Too Much Passive Sitting Can Increase Dementia Risk: अगर आप भी दिनभर बैठे-बैठे फोन चलाते रहते हैं, घंटों टीवी देखते हैं या बिना सोचे-समझे गाने सुनते रहते हैं, तो यह खबर आपके लिए चेतावनी की घंटी है। अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिवेंटिव मेडिसिन में प्रकाशित एक बड़ी स्टडी में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि ऐसी गतिविधियां डिमेंशिया का खतरा काफी बढ़ा देती हैं।
देखा जाए तो डिमेंशिया एक ऐसी गंभीर स्थिति है जिसमें याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और रोजमर्रा के काम करने की शक्ति धीरे-धीरे कम होने लगती है। व्यक्ति नाम, जगहें, हाल की बातें भूलने लगता है। और दिलचस्प बात यह है कि दुनिया भर में 5.5 करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है।
स्टडी में पाया गया कि जो लोग दिमाग को एक्टिव रखने वाले काम करते हैं – जैसे क्रॉसवर्ड पजल सॉल्व करना, ऑफिस का काम, सिलाई-बुनाई – उनमें डिमेंशिया का खतरा काफी कम होता है। वहीं जो लोग सिर्फ स्क्रीन देखते रहते हैं, उनका दिमाग धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
20 साल की रिसर्च में सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई
यह स्टडी स्वीडन में की गई जिसमें 20,000 से ज्यादा लोगों को लगभग 20 सालों तक फॉलो किया गया। जब स्टडी शुरू हुई तब इन लोगों की उम्र 35 से 64 साल के बीच थी। उनसे पूछा गया कि वे रोज कितना समय बैठकर बिताते हैं और उस दौरान क्या करते हैं।
समझने वाली बात यह है कि रिसर्चर्स ने बैठकर की जाने वाली गतिविधियों को दो हिस्सों में बांटा। पहला हिस्सा था “मेंटली पैसिव सेडेंट्री बिहेवियर” – यानी ऐसे काम जिनमें दिमाग का बहुत कम इस्तेमाल होता है। जैसे टीवी देखना, म्यूजिक सुनना, बिना सोचे फोन चलाना।
दूसरा हिस्सा था “मेंटली एक्टिव सेडेंट्री बिहेवियर” – यानी ऐसे काम जो दिमाग को चुनौती देते हैं। जैसे ऑफिस का काम, मीटिंग्स, पढ़ाई, सिलाई-बुनाई, क्रॉसवर्ड पजल।
569 लोगों को हुआ डिमेंशिया, आंकड़े हैरान करने वाले
करीब 20 साल की अवधि में 569 लोगों को डिमेंशिया हो गया। जब डाटा का विश्लेषण किया गया तो पता चला कि जो लोग ज्यादा समय मेंटली पैसिव गतिविधियों में बिताते थे, उनमें डिमेंशिया का खतरा काफी ज्यादा था।
वहीं जो लोग बैठकर भी दिमाग को एक्टिव रखते थे – जैसे काम करना, पढ़ना, पजल सॉल्व करना – उनमें यह खतरा काफी कम पाया गया।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रिसर्चर्स ने यह भी देखा कि अगर लोग अपनी आदतें बदल लें तो क्या असर पड़ेगा। और परिणाम बहुत उत्साहवर्धक थे।
सिर्फ एक घंटे की बदलाव से 7% तक घटा खतरा
स्टडी में पाया गया कि अगर कोई व्यक्ति एक घंटे की पैसिव गतिविधि (जैसे टीवी देखना) की जगह मेंटली एक्टिव काम करे तो डिमेंशिया का रिस्क लगभग 7% तक कम हो सकता है।
अगर गौर करें तो यह बहुत महत्वपूर्ण है। सिर्फ एक घंटे का बदलाव इतना बड़ा फर्क ला सकता है।
इसके अलावा अगर दिमाग को एक्टिव रखने वाले काम को एक घंटे के लिए और बढ़ा दिया जाए तो डिमेंशिया का खतरा करीब 4% तक कम हो जाता है।
और सबसे दिलचस्प बात – अगर दिमाग के साथ-साथ शरीर भी एक्टिव रहे (यानी फिजिकल एक्टिविटी भी की जाए) तो डिमेंशिया का रिस्क लगभग 11% तक घट जाता है।
क्यों खतरनाक है घंटों स्क्रीन देखना?
अब सवाल उठता है कि आखिर बैठे-बैठे टीवी देखने या फोन चलाने से डिमेंशिया का खतरा क्यों बढ़ता है? इस सवाल का जवाब देने के लिए हमने फोर्टिस हॉस्पिटल शालीमार बाग में न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रिंसिपल डायरेक्टर और हेड डॉक्टर जयदीप बंसल से बात की।
डॉक्टर जयदीप बंसल कहते हैं कि जब दिमाग को चुनौती नहीं मिलती तो उसके कनेक्शन धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं। देर तक टीवी देखना या बिना सोचे-समझे फोन चलाना दिमाग को सिर्फ जानकारी लेने तक सीमित कर देता है। इससे सोचने, समझने और याद रखने की क्षमता पर असर पड़ता है।
समझने वाली बात यह है कि दिमाग भी शरीर की तरह है। अगर आप इसे इस्तेमाल नहीं करेंगे तो यह कमजोर हो जाएगा। जैसे शरीर को एक्सरसाइज की जरूरत होती है, वैसे ही दिमाग को भी मानसिक कसरत की जरूरत होती है।
मोटापा, डायबिटीज और BP भी बढ़ाते हैं खतरा
डॉक्टर बंसल ने यह भी बताया कि सिर्फ स्क्रीन देखना ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी दूसरी आदतें भी डिमेंशिया का खतरा बढ़ाती हैं। जैसे जो लोग घंटों बैठे रहते हैं, उनमें मोटापा, डायबिटीज, हाई बीपी और कम फिजिकल एक्टिविटी की समस्या होती है।
और ये सभी चीजें डिमेंशिया का खतरा और भी बढ़ा देती हैं। यानी यह एक चेन रिएक्शन है। घंटों बैठकर स्क्रीन देखने से शारीरिक समस्याएं बढ़ती हैं और वे समस्याएं दिमाग को और कमजोर करती हैं।
डिमेंशिया क्या है और कितने लोग प्रभावित हैं?
डिमेंशिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें मस्तिष्क की कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं। इसकी वजह से याददाश्त खोने लगती है, सोचने-समझने की क्षमता कम हो जाती है, और रोजमर्रा के काम करने में दिक्कत होती है।
चिंता का विषय यह है कि दुनिया भर में 5.5 करोड़ से ज्यादा लोग डिमेंशिया से प्रभावित हैं। और अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या तीन गुना हो सकती है।
डिमेंशिया की सबसे आम किस्म है अल्जाइमर रोग। इसमें व्यक्ति धीरे-धीरे अपने परिवार के सदस्यों को, अपना नाम, अपनी जगह – सब कुछ भूलने लगता है।
कैसे बचें डिमेंशिया से? विशेषज्ञों की सलाह
डॉक्टर जयदीप बंसल ने डिमेंशिया के खतरे को कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।
सबसे पहले – दिमाग को चुनौती दें। रोज कुछ नया सीखें, पढ़ें, पजल सॉल्व करें, सुडोकू खेलें, शतरंज खेलें। ऐसे काम करें जिनमें दिमाग को सोचना पड़े।
दूसरा – सोशली एक्टिव रहें। लोगों से बातचीत करें, दोस्तों-रिश्तेदारों से मिलें। सामाजिक गतिविधियों में भाग लें। अकेलापन डिमेंशिया का एक बड़ा कारण है।
तीसरा – रोजाना एक्सरसाइज करें। थोड़ी भी एक्सरसाइज करें – चाहे वह सिर्फ 30 मिनट की वॉक ही क्यों ना हो। इससे दिमाग में खून का प्रवाह सुधरता है और नई कोशिकाएं बनती हैं।
चौथा – हेल्दी डाइट लें। ताजे फल, सब्जियां, नट्स, मछली खाएं। प्रोसेस्ड फूड, चीनी और अनहेल्दी फैट से बचें।
पांचवां – अच्छी नींद लें। कम से कम 7-8 घंटे की नींद बहुत जरूरी है। नींद के दौरान दिमाग खुद को रिपेयर करता है।
छठा – तनाव को कंट्रोल करें। योग, मेडिटेशन, गहरी सांस लेना – ये सब तनाव कम करने में मदद करते हैं।
स्क्रीन टाइम कितना होना चाहिए?
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि स्टडी यह नहीं कहती कि टीवी या फोन बिल्कुल ना देखें। लेकिन यह जरूर कहती है कि इन्हें सीमित मात्रा में इस्तेमाल करें।
अगर गौर करें तो विशेषज्ञों का मानना है कि रोजाना 2-3 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम नुकसानदायक हो सकता है। और सबसे जरूरी – स्क्रीन देखते समय भी दिमाग को एक्टिव रखें।
जैसे सिर्फ सीरियल देखने की बजाय कोई डॉक्यूमेंट्री देखें। सिर्फ रील्स स्क्रॉल करने की बजाय कुछ पढ़ें, कुछ सीखें। यानी स्क्रीन टाइम को productive बनाएं।
युवाओं के लिए भी चेतावनी
हैरान करने वाली बात यह है कि यह समस्या सिर्फ बुजुर्गों की नहीं है। आजकल युवा भी घंटों फोन पर बिताते हैं। और यह आदत आगे चलकर गंभीर समस्या बन सकती है।
देखा जाए तो जो युवा आज 8-10 घंटे फोन पर बिता रहे हैं, उनका दिमाग धीरे-धीरे इसका आदी हो रहा है। और 20-30 साल बाद जब वे मध्यम आयु में पहुंचेंगे, तब उन्हें डिमेंशिया का खतरा काफी ज्यादा होगा।
इसलिए युवाओं को अभी से सावधान रहने की जरूरत है। स्क्रीन टाइम को कम करें, दिमाग को एक्टिव रखने वाले काम करें, और शारीरिक गतिविधियों में भी भाग लें।
भारत में डिमेंशिया की स्थिति
भारत में भी डिमेंशिया के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अनुमान है कि भारत में करीब 40-50 लाख लोग डिमेंशिया से प्रभावित हैं।
चिंता का विषय यह है कि भारत में लोग इस बीमारी को गंभीरता से नहीं लेते। अक्सर यह समझा जाता है कि बुढ़ापे में भूलना आम बात है। लेकिन यह सोच गलत है।
अगर किसी को बार-बार भूलने की समस्या हो, नाम याद ना रहे, जगह भूल जाए, तो तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए। शुरुआती दौर में पता चल जाए तो इलाज से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
मुख्य बातें (Key Points):
✅ घंटों फोन-टीवी देखना डिमेंशिया का खतरा बढ़ाता है
✅ 20 साल की स्टडी में 20,000 लोगों को फॉलो किया गया
✅ 569 लोगों को हुआ डिमेंशिया, मेंटली पैसिव गतिविधियां जिम्मेदार
✅ एक घंटे की बदलाव से 7% तक खतरा कम हो सकता है
✅ दुनिया में 5.5 करोड़ लोग डिमेंशिया से प्रभावित
✅ पजल, पढ़ाई, सिलाई-बुनाई जैसे काम दिमाग को एक्टिव रखते हैं
✅ एक्सरसाइज, अच्छी नींद, हेल्दी डाइट जरूरी है













