Pakistan Economic Crisis: ईरान-अमेरिका युद्ध ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद स्वीकार किया है कि देश की साप्ताहिक तेल आयात लागत $300 मिलियन से उछलकर $800 मिलियन हो गई है। यह महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक नाजुक अर्थव्यवस्था के लिए सिस्टमिक शॉक है।
देखा जाए तो पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा था। लेकिन ईरान युद्ध ने जो झटका दिया है, वह पिछले दो सालों की सारी प्रगति को धूल में मिला गया है। Shehbaz Sharif का कहना है कि यह संघर्ष देश की आर्थिक स्थिरीकरण की कोशिशों को लगभग दो साल पीछे ले गया है।
अब सवाल उठता है कि आखिर ईरान युद्ध ने पाकिस्तान को इतना क्यों प्रभावित किया? इसके पीछे कई गहरे कारण हैं जिन्हें समझना जरूरी है।
तेल आयात बिल में तीन गुना उछाल, विदेशी मुद्रा भंडार खाली
पाकिस्तान अपनी तेल जरूरतों के लिए 85 से 90 प्रतिशत तक आयात पर निर्भर है। जब स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में व्यवधान शुरू हुआ, तो वैश्विक तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। पहले जो कच्चा तेल $100 प्रति बैरल पर था, वह अचानक $125 प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह पिछले तीन-चार वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर है।
दिलचस्प बात यह है कि भारत भी तेल आयात पर निर्भर है, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि वह इस झटके को झेल सकती है। पाकिस्तान के लिए यही सबसे बड़ी समस्या है – उसका विदेशी मुद्रा भंडार पहले से ही खाली है।
हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी पाकिस्तान के आयात बिल को भारी तरीके से बढ़ा देती है। और जब आपके पास डॉलर ही नहीं है, तो भुगतान कैसे करेंगे? यही वह चेन रिएक्शन है जो पूरी अर्थव्यवस्था को हिला देती है।
करंट अकाउंट घाटा बढ़ा, पाकिस्तानी रुपया और गिरा
जब तेल का आयात बिल बढ़ता है, तो करंट अकाउंट डेफिसिट भी बढ़ता है। पाकिस्तान को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है, लेकिन जब विदेशी मुद्रा भंडार ही सूख जाए, तो भुगतान कैसे हो? इसका सीधा असर पाकिस्तानी रुपये पर पड़ता है जो और नीचे गिर जाता है।
समझने वाली बात यह है कि जब रुपया कमजोर होता है, तो आयात और महंगा हो जाता है। इससे महंगाई बढ़ती है – जिसे इंपोर्टेड इनफ्लेशन कहते हैं। ईंधन के दाम बढ़ते हैं, परिवहन महंगा होता है, और अंततः खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं।
स्टैगफ्लेशन का खतरा: न विकास, न राहत
अगर गौर करें तो पाकिस्तान अभी क्लासिक स्टैगफ्लेशन की स्थिति में फंस गया है। यह वह हालत है जब महंगाई तो बढ़ रही है, लेकिन आर्थिक विकास रुक गया है। जब महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं, तो निवेश और खपत दोनों घट जाते हैं। इससे बेरोजगारी बढ़ती है और अर्थव्यवस्था और संकट में फंसती है।
IMF (International Monetary Fund) से मिला बेलआउट पैकेज भी अब काम नहीं आ रहा। पिछले दो सालों में जो थोड़ी-बहुत आर्थिक स्थिरता आई थी, वह सब खत्म हो गई। महंगाई दर वापस 35-40% के स्तर पर पहुंच गई है।
बिजली संकट: दिन में 4 घंटे, गांवों में 8 घंटे कटौती
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पाकिस्तान सिर्फ तेल संकट से नहीं जूझ रहा, बल्कि बिजली का भयानक संकट भी झेल रहा है। LNG (Liquefied Natural Gas) आधारित बिजली उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया है क्योंकि कतर से कार्गो नहीं आ पा रहा।
पाकिस्तान के एलएनजी पावर प्लांट्स की कुल क्षमता 6000 मेगावाट है, लेकिन अभी केवल 600 मेगावाट बिजली भी नहीं बन पा रही। इसका नतीजा यह है कि शहरी इलाकों में 4 से 6 घंटे और ग्रामीण इलाकों में 8 घंटे से ज्यादा बिजली कटौती हो रही है।
तेल से चलने वाले पावर प्लांट महंगे हो गए हैं, इसलिए कई बंद हो गए हैं। पानी से बिजली बनाने वाले हाइड्रो प्लांट्स में भी पानी की कमी है क्योंकि बारिश का मौसम अभी नहीं आया है। यह सिस्टमिक कोलैप्स की स्थिति है।
गैस की भयंकर कमी: प्लास्टिक बैग में भरनी पड़ी गैस
सिर्फ बिजली ही नहीं, गैस की भी भयानक किल्लत है। पाकिस्तान में गैस का उपयोग खाना पकाने, उर्वरक बनाने और टेक्सटाइल उद्योग में होता है। लेकिन अब गैस का दबाव इतना कम हो गया है कि सप्लाई ही बंद हो जाती है।
और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी – हालात इतने बुरे हो गए कि लोगों को प्लास्टिक बैग में गैस भरनी पड़ी। यह किसी तीसरी दुनिया के देश की तस्वीर नहीं, बल्कि परमाणु हथियारों वाले देश की वास्तविकता है।
सरकार ने कमर्शियल उपयोग से प्राथमिकता हटाकर घरेलू उपभोक्ताओं को देनी शुरू की, लेकिन यह भी पर्याप्त नहीं है।
सेक्टर-वार तबाही: ऊर्जा से लेकर उद्योग तक
ऊर्जा क्षेत्र में ईंधन की कीमतें बढ़ने से बिजली उत्पादन महंगा हो गया। खाद्य महंगाई बढ़ी क्योंकि परिवहन लागत और उर्वरक के दाम आसमान छू गए। औद्योगिक क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ क्योंकि ऊर्जा लागत बढ़ने से उत्पादन महंगा हो गया।
कई उद्योगों ने अपना उत्पादन कम कर दिया क्योंकि महंगाई के कारण माल बिक नहीं रहा। इससे बेरोजगारी बढ़ी और पूरी अर्थव्यवस्था एक दुष्चक्र में फंस गई।
UAE ने दिया ₹29,000 करोड़ का झटका
राहत की बात तो यह थी कि Saudi Arabia और China ने पाकिस्तान की थोड़ी मदद की। लेकिन UAE (United Arab Emirates) ने बड़ा झटका दिया। पहले UAE ने $1 बिलियन की मांग की, फिर इसे बढ़ाकर $2.4 बिलियन कर दिया। कुल मिलाकर $3.45 बिलियन (करीब ₹29,000 करोड़) की वापसी की मांग की।
पाकिस्तान इस स्थिति में नहीं था कि इतनी बड़ी रकम चुका सके। लेकिन चीन और सऊदी अरब की मदद से किसी तरह यह भुगतान किया गया। UAE अब अपना पैसा पाकिस्तान से निकालकर भारत में निवेश करना चाहता है।
मध्यस्थता की कोशिश भी फेल, होटल का बिल भी नहीं चुका सके
पाकिस्तान ने सोचा था कि अगर वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करा दे, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधरेगी और कुछ आर्थिक लाभ भी मिलेगा। लेकिन यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह अभी कहना मुश्किल है।
चिंता का विषय यह है कि जब ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधिमंडल Islamabad के सेरेना होटल में रुके थे, तो उनके होटल के बिल का भुगतान तक पाकिस्तान सरकार नहीं कर पाई। बाद में होटल के मालिक को आना पड़ा और कहना पड़ा कि यह “कॉम्प्लीमेंट्री” था। यह दयनीय स्थिति को दर्शाता है।
दो साल की प्रगति एक झटके में खत्म
युद्ध से पहले आईएमएफ बेलआउट पैकेज की मदद से महंगाई थोड़ी स्थिर हो रही थी। करेंसी रिलेटिवली कंट्रोल में थी और आईएमएफ के सुधार भी लागू हो रहे थे। लेकिन युद्ध ने यह सब खत्म कर दिया।
महंगाई वापस 35-40% पर पहुंच गई। घाटा और बढ़ गया। आर्थिक विश्वास कमजोर हो गया। इसका मतलब यही है कि पिछले दो साल की स्थिरता पूरी तरह खत्म हो गई।
सऊदी अरब और चीन ही सहारा
बाहरी सहायता के मामले में सबसे ज्यादा मदद सऊदी अरब कर रहा है – वित्तीय सहायता और तेल भुगतान में देरी की सुविधा। सऊदी-पाकिस्तान समझौते के तहत संकट में मदद का वादा किया गया था, और अब वह पूरा किया जा रहा है।
आईएमएफ से बेलआउट पैकेज तो मिलते रहते हैं, लेकिन उनके नियमों का पालन करना पड़ता है। उम्मीद की किरण यह है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख Asim Munir और शहबाज शरीफ Donald Trump के करीब चले गए हैं, और आईएमएफ में ज्यादातर फैसले अमेरिका के इशारे पर होते हैं।
भविष्य में और भी खतरनाक संकट
तेल की कीमतें जो कल $100 प्रति बैरल थीं, वह अचानक $125 प्रति बैरल हो गई हैं। यह रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान के सबसे ऊंचे स्तर के बराबर है। अगर यह और बढ़ता है, तो पाकिस्तान के लिए स्थिति और खतरनाक हो जाएगी।
National Coordination and Management Council (NCMC) को इस आर्थिक संकट से निपटने के लिए सक्रिय किया गया है। लेकिन जब बुनियादी संसाधन ही न हों, तो कोई भी काउंसिल कितना कर सकती है?
हैरान करने वाली बात यह है कि परमाणु हथियारों वाला देश अपने नागरिकों को बिजली और गैस तक नहीं दे पा रहा। यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का भी प्रतीक है।
जानें पूरा मामला
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर थी – ऊंचा बाहरी कर्ज, व्यापार घाटा, करंट अकाउंट घाटा और खाली विदेशी मुद्रा भंडार। ऐसे में ईरान-अमेरिका युद्ध ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को अवरुद्ध कर दिया, जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है।
तेल की कीमतें दोगुनी हो गईं। पाकिस्तान 85-90% तेल आयात करता है और उसके पास इतना विदेशी मुद्रा भंडार नहीं है कि वह इस झटके को झेल सके। नतीजा – एक के बाद एक सेक्टर ढह रहे हैं। यह एक चेन रिएक्शन है जिसमें पूरी अर्थव्यवस्था फंस गई है।
मुख्य बातें (Key Points)
• पाकिस्तान का साप्ताहिक तेल आयात बिल $300 मिलियन से बढ़कर $800 मिलियन हो गया
• प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने माना कि देश दो साल की प्रगति खो चुका है
• कच्चे तेल की कीमत $100 से बढ़कर $125 प्रति बैरल हो गई
• शहरी क्षेत्रों में 4-6 घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों में 8 घंटे से ज्यादा बिजली कटौती
• 6000 मेगावाट एलएनजी पावर क्षमता में से केवल 600 मेगावाट उत्पादन हो रहा
• UAE ने $3.45 बिलियन की वापसी की मांग की जिसे चीन और सऊदी की मदद से चुकाया गया
• महंगाई दर वापस 35-40% के स्तर पर पहुंच गई
• स्टैगफ्लेशन की स्थिति – न विकास, न महंगाई से राहत











