New Labour Code: देश में 1 अप्रैल 2026 से लागू हुए नए लेबर कोड ने ग्रेच्युटी (Gratuity) के नियमों में बड़े बदलाव किए हैं। इस बदलाव का सीधा असर कर्मचारियों की जेब पर पड़ेगा, क्योंकि अब पहले के मुकाबले 20% से 50% तक ज्यादा ग्रेच्युटी मिलने की संभावना है। खासतौर पर फिक्स्ड टर्म (निश्चित अवधि) कर्मचारियों के लिए यह खबर बड़ी राहत लेकर आई है।
मोदी सरकार (Modi Government) ने करीब 44 अलग-अलग पुराने श्रम कानूनों को हटाकर चार नए कोड लागू किए हैं। इनका मुख्य उद्देश्य मजदूरों की सुरक्षा और उनके हितों को मजबूत करना है।
क्या बदला है ग्रेच्युटी में?
नए लेबर कोड के तहत सबसे बड़ा बदलाव वेतन (Salary) की परिभाषा में किया गया है। पहले कई कंपनियां बेसिक सैलरी कम रखती थीं और भत्ते (Allowances) ज्यादा, जिससे ग्रेच्युटी कम बनती थी।
अब सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि बेसिक सैलरी कुल वेतन का कम से कम 50% होनी चाहिए। अगर ज्यादा भत्ते हैं, तो उन्हें बेसिक सैलरी में जोड़ा जाएगा। इससे ग्रेच्युटी की गणना का आधार बढ़ेगा और कर्मचारियों को ज्यादा भुगतान मिलेगा।
फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत
नए नियमों के तहत अब निश्चित अवधि (Fixed Term) यानी कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को भी ग्रेच्युटी का लाभ मिलेगा।
अगर ऐसा कर्मचारी कम से कम एक साल की सेवा पूरी करता है, तो उसे उसके कार्यकाल के अनुपात में ग्रेच्युटी दी जाएगी। यह बदलाव कॉन्ट्रैक्ट और प्रोजेक्ट आधारित नौकरियों में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए बड़ी खुशखबरी है।
ग्रेच्युटी की गणना कैसे होगी?
ग्रेच्युटी की गणना का फार्मूला पहले जैसा ही रखा गया है, लेकिन वेतन की नई परिभाषा के कारण इसकी राशि में अंतर आएगा।
फार्मूला: (आखिरी सैलरी × सेवा अवधि × 15) ÷ 26
उदाहरण के लिए, अगर किसी कर्मचारी की आखिरी सैलरी ₹52,000 है और उसने 10 साल काम किया है, तो उसकी ग्रेच्युटी लगभग ₹3 लाख के आसपास होगी।
बेसिक सैलरी का नियम
नए नियमों में यह भी तय किया गया है कि बेसिक सैलरी कुल वेतन का कम से कम 50% होनी चाहिए।
पहले कई कंपनियां बेसिक सैलरी कम और अलाउंस ज्यादा रखती थीं, जिससे ग्रेच्युटी, PF और अन्य लाभ कम बनते थे। अब यह तरीका नहीं चलेगा। इससे सैलरी स्ट्रक्चर ज्यादा पारदर्शी बनेगा।
कितनी बढ़ सकती है ग्रेच्युटी?
विशेषज्ञों के अनुसार, कई मामलों में ग्रेच्युटी 20% से 50% तक बढ़ सकती है। यह उन कर्मचारियों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद होगा, जिनकी सैलरी में पहले ज्यादा अलाउंस शामिल होते थे।
उदाहरण: अगर किसी कर्मचारी की कुल सैलरी ₹1 लाख है और पहले बेसिक सिर्फ ₹30,000 था, तो अब यह कम से कम ₹50,000 होगा। इससे ग्रेच्युटी की गणना में बड़ा अंतर आएगा।
मूल व्यवस्था अभी भी वही
हालांकि नए कानूनों के बावजूद ग्रेच्युटी की मूल व्यवस्था पहले जैसी ही बनी हुई है। कर्मचारियों को अब भी कम से कम 5 साल की निरंतर सेवा पूरी करने पर ही ग्रेच्युटी मिलेगी।
यह राशि रिटायरमेंट, इस्तीफा, नौकरी छोड़ने, मृत्यु और विकलांगता जैसी परिस्थितियों में दी जाएगी। कैलकुलेशन का आधार भी लास्ट सैलरी और टोटल सर्विस पीरियड ही रहेगा।
21 नवंबर 2025 से प्रभावी
सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये नियम 21 नवंबर 2025 से ही लागू माने जाएंगे। हालांकि, पूर्ण रूप से लागू होने की तारीख 1 अप्रैल 2026 रखी गई है।
इसका मतलब यह है कि इस तारीख के बाद रिटायर होने वाले या नौकरी छोड़ने वाले कर्मचारियों को नए नियमों के तहत ग्रेच्युटी मिलेगी।
कंपनियों पर असर
जहां कर्मचारियों के लिए यह बदलाव फायदेमंद है, वहीं कंपनियों के लिए यह लागत बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।
कंपनियों को अपनी सैलरी स्ट्रक्चर को नए नियमों के अनुसार बदलना होगा। इससे उनका HR बजट बढ़ सकता है, लेकिन कर्मचारी संतुष्टि और रिटेंशन में सुधार भी होगा।
जानें पूरा मामला
भारत में श्रम कानून बहुत पुराने और जटिल हो चुके थे। अलग-अलग 44 कानूनों को मैनेज करना सरकार और कंपनियों दोनों के लिए मुश्किल था।
इसी को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने चार नए लेबर कोड बनाए: वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थिति। इनका उद्देश्य कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत करना और व्यापार को आसान बनाना है।
मुख्य बातें (Key Points):
- 1 अप्रैल 2026 से नए लेबर कोड पूरी तरह लागू हुए
- बेसिक सैलरी अब कुल वेतन का कम से कम 50% होनी चाहिए
- फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को 1 साल बाद ही ग्रेच्युटी मिलेगी
- कई मामलों में ग्रेच्युटी 20-50% तक बढ़ सकती है













