Trump Iran War Defeat के संकेत अब छिपाए नहीं छिप रहे। सिर्फ 10 दिन हुए हैं और अमेरिका की सैन्य ताकत में दरारें दिखने लगी हैं। एक युद्ध जो जल्दी खत्म होने वाला था, उसने दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना के कवच में गंभीर छेद कर दिए हैं। ईरान जीतने के लिए नहीं लड़ रहा था, वह अमेरिका को जीतने नहीं देने के लिए लड़ रहा था और ऐसा लग रहा है कि वह इसमें काफी हद तक कामयाब हो गया है। आज की तारीख में ईरान शर्तें तय कर रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला बयान दिया कि “ईरान युद्ध लगभग खत्म हो चुका है।” लेकिन ठीक कुछ घंटों बाद उनके रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ ने कहा कि “यह तो बस शुरुआत है।” इजराइल के अधिकारी वॉशिंगटन पोस्ट को बता रहे हैं कि वे युद्ध को और बढ़ाना नहीं चाहते और “एग्जिट रैंप” यानी बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ईरान ने यह सब बिना किसी बड़े सहयोगी के अकेले दम पर किया है। न कोई मुस्लिम देश खुलकर साथ आया, न रूस और न चीन खुले तौर पर मैदान में उतरा।
ट्रंप का बयान: “युद्ध लगभग खत्म”, लेकिन खुद ही कंफ्यूज
Trump Iran War Defeat के सबसे बड़े संकेत खुद ट्रंप के बयानों से मिल रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि ईरान युद्ध “शॉर्ट टर्म वॉर” है और “लगभग खत्म” हो चुका है। ट्रंप के इस बयान से उनके अपने समर्थक भी हैरान हैं। लेकिन ठीक कुछ घंटों बाद, शायद कुछ पीने के बाद सोशल मीडिया पर पोस्ट डालते हैं कि अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी हटाने के लिए ईरान पर 20 गुना बड़ा हमला करने वाला है।
जब पत्रकारों ने ट्रंप से इस विरोधाभास पर स्पष्टीकरण मांगा, तो जो जवाब आया वह हमेशा की तरह अस्पष्ट और भ्रमित करने वाला था। ट्रंप ने कहा कि ईरान के पास न तो रडार है, न नौसेना है, न मजबूत नेतृत्व बचा है, फिर भी वह अमेरिका को पछाड़ रहा है। एक तरह से ट्रंप ने यह स्वीकार कर लिया कि ईरान अमेरिका से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, भले ही उसके पास साधन बहुत कम हैं।
ट्रंप के शांति के संकेतों से अमेरिकी शेयर बाजार में सोमवार को जोरदार तेजी देखने को मिली। डाउ जोंस और नैस्डैक दोनों में मजबूत उछाल आया, क्योंकि बाजार को उम्मीद बंधी कि यह युद्ध जल्दी खत्म होगा। ट्रंप भले ही और कुछ न समझें, लेकिन पैसों की ताकत वह बखूबी समझते हैं और तेल-गैस की बढ़ती कीमतें उनकी नींद उड़ा रही हैं।
इजराइल ने माना: “एग्जिट रैंप” ढूंढ रहे हैं
Trump Iran War Defeat के एक और बड़े संकेत इजराइल से आ रहे हैं। इजराइल के अधिकारी अब वॉशिंगटन पोस्ट को बता रहे हैं कि वे युद्ध को और आगे नहीं बढ़ाना चाहते और बाहर निकलने का रास्ता (“एग्जिट रैंप”) ढूंढ रहे हैं। इजराइल जो कल तक तेहरान को जला रहा था, वह अब समझ नहीं पा रहा कि अगला कदम क्या होना चाहिए।
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिका दोनों के लिए “एग्जिट रैंप” इन दिनों का नया पसंदीदा शब्द बन गया है, “स्मार्ट बम” नहीं। हार मानने से पहले हर चाल आजमाई जा चुकी है। ट्रंप के खास सहयोगी सेनेटर लिंडसे ग्राहम ने यूएई को धमकी तक दी कि “हम तुम्हारे लिए इतना काम कर रहे हैं, तुम ईरान पर हमला क्यों नहीं कर सकते?” इजराइल ने कुछ फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन भी किए, ताकि दूसरे देशों की जनता को ईरान के खिलाफ भड़काया जा सके। लेकिन कुछ काम नहीं आया।
ट्रंप ने अपनी ही गलती दूसरों पर थोपी
Trump Iran War Defeat के बीच एक और शर्मनाक बात सामने आई है। आमतौर पर एक नेता अपनी टीम की गलतियों की जिम्मेदारी खुद लेता है, लेकिन ट्रंप एक अनुभवी राजनेता हैं। उन्होंने इस युद्ध में जाने के अपने फैसले की जिम्मेदारी दूसरों पर थोपनी शुरू कर दी है। यह इस बात का संकेत है कि ट्रंप ने समझ लिया है कि उन्होंने कुछ गलत किया है।
पूरी दुनिया जानती है कि अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइलों ने 170 ईरानी लड़कियों की जान ली। लेकिन ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि “मुझे नहीं पता, यह किसी और की मिसाइल रही होगी।” जबकि हकीकत यह है कि ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान और नीदरलैंड्स के अलावा दुनिया में किसी देश के पास टॉमहॉक मिसाइलें हैं ही नहीं। यहां तक कि इजराइल के पास भी नहीं हैं। ट्रंप ने सोचा कि 100 बार झूठ बोलेंगे तो कुछ लोग मान लेंगे, लेकिन दुनिया अब अमेरिकी घमंड से परेशान हो चुकी है।
ईरान ने अकेले दम पर क्यों लड़ी यह जंग
Trump Iran War Defeat की कहानी तब और दिलचस्प हो जाती है जब यह समझें कि ईरान ने यह लड़ाई पूरी तरह अकेले क्यों लड़ी। न कोई मुस्लिम देश खुलकर साथ आया, न रूस और चीन ने खुले तौर पर सैन्य मदद दी। ईरान सात देशों से अपनी सीमा साझा करता है, लेकिन जब उस पर हमला हुआ तो कोई पड़ोसी एक शब्द बोलने के लिए भी आगे नहीं आया।
इसके पीछे सदियों पुरानी राजनीतिक और धार्मिक वजहें हैं। दुनिया सोचती है कि सभी मुस्लिम देश एक जैसे हैं, “मुस्लिम ब्रदरहुड।” ईरान का नाम अक्सर सऊदी अरब या यूएई के साथ लिया जाता है। लोग मानते हैं कि ये सब अरब देश हैं और भूगोल भी एक जैसा है। लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग है।
फारसी बनाम अरब: सदियों पुरानी पहचान की लड़ाई
Trump Iran War Defeat और ईरान के अकेलेपन को समझने के लिए इतिहास में जाना पड़ेगा। बहुत पहले, जब इस्लाम इस क्षेत्र में नहीं फैला था, तब फारस (पर्शिया) में बेहद शक्तिशाली साम्राज्य हुआ करते थे। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में साइरस द ग्रेट द्वारा स्थापित अकीमेनिड साम्राज्य सिंधु घाटी से लेकर भूमध्य सागर तक फैला हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि “ईरान” शब्द भी एक पुराने शब्द से आया है जिसका शाब्दिक अर्थ है “आर्यों की भूमि।”
सातवीं शताब्दी में अरब मुस्लिम सेनाओं ने पर्शिया को जीता और वहां इस्लाम ने जड़ें जमाईं। लेकिन एक बात कभी नहीं बदली: फारसी पहचान कभी खत्म नहीं हुई। फारसी और अरबों के बीच भाषा का अंतर है। फारसी लोग फारसी (दरी) बोलते हैं, अरब अरबी बोलते हैं। ईरान के ज्यादातर मुसलमान जातीय रूप से फारसी हैं, अरब नहीं।
फारस में जहां राजा, शासन, बड़े शहर, इंफ्रास्ट्रक्चर, कला, संस्कृति और कानून जैसी चीजें मौजूद थीं, वहीं अरब ज्यादातर कबीलों में रहते थे, बेदुइन या अर्ध-खानाबदोश थे और रेगिस्तान में जीवन जीते थे। यह पहचान का अंतर आज भी राजनीति, गठबंधन और एक-दूसरे को देखने के नजरिए में दिखता है।
शिया बनाम सुन्नी: 1400 साल पुरानी दरार जिसने ईरान को अलग-थलग किया
Trump Iran War Defeat में ईरान के अकेलेपन की दूसरी बड़ी वजह शिया–सुन्नी विभाजन है। ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुसंख्यक देश है, जहां 90 से 95% आबादी शिया मुस्लिम है। जबकि दुनिया के लगभग 85% मुसलमान सुन्नी हैं। शिया मुसलमान लगभग 15% हैं, लेकिन वे एक क्षेत्र में केंद्रित हैं। लेबनान से लेकर इराक होते हुए ईरान तक जो क्षेत्र है, उसे “शिया क्रेसेंट” भी कहा जाता है।
सुन्नी मानते हैं कि पैगंबर मुहम्मद के बाद किसी इंसान के पास कोई दैवीय अधिकार नहीं है और समुदाय अपना नेता चुन सकता है। लेकिन शिया मानते हैं कि शिया इमाम, जो पैगंबर मुहम्मद के वंशज हैं, दैवीय रूप से मार्गदर्शित हैं। यह विभाजन 680 ईस्वी से चला आ रहा है।
ईरान ने इसी विभाजन का इस्तेमाल अपनी विदेश नीति में किया। अयातुल्ला अली खामेनेई सिर्फ ईरान के प्रमुख नहीं थे, वह दुनियाभर के शिया मुसलमानों के सर्वोच्च नेता थे। उनकी हत्या के बाद शिया-सुन्नी विभाजन और स्पष्ट हो गया।
दिलचस्प बात यह है कि ईरान खुद सदियों तक सुन्नी बहुसंख्यक देश था। 16वीं शताब्दी में शिया को ईरान का मुख्य संप्रदाय बनाया गया और यह बदलाव भी एक राजनीतिक चाल थी। ईरान ने यह अपने प्रमुख सुन्नी प्रतिद्वंद्वी ऑटोमन साम्राज्य से खुद को अलग करने और सत्ता को एक जगह केंद्रित करने के लिए किया।
1979 की क्रांति ने ईरान को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया
Trump Iran War Defeat में ईरान की अकेलेपन की जड़ 1979 की ईरानी क्रांति में है। क्रांति के बाद ईरान में शिया इस्लाम सिर्फ राज्य का धर्म नहीं बना, बल्कि यह उसका कानून, उसकी सरकार, उसकी विदेश नीति और उसकी रीढ़ बन गया। ईरान सिर्फ अपने देश तक सीमित नहीं रहना चाहता था, बल्कि इस्लामी क्रांति के विचारों को दूसरे मुस्लिम देशों तक ले जाना चाहता था।
विशेषज्ञों के मुताबिक क्रांति का निर्यात सबसे सफल लेबनान में रहा, जो उस समय इजराइली आक्रमण से नाराज था और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी को स्वीकार करने को तैयार था। लेकिन बाकी जगहों पर खुमैनी को ज्यादा सफलता नहीं मिली। ईरान की कट्टरपंथी सोच और क्रांति फैलाने की इच्छा ने मिडिल ईस्ट के पड़ोसी देशों को दूर कर दिया। खासतौर से सुन्नी बहुसंख्यक देश अपने यहां इस तरह की उथल-पुथल नहीं चाहते थे और उन्होंने ईरान को हमेशा एक खतरे के रूप में देखा।
ईरान के पड़ोसी क्यों नहीं आए साथ
Trump Iran War Defeat में ईरान के अकेलेपन को समझने के लिए उसके हर पड़ोसी देश से संबंधों पर नजर डालनी जरूरी है। आर्मेनिया और तुर्कमेनिस्तान ईरान के दोस्त माने जाते हैं, कम से कम उनसे कोई टकराव नहीं है। अजरबैजान से संबंध सामान्य हैं, क्योंकि अजरबैजान-आर्मेनिया क्षेत्रीय विवाद में ईरान ने हमेशा आर्मेनिया का साथ दिया।
पाकिस्तान से संबंध ठीक-ठाक रहे हैं, लेकिन क्षेत्रीय दबावों और शिया-सुन्नी विवाद की वजह से यह रिश्ता हमेशा जटिल रहा। पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब के साथ संबंध ज्यादा अहम हैं, क्योंकि सऊदी अरब उसे बड़ी मात्रा में वित्तीय सहायता देता है। इसके अलावा, पाकिस्तान अमेरिका की गुड बुक्स में है और ईरान का समर्थन करके अपने “पापा” को नाराज नहीं कर सकता।
अफगानिस्तान से हेलमंद नदी के अधिकारों को लेकर लंबे समय से तनाव है। 1998 में सुन्नी कट्टरपंथी तालिबान ने मजार-ए-शरीफ में 10 ईरानी राजनयिकों की हत्या कर दी थी। ओमान में इबादी इस्लाम का पालन होता है, जो शिया और सुन्नी दोनों से पहले का एक प्राचीन संप्रदाय है। ओमान ने अपने पड़ोसियों के उलट ईरान, इजराइल और पश्चिम तीनों के साथ एक साथ अच्छे कूटनीतिक संबंध बनाए रखे हैं।
तुर्की से संबंध बेहद जटिल हैं। ऑटोमन और फारसी साम्राज्य एक समय बड़े प्रतिद्वंद्वी थे। सीरिया में ईरान ने बशर अल-असद की सरकार का समर्थन किया, जबकि तुर्की ने विद्रोहियों का। इराक से संबंधों में 1980-88 का आठ साल लंबा युद्ध सबसे बड़ा जख्म है, जिसमें लाखों लोगों की जान गई। हालांकि, 2003 में अमेरिकी आक्रमण के बाद ईरान ने इराकी राजनीति में अपना प्रभाव काफी बढ़ाया।
सऊदी अरब: दशकों पुरानी प्रतिद्वंद्विता
Trump Iran War Defeat में ईरान के सबसे बड़े क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी सऊदी अरब ने भी उसका साथ नहीं दिया। सऊदी अरब दशकों से ईरान को अपना सबसे बड़ा क्षेत्रीय खतरा मानता रहा है। दोनों देश यमन, सीरिया और अन्य क्षेत्रों में प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा करते रहे हैं। ईरान को शिया नेता माना जाता है, जबकि सऊदी अरब सुन्नी इस्लाम का मुख्य रक्षक माना जाता है।
1979 की ईरानी क्रांति के बाद सऊदी अरब ने वहाबवाद (सुन्नी इस्लाम का एक कट्टर रूप) को बढ़ावा देना शुरू किया ताकि ईरान के प्रभाव का मुकाबला किया जा सके। 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध में सऊदी अरब ने इराक का समर्थन किया। 1981 में सऊदी अरब समेत छह खाड़ी देशों ने ईरान के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) बनाई। 1987 की हज यात्रा के दौरान कुछ ईरानी तीर्थयात्रियों ने सऊदी सुरक्षाबलों पर हमला किया, जिसके बाद सऊदी अरब ने ईरान से कूटनीतिक संबंध भी तोड़ लिए। 2016 में सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और बहरीन सबने ईरानी राजनयिकों को निष्कासित कर दिया।
ईरान की शतरंज की चालें: खाड़ी देशों को लालच, अमेरिका को धमकी
Trump Iran War Defeat के बीच ईरान ने शतरंज की कई चालें एक साथ चली हैं। पहली चाल: ईरान ने खाड़ी देशों से कहा कि “हम अब आप पर हमला नहीं करेंगे, बशर्ते आपके देश से अमेरिकी हमला न हो और आप अमेरिका से दूरी बनाएं।”
दूसरी चाल और भी दिलचस्प है: ईरान ने ऐलान किया कि जो भी अरब या यूरोपीय देश अपने यहां से अमेरिकी या इजराइली राजदूत को निकाल देगा, उसके जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित गुजरने की गारंटी ईरान देगा। उन जहाजों को कुछ नहीं होगा। यानी ईरान लोगों को अमेरिका के जाल से बाहर निकलने का लालच दे रहा है।
अमेरिका खुद भी कंफ्यूज, चार मोर्चों पर फंसा
Trump Iran War Defeat के बीच अमेरिका खुद भी भारी कंफ्यूजन में है। उसके सामने चार मोर्चों पर एक साथ संकट खड़ा है। पहला, एप्सटीन फाइल्स के नए-नए खुलासे सामने आ रहे हैं। दूसरा, देश में तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। तीसरा, मध्यावधि चुनाव करीब आ रहे हैं और ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग पर असर पड़ रहा है। और चौथा, सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह युद्ध अमेरिका के लिए है या इजराइल के लिए? इस सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला है।
अब हो सकता है कि धीरे-धीरे अमेरिका खुद को विजेता घोषित कर दे और ट्रंप कहें कि “मैंने जीत लिया।” युद्ध के लक्ष्य पूरे हो गए और हमले धीरे-धीरे कम हो जाएं। या फिर हो सकता है कि कोई ट्रंप के अहम को चोट पहुंचा दे, इजराइल से कोई नया निर्देश आ जाए और अगले 24 घंटों में एक और बड़ा विस्फोट दिखाई दे। यह युद्ध एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां शांति बहाली हो सकती है, लेकिन जहां ट्रंप जैसा इंसान हो, वहां 100% कुछ भी कहना बेहद मुश्किल है। ईरान ने अकेले दम पर जो कर दिखाया है, वह इतिहास में दर्ज होगा, चाहे इसे जीत कहें या अमेरिका की हार।
मुख्य बातें (Key Points)
- ट्रंप ने कहा “युद्ध लगभग खत्म” और “शॉर्ट टर्म वॉर”, लेकिन रक्षा मंत्री हेग्सेथ बोले “बस शुरुआत है”, इजराइल “एग्जिट रैंप” ढूंढ रहा।
- ईरान ने बिना किसी बड़े सहयोगी के अकेले दम पर अमेरिका-इजराइल को रोका, शिया-सुन्नी विभाजन और फारसी-अरब पहचान की वजह से कोई मुस्लिम देश साथ नहीं आया।
- ईरान ने खाड़ी देशों को ऑफर दिया: अमेरिकी राजदूत निकालो तो होर्मुज से जहाज सुरक्षित गुजरेंगे, अमेरिका से दूरी बनाओ तो हमला नहीं होगा।
- अमेरिका चार मोर्चों पर फंसा: एप्सटीन फाइल्स, बढ़ती तेल कीमतें, मिडटर्म इलेक्शन और “यह युद्ध किसके लिए” का अनुत्तरित सवाल।








