Atiq Ahmed का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति और अपराध की दुनिया में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 100 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद अतीक अहमद कभी भी कोर्ट में दोषी साबित नहीं हो पाए, सिवाय एक केस के, जिसमें उन्हें उनकी मौत से कुछ दिन पहले ही उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। प्रयागराज के इस बाहुबली नेता ने पांच बार विधायक और एक बार सांसद बनकर राजनीति में अपना दबदबा कायम किया। 15 अप्रैल की रात उनकी और उनके भाई अशरफ की धूमनगंज पुलिस स्टेशन से कोविन हॉस्पिटल ले जाते वक्त फर्जी मीडियाकर्मियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
क्रिमिनल और बाहुबली में क्या फर्क है?
Atiq Ahmed की कहानी समझने से पहले एक बात समझना जरूरी है कि क्रिमिनल और बाहुबली में फर्क क्या होता है। बाहुबली वो होता है जिसके खिलाफ केस तो दर्ज होते हैं, लेकिन कोर्ट में कभी प्रूव नहीं हो पाते। और यही बात अतीक अहमद पर सटीक बैठती थी।
अतीक के ऊपर 100 से भी ज्यादा केस रजिस्टर्ड थे, लेकिन सिर्फ एक ही केस में वो दोषी साबित हो पाए। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि कोई भी गवाह कोर्ट में सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। जो गवाह आता भी था, वो अपने बयान बदल देता था। और जो गवाह आने वाला होता था, उसकी किसी न किसी वजह से मौत हो जाती थी।
पुलिसकर्मी भी छुपाते थे अपनी पहचान
Atiq Ahmed का खौफ इतना था कि जिन पुलिसकर्मियों की ड्यूटी उन्हें हथकड़ी पहनाने या जेल में एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए लगती थी, वो डर के मारे अपना नेम टैग छुपाकर जेब में रख लेते थे। उन्हें डर रहता था कि कहीं अतीक अहमद को उनका नाम न पता चल जाए।
इतना ही नहीं, एक समय ऐसा भी आया जब 10 जजों ने अतीक अहमद के केस सुनने से ही साफ मना कर दिया था। यही कारण था कि उनका अपराध कभी कोर्ट में प्रूव ही नहीं हो पाया।
1989 से 2004 तक लगातार पांच बार बने विधायक
चूंकि Atiq Ahmed के खिलाफ कोई भी अपराध कोर्ट में साबित नहीं हुआ था, इसलिए वो चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह पात्र थे। 1989 में अतीक अहमद पहली बार विधायक बने और उसके बाद 2004 तक लगातार पांच बार चुनाव जीतकर एमएलए बनते रहे।
बड़ी-बड़ी पार्टियों के दिग्गज नेताओं को हराकर चुनाव जीतना कोई आसान काम नहीं था। लेकिन कहा जाता है कि उस दौर में अतीक के पास उस इलाके में पैसा और पावर दोनों था। आरोप यह भी लगे कि एक्सटॉर्शन और जमीन कब्जा करके अतीक ने बेहिसाब पैसा बनाया।
बिजनेसमैन से लेकर बिल्डर तक, सबसे वसूली के आरोप
Atiq Ahmed पर आरोप सिर्फ एक्सटॉर्शन और लैंड कब्जे तक सीमित नहीं थे। चुनाव के समय बिजनेसमैन, बिल्डर्स, फैक्ट्री ओनर्स, हॉस्पिटल मालिक और बड़ी रिटेल शॉप्स के मालिकों से “इलेक्शन टैक्स” के नाम पर पैसे वसूलने का आरोप भी लगा।
इसके अलावा बूथ कैप्चरिंग और दूसरे इलाकों से लोगों को ट्रकों में भरकर वोटिंग के समय लाने के भी गंभीर आरोप थे। बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों के लिए पार्टी फंड के नाम पर करोड़ों रुपए जमा करवाना अतीक के लिए बाएं हाथ का खेल माना जाता था। उनकी एक आवाज पर बंदूकें लेकर भीड़ इकट्ठी हो जाती थी।
1995 का गेस्ट हाउस कांड और मायावती पर हमला
1995 में हुए चर्चित गेस्ट हाउस कांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस घटना में मायावती पर हमला हुआ और उन्हें अपनी जान बचाने के लिए एक कमरे में बंद होना पड़ा। इस हमले का आरोप भी Atiq Ahmed के ऊपर लगाया गया था।
इस घटना के बाद अतीक अहमद अपने इलाके में और भी ज्यादा फेमस हो गए। राजनीतिक पार्टियों को भी उनमें “टैलेंट” दिखने लगा और हर पार्टी अतीक को अपने साथ लेना चाहती थी।
2004 में समाजवादी पार्टी से बने सांसद
2004 में समाजवादी पार्टी ने Atiq Ahmed को फूलपुर लोकसभा सीट से टिकट दिया। अतीक ने यह चुनाव भी जीत लिया और “माननीय विधायक” से सीधे “माननीय सांसद” बन गए। अब अतीक अहमद का दबदबा सिर्फ प्रयागराज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसद की गलियारों तक पहुंच गया।
India-US Nuclear Deal में अतीक अहमद की वोटिंग
2008 में भारत और अमेरिका के बीच न्यूक्लियर डील साइन होनी थी। इस डील को लेकर संसद में जबरदस्त हंगामा मचा हुआ था। विपक्ष इस डील को रोकने पर अड़ा था। अंत में यह तय हुआ कि संसद में वोटिंग होगी और बहुमत के आधार पर फैसला लिया जाएगा।
उस समय कांग्रेस के पास 228 सदस्य थे और जीत के लिए 44 वोट कम पड़ रहे थे। सभी पार्टियां अपनी-अपनी गणित लगा रही थीं। जिस दिन वोटिंग होनी थी, उससे 48 घंटे पहले जेल से छह लोगों को निकाला गया और संसद में बुलाया गया। इन छह में से एक Atiq Ahmed भी थे।
अतीक ने संसद में जाकर इस न्यूक्लियर डील के पक्ष में वोट किया। यह बात आज भी रिकॉर्ड में दर्ज है कि भारत की न्यूक्लियर डील में अतीक अहमद ने भी वोटिंग की थी। एक तरफ अतीक और उनके लोगों पर आरोप था कि चौराहों पर लड़ते-लड़ते क्रूड बम फेंके जा रहे थे, दूसरी तरफ वही अतीक देश की न्यूक्लियर डील पर फैसला भी ले रहे थे।
उमेश पाल किडनैपिंग केस में उम्रकैद की सजा
Atiq Ahmed साबरमती जेल में बंद थे जब 28 मार्च को कोर्ट ने उन्हें उमेश पाल किडनैपिंग केस में उम्रकैद की सजा सुनाई। यह पहली बार था जब अतीक अहमद को किसी भी केस में दोषी करार दिया गया। 100 से ज्यादा केस दर्ज होने के बाद यह पहला मामला था जिसमें अतीक गिल्टी प्रूव हुए।
इसी सुनवाई के लिए अतीक को साबरमती जेल से उत्तर प्रदेश लाया गया और उनके भाई अशरफ को बरेली जेल से प्रयागराज लाया गया। अतीक को एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाना भी कोई साधारण काम नहीं था। सिर्फ साबरमती से यूपी लाने में करीब एक लाख रुपए का खर्च आया था। पूरे रास्ते मीडिया ने एक पल के लिए भी अतीक का साथ नहीं छोड़ा।
15 अप्रैल की वो खौफनाक रात
Atiq Ahmed और उनके भाई अशरफ दोनों को प्रयागराज की धूमनगंज पुलिस स्टेशन में रखा गया था। कोर्ट के स्पेशल आर्डर के अनुसार दोनों का नियमित मेडिकल चेकअप होना था ताकि किसी भी तरह की मारपीट का तुरंत पता चल सके।
15 अप्रैल को रात करीब 10 बजे अतीक और अशरफ को मेडिकल चेकअप के लिए धूमनगंज पुलिस स्टेशन से कोविन हॉस्पिटल की तरफ ले जाया गया, जो कि करीब 10 मिनट की दूरी पर था। उनकी गाड़ी हॉस्पिटल से थोड़ी दूर रुकी और वो पैदल चलकर हॉस्पिटल की तरफ बढ़ने लगे।
इसी दौरान मीडिया वालों ने उन्हें घेर लिया। भीड़ में से तीन लोग फर्जी मीडिया पर्सन बनकर आए और Atiq Ahmed तथा अशरफ को गोली मारकर हत्या कर दी। यह पूरी घटना लाइव कैमरों के सामने हुई और पूरे देश ने इसे देखा।
बाहुबली राजनीति का यह चेहरा कितना खतरनाक
Atiq Ahmed की कहानी दरअसल भारतीय राजनीति के उस स्याह पक्ष को उजागर करती है जहां अपराध और सत्ता का गठजोड़ इतना मजबूत हो जाता है कि न्याय व्यवस्था भी लाचार नजर आती है। जब जज केस सुनने से मना कर दें, गवाह बयान बदल दें या मर जाएं, और पुलिसकर्मी अपना नेम टैग छुपा लें, तो यह समझा जा सकता है कि किसी बाहुबली का खौफ किस हद तक हो सकता है। यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि ऐसे तत्व कैसे सालों तक लोकतांत्रिक संस्थाओं का हिस्सा बने रहे और व्यवस्था ने उन्हें रोकने में इतना समय क्यों लगाया।
मुख्य बातें (Key Points)
- Atiq Ahmed के खिलाफ 100 से ज्यादा केस दर्ज थे, लेकिन सिर्फ एक केस में ही दोषी साबित हो पाए, वो भी उनकी मौत से कुछ दिन पहले।
- 1989 से 2004 तक लगातार पांच बार विधायक और 2004 में समाजवादी पार्टी से फूलपुर से सांसद बने।
- 2008 में भारत-अमेरिका Nuclear Deal के लिए जेल से निकालकर संसद में वोटिंग कराई गई थी।
- 15 अप्रैल को प्रयागराज में फर्जी मीडियाकर्मियों ने अतीक और उनके भाई अशरफ की लाइव कैमरों के सामने गोली मारकर हत्या कर दी।








