Ottoman Empire History दुनिया के इतिहास का सबसे रोमांचक और प्रभावशाली अध्याय है। एक ऐसा साम्राज्य जिसने मिडिल ईस्ट, ईस्टर्न यूरोप और नॉर्थ अफ्रीका के विशाल हिस्से पर 600 साल से भी ज्यादा समय तक राज किया। यह इस्लामिक दुनिया की सबसे बड़ी सुपर पावर थी। आज जब मिडिल ईस्ट में अरब देशों और ईरान के बीच तनाव की बात होती है, तो उसकी जड़ें सीधे इसी ऑटोमन साम्राज्य से जुड़ी मिलती हैं। ऑटोमन एंपायर ने न सिर्फ भौगोलिक सीमाएं बदलीं, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट का राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक ढांचा ही बदल दिया।
आइए विस्तार से जानते हैं कि यह साम्राज्य कैसे खड़ा हुआ, कैसे दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बना, इसने भारत पर हमला क्यों नहीं किया, और आखिर कैसे इस विशाल साम्राज्य का अंत हुआ।
बैकग्राउंड: बिजेंटाइन एंपायर कमजोर हो रहा था, तुर्कों को मिला मौका
Ottoman Empire History समझने के लिए सबसे पहले 1300 ईस्वी के आसपास की दुनिया को समझना जरूरी है। उस समय दो बड़ी घटनाएं एक साथ हो रही थीं। एक तरफ ईस्टर्न रोमन यानी बिजेंटाइन एंपायर तेजी से कमजोर हो रहा था। यहां के ज्यादातर लोग ईसाई थे और सदियों से इस साम्राज्य ने पूर्वी यूरोप और एशिया माइनर पर राज किया था।
दूसरी तरफ रूम के सेल्जुक साम्राज्य को मंगोलों ने पूरी तरह तबाह कर दिया था। रूम यानी एशिया माइनर या एनाटोलिया का वह इलाका जिसे आज हम तुर्की के नाम से जानते हैं। सेल्जुक साम्राज्य के पतन के बाद एनाटोलिया का पूरा इलाका बहुत छोटी-छोटी तुर्की रियासतों में बंट गया।
तुर्क लोग जन्मजात योद्धा थे। दूसरे इलाकों पर हमला करने की इनकी लंबी परंपरा रही थी। अपने समूहों के प्रति ये बेहद वफादार थे, लेकिन इन्हें एकजुट करने वाली कोई केंद्रीय ताकत नहीं थी। बस इसी बिखराव के बीच से एक ऐसा दबंग नेता उभरता है जो इन सभी तुर्कों को एकजुट करके एक नए साम्राज्य की नींव रखता है।
उस्मान: वो शख्स जिसने ऑटोमन एंपायर की रखी नींव
Ottoman Empire History का सबसे पहला और सबसे अहम नाम है उस्मान (Osman)। एनाटोलिया के ज्यादातर तुर्क खुद को “गाजी” यानी इस्लाम के योद्धा मानते थे। ये लोग “अमीर” यानी मुख्य सेनापति की अगुवाई में सैन्य समूह बनाते थे और सख्त इस्लामी आचार संहिता का पालन करते थे।
13वीं सदी के अंत में बिजेंटाइन एंपायर की सीमावर्ती जमीनों पर तुर्की गाजियों ने हमले शुरू कर दिए। इनमें सबसे सफल गाजी का नाम था उस्मान। पश्चिम के लोग इन्हें “ओटोमैन” कहते थे और इनके अनुयायी “ऑटोमन्स” कहलाने लगे।
अपनी सफलता के दम पर 1300 से 1326 के बीच उस्मान ने एनाटोलिया में एक छोटा सा मुस्लिम राज्य स्थापित कर लिया। यही छोटा सा राज्य आगे चलकर विशाल ऑटोमन साम्राज्य बना। उनके उत्तराधिकारियों ने जमीन खरीदकर, दूसरे अमीरों से गठबंधन बनाकर और कुछ को जीतकर इस राज्य का विस्तार किया।
बारूद की ताकत: ऑटोमन्स ने कैसे जीती एक के बाद एक जंग
Ottoman Empire History में ऑटोमन्स की सैन्य सफलता का बहुत बड़ा श्रेय बारूद (Gunpowder) को जाता है। जहां दूसरी सेनाएं अभी भी घोड़ों पर सवार तीरंदाजों पर निर्भर थीं, वहीं ऑटोमन्स ने अपनी सेना में एक क्रांतिकारी बदलाव किया। उन्होंने घुड़सवार तीरंदाजों की जगह मस्कट (बंदूक) लेकर चलने वाले पैदल सैनिकों को दे दी।
इसके अलावा ऑटोमन्स हमले के लिए तोपों (Cannons) का इस्तेमाल करने वाले शुरुआती लोगों में से एक थे। इनकी तोपों के सामने दुनिया की सबसे मजबूत किलेबंद शहर भी कमजोर पड़ जाती थीं। यही बारूद की ताकत थी जिसने ऑटोमन्स को अजेय बना दिया।
उस्मान के बेटे ओरहान (Orhan) दूसरे ऑटोमन शासक बने। इन्होंने खुद को “सुल्तान” घोषित किया। 1361 में ऑटोमन्स ने बिजेंटाइन एंपायर के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण शहर एड्रियानोपल (आज का एडिरने, मॉडर्न तुर्की में स्थित) को जीत लिया। और इस तरह एनाटोलिया से एक नया तुर्की साम्राज्य तेजी से उभरने लगा।
तैमूर लंग ने रोकी ऑटोमन्स की रफ्तार: 1402 का वो बड़ा झटका
Ottoman Empire History में एक ऐसा मोड़ भी आया जब इस बढ़ते हुए साम्राज्य की रफ्तार कुछ समय के लिए रुक गई। 1402 में सेंट्रल एशिया के समरकंद का एक विद्रोही योद्धा और विजेता ऑटोमन एंपायर के विस्तार को रोक देता है।
पैर में तीर लगने की वजह से स्थायी रूप से लंगड़े हुए इस योद्धा को तैमूर लंग कहा जाता था। यूरोपीय लोग इसे “टैमरलेन” बोलते थे। यह वही तैमूर था जिसने 1398 में तुगलक वंश के शासन के समय भारत पर आक्रमण किया था और बगदाद जैसे शक्तिशाली शहर को पूरी तरह तबाह कर दिया था।
1402 में अंकारा के युद्ध में तैमूर ने ऑटोमन सेनाओं को बुरी तरह हरा दिया। इस हार ने कुछ समय के लिए साम्राज्य के विस्तार में रुकावट पैदा कर दी। लेकिन जल्दी ही तैमूर ने अपना ध्यान चीन की तरफ मोड़ लिया और ऑटोमन सुल्तान फिर से अपनी ताकत बनाने लगे।
1453: कॉन्स्टेंटिनोपल की जीत ने बदल दी पूरी दुनिया
Ottoman Empire History की सबसे बड़ी और सबसे ऐतिहासिक घटना 1453 में होती है। जब सुल्तान मेहमद द्वितीय बिजेंटाइन एंपायर की राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल को जीत लेते हैं।
1451 में जब मेहमद सत्ता में आए, उस समय कॉन्स्टेंटिनोपल की आबादी 10 लाख से सिकुड़कर सिर्फ 50,000 रह गई थी। शहर की ताकत लगातार घट रही थी और अपनी दीवारों के बाहर किसी भी इलाके पर इनका नियंत्रण नहीं बचा था। लेकिन बॉस्फोरस जलडमरूमध्य पर इनका दबदबा अभी भी बरकरार था।
बॉस्फोरस जलडमरूमध्य काला सागर को मारमरा सागर से जोड़ता है और एशियाई तुर्की को यूरोपीय तुर्की से भी जोड़ता है। इस जलमार्ग पर नियंत्रण का मतलब था कि बिजेंटाइन कभी भी ऑटोमन्स के एशियाई और बाल्कन क्षेत्रों के बीच के यातायात को रोक सकते थे। 21 साल की उम्र में सत्ता में आने के बाद मेहमद ने इस खतरे को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला किया।
1453 में मेहमद ने हमला शुरू किया। उनकी तुर्की सेना शक्तिशाली तोपों से शहर की दीवारों पर गोले बरसाने लगी। इनमें से एक 26 फुट लंबी तोप थी जो 1,200 पाउंड के भारी पत्थर दाग रही थी। बॉस्फोरस और मारमरा सागर के बीच गोल्डन हॉर्न के आरपार एक जंजीर थी जो तुर्की बेड़े को शहर के बंदरगाह से बाहर रखे हुई थी।
फिर एक रात मेहमद की सेना ने एक हैरतअंगेज चाल चली। उन्होंने बॉस्फोरस से ग्रीस लगे रास्तों पर अपने 70 जहाजों को एक पहाड़ी के ऊपर से खींचते हुए बंदरगाह तक पहुंचा दिया। अब मेहमद की सेना दो तरफ से हमला कर रही थी। सात हफ्तों तक शहर ने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार तुर्कों ने दीवार तोड़ दी और शहर में घुस गए।
इस तरह हजारों साल पुराने बिजेंटाइन साम्राज्य का शासन हमेशा के लिए समाप्त हो गया। कॉन्स्टेंटिनोपल की जीत के बाद ही मेहमद द्वितीय को “मेहमद द कॉन्करर” (विजेता मेहमद) कहा जाने लगा।
इस्तांबुल बना नई राजधानी: यहूदी, ईसाई और मुसलमान सब बसे
मेहमद एक बेहतरीन योद्धा होने के साथ-साथ एक कुशल शासक भी साबित हुए। Ottoman Empire History में उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने कॉन्स्टेंटिनोपल को नए नागरिकों के लिए खोल दिया। यहूदी, ईसाई और मुसलमान सभी यहां आकर बसने लगे और इन लोगों ने शहर को फिर से बनाने में मदद की।
शहर का नाम बदलकर इस्तांबुल कर दिया गया और इसे ऑटोमन एंपायर की नई राजधानी घोषित कर दिया गया। इस्तांबुल जल्दी ही व्यापार और संस्कृति का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय केंद्र बन गया।
कॉन्स्टेंटिनोपल के पतन ने कैसे बदला पूरा विश्व
Ottoman Empire History में कॉन्स्टेंटिनोपल का पतन एक ऐसी घटना थी जिसने पूरी दुनिया पर डोमिनो इफेक्ट पैदा किया। यूरोप में एक तरह का पावर वैक्यूम पैदा हो गया क्योंकि रोमन एंपायर अपने समय की सबसे बड़ी ताकत और ईसाई दुनिया का गढ़ था। इसकी जगह अब ऑटोमन एंपायर ने ले ली जो एक इस्लामी साम्राज्य था।
इस वजह से यूरोप के ईसाई देशों और ऑटोमन एंपायर के बीच धार्मिक युद्ध (क्रूसेड्स) भी शुरू हो गए। ऑटोमन एंपायर सबसे बड़ा इस्लामी साम्राज्य था और इसके सुल्तान को पूरे इस्लामी विश्व का आध्यात्मिक नेता भी माना जाता था।
लेकिन सबसे बड़ा असर व्यापार मार्गों पर पड़ा। पूर्व को जाने वाले जमीनी रास्ते पहले बिजेंटाइन एंपायर का हिस्सा थे और सालों से इनके जरिए यूरोपीय लोगों का पूर्वी दुनिया से व्यापार चलता था। अब ये रास्ते ऑटोमन्स के नियंत्रण में आ चुके थे। इसलिए यूरोपीय ताकतों ने वैकल्पिक व्यापार मार्गों की खोज शुरू कर दी।
और फिर दुनिया की कुछ सबसे मशहूर समुद्री यात्राएं हुईं। इनमें कोलंबस की अमेरिकी यात्रा और वास्को डा गामा की भारतीय यात्रा भी शामिल थी। यहीं से यूरोपीय देशों द्वारा एशिया और अमेरिका में उपनिवेशों की स्थापना भी शुरू होती है।
इसके अलावा कॉन्स्टेंटिनोपल के पतन के बाद ग्रीक विद्वान यहां से इटली की तरफ पलायन करते हैं और अपने साथ हजारों की संख्या में क्लासिकल ग्रीक और लैटिन ग्रंथ भी ले जाते हैं। इन्हीं ग्रंथों की पुनर्प्राप्ति के बाद यूरोप में रेनेसां (पुनर्जागरण) की शुरुआत मानी जाती है। एक तरह से कॉन्स्टेंटिनोपल का पतन विश्व इतिहास का टर्निंग पॉइंट कहा जा सकता है।
सुलेमान द मैग्निफिसेंट: ऑटोमन एंपायर का स्वर्ण युग
Ottoman Empire History का सबसे शानदार अध्याय सुल्तान सुलेमान प्रथम के शासनकाल (1520-1566) में आता है। सुलेमान 46 साल तक राज करते हैं। उनकी प्रजा उन्हें “सुलेमान द लॉ गिवर” (कानून देने वाला) बुलाती थी, जबकि पश्चिम में उन्हें “सुलेमान द मैग्निफिसेंट” (भव्य सुलेमान) कहा जाता था।
सुलेमान एक बेहतरीन सैन्य नेता थे। 1521 में उन्होंने महत्वपूर्ण यूरोपीय शहर बेलग्रेड पर कब्जा किया। अगले साल तुर्की सेनाओं ने भूमध्य सागर में रोड्स द्वीप (आज ग्रीस का हिस्सा) को जीत लिया और पूरे पश्चिमी भूमध्य सागर पर ऑटोमन्स का दबदबा कायम हो गया।
अपनी मजबूत नौसेना के दम पर ऑटोमन्स ने नॉर्थ अफ्रीका के तट पर स्थित त्रिपोली (आज लीबिया की राजधानी) को भी जीत लिया। 1526 में सुलेमान सेंट्रल यूरोप में दहशत फैलाते हुए हंगरी और ऑस्ट्रिया की तरफ बढ़ते हैं। उनकी सेनाएं ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना के बाहर तक पहुंच जाती हैं। वियना को तो वे जीत नहीं पाए, लेकिन हंगरी पर उनका नियंत्रण स्थापित हो गया।
सुलेमान के शासनकाल में ऑटोमन एंपायर अपने चरम पर था। इसमें तुर्की, ग्रीस, बुल्गेरिया, मिस्र, हंगरी, मैसेडोनिया, रोमानिया, जॉर्डन, फिलिस्तीन, लेबनान, सीरिया, अरब का कुछ हिस्सा और नॉर्थ अफ्रीका की तटीय पट्टी का बड़ा इलाका शामिल था।
ऑटोमन्स ने भारत पर हमला क्यों नहीं किया: सफावी साम्राज्य बना रुकावट
Ottoman Empire History का एक बड़ा सवाल यह है कि इतने विशाल और ताकतवर साम्राज्य ने भारत पर कभी हमला क्यों नहीं किया? इसका जवाब छिपा है सफावी साम्राज्य (ईरान) में।
भारत पर हमला करने के लिए ऑटोमन्स को पहले फारस (ईरान) के सफावी साम्राज्य को जीतना जरूरी था, क्योंकि भारत का जमीनी रास्ता यहीं से होकर जाता था। लेकिन सफावी साम्राज्य अपने आप में एक बेहद मजबूत शक्ति था। ऑटोमन्स ने सफावियों के साथ बहुत से युद्ध लड़े, लेकिन वे कभी भी सफावी साम्राज्य पर पूरा नियंत्रण नहीं कर पाए। इसलिए जमीनी रास्ते से भारत पर हमले का मौका ऑटोमन्स को कभी नहीं मिला।
यही वह बिंदु है जो आज के अरब देशों और ईरान के बीच की दुश्मनी की जड़ है। ऑटोमन एंपायर सुन्नी मुसलमानों का साम्राज्य था, जबकि सफावी एंपायर शिया मुसलमानों का। दोनों के बीच सदियों तक चले संघर्ष ने मिडिल ईस्ट को धार्मिक आधार पर बांट दिया। अरब देश ऑटोमन प्रभाव में रहे जबकि ईरान सफावी विरासत का वाहक बना। यही विभाजन आज भी मिडिल ईस्ट की राजनीति को प्रभावित कर रहा है।
हालांकि ऑटोमन्स के भारत से संपर्क जरूर थे। दक्कन की बहमनी सल्तनत और ऑटोमन्स के बीच दूतावास का आदान-प्रदान हुआ था। ऑटोमन प्रजा के लोगों को भारत में नौकरी भी दी जाती थी। इन्हें “रूमी” कहा जाता था और ये तोपखाने में अपनी महारत के लिए मशहूर थे।
ऑटोमन्स ने भारत के पश्चिमी तट पर अपना प्रभाव बनाने की कोशिश भी की। इसके लिए उन्होंने पश्चिम भारतीय तट पर स्थित स्थानीय इस्लामी राज्यों के साथ गठबंधन बनाकर पुर्तगालियों से युद्ध भी किया। इसमें गुजरात के शासक बहादुर शाह के साथ गठबंधन की कोशिश भी शामिल थी। लेकिन 1538 के द्वीप की घेराबंदी में पुर्तगाली ऑटोमन्स को हराने में सफल रहे।
ऑटोमन्स की सोशल व्यवस्था: देवशिर्मे, जानिसरी और मिल्लत सिस्टम
Ottoman Empire History में ऑटोमन्स की सबसे बड़ी खासियत उनका सुव्यवस्थित सामाजिक ढांचा था। ऑटोमन्स अपने द्वारा जीते गए लोगों के साथ समझदारी से पेश आते थे। जीती हुई जमीनों पर सुल्तान द्वारा नियुक्त स्थानीय अधिकारियों की मदद से शासन करते थे और अक्सर किसानों की जिंदगी सुधारने का काम करते थे।
सुल्तान सुलेमान की सबसे बड़ी उपलब्धि इस विशाल साम्राज्य को एक कुशल शासन व्यवस्था देना थी। उन्होंने अपराधिक और दीवानी मामलों के लिए कानून बनाए, करों को सरल और सीमित किया, और सरकारी नौकरशाही को कम करके व्यवस्थित बनाया। इन्हीं सुधारों की वजह से उन्हें “लॉ गिवर” की उपाधि मिली।
सुल्तान के करीब 20,000 निजी गुलाम महल की नौकरशाही के कर्मचारियों की तरह काम करते थे। इन गुलामों को “देवशिर्मे” नाम की नीति के तहत हासिल किया जाता था। इस व्यवस्था के अनुसार सुल्तान की सेना जीती हुई ईसाई जमीनों की आबादी में से छोटे लड़कों को चुनती थी। सेना इन्हें शिक्षा देती थी, इस्लाम में परिवर्तित करती थी और फिर सैनिकों की तरह प्रशिक्षित किया जाता था।
इन्हीं में से 3,000 सैनिकों की एक विशिष्ट शक्ति को सिर्फ सुल्तान के प्रति वफादार रहने का प्रशिक्षण दिया जाता था। इस शक्ति को जानिसरी (Janissaries) के नाम से जाना जाता था। अपने शानदार अनुशासन की वजह से ये ऑटोमन युद्ध मशीन का दिल कहलाते थे। कई बार तो ईसाई परिवार अधिकारियों को रिश्वत देते थे कि उनके बच्चों को सुल्तान की सेवा में ले लिया जाए, क्योंकि इनमें से सबसे होशियार लोग ऊंचे सरकारी पदों या सैन्य पदों तक पहुंच सकते थे।
मुसलमान होने के नाते ऑटोमन सुल्तान इस्लामी कानून का पालन करते थे। इसी के अनुसार ऑटोमन्स दूसरे धार्मिक समुदायों, खासकर ईसाइयों और यहूदियों को पूजा की स्वतंत्रता देते थे। इन समुदायों को “मिल्लत” (Nation) की तरह माना जाता था। सभी मिल्लतों को अपने धार्मिक कानूनों और प्रथाओं का पालन करने दिया जाता था। यह व्यवस्था विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच टकराव को कम रखने में मदद करती थी।
ऑटोमन एंपायर का पतन: कमजोर सुल्तानों ने डुबोया
Ottoman Empire History का सबसे दुखद अध्याय इसका पतन है। 1600 के बाद ऑटोमन एंपायर का यूरोप पर आर्थिक और सैन्य दबदबा कमजोर होना शुरू हो गया। इस समय यूरोप रेनेसां के विचारों और फिर औद्योगिक क्रांति की वजह से तेजी से प्रगति कर रहा था। वहीं दूसरी तरफ ऑटोमन एंपायर कमजोर नेतृत्व की वजह से अपनी शान खोना शुरू कर देता है।
सुलेमान ने अपने सबसे काबिल बेटे की हत्या करवा दी थी और दूसरे को निर्वासन में भेज दिया था। इसलिए उनके तीसरे बेटे सलीम द्वितीय ने गद्दी संभाली, जो एक अयोग्य शासक साबित हुए। इसके साथ ही एक प्रथा यह भी बन गई कि नया सुल्तान अपने सभी भाइयों की हत्या करवा देता था ताकि कोई प्रतिद्वंद्वी न बचे। सुल्तान अपने बेटों को भी हरम में कैदी बनाकर रखने लगे, जिससे उनकी शिक्षा और बाहरी दुनिया से संपर्क पूरी तरह खत्म हो जाता था। इस प्रथा ने कमजोर सुल्तानों की लंबी कतार पैदा की जिसने आखिरकार इस विशाल साम्राज्य को तबाह कर दिया।
1683 में वियना के युद्ध में ऑटोमन तुर्कों की हार हो गई। यह हार उनकी पहले से गिरती हुई हैसियत को और गहरा कर देती है। अगले 100 सालों तक साम्राज्य अलग-अलग युद्धों में अपने इलाकों को खोता रहा।
एक-एक करके टूटते गए ऑटोमन एंपायर के टुकड़े
Ottoman Empire History के आखिरी दौर में साम्राज्य बिखरता चला गया। 1830 में ग्रीस विद्रोह के जरिए ऑटोमन एंपायर से आजाद हो गया। 1878 में कांग्रेस ऑफ बर्लिन के दौरान रोमानिया, सर्बिया और बुल्गेरिया भी स्वतंत्र हो गए।
1912 और 1913 में हुए बाल्कन युद्धों के दौरान ऑटोमन एंपायर यूरोप की लगभग सभी अपनी जमीनें खो देता है। अब सिर्फ ऑटोमन एंपायर का औपचारिक अंत होना बाकी था। इसकी शान तो पहले ही पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।
प्रथम विश्व युद्ध ने लिखी ऑटोमन एंपायर की अंतिम कहानी
Ottoman Empire History का आखिरी अध्याय प्रथम विश्व युद्ध के साथ लिखा गया। जब विश्व युद्ध शुरू हुआ, ऑटोमन एंपायर पहले से ही पतन की ओर बढ़ रहा था। 1914 में ऑटोमन सेना सेंट्रल पावर्स यानी जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी की तरफ से युद्ध में शामिल होती है।
अक्टूबर 1918 में मित्र देशों (Allied Powers) की सेनाओं के हाथों ऑटोमन्स को करारी हार मिलती है। मुद्रोस के युद्धविराम के बाद ऑटोमन साम्राज्य की ज्यादातर जमीनों को ब्रिटेन, फ्रांस, ग्रीस और रूस के बीच बांट दिया जाता है।
यही वह क्षण है जब मिडिल ईस्ट का वो नक्शा बनता है जो आज दिखता है। ब्रिटेन और फ्रांस ने ऑटोमन एंपायर के अरब इलाकों को अपने बीच बांट लिया। सीरिया, लेबनान, इराक, जॉर्डन, फिलिस्तीन: ये सब देश इसी विभाजन की उपज हैं। और यही विभाजन आज अरब देशों के बीच सीमा विवादों, सांप्रदायिक तनावों और राजनीतिक अस्थिरता की जड़ है।
ऑटोमन एंपायर आधिकारिक रूप से 1922 में समाप्त होता है जब ऑटोमन सुल्तान की उपाधि ही खत्म कर दी जाती है। 29 अक्टूबर 1923 को मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में तुर्की को एक गणतंत्र (Republic) घोषित कर दिया जाता है। अतातुर्क 1923 से 1938 तक तुर्की के पहले राष्ट्रपति रहते हैं और तुर्की को तेजी से धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक बनाने के लिए बड़े सुधार लागू करते हैं।
600 साल के इस साम्राज्य ने मिडिल ईस्ट को कैसे बांटा?
Ottoman Empire History का सबसे बड़ा सबक यह है कि इस एक साम्राज्य के उदय, विस्तार और पतन ने आज के मिडिल ईस्ट की पूरी तस्वीर बना दी। ऑटोमन्स ने सदियों तक अरब दुनिया पर शासन किया और इस्तांबुल से बैठकर मिस्र से लेकर इराक तक का नियंत्रण अपने हाथ में रखा। जब यह साम्राज्य टूटा तो अरब दुनिया बिखर गई। ब्रिटेन और फ्रांस ने अपने हिसाब से सीमाएं खींचीं जिनका न स्थानीय संस्कृति से कोई लेना-देना था और न जनभावनाओं से।
ऑटोमन-सफावी संघर्ष ने सुन्नी और शिया के बीच की खाई को इतना गहरा कर दिया कि आज भी अरब देश और ईरान एक-दूसरे के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बने हुए हैं। सऊदी अरब, इराक, सीरिया, यमन: इन सभी देशों की राजनीति में ऑटोमन विरासत की छाप आज भी साफ दिखती है।
मुख्य बातें (Key Points)
- Ottoman Empire History बताती है कि 1300 में उस्मान ने एनाटोलिया में जो छोटा सा मुस्लिम राज्य बनाया, वह 1500 के अंत तक तीन महाद्वीपों तक फैल गया और 600 साल तक कायम रहा।
- 1453 में मेहमद द्वितीय ने कॉन्स्टेंटिनोपल जीतकर बिजेंटाइन एंपायर को खत्म किया, जिसने यूरोपीय समुद्री खोजों, रेनेसां और उपनिवेशवाद की शुरुआत कर दी।
- ऑटोमन्स ने भारत पर कभी हमला नहीं किया क्योंकि ईरान का सफावी (शिया) साम्राज्य रास्ते में था; इसी ऑटोमन-सफावी संघर्ष ने सुन्नी-शिया विभाजन को गहरा किया जो आज अरब vs ईरान की दुश्मनी की जड़ है।
- प्रथम विश्व युद्ध में हार के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने ऑटोमन अरब इलाकों को बांटकर सीरिया, लेबनान, इराक, जॉर्डन जैसे देश बनाए; 1923 में अतातुर्क ने तुर्की गणतंत्र की स्थापना की।






