Women Voters Missing from Electoral Rolls: भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, लेकिन इस लोकतंत्र की बुनियाद यानी मतदाता सूची में अब एक गहरी दरार दिखने लगी है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में कराए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद जो आंकड़े सामने आए हैं, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं बल्कि बेहद चिंताजनक भी हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में 1.54 करोड़ महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं, जबकि पुरुषों के 1.34 करोड़ नाम कटे हैं। करीब 20 लाख का यह अंतर सवाल खड़ा करता है कि क्या शुद्धता के नाम पर लोकतंत्र में महिलाओं की आवाज को धीरे-धीरे दबाया जा रहा है?
क्या है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन और कैसे होती है वोटर लिस्ट की सफाई?
Women Voters Missing from Electoral Rolls के इस संकट को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए दो प्रमुख प्रक्रियाएं अपनाता है। पहली प्रक्रिया है कंटीन्यूअस अपडेशन, जिसमें साल भर नए मतदाता जुड़ सकते हैं, पता बदल सकते हैं और त्रुटियों में सुधार किया जा सकता है।
दूसरी और सबसे अहम प्रक्रिया है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR)। इसमें एक व्यापक सत्यापन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इस दौरान बीएलओ (Booth Level Officers) घर-घर जाकर मृत मतदाताओं, डुप्लीकेट एंट्रीज और पलायन कर चुके मतदाताओं के नामों की पहचान करते हैं और उन्हें सूची से हटाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद होता है इलेक्टोरल रोल एक्यूरेसी यानी मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना। लेकिन हालिया आंकड़ों ने एक ऐसा असमान पैटर्न सामने ला दिया है, जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी है।
उत्तर प्रदेश: सबसे बड़े चुनावी राज्य में सबसे बड़ा संकट
Women Voters Missing from Electoral Rolls का सबसे भयावह चित्र उत्तर प्रदेश से सामने आया है, जो भारत का सबसे बड़ा चुनावी राज्य है और जहां से देश के कई प्रधानमंत्री आए हैं। SIR के बाद जो ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल जारी हुआ है, उसमें कुल 2.89 करोड़ नाम हटाए गए हैं, जो उत्तर प्रदेश के कुल मतदाताओं का लगभग 18 से 19 प्रतिशत है।
लेकिन जो बात सबसे ज्यादा चिंतित करती है, वह है जेंडर गैप। SIR से पहले उत्तर प्रदेश में महिला मतदाताओं की संख्या 7.22 करोड़ थी, जो SIR के बाद घटकर मात्र 5.62 करोड़ रह गई। यानी अकेले महिलाओं के 1.54 करोड़ नाम काट दिए गए, जबकि पुरुष मतदाताओं की संख्या में 1.34 करोड़ की गिरावट आई। पुरुषों और महिलाओं के नाम कटने में करीब 20 लाख का अंतर है, जो किसी भी मायने में सामान्य नहीं कहा जा सकता।
इसका सीधा असर जेंडर रेश्यो पर भी पड़ रहा है। पहले प्रति 1000 पुरुष मतदाताओं पर 877 महिलाएं मतदाता सूची में थीं, लेकिन अब यह अनुपात घटकर 824 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष रह गया है। यह सिर्फ एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक वास्तविकता भी है, क्योंकि भारत में कई चुनाव मात्र कुछ हजार वोटों के अंतर से जीते और हारे जाते हैं।
पश्चिम बंगाल: जहां चुनाव होने वाले हैं, वहां हालात और भी चिंताजनक
Women Voters Missing from Electoral Rolls का मसला पश्चिम बंगाल में और भी गंभीर रूप में सामने आया है, खासकर इसलिए क्योंकि यहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बंगाल में SIR के बाद लगभग 58 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं और यहां का जेंडर पैटर्न बेहद चौंकाने वाला है।
हटाए गए कुल नामों में 53.6 प्रतिशत महिलाएं थीं। लेकिन कुछ विशेष क्षेत्रों में तो यह आंकड़ा और भी डरावना है। किरी और डोमकल जैसी सीटों में 65 से 68 प्रतिशत तक नाम जो हटाए गए, वे महिलाओं के थे। सीधे शब्दों में कहें तो इन इलाकों में एक पुरुष के मुकाबले लगभग दो महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से काटे गए। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जिस राज्य में चुनाव सिर पर हैं, वहां इतने बड़े पैमाने पर महिला मतदाताओं के नाम हटाने के पीछे क्या कारण हैं।
बिहार और तमिलनाडु: एक ही देश, दो अलग तस्वीरें
Women Voters Missing from Electoral Rolls का प्रभाव बिहार में भी व्यापक रूप से देखने को मिला। SIR के दौरान बिहार में कुल 65.6 लाख नाम हटाए गए और कुल मतदाता संख्या 7.9 करोड़ से घटकर 7.24 करोड़ रह गई। हालांकि बिहार का स्पष्ट जेंडर ब्रेकडाउन अभी सामने नहीं आया है, लेकिन वेरिफिकेशन और माइग्रेशन से जुड़े कई गंभीर मुद्दे यहां भी उभरे हैं।
वहीं तमिलनाडु एक छोटा अपवाद जरूर है। यहां रिवीजन के दौरान करीब 97 लाख नाम काटे गए, लेकिन अंतिम मतदाता सूची में महिलाओं की संख्या 2.89 करोड़ और पुरुषों की 2.77 करोड़ है। यानी तमिलनाडु में अभी भी महिलाओं की संख्या पुरुषों से थोड़ी अधिक बनी हुई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या सार्वभौमिक नहीं है, बल्कि राज्य विशिष्ट प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सामाजिक संरचनाओं से भी जुड़ी हुई है।
किंगमेकर की भूमिका में आई महिलाएं, अब उनकी आवाज दबाई जा रही है?
Women Voters Missing from Electoral Rolls का यह संकट इसलिए और भी गंभीर है क्योंकि पिछले एक दशक में भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। 1990 के दशक में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से बहुत कम हुआ करता था, लेकिन धीरे-धीरे स्थितियां बदलीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं का टर्नआउट लगभग 67 प्रतिशत था, जो पुरुषों के लगभग बराबर था। कई राज्यों में तो महिलाओं का टर्नआउट पुरुषों से कहीं अधिक रहा।
इसी कारण राजनीतिक विश्लेषकों ने महिलाओं को “किंगमेकर” कहना शुरू किया। विभिन्न राज्यों में लाडली बहना योजना जैसी महिला-केंद्रित स्कीमें लॉन्च की गईं। इसे “साइलेंट वोटर रिवॉल्यूशन” कहा गया, क्योंकि महिलाओं को पारंपरिक रूप से साइलेंट वोटर माना जाता रहा है।
लेकिन अब जो विरोधाभास सामने आया है, वह बेहद चिंताजनक है। एक तरफ महिलाएं मतदान केंद्रों पर अपनी ताकत दिखा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ मतदाता सूची में उनका नाम दर्ज होना ही मुश्किल होता जा रहा है। यह एक बड़ा पैराडॉक्स है, जो लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल खड़ा करता है।
आखिर क्यों ज्यादा कट रहे हैं महिलाओं के नाम? तीन बड़े कारण
Women Voters Missing from Electoral Rolls के पीछे कुछ संरचनात्मक कारण भी हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। सबसे बड़ा कारण है मैरिज माइग्रेशन। भारत में शादी के बाद अधिकांश महिलाएं अपना निवास स्थान बदल लेती हैं। ऐसे में पुराने निर्वाचन क्षेत्र से उनका नाम तो कट जाता है, लेकिन नए क्षेत्र में पंजीकरण तुरंत नहीं हो पाता। इस बीच की अवधि में वे लोकतंत्र की अदृश्य नागरिक बनकर रह जाती हैं।
दूसरा बड़ा कारण है डॉक्यूमेंटेशन गैप। ग्रामीण भारत में महिलाओं के पास न तो संपत्ति के कागजात होते हैं, न बिजली का बिल, न किराया समझौता। किसी भी आधिकारिक दस्तावेज में उनका नाम नहीं होता और बिना दस्तावेज के उनका वेरिफिकेशन भी मुश्किल हो जाता है।
तीसरा कारण बीएलओ वेरिफिकेशन प्रक्रिया से जुड़ा है। जब बीएलओ घरों में वेरिफिकेशन के लिए जाता है तो सामान्यतः पुरुष सदस्य से बात करता है। अगर उस समय महिला घर पर मौजूद न हो तो कई बार उसे “शिफ्टेड” या “एब्सेंट” मान लिया जाता है। यह प्रक्रियागत खामी भी महिलाओं के नाम कटने का एक बड़ा कारण बन रही है।
शुद्धता बनाम समावेशिता: लोकतंत्र का सबसे बड़ा दार्शनिक सवाल
Women Voters Missing from Electoral Rolls के इस पूरे विवाद में एक बड़ा दार्शनिक प्रश्न भी सामने आता है कि लोकतंत्र में ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है? शुद्धता (Accuracy), जहां अपात्र मतदाताओं को हटाया जाए, या समावेशिता (Inclusivity), जहां हर पात्र मतदाता का नाम सूची में होना सुनिश्चित किया जाए। शुद्धता के नाम पर जब प्रशासन बहुत ज्यादा सख्त हो जाता है तो कई बार पात्र मतदाता भी सूची से बाहर हो जाते हैं।
यह समस्या केवल भारत की नहीं है। अमेरिका में भी वोटर रोल पर्जिंग एक बड़ा राजनीतिक विवाद रहा है। कई अध्ययनों में कहा गया कि पर्ज पॉलिटिक्स से अल्पसंख्यक और कमजोर समुदाय अनुपातहीन रूप से प्रभावित होते हैं। हर चुनाव प्रणाली को एक्यूरेसी और इंक्लूसिविटी के बीच संतुलन बनाना पड़ता है और भारत में इस संतुलन का झुकाव फिलहाल शुद्धता की तरफ ज्यादा दिख रहा है, जिसकी सबसे बड़ी कीमत महिला मतदाता चुका रही हैं।
समस्या का समाधान: चार बड़े संरचनात्मक सुधार जो तुरंत जरूरी हैं
Women Voters Missing from Electoral Rolls के इस गंभीर संकट से निपटने के लिए कुछ ठोस संरचनात्मक सुधारों की तत्काल आवश्यकता है। सबसे पहले हर इलेक्शन रिवीजन के बाद जेंडर ऑडिट को अनिवार्य बनाना चाहिए, जिसमें जेंडर रेश्यो की स्वतंत्र जांच हो ताकि किसी भी असमान कटौती की तुरंत पहचान की जा सके।
दूसरा अहम सुधार है ऑटोमेटिक वोटर ट्रांसफर प्रोटोकॉल। विवाह पंजीकरण के साथ ही वोटर ट्रांसफर की प्रक्रिया स्वतः शुरू हो जानी चाहिए, ताकि शादी के बाद महिलाओं को लोकतंत्र से बाहर होने का खतरा न रहे। तीसरा, आधार और डिजिटल पहचान का बेहतर उपयोग करके वेरिफिकेशन को अधिक सटीक बनाया जा सकता है। और चौथा, महिलाओं के लिए हाइपर-लोकल टारगेटेड अवेयरनेस कैंपेन चलाए जाने चाहिए ताकि वे अपने मतदाता अधिकारों के प्रति जागरूक हों और समय रहते अपना नाम सूची में दर्ज करा सकें।
मतदाता सूची लोकतंत्र का आईना है, इसमें दरार नहीं आनी चाहिए
Women Voters Missing from Electoral Rolls का यह पूरा मामला अंततः एक नैतिक सवाल भी है। मतदाता सूची केवल नामों की सूची नहीं होती, यह लोकतंत्र का आईना होती है। यह हमें बताती है कि हम किसे नागरिक मानते हैं और किसे भूल जाते हैं। जब लाखों महिलाएं प्रशासनिक प्रक्रियाओं की दरारों में गिरकर गायब हो रही हैं, तो यह केवल डाटा की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि लोकतंत्र के लिए एक गहरी नैतिक चुनौती बन जाती है।
एक वोट केवल कागज का टुकड़ा नहीं होता, वह एक नागरिक की आवाज होता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो महिला मतदाता अब तक “किंगमेकर” के रूप में उभर रही थीं, क्या उनकी बुलंद आवाज अगले चुनाव में भी गूंजेगी, या फिर वे लोकतंत्र के भीतर “वैनिशिंग वोटर” बनकर रह जाएंगी। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में हर एक वोट मायने रखता है और हर एक नागरिक की आवाज दर्ज होनी चाहिए, चाहे वह पुरुष हो या महिला।
मुख्य बातें (Key Points)
- उत्तर प्रदेश में SIR के बाद 2.89 करोड़ नाम हटाए गए, जिसमें 1.54 करोड़ महिलाओं और 1.34 करोड़ पुरुषों के नाम शामिल हैं। जेंडर रेश्यो 877 से घटकर 824 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष रह गया।
- पश्चिम बंगाल में 58 लाख नाम हटाए गए, जिसमें 53.6% महिलाएं थीं। किरी और डोमकल जैसे क्षेत्रों में 65-68% तक नाम महिलाओं के कटे।
- बिहार में 65.6 लाख नाम हटाए गए, कुल मतदाता संख्या 7.9 करोड़ से घटकर 7.24 करोड़ हुई। तमिलनाडु अपवाद रहा जहां महिलाएं (2.89 करोड़) अभी भी पुरुषों (2.77 करोड़) से अधिक हैं।
- समाधान के लिए जेंडर ऑडिट अनिवार्य करने, विवाह पंजीकरण के साथ ऑटोमेटिक वोटर ट्रांसफर, डिजिटल इंटीग्रेशन और महिलाओं के लिए हाइपर-लोकल अवेयरनेस कैंपेन जैसे संरचनात्मक सुधारों की तत्काल जरूरत है।








