आईआरजीसी की नौसैनिक नावें
  • सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल साइट
  • सिरिक और जास्क के तटीय इलाकों में सैन्य अड्डे
  • समुद्र में माइन बिछाने वाली खास नावें

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने साफ किया है कि यह “युद्ध की घोषणा” नहीं है। यह केवल अमेरिकी सैनिकों और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षा के लिए किया गया कदम है। लेकिन इस तर्क को कितने लोग मानेंगे, यह देखने वाली बात है।

🔍 यह भी पढ़ें- BRICS Consensus Failure: India चेयर के बावजूद Iran-UAE विवाद में फंसा, Joint Statement नहीं

बंदर अब्बास: ईरान की नौसैनिक ताकत का दिल

यहां ध्यान देने वाली बात है कि बंदर अब्बास कोई साधारण बंदरगाह नहीं है। यह Persian Gulf में ईरान का सबसे अहम नौसैनिक मुख्यालय है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर ईरान जो भी नियंत्रण रख पा रहा है, उसमें इस बंदरगाह की भूमिका सबसे बड़ी है।

बंदर अब्बास की खासियतें:

विशेषताविवरण
स्थितिहोर्मुज़ द्वीप के ठीक ऊपर, स्ट्रेट के पास
महत्वIRGC का मुख्य नौसैनिक अड्डा
हथियारएंटी-शिप मिसाइल, ड्रोन, सबमरीन, माइन बिछाने वाली नावें
रणनीतिक भूमिकास्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर नियंत्रण का केंद्र

अगर इस बंदरगाह पर हमला होता है, तो ईरान की नौसैनिक क्षमता पर सीधा असर पड़ता है। और यही वजह है कि अमेरिका ने इसे निशाना बनाया।

नेवल माइन्स: समुद्र में छिपा खतरनाक हथियार

समझने वाली बात यह है कि नौसैनिक माइन (Naval Mines) क्या होती हैं और इतनी खतरनाक क्यों हैं। जैसे जमीन पर बारूदी सुरंगें बिछाई जाती हैं, वैसे ही समुद्र में भी माइन बिछाई जाती हैं।

नेवल माइन्स की खासियत:

  • ये पानी में तैर सकती हैं या समुद्र की तली में छिपी रह सकती हैं
  • जहाज के छूते ही विस्फोट हो जाता है
  • रिमोट से भी इन्हें ब्लास्ट किया जा सकता है
  • सिर्फ कुछ माइन भी पूरे समुद्री रास्ते को बंद कर सकती हैं

और बस यहीं से शुरू हुई असली समस्या। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में कुछ माइन भी बिछा दी जाएं, तो कोई भी शिपिंग कंपनी अपने हजारों करोड़ रुपये के जहाज को वहां से गुजारने की हिम्मत नहीं करेगी। इंश्योरेंस कंपनियां भी मना कर देंगी। यही वजह है कि अमेरिका माइन बिछाने की कोशिश को “तत्काल सैन्य खतरा” मानता है।

सेल्फ-डिफेंस का तर्क: कानूनी भाषा का खेल

यहां गौर करने वाली बात है कि Donald Trump प्रशासन और अमेरिकी सेना ने इस हमले को “सेल्फ-डिफेंस” (आत्मरक्षा) क्यों बताया। अंतरराष्ट्रीय कानून में यह शब्द बहुत मायने रखता है।

अमेरिका नहीं दिखाना चाहता कि वह हमलावर (Aggressor) है। इसलिए यह कह रहा है कि:

  • ईरानी नावें माइन बिछा रही थीं (खतरा था)
  • अमेरिकी सैनिकों को सुरक्षा देना जरूरी था (रक्षा)
  • यह युद्ध नहीं, बचाव का कदम था (Self-Defense)

यूएस सेंट्रल कमांड ने साफ शब्दों में कहा: “यह ऑपरेशन डिफेंसिव, प्रिवेंटिव और अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा के लिए था।” ताकि डिप्लोमैटिक, कानूनी और राजनीतिक – हर मोर्चे पर उनका पक्ष मजबूत रहे।

🔍 यह भी पढ़ें- US Senate Iran War बड़ा झटका: Trump की अपनी Party ने दिया धोखा, जानें पूरा मामला

प्रोजेक्ट फ्रीडम: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को खोलने की मुहिम

अमेरिका लंबे समय से “प्रोजेक्ट फ्रीडम” (Operation Freedom) चला रहा है। इसका मकसद साफ है – स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को पूरी तरह खुला रखना।

प्रोजेक्ट फ्रीडम के तहत तैनाती:

संसाधनउद्देश्य
A-10 अटैक एयरक्राफ्टहवाई हमले के लिए
Apache हेलीकॉप्टरतेज कार्रवाई
Destroyers (विध्वंसक युद्धपोत)समुद्री सुरक्षा
Mine Clearing Missionsमाइन हटाने के अभियान

चिंता का विषय यह है कि पूरी दुनिया अमेरिका पर दबाव बना रही है। क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ तो पहले खुला था, लेकिन अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध छिड़ने के बाद अब यह रास्ता खतरे में है। वैश्विक तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

दिलचस्प बात यह है कि अब तक यह मिशन पूरी तरह सफल नहीं हुआ है। आज भी स्ट्रेट से जहाज गुजारना बेहद मुश्किल है, खासकर ईरान की इजाजत के बिना।

युद्ध और बातचीत: एक साथ कैसे?

यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है – जब शांति वार्ता चल रही है, तो हमला क्यों? यह आधुनिक भू-राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

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हकीकत यह है कि एक तरफ युद्ध चल रहा है और दूसरी तरफ डिप्लोमेसी भी। इन हमलों के बावजूद, अमेरिकी और ईरानी वार्ताकार दोहा में बातचीत के लिए बैठे हुए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio का कहना है: “डिप्लोमेसी रिमेन्स प्रेफरेबल” (राजनयिक समाधान ही बेहतर है)।

लेकिन राहत की बात यह है कि दोनों पक्ष अभी भी बातचीत के लिए तैयार हैं। हालांकि बम बरसने के बाद यह वार्ता और जटिल हो सकती है।

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पाकिस्तान को बड़ा झटका, कतर ने ली बातचीत की कमान

अब एक और दिलचस्प मोड़ आता है – Pakistan और कतर का। पिछले कुछ समय से Pakistan खुद को “मध्यस्थ” (Mediator) के रूप में पेश कर रहा था। इस्लामाबाद में बातचीत की योजना बनाई जा रही थी।

लेकिन अब पूरा खेल बदल गया। इस्लामाबाद वार्ता की जगह दोहा ने ले ली है। पाकिस्तान के लिए यह बड़ा झटका है क्योंकि उसने बहुत कोशिश की थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी साख बने।

क्यों कतर को चुना गया?

  • कतर में अमेरिका का बड़ा सैन्य अड्डा Al Udeid Airbase है
  • कतर के ईरान के साथ राजनयिक संबंध हैं
  • कतर तटस्थ मध्यस्थ के रूप में स्वीकार्य है
  • ईरान ने कतर पर हमला किया था, इसलिए कतर भी चाहता है कि यह युद्ध रुके
अब्राहम एकॉर्ड और पाकिस्तान की मुश्किल

और इसी बीच एक और मसला उभरा – Abraham Accords। ट्रंप ने पाकिस्तान से कहा है कि वह अब्राहम एकॉर्ड में शामिल हो, लेकिन पाकिस्तान इसमें हिचक रहा है।

समझने वाली बात है कि अब्राहम एकॉर्ड इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने का समझौता है। अगर पाकिस्तान इसमें शामिल होता है तो:

  • वहां भारी विरोध प्रदर्शन होंगे
  • इस्लामिक देशों में पाकिस्तान की साख गिरेगी
  • घरेलू राजनीति में भूचाल आ सकता है

ट्रंप ने Truth Social पर एक पोस्ट में मध्य पूर्व के कई नेताओं का जिक्र किया, लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर का नाम तक नहीं लिया। यह पाकिस्तान के लिए बड़ी शर्मिंदगी है, क्योंकि दोनों लगातार ट्रंप की तारीफ कर रहे थे।

दोहा में बातचीत का एजेंडा क्या है?

अब सवाल है कि कतर में हो रही वार्ता में किन मुद्दों पर बात हो रही है। मुख्य मुद्दे हैं:

बातचीत के प्रमुख बिंदु:

मुद्दाविवरण
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़कैसे खोला जाए और नौवहन सुरक्षित हो
नेवल माइन्सकैसे हटाई जाएं
ईरानी संपत्तियांजो फ्रीज हैं, उन्हें आर्थिक राहत
सीजफायरयुद्धविराम का विस्तार
यूरेनियम स्टॉकपाइलपरमाणु सामग्री का निपटान
ट्रंप की यूरेनियम डिमांड: या तो सौंपो, या नष्ट करो

हैरान करने वाली बात यह भी है कि ट्रंप ने एक नई मांग रखी है। उन्होंने कहा है कि ईरान के पास जो समृद्ध यूरेनियम (Enriched Uranium) है, उसे:

  • या तो तुरंत अमेरिका को सौंप दो
  • अमेरिका उसे अपने यहां ले जाकर नष्ट कर देगा
  • या फिर किसी तटस्थ देश में भेजकर नष्ट करो

यह डिमांड बहुत सख्त है। ईरान इसे मानने को तैयार नहीं दिख रहा।

आईआरजीसी की रणनीति: एसिमेट्रिक वारफेयर

देखा जाए तो ईरान जानता है कि वह पारंपरिक युद्ध (Conventional Warfare) में अमेरिका को नहीं हरा सकता। इसलिए वह एसिमेट्रिक वारफेयर (असममित युद्ध) की रणनीति अपना रहा है:

  • तेज रफ्तार नौसैनिक नावों का इस्तेमाल
  • ड्रोन हमले
  • साइबर अटैक
  • मिसाइल सैचुरेशन (एक साथ कई मिसाइलें दागना)
  • नेवल माइन्स बिछाना

ईरान का तर्क साफ है: “अगर हमारे जहाज स्ट्रेट से नहीं गुजर सकते, तो दुनिया के किसी और के जहाज भी हमारी इजाजत के बिना नहीं गुजरेंगे।”

पूरे मामले की पृष्ठभूमि: कैसे पहुंची यहां तक बात

यह संघर्ष अचानक नहीं हुआ। पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को लेकर विवाद, परमाणु कार्यक्रम, मध्य पूर्व में प्रभाव की लड़ाई – ये सब मिलकर आज की स्थिति तक पहुंचे हैं।

अमेरिका का कहना है कि ईरान आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है। वहीं ईरान का कहना है कि अमेरिका ही मध्य पूर्व में अस्थिरता फैला रहा है।

और अब हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि एक तरफ बम बरस रहे हैं और दूसरी तरफ बातचीत चल रही है। यह दर्शाता है कि 21वीं सदी की भू-राजनीति कितनी जटिल और विरोधाभासी हो गई है।

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मुख्य बातें (Key Points)
  • अमेरिकी हमला: शांति वार्ता के दौरान अमेरिका ने दक्षिणी ईरान के बंदर अब्बास पर “सेल्फ-डिफेंस स्ट्राइक्स” किए
  • निशाना: आईआरजीसी की नौसैनिक नावें, मिसाइल साइट और माइन बिछाने वाली बोट्स को तबाह किया गया
  • बंदर अब्बास की अहमियत: यह ईरान का सबसे महत्वपूर्ण नौसैनिक मुख्यालय है, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर नियंत्रण के लिए जरूरी है
  • शांति वार्ता: हमलों के बावजूद अमेरिका और ईरान के वार्ताकार कतर के दोहा में बातचीत कर रहे हैं
  • पाकिस्तान को झटका: मध्यस्थता की भूमिका पाकिस्तान से छिनकर कतर के पास चली गई
  • यूरेनियम मांग: ट्रंप ने ईरान से समृद्ध यूरेनियम सौंपने या नष्ट करने की मांग की
  • प्रोजेक्ट फ्रीडम: अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को खुला रखने के लिए बड़ा अभियान चला रहा है
  • विरोधाभास: एक तरफ युद्ध चल रहा है, दूसरी तरफ डिप्लोमेसी – यह आधुनिक भू-राजनीति की जटिलता को दर्शाता है

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: अमेरिका ने ईरान पर हमला क्यों किया जबकि शांति वार्ता चल रही थी?

अमेरिका का कहना है कि यह “सेल्फ-डिफेंस” था क्योंकि ईरानी नावें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में नेवल माइन बिछा रही थीं, जो अमेरिकी सैनिकों और अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खतरा था। हालांकि, यह रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश भी हो सकती है ताकि बातचीत में अमेरिका की स्थिति मजबूत हो।

प्रश्न 2: बंदर अब्बास इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

बंदर अब्बास ईरान का पर्शियन गल्फ में सबसे बड़ा नौसैनिक मुख्यालय है। यहां से ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर नियंत्रण रखता है, जहां से दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसमें एंटी-शिप मिसाइल, ड्रोन, सबमरीन और माइन बिछाने वाली नावें तैनात हैं।

प्रश्न 3: क्या यह हमला युद्ध की घोषणा है?

नहीं। अमेरिका ने साफ किया है कि यह “डिक्लेरेशन ऑफ वॉर” नहीं है, बल्कि डिफेंसिव और प्रिवेंटिव कदम है। अंतरराष्ट्रीय कानून में यह अंतर बहुत मायने रखता है। अमेरिका खुद को हमलावर नहीं, बल्कि अपनी रक्षा करने वाला दिखाना चाहता है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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