Bhagwant Mann FIR Case Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को चंडीगढ़ प्रशासन की उस याचिका पर सुनवाई मुल्तवी कर दी है, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसके जरिए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, उनके कैबिनेट मंत्रियों अमन अरोड़ा और हरपाल सिंह चीमा तथा आम आदमी पार्टी (AAP) के कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ साल 2020 के एक प्रदर्शन के दौरान दंगे भड़काने के आरोप में दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया गया था।
गौरतलब है कि एफआईआर दर्ज होने के लगभग छह सालों बाद, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने गत 29 नवंबर 2025 को भगवंत मान और अन्य AAP नेताओं के खिलाफ दर्ज एफआईआर, चार्जशीट और इससे संबंधित सारी कार्रवाई को मूल रूप से रद्द कर दिया था। चंडीगढ़ पुलिस ने यह मामला 10 जनवरी 2020 को उस वक्त दर्ज किया था जब भगवंत मान, अमन अरोड़ा, हरपाल चीमा, बलजिंदर कौर, मनजीत सिंह बिलासपुर और सरवजीत कौर मानूखे समेत अन्य नेताओं ने बिजली दरों में किए गए वृद्धि के खिलाफ चंडीगढ़ में एक रोष मार्च निकाला था।
सीजेआई की बेंच ने दी अगली तारीख
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, जस्टिस जोएमालिया बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की अगुवाई वाले बेंच ने मामले की सुनवाई उस वक्त आगे बढ़ा दी जब चंडीगढ़ प्रशासन ने इसी केस से संबंधित कुछ अन्य आरोपियों के खिलाफ याचिकाएं दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा।
देखा जाए तो यह मामला काफी संवेदनशील है। यूटी प्रशासन की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि उन्हें याचिका में उन अन्य प्रतिवादियों (Respondents) के नाम जोड़ने की जरूरत है, जिन्हें पिछले साल हाईकोर्ट द्वारा राहत दी गई थी।
CJI ने कहा: इम्प्लीडमेंट की अर्जी दाखिल करो
सीजेआई सूर्या कांत ने कहा, “हम इसे सूचीबद्ध कराएंगे। अन्य प्रतिवादियों को शामिल करने (Impleadment) संबंधी अर्जी दाखिल की जाए।” यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि चंडीगढ़ प्रशासन चाहता है कि उन सभी AAP नेताओं को भी याचिका में शामिल किया जाए जिन्हें हाईकोर्ट ने बरी किया था।
अगर गौर करें तो यह रणनीति चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से केस को मजबूत करने की कोशिश हो सकती है। क्योंकि अगर सभी आरोपियों को एक साथ याचिका में शामिल किया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट पूरे मामले की समग्र समीक्षा कर सकता है।
क्या था 2020 का पूरा मामला?
समझने वाली बात यह है कि 10 जनवरी 2020 को क्या हुआ था। उस समय पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी और कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री थे। AAP तब विरोधी दल में थी।
पंजाब सरकार ने बिजली दरों में वृद्धि की थी, जिसके खिलाफ AAP ने चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री आवास की ओर रोष मार्च निकालने का फैसला किया। भगवंत मान उस समय लोकसभा सांसद थे। उनके साथ कई वरिष्ठ AAP नेता और कार्यकर्ता प्रदर्शन में शामिल थे।
दिलचस्प बात यह है कि जब प्रदर्शनकारी मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़े तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इसी दौरान कथित तौर पर झड़प हुई, बैरिकेड तोड़े गए और पुलिस पर पत्थरबाजी की गई। कई पुलिसकर्मी घायल हुए।
किन धाराओं में दर्ज हुआ था मामला?
यह मामला चंडीगढ़ पुलिस की एक महिला कांस्टेबल की शिकायत पर सेक्टर 3 के पुलिस थाने में धारा 353 (सरकारी कर्मचारी को ड्यूटी से रोकने के लिए हमला), 332 (सरकारी कर्मचारी को घायल करना), 147 (दंगा करना) और 149 के तहत दर्ज किया गया था।
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जब प्रदर्शनकारियों को तत्कालीन मुख्यमंत्री की सरकारी निवास की ओर बढ़ने से रोका गया, तो नेताओं के उकसाने पर कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की और पुलिस पर पत्थरबाजी की, जिसमें कई पुलिस कर्मचारी घायल हो गए।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की थी एफआईआर?
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने 29 नवंबर 2025 के अपने फैसले में एफआईआर रद्द करते हुए कहा था कि पुलिस के पास प्रदर्शनकारियों को रोकने का कोई जायज कारण नहीं था, क्योंकि उस समय इलाके में फौजदारी जाब्ता (CrPC) की धारा 144 के तहत कोई भी प्रतिबंधात्मक आदेश लागू नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा था कि मौके पर मौजूद जिन लोगों ने कथित तौर पर पुलिस फोर्स पर पत्थरबाजी की, उनमें से किसी का नाम एफआईआर में दर्ज नहीं है। इसके अलावा, ऐसा कोई सबूत नहीं है कि याचिकाकर्ताओं (AAP नेताओं) ने उन्हें ऐसा करने के लिए उकसाया हो।
यह दलील काफी मजबूत थी। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर धारा 144 नहीं थी, तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान में है।
चंडीगढ़ प्रशासन क्यों है खिलाफ?
लेकिन चंडीगढ़ प्रशासन का तर्क है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण नहीं था। पुलिस पर हमला हुआ, बैरिकेड तोड़े गए और कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी। इसलिए एफआईआर सही तरीके से दर्ज की गई थी।
प्रशासन का यह भी कहना है कि हाईकोर्ट ने सभी पहलुओं पर गौर नहीं किया। इसलिए वे सुप्रीम कोर्ट में गए हैं।
समझने वाली बात यह है कि यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। भगवंत मान अब मुख्यमंत्री हैं और AAP सत्ता में है। ऐसे में यह मामला उनके लिए संवेदनशील हो जाता है।
राजनीतिक दांवपेच
अगर गौर करें तो 2020 में जो AAP विरोध कर रही थी, आज वही सत्ता में है। और जो कांग्रेस सत्ता में थी, वह अब विरोध में है। ऐसे में यह मामला एक दिलचस्प राजनीतिक मोड़ लेता है।
विरोधी दलों का आरोप है कि AAP सरकार दबाव बना रही है कि यह मामला खत्म हो। लेकिन AAP का कहना है कि यह पूरी तरह न्यायिक प्रक्रिया है और उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया था।
अगली सुनवाई का इंतजार
अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर हैं। चंडीगढ़ प्रशासन को अन्य प्रतिवादियों को शामिल करने की अनुमति मिलेगी या नहीं, यह देखना होगा।
इसके साथ ही यह भी देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है या चंडीगढ़ प्रशासन की दलीलों को मान लेता है। यह मामला भगवंत मान और AAP के लिए काफी अहम है।
मुख्य बातें (Key Points)
- सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन की याचिका पर सुनवाई मुल्तवी की
- भगवंत मान सहित AAP नेताओं के खिलाफ 2020 की एफआईआर रद्द करने वाले फैसले को चुनौती
- हाईकोर्ट ने 29 नवंबर 2025 को एफआईआर रद्द की थी
- बिजली दरों के खिलाफ 2020 में हुए प्रदर्शन से जुड़ा है मामला
- चंडीगढ़ प्रशासन ने अन्य आरोपियों को शामिल करने के लिए समय मांगा
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