China Iran Relations में एक नाटकीय बदलाव देखने को मिल रहा है जो पूरी वैश्विक राजनीति की दिशा बदल सकता है। हाल ही में हुई US China Summit के दौरान राष्ट्रपति Donald Trump और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping की मुलाकात में एक चौंकाने वाली बात सामने आई – चीन ने Strait of Hormuz पर ईरान की नाकाबंदी के खिलाफ अमेरिका का साथ दिया है। देखा जाए तो यह वही चीन है जिसने 2016 में ईरान के साथ 25 साल का $400 बिलियन का रणनीतिक समझौता किया था। अब सवाल उठता है – क्या बीजिंग अपने पुराने सहयोगी को त्याग रहा है? दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे खेल में भारत के लिए भी बड़े अवसर छिपे हैं।
आपका दुश्मन आपके दोस्त को क्या ऑफर कर सकता है – यह सीधे तौर पर आपकी सुरक्षा का मामला बन सकता है। और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी।
हाल ही में हुई famous USA-China Summit में जो डायनेमिक्स देखने को मिले हैं, वे ताइवान से लेकर ईरान तक कई मोर्चों पर बड़े बदलाव ला सकते हैं। हालांकि कोई joint statement तो जारी नहीं हुआ, लेकिन दोनों पक्षों ने “significant achievements” और “deals in pipeline” की बात की है।
हॉर्मुज़ पर ईरान को बड़ा झटका
समझने वाली बात यह है कि सबसे बड़ा तनाव अभी ईरान को है। अमेरिकी विदेश मंत्री और चीनी विदेश मंत्री इसी विजिट के दौरान मिले और एक स्वर में कहा:
“ईरान जो Hormuz Strait में toll वसूल रहा है और shipping को block कर रहा है, यह बिल्कुल गलत है। यह चोक पॉइंट को free करना होगा।”
अब आप कहेंगे – लेकिन ईरान के पास तो यही एक strategic advantage था अमेरिका को pressure करने का! और चीन के लिए तो strategically यह जरूरी था कि वह ईरान को support करे, ताकि अमेरिका को यह संदेश जाए कि “तुम हर चीज में अपनी मनमानी नहीं कर सकते।”
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पहले यह कहा जा रहा था कि रूस और चीन दोनों पीछे से ईरान को intelligence support दे रहे थे। फिर अचानक से चीन यह कैसे कह रहा है?
देखिए, यही है कूटनीति की असली दुनिया। मौके की नजाकत को देखा जाता है और जो advantage लिया जा सकता है, वह लिया जाता है।
ट्रंप का दावा: शी ने ईरान संकट खत्म कराने का ऑफर दिया
Donald Trump का कहना है कि शी जिनपिंग ने ऑफर किया है कि वे ईरान में चल रहे संकट को खत्म करवाएंगे। कैसे करवाएंगे, यह अभी clear नहीं है, लेकिन signal बिल्कुल स्पष्ट है।
और देखिए, Israel के Prime Minister Benjamin Netanyahu भी मौका नहीं छोड़ रहे। उन्होंने तुरंत कहा:
“अच्छा, चीन साथ आ गया है। तो अब ईरान पर pressure बढ़ेगा। चलो, मैं UAE की visit कर लेता हूं और security partnership को और मजबूत करते हैं।”
यह timing इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में UAE के एकमात्र nuclear reactor के पास एक generator room पर ईरानी drone ने हमला किया है। मतलब nuclear power plant के नजदीक ड्रोन अटैक! यह तो बेहद गंभीर मामला है।
इतिहास नहीं, वर्तमान और भविष्य देखते हैं बड़ी शक्तियां
देखिए, दो बड़ी ताकतें history के हिसाब से अपनी diplomacy को fine-tune नहीं करतीं। वे देखती हैं present को और future को।
याद कीजिए, जब ट्रंप पिछली बार (2017-2021) राष्ट्रपति बने, तब उन्होंने चीन के खिलाफ Trade War शुरू किया था। और जब दोबारा आए (2025), तो उसे और escalate कर दिया।
लेकिन अब दोनों कह रहे हैं: “हमें rivalry को छोड़ना चाहिए, हमें present और future को देखना चाहिए।”
अगर गौर करें, तो बात survival पर आ गई है।
चीन की असली समस्या: तेल निर्भरता
चीन को पता है कि अगर यह dynamics और बिगड़ते रहे, तो उनकी manufacturing edge को गंभीर नुकसान हो सकता है।
आप कहेंगे – वह कैसे?
यहां समझिए:
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| चीन की तेल निर्भरता | लगभग 50% तेल Strait of Hormuz से आता है |
| Hormuz का महत्व | दुनिया के 20% तेल की आपूर्ति यहीं से होती है |
| ईरान का दबाव | नाकाबंदी से supply कम हो रही है |
| तेल कीमतें | $90+ per barrel (अप्रैल 2025) |
| चीन की अर्थव्यवस्था | Manufacturing sector को सस्ते तेल की जरूरत |
अगर 50% के आसपास आपका total oil इसी तरफ से आ रहा हो, और उस पर blockade वाली condition हो, net supply decrease हो रही हो, oil infrastructure पर हमले हो रहे हों – तो आपको नहीं लगता कि आपकी economic might पर problem है?
यानी कि जिस वजह से आपको respect मिल रही है, अगर वो वजह चली जाएगी, तो जो आपको दोस्त मान रहे हैं, क्या वे आपको जरूरी मानेंगे?
चीन इस बात को समझता है: सबसे पहले उस बात को protect करो जिसकी वजह से तुम्हें इज्जत मिल रही है। चाहे ईरान तुम्हारी इज्जत कर रहा हो या नहीं।
यहां ideology matter नहीं करती। यहां matter करता है national interest.
चीन का ईरान को संकेत: “बुरा मत मानना”
चीन एक तरीके से signal दे रहा है ईरान को:
“देखो, कुछ points पर हम USA के साथ खड़े होंगे। और जो यह blockade है, उसके भी against होंगे। लेकिन बुरा मत मानना।”
यह वाली बात हो गई कि आपका कोई दोस्त है, कहीं झगड़ा चल रहा है। लेकिन आपने कहा: “यार, मेरा long-term फायदा तुम्हारे दुश्मन से है। तो फिलहाल अगर मैं तुम्हें दो-चार बातें सुना भी दूं, तो चुपचाप सुन लेना। क्योंकि मुझे जो फायदा होगा long-term में, उससे तुम्हें guaranteed फायदा होगा।”
ऐसा भी हो सकता है कि चीन backdoor से ईरान को यह सांत्वना दे रहा हो: “तुम tension मत लो। Long-term मेरा advantage तो होने दो। मेरा time तो आने दो। मुझे USA रोककर रखता है। एक बार वो दरवाजे खुलने दो।”
हॉर्मुज़ की रणनीतिक अहमियत
दोनों powers ने कहा कि choke points को चोक नहीं करना चाहिए। क्यों?
क्योंकि इससे ईरान – एक regional power – global powers को counter कर रही है। चीन और USA दोनों की economy के लिए यह problem हो गई है।
ट्रंप की घरेलू समस्या:
- Mid-term elections आने वाले हैं (2026)
- अगर inflation बढ़ रहा है और US Congress में उनकी पार्टी की seats कम हो गईं
- तो बाकी के कार्यकाल में अपने फैसलों को implement कराना भारी हो जाएगा
तो यानी कि उनका जो एक ही मौका है (दूसरी बार राष्ट्रपति बनने का), अगर यह मौका कमजोर हो जाए, तो बड़ी समस्या है।
Hormuz Strait के आंकड़े:
| संकेतक | आंकड़ा |
|---|---|
| वार्षिक जहाज यातायात | लगभग 1,600 जहाज |
| मूल्य | करीब $700 billion |
| वैश्विक तेल आपूर्ति | 20-25% |
| चीन की निर्भरता | 50% तेल आयात |
| दैनिक तेल प्रवाह | 21 million barrels |
International Maritime Organization की रिपोर्ट के अनुसार, यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण oil chokepoint है।
इतिहास में भी ऐसा हुआ है
regional player अगर global players के लिए problem करेगा, और भले ही वो दो global players rival हों, तो global players का converge होना लाजमी है।
Suez Canal Crisis (1956) याद कीजिए – जब मिस्र के राष्ट्रपति Gamal Abdel Nasser ने स्वेज नहर को nationalize कर दिया, तो UK, France, और USA तीनों साथ आ गए।
Panama Canal में भी similar action हुआ था – USA ने कहा कि “हम तो militarily control कर देंगे।”
तो इसका मतलब होता है – ये choke points arteries की तरह होते हैं। और अगर इन पर problem आ जाए, तो great powers कुछ भी करने के लिए तैयार होते हैं।
पेट्रो-डॉलर का खेल
अमेरिका के लिए भी यह बेहद critical है। Gulf countries – UAE, Qatar, Saudi Arabia – ये सब USA के allies हैं।
यहां चलता है Petro-Dollar Complex:
कैसे काम करता है:
- Gulf countries तेल बेचते हैं
- Payment डॉलर में होता है
- इससे डॉलर की global dominance बनी रहती है
- जिससे US की economy को भी फायदा होता है
लेकिन Hormuz में disruption से इस petro-dollar dynamics को भी problem हुई है। यह भी USA को solve करना है।
ट्रंप-शी समिट में क्या-क्या हुआ?
USA का कहना है: “चीन, तुमने पुराने तरीके इस्तेमाल करके देख लिए। तुम्हें भी कुछ खास फायदा हो नहीं रहा।”
शी जिनपिंग: “बिलाई (भाई साहब), किसकी बात कर रहे हो आप?”
ट्रंप: “यार, research तो हम भी करके आए हैं। तुम्हें क्या लग रहा था, ईरान के साथ तुम जो secret deal करोगे, उसके बारे में पता नहीं होगा हमें?”
2016 का चीन-ईरान समझौता: $400 बिलियन का खेल
2016 में चीन ने ईरान के साथ एक historic deal की थी। यह 25 साल की strategic partnership थी (2016-2041 तक)।
समझौते की मुख्य बातें:
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| निवेश | $400 billion (2016-2041) |
| तेल छूट | International market price से 32% सस्ता |
| अतिरिक्त छूट | Sanctions के कारण और discount |
| बदले में | ईरान के ports, airports पर चीनी कंपनियों का control |
| Strategic depth | ईरान Middle East में USA को backfoot पर रखेगा |
Hidden Agenda:
- ईरान अपनी nuclear power बढ़ाएगा (40% enrichment level तक पहुंच गया था)
- ईरान के proxy groups (Iraq, Lebanon, Yemen में) से USA की hegemony को counter करना
- चीन को strategic depth मिलेगी
ऑपरेशन मिडनाइट ने बदल दी तस्वीर
ट्रंप: “फिर जून 2025 में जब Operation Midnight हुआ, और उसके बाद जो 40% का आपका enrichment capacity बता रहे थे, वो reduce होकर 5% हो गया – ऐसा कहना है IAEA की report का।”
IAEA (International Atomic Energy Agency) के अनुसार, Israel और US की joint covert operations से ईरान की nuclear facilities को बड़ा नुकसान हुआ।
Plus: “जो आप कह रहे थे कि इनके पास strategic depth है USA के against, एक-एक करके वो सारे terrorist groups को तो eliminate कर ही रहे हैं USA और Israel मिलकर।”
चीन की समझ: “यार, ईरान को जितना बड़ा player हम मान रहे थे, वैसे strategically use करने की सोच रहे थे, वो हो नहीं पाया।”
चीन का U-Turn: $12 बिलियन का निवेश suspended
अब ये नहीं है कि चीन ट्रंप का इंतजार कर रहा था। चीन के अपने analysts ये खुद analyze कर रहे होते हैं।
और इसी वजह से चीन अपने losses को cut करना चाह रहा है।
आप कहेंगे – proof कीजिए!
Q1 2025 की रिपोर्ट देखिए:
| क्षेत्र | पहले | अब |
|---|---|---|
| ईरान में BRI निवेश | $12 billion planned | Suspended |
| Central Asia में BRI | कम फोकस | Significantly increased |
| ईरान-चीन व्यापार | Peak पर था | घट रहा है |
Central Asia में BRI के नाम पर total funds को increase कर दिया गया है और ईरान में $12 billion का जो funds जाना था, उसको suspend कर दिया गया है।
चीनी कंपनियों की शिकायत:
- “यहां पर लगातार attacks हो रहे हैं”
- “हमारे investment ही खतरे में हैं”
- “इसकी भरपाई कौन करेगा?”
- “ईरान की सरकार? वो तो खुद economic problem में है”
Plus: जो कंपनियां ईरान के साथ trade कर रही थीं, USA ने उनको sanction कर दिया।
शी जिनपिंग: “चलो, tension मत लो। तुम्हारा भी कुछ सोचते हैं। फिलहाल $12 billion suspend करो। सेंट्रल एशिया की तरफ सोचो। वहां से Russia को connect करेंगे। Russia से जब चीजें normalize हो जाएंगी, तो European Union में connect करेंगे।”
चीन का चार-आयामी खेल
चीन की real strategy में चार dimensions हैं:
Dimension 1: Cut Losses (नुकसान कम करो)
- ईरान में investments को आगे मत बढ़ाओ
- BRI को सुरक्षित जगहों पर redirect करो
Dimension 2: Extract Concessions (रियायतें लो)
“ईरान में नुकसान हो रहा है, लेकिन हम global सोच रहे हैं। 10 जगह से profit बना ही रहे हैं। ईरान को हम back करते रहेंगे क्योंकि ईरान ही एक ऐसा ideological rival है जो compromise करने के लिए तैयार नहीं है।”
चीन USA को communicate कर रहा है:
“देखो, हम ईरान से पूरी तरह पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन कुछ बीच का रास्ता निकालते हैं। अगर हम ईरान को लगातार support करते रहे, तो आप भी वहां से निकल नहीं पाओगे, Middle East में फंसे रहोगे।”
“तो क्या करें? Concessions दो।”
चीन की मांगें: ट्रंप से तीन बड़ी रियायतें
USA: “क्या concession चाहिए?”
चीन की तीन मांगें:
1. Tariff में कमी
- 145% टैरिफ हटाओ या कम करो
- Trade war को de-escalate करो
2. Semiconductor Technology
- Biden administration ने चीनी कंपनियों को high-tech chips लेने से रोक रखा था
- अब USA खुद offer कर रहा है (Nvidia के CEO को लेकर गए थे)
- लेकिन चीन कह रहा है: “केवल एक Nvidia नहीं, हमें तो technology चाहिए”
3. Indo-Pacific में दबाव कम करो
- AUKUS, QUAD जैसे “counter to China” groups बनाए जा रहे हैं
- “यह नहीं चलेगा, गलत है”
ट्रंप की समिट से घरेलू उपलब्धियां
इस visit में Trump ने कुछ immediate gains भी लिए:
| मुद्दा | परिणाम |
|---|---|
| Beef Factories | चीन ने प्रतिबंध हटाए |
| Soybean | चीन खरीदेगा (US farmers को राहत) |
| Rare Earth Elements | चीन supply करेगा (US EV sector के लिए जरूरी) |
| Iran Crisis | चीन ने “solve कराने” का वादा किया |
लेकिन: “पहले मेरी conditions भी तो सुन लीजिए।”
तो इसका मतलब यह है कि Donald Trump की यह visit केवल ईरान पर focus नहीं थी। यह domestic economy में inflation को भी manage करने के लिए थी।
चीन का बैलेंसिंग एक्ट
हॉर्मुज़ को लेकर ईरान के खिलाफ जो UN Security Council में proposed resolution है, उस पर चीन ने कहा:
“हम USA द्वारा proposed इस resolution पर agree नहीं करते।”
इसका मतलब क्या?
- ईरान को भी खुश कर दिया
- Indicate भी कर दिया कि “ऐसा नहीं है कि USA के पीछे-पीछे चलेंगे”
- “Issue तो USA ने create किया है ना? ईरान ने जवाबी कार्रवाई में block किया है”
यह है balancing diplomacy।
चीन की नौसेना भेजने से इनकार
ट्रंप: “अब Hormuz में इसे खोलना है। तो ऐसा करो, अपनी navy को ही भेजो। इतने सारे तुम्हारे पास warships हैं, aircraft carriers हैं। भेजो यहां पर, escort करो जो commercial ships आ रहे हैं।”
चीन: “हम नहीं भेजेंगे। तुमने फैलाया, तुम संभालो।”
और इस जिम्मेदारी USA को लेनी पड़ रही है, जिसमें $5 billion per month का उनका खर्चा आ रहा है।
Plus: बीच-बीच में जो attacks होते रहते हैं:
- एक Tomahawk missile: $2 million
- Patriot missile: $4 million
इतना खर्चा कर रहे हैं।
तो एक तरीके से चीन देख रहा है: “तुमने फैलाया ना, तो तुम कमजोर होओगे, तो हमें ही फायदा होगा।”
चीन की तीन वैश्विक पहलें (Global Initiatives)
पश्चिमी think tanks और scholars (जैसे CNN के Fareed Zakaria) कहते हैं:
“चीन के पास superpower बनने वाला status नहीं है। चीन global hegemon नहीं बन सकता। क्यों? क्योंकि उसके अंदर commitment नहीं है for taking global responsibilities।”
चीन का जवाब: “जरा इधर तो देखिए। हम तीन global initiatives लेकर आए हैं:”
1. Global Development Initiative (GDI)
- Global South के nations की poverty solve करेंगे
- Low-cost solutions लाएंगे, infrastructure लाएंगे
Critics: “इसके through तो वो debt trap कर रहा है ना?”
लेकिन: 2016 के बाद से चीन ने अपनी strategy बदली है। अब long-term heavy loans कम कर दिए हैं, sustainable loans दे रहा है।
क्यों?
श्रीलंका को loan दिया, Hambantota Port कब्जा लिया (lease पर) – तो ऐसे आरोप लग ही रहे थे। तो चीन ने उसको solve किया है।
2. Global Security Initiative (GSI)
- Sustainable security cooperation करेंगे
- जैसे Solomon Islands जैसे देश को कहता है: “हम हैं ना आपकी security के लिए”
Australia कह रहा है: “इतने सालों तक हमने support किया।”
लेकिन चीन कह रहा है: “यह Australia के चक्कर में मत रहो। Australia तो South में है, लेकिन है Global North (developed nation)। Solomon Islands, तुम और हम – हम सब developing nations हैं। तो हम सब एक हैं।”
3. Global Civilization Initiative (GCI)
- अपने cultural identity को पहचानो
- ऐसा नहीं कि West को copy करते रहें
चीन की 8-step strategy
Step 1: कुछ points पर USA के साथ align हो रहा है
- “हम rival नहीं हैं। सुसाइडल steps में क्यों पड़ना है?”
- “चीन तो rise करना चाहता है, लेकिन global architecture को disrupt नहीं करना चाहता”
- इससे USA के साथ trust build कर रहा है
Step 2: Rare Earth Elements का leverage
- USA के Pentagon का खुद कहना था: “F-35, magnets, EV sector के लिए आपको चीन चाहिए”
- 90% of global mining supply and processing चीन के control में है
Step 3: Semiconductor bargaining
Step 4: Indo-Pacific पर pressure
Step 5: Hormuz पर selective support
- USA के साथ “principle” में agree
- लेकिन UNSC में against vote
Step 6: BRI को redirect (Central Asia focus)
Step 7: तीन global initiatives के through soft power
Step 8: Middle East Peace Fund ($500 million)
- Middle East के countries से कहा: “आओ मिलकर बैठते हैं”
- “जो नुकसान हुआ, चीन भी support करेगा”
आप कहोगे: “इतना बड़ा पैसा चीन क्यों दे रहा है?”
क्योंकि: जहां peace establish होगा और चीन उसमें major role अदा करेगा, तो चीनी कंपनियों को access मिलेगा। पैसा तो उससे कमा लेगा।
Buck-Passing Strategy: दुश्मन को दुश्मन से लड़ने दो
फेमस scholar John Mearsheimer (जिन्हें Political Science Optional में पढ़ाया जाता है) ने एक Buck-Passing Strategy का जिक्र किया था अपनी book में।
क्या है यह?
“अगर तुम्हारा दुश्मन किसी दूसरे से लड़ रहा है, तो लड़ने दो। जिससे तुम्हारा दुश्मन लड़ रहा है, उसको कुछ-कुछ support करते रहो बीच-बीच में। जिससे तुम्हें अपने दुश्मन से लड़ना था, तुम्हारे behalf पर कोई और उसको कमजोर कर रहा है।”
आपको नहीं लगता कुछ ऐसा ही हो रहा है?
USA को counter चीन करना चाह रहा था। अब वो काम ईरान कर रहा है USA के खिलाफ। तो इससे तो फायदा directly चीन को ही हो रहा है।
इसी को हम कहते हैं: New Realism in Political Science।
भारत के लिए सुनहरा अवसर
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल: इस पूरे खेल में भारत को क्या करना चाहिए?
अवसर 1: ऊर्जा सुरक्षा में विविधता
- चीन ईरान से दूर हो रहा है
- भारत Iran से तेल import करता है (Chabahar Port के through)
- यह एक मौका है बेहतर terms पर deal करने का
अवसर 2: Central Asia में भारत की entry
- चीन BRI को Central Asia में redirect कर रहा है
- भारत INSTC (International North-South Transport Corridor) को push कर सकता है
- Iran-Afghanistan-Central Asia route को strengthen करो
अवसर 3: Middle East में balancing
- अगर चीन Middle East से थोड़ा back करे
- भारत UAE, Saudi के साथ अपनी strategic partnership को deepen करे
- I2U2 (India-Israel-UAE-USA) को activate करो
अवसर 4: Semiconductor supply chain
- अगर USA-China semiconductor war जारी रहे
- भारत खुद को alternative manufacturing hub के रूप में position करे
अवसर 5: Quad को strengthen
- China की Indo-Pacific पर pressure कम करने की मांग
- यह समय है Quad (India-USA-Japan-Australia) को और effective बनाने का
अवसर 6: Global South leadership
- चीन अपनी तीन global initiatives से Global South में influence बढ़ा रहा है
- भारत को अपनी G20 presidency की सफलता का leverage लेना चाहिए
- Voice of Global South summit series को continue रखो
भारत की सावधानियां
सावधानी 1: ईरान को पूरी तरह alienate मत करो
- Chabahar Port अभी भी महत्वपूर्ण है
- Afghanistan access के लिए जरूरी है
सावधानी 2: USA-China के बीच proxy बनने से बचो
- Strategic autonomy maintain रखो
- Multi-alignment की policy जारी रखो
सावधानी 3: Middle East में over-commitment से बचो
- Israel-Iran conflict में neutral stance
- सभी Gulf countries के साथ balanced relations
विश्लेषण: क्या चीन सच में ईरान छोड़ रहा है?
देखा जाए तो यह पूरी तरह से “छोड़ना” नहीं है। यह एक tactical retreat है।
चीन की असली strategy:
- Short-term: USA से concessions लो (tariff, tech, rare earth के बदले)
- Medium-term: BRI को सुरक्षित रखो (Central Asia में shift)
- Long-term: जब USA Middle East में कमजोर हो जाए, तब फिर से ईरान में invest करो
यह एक calculated risk है।
ईरान के लिए संकट:
- सबसे बड़े economic partner (चीन) ने distance बनाया
- Nuclear program पर setback (Operation Midnight)
- Proxy groups कमजोर हो रहे हैं (Hezbollah, Houthis)
- Economic sanctions जारी हैं
लेकिन:
- ईरान के पास Hormuz का leverage अभी भी है
- Regional influence बना हुआ है
- Russia के साथ relations मजबूत हैं
आगे क्या होगा?
Scenario 1: De-escalation
- अगर ईरान Hormuz blockade हटाता है
- USA sanctions में कुछ राहत देता है
- चीन फिर से invest करना शुरू करता है
- Regional stability आती है
Scenario 2: Continued Tensions
- ईरान blockade जारी रखता है
- USA-Israel military pressure बढ़ाते हैं
- चीन completely shift हो जाता है Central Asia में
- India को Middle East में bigger role मिलता है
Scenario 3: Major Conflict
- USA-Iran direct military confrontation
- Global oil crisis
- $150+ per barrel oil
- Worldwide economic recession
सबसे संभावित: Scenario 1 और 2 के बीच कुछ।
मुख्य बातें (Key Points)
• चीन ने Hormuz Strait पर अमेरिका का साथ दिया, ईरान की नाकाबंदी को गलत बताया – यह 25 साल की strategic partnership के बावजूद
• $12 billion का ईरान निवेश suspend, चीन ने BRI funds को Central Asia में redirect किया
• चीन की 50% तेल निर्भरता Hormuz पर, इसलिए stability चीन के लिए भी जरूरी है
• ट्रंप-शी समिट में बड़े सौदे – beef factories, soybean, rare earth elements पर agreement
• चीन की तीन मांगें: 145% टैरिफ में कमी, semiconductor technology, Indo-Pacific में pressure कम करो
• Operation Midnight ने ईरान को कमजोर किया – nuclear enrichment 40% से घटकर 5% हुई
• USA को $5 billion/month खर्च Hormuz में security के लिए – चीन ने navy भेजने से इनकार किया
• चीन की तीन global initiatives – Development, Security, Civilization – soft power बढ़ाने के लिए
• Buck-passing strategy – चीन दे रहा है USA को ईरान से उलझने, खुद बच रहा है
• भारत के लिए बड़े अवसर – Middle East में बढ़ती भूमिका, INSTC को push करना, Quad को मजबूत करना












