India Strategic Tunnels: अक्साई चिन के डेपसांग बल्ज में 50 चीनी सैनिक LAC (Line of Actual Control) को पार कर भारतीय क्षेत्र में घुस आए। अगले दिन ITBP (Indo-Tibetan Border Police) की पेट्रोल पार्टी ने इस अवैध चीनी शिविर को खोज निकाला और उनसे 300 मीटर दूर अपने तंबू लगा दिए।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस दूरस्थ इलाके में भी चीनी सैनिक अच्छी तरह से आपूर्ति प्राप्त कर रहे थे। यह गतिरोध 5 मई तक चला और इस दौरान चीनी सैनिकों को हेलीकॉप्टर और ऑल-टेरेन व्हीकल्स द्वारा सप्लाई की गई। यह LAC के साथ चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर बिल्ड-अप की बड़ी बढ़त को दर्शाता है।
वहीं भारतीय सेना इस गतिरोध के दौरान खराब तरीके से सपोर्टेड थी। जिसकी वजह से भारतीय बल इस अवैध घुसपैठ के दौरान कोई भी सख्त कार्रवाई नहीं ले पाए। और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। इस मुद्दे को हल करने के लिए हमें चीनी मांगों को मानना पड़ा – अपने क्षेत्र से बंकर हटाने के बाद ही चीनी सैनिकों ने 5 मई को वापसी की।
2020 में बदल गई तस्वीर: गालवान की सफलता
अगर गौर करें तो 2020 में दोबारा चीनी फोर्सेस ने इस क्षेत्र से 40 किमी दक्षिण गालवान में भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की कोशिश की। लेकिन इस बार तस्वीर अलग थी।
2020 में भारतीय सेना पीछे से नई सड़क के कारण अच्छी तरह से सपोर्टेड थी। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हमारे जवानों ने चीनी सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए। यह इंफ्रास्ट्रक्चर की ताकत का सीधा प्रमाण है।
और आज अपनी सेना को और मजबूत करने के लिए BRO (Border Roads Organisation) इस क्षेत्र में ऑल-वेदर टनल्स विकसित करने में जुटा है। जो 2027 तक ऑपरेशनल हो जाएंगी और इस क्षेत्र में 12 महीने एक्सेस हमारी फोर्सेस को प्रदान करेंगी।
चीन का आक्रामक इंफ्रास्ट्रक्चर
समझने वाली बात यह है कि 2013 का यह घटना LAC के साथ भारत की कमजोरी को उजागर करता है। चाहे 2013 का डेपसांग स्टैंडऑफ हो या 2017 में डोकलाम या 2020 में गालवान, हमेशा ही चीन आक्रामक रहा है।
वहीं चीन ने समय पर LAC के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर लिया है:
- ऑल-वेदर रोड्स
- रेल लाइनें
- एयरफील्ड्स
- अवैध गांव (सलामी स्लाइसिंग के लिए)
दिलचस्प बात यह है कि इस इंफ्रा पुश के साथ चीन बॉर्डर क्षेत्रों में अवैध गांव भी सेटअप करके भारतीय क्षेत्र की सलामी स्लाइसिंग करने में लगा है।
भारत का जवाब: रणनीतिक सुरंगों का नेटवर्क
लेकिन आज हमारी सोच में बदलाव के कारण LAC के साथ अपने वीरों को सपोर्ट करने के लिए हम इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर रहे हैं। चीन के इस आक्रमण को काउंटर करने के लिए जरूरी है कि भारत भी बॉर्डर के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करे।
इसमें ऑल-वेदर रोड्स सबसे महत्वपूर्ण हैं। और इन रोड्स को ऑल-वेदर बनाती हैं रणनीतिक सुरंगें, जो इस हिमालयन बॉर्डर को सर्दियों में भारी बर्फबारी के दौरान भी एक्सेसिबल रखती हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सभी टनल्स स्ट्रैटेजिक हैं, लेकिन इनमें से एक टनल ऐसी है जिसके माध्यम से भारत पूरी तरह से चीन के एक विशेष क्षेत्र में डोमिनेट कर पाएगा।
जम्मू-कश्मीर: LAC और LOC की लाइफलाइन
आज जम्मू-कश्मीर दोनों LAC और LOC को एक्सेस करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। तो चलिए आते हैं जम्मू-कश्मीर की लाइफलाइन NH-44 पर जो लेसर हिमालय के पीर पंजाल रेंजेस को काटते हुए जम्मू और श्रीनगर को कनेक्ट करता है।
जम्मू-श्रीनगर हाईवे की प्रमुख सुरंगें:
| सुरंग का नाम | लंबाई | वर्ष | विशेषता |
|---|---|---|---|
| जवाहर टनल | 2.85 किमी | 1956 | बनिहाल पास को बाईपास करती है |
| बनिहाल-काजीगुंड रोड टनल | 8.45 किमी | 2021 | दूरी 16 किमी कम, समय 30 मिनट बचत |
| बनिहाल-काजीगुंड रेलवे टनल | 11.21 किमी | 2013 | रेल कनेक्टिविटी |
| डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी टनल | 9.28 किमी | 2017 | दूरी 30 किमी कम, 2 घंटे बचत |
अगर गौर करें तो इन सुरंगों के खुलने से पहले जहां श्रीनगर और जम्मू के बीच यात्रा में 8-9 घंटे लगते थे, आज यह ट्रैवल टाइम सिर्फ 5.5 घंटे रह गया है। इसके अलावा सुधमादेव टनल, खिलानी टनल और नंदी टनल निर्माणाधीन हैं, जिसके बाद जम्मू से श्रीनगर सिर्फ 4 घंटों में पहुंचा जा सकेगा।
LOC के साथ रणनीतिक कनेक्टिविटी
NH-144A (पुंछ-अखनूर-जम्मू रूट):
यह रोड LOC के समानांतर चलता है और भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के साथ फोर्स डिप्लॉयमेंट के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस रोड पर चार प्रमुख टनल्स निर्माणाधीन हैं:
- कांडी टनल
- सुंगल टनल
- नौशेरा टनल
- भीमभर गली टनल
2024 में ये सभी टनल्स इनॉगुरेट होने वाली हैं। इनके कंप्लीट होने के बाद LOC के साथ ऑल-वेदर रोड्स भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स को सपोर्ट करेंगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बूस्ट करेंगी।
लद्दाख: LAC की सबसे संवेदनशील धुरी
श्रीनगर-कारगिल-लेह रूट LAC पर तैनाती के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि 2.5 फ्रंट वॉर के मामले में LOC और LAC के बीच तैनाती और पुनर्तैनाती के लिए यह रूट इस्तेमाल किया जाएगा।
NH-1 (श्रीनगर-कारगिल-लेह) की प्रमुख सुरंगें:
2023 में इस क्रिटिकल हाईवे पर तीन बड़ी टनल्स खुलीं:
| सुरंग | लंबाई | विशेषता |
|---|---|---|
| Z-Morh टनल | 6.5 किमी | जोजिला पास से पहले |
| जोजिला टनल | 14.2 किमी | एशिया की सबसे लंबी बाई-डायरेक्शनल रोड टनल |
| नीलगर टनल | 2 किमी | लेह कनेक्टिविटी |
इन तीनों टनल्स के खुलने के बाद श्रीनगर से लेह जाने में सिर्फ 9 घंटे का समय लगता है, जो पहले 13-14 घंटे था। और सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण यह रूट बार-बार बंद हो जाता था, वह समस्या अब खत्म हो गई है।
इसी रूट पर निर्माणाधीन अन्य टनल्स:
- नामिका टनल
- फोटुला टनल
- हमबो टिंगला टनल (कारगिल-बतालिक रूट पर)
- खारदुंगला टनल (2027 तक)
- सासिर ला टनल (डारबुक-शयोक-DBO रोड पर, डेपसांग प्लेन्स के लिए क्रिटिकल)
लेह के लिए तीन वैकल्पिक रूट
समझने वाली बात यह है कि भारत लेह को तीन अलग-अलग रूटों से कनेक्ट कर रहा है:
1. NH-1 (श्रीनगर-कारगिल-लेह) – पहले से चर्चित
2. NH-3 (मनाली-कीलोंग-लेह):
- 2020 में 9.02 किमी लंबी अटल टनल हिमाचल प्रदेश में पहले से खुल चुकी है
- लद्दाख में तीन और टनल्स निर्माणाधीन:
- बारा लाछा ला टनल
- लाछुंगला टनल
- तांगलांग ला टनल
- 2027 तक ये बनकर तैयार होंगी और मनाली-लेह रूट की दूरी 4 घंटे कम हो जाएगी
3. नया रूट (सहारनपुर-काजा-चुशुल-लेह) – 2029 तक:
यह रूट गोगरा हॉट स्प्रिंग्स और पगोंग त्सो जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में लॉजिस्टिकल सपोर्ट देगा। इस रूट पर कम से कम 9 स्ट्रैटेजिक टनल्स होंगी।
अरुणाचल प्रदेश: सबसे संवेदनशील फ्रंट
NH-13 (तवांग हाईवे) पर सेला टनल:
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हाल ही में इनॉगुरेट हुई सेला टनल तवांग को ऑल-वेदर कनेक्टिविटी प्रदान करती है। तवांग चीन के साथ सबसे संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में से एक है।
सबसे स्ट्रैटेजिक टनल: नुमालीगढ़-गोपुर अंडर रिवर टनल
और बस यहीं है भारत की सबसे रणनीतिक परियोजना। दिलचस्प बात यह है कि यह ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे बनाई जा रही है।
अगर गौर करें तो युद्ध के मामले में चीन भारत के पुलों को मिसाइल से टारगेट कर सकता है। वहीं अंडर-वाटर टनल्स को टारगेट करना बेहद मुश्किल है। और यह टनल अरुणाचल में हमारे सैनिकों के लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अन्य महत्वपूर्ण टनल्स
सिक्किम:
- 2018 में इनॉगुरेट हुई NH-301A पर थेंग टनल (0.578 किमी)
- उत्तर सिक्किम में तैनाती के लिए महत्वपूर्ण
हिमाचल-उत्तराखंड:
- मनाली-काजा रूट पर कुंजुम पास टनल
- नीमू-पादुम-दारचा रोड पर शिंगोला टनल
- उत्तराखंड में चारधाम हाईवे प्रोजेक्ट में 7 नई टनल्स निर्माणाधीन
आर्थिक लाभ: तैनाती लागत में कमी
यहां समझना जरूरी है कि इन दूरस्थ स्थानों पर सैनिकों को तैनात रखना बेहद महंगा है। उदाहरण के लिए, डेपसांग प्लेन्स में एक सैनिक को तैनात रखने में ₹1 लाख प्रति वर्ष का खर्च आता है।
इसलिए ये रोड, ब्रिज और टनल्स इन रणनीतिक क्षेत्रों को कनेक्ट करके:
- परिवहन लागत कम करते हैं
- सैनिकों की रखरखाव लागत घटाते हैं
- लॉन्ग टर्म में देश को आर्थिक लाभ देते हैं
क्यों पहले नहीं बना ये इंफ्रास्ट्रक्चर?
तो सवाल यह उठता है कि क्या इन रोड्स, टनल्स और ब्रिजों के फायदों के बारे में हमें पहले नहीं पता था?
समझने वाली बात यह है कि पिछली सरकारों ने बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को नजरअंदाज किया। लेकिन 2013 के डेपसांग, 2017 के डोकलाम और 2020 के गालवान ने हमें सबक सिखाया कि बिना मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के, हम अपने सैनिकों को उचित सहायता नहीं दे सकते।
आज सोच में बदलाव आया है। BRO और सरकार तेजी से बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर रहे हैं, जो अगले 8-10 सालों में पूरी तरह तैयार हो जाएगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- 2013 डेपसांग स्टैंडऑफ में भारत खराब इंफ्रा के कारण पिछड़ा
- 2020 गालवान में बेहतर रोड कनेक्टिविटी से भारत ने चीन को जवाब दिया
- 2027 तक LAC के साथ ऑल-वेदर कनेक्टिविटी मिलेगी
- जम्मू-श्रीनगर ट्रैवल टाइम 5.5 घंटे (पहले 8-9 घंटे)
- जोजिला टनल (14.2 किमी) एशिया की सबसे लंबी बाई-डायरेक्शनल रोड टनल
- लेह के लिए तीन वैकल्पिक रूट विकसित हो रहे हैं
- ब्रह्मपुत्र में अंडर-रिवर टनल सबसे स्ट्रैटेजिक प्रोजेक्ट
- डेपसांग में एक सैनिक की लागत ₹1 लाख/वर्ष, रोड से कम होगी













