Iran-Israel War India Trade Energy Impact अब सिर्फ एक भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सीधे भारत के हर आम नागरिक की जेब और देश की आर्थिक संप्रभुता से जुड़ा सवाल बन चुका है। ईरान में जैसे-जैसे हालात गंभीर होते जा रहे हैं, युद्ध गहराता जा रहा है और जान-माल का नुकसान बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार पर इसका असर साफ दिखने लगा है। और इस पूरे संकट के केंद्र में खड़ा है एक छोटा लेकिन बेहद अहम समुद्री रास्ता: स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़।
‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़: वो संकरा रास्ता जिस पर टिकी है दुनिया की ऊर्जा’
दुनिया का कच्चा तेल व्यापार जिस रास्ते से होकर गुज़रता है, उसमें सबसे अहम स्थान है स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ का। इस एक रास्ते से हर रोज़ 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल गुज़रता है। दुनिया के कुल प्राकृतिक गैस व्यापार का 33% इसी रूट से होता है और एशियाई बाज़ारों की तरफ जाने वाले तेल का 84% हिस्सा इसी रास्ते से निकलता है। इन एशियाई बाज़ारों में चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े देश शामिल हैं।
4 मार्च का डेटा बताता है कि इस क्षेत्र में सैकड़ों व्यावसायिक जहाज़ रुके खड़े हैं क्योंकि ईरान द्वारा इस जलमार्ग को बंद करने की आशंका बार-बार जताई जा रही है। हालांकि यूएन में ईरानी मिशन का कहना है कि ये दावे बेबुनियाद और हास्यास्पद हैं और ईरान अंतर्राष्ट्रीय कानून तथा नौवहन की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध है।
‘भारत के लिए क्यों है यह संकट सबसे बड़ा?’
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। भारत की कुल ऊर्जा ज़रूरतों का 35 से 50 प्रतिशत हिस्सा इसी मध्य-पूर्व क्षेत्र से होते हुए आता है। अगर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ बंद होती है या आपूर्ति बाधित होती है, तो तेल के दाम तेज़ी से बढ़ेंगे। इसका सीधा असर घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमत पर, पेट्रोल-डीज़ल पर और महंगाई पर पड़ेगा जो हर आम भारतीय की ज़िंदगी को प्रभावित करेगा।
इतना ही नहीं, मध्य-पूर्व के इन्हीं देशों से भारत को सबसे ज़्यादा रेमिटेंस यानी विदेश से भेजा जाने वाला पैसा मिलता है। भारत रेमिटेंस प्राप्त करने में दुनिया में पहले नंबर पर है। अगर इस क्षेत्र में अशांति बढ़ी और वहाँ काम करने वाले भारतीयों की आमदनी प्रभावित हुई, तो रेमिटेंस घटेगा, करंट अकाउंट डेफिसिट पर दबाव बढ़ेगा और रुपए का अवमूल्यन होगा।
‘रूसी तेल का खेल और अमेरिका का 30 दिन का वेवर’
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब दुनिया ने रूसी तेल से मुँह फेर लिया था, तब भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूसी तेल खरीदना शुरू किया था। उस दौरान भारत का रूसी तेल आयात 21 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुँच गया था। लेकिन जनवरी 2026 तक यह आंकड़ा घटकर लगभग 11 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। इसकी प्रमुख वजह रही अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत लगाया गया अतिरिक्त 25% टैरिफ और रूसी तेल पर मिलने वाली छूट का अंतर धीरे-धीरे कम होना।
अब इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका ने भारत को 30 दिन का वेवर दिया है, जिसके तहत भारतीय तेल कंपनियाँ समुद्र में मौजूद उस रूसी तेल को खरीद सकती हैं जिसे अंतिम खरीदार नहीं मिला। रिलायंस ने इस वेवर के बाद रूसी तेल दोबारा खरीदने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत की ऊर्जा नीतियाँ अमेरिका की मंज़ूरी की मोहताज रहेंगी? विपक्ष ने भी यह सवाल उठाया है कि यह वेवर एक तरह का ब्लैकमेल है और यह किसी देश की संप्रभुता के लिए ठीक नहीं है।
‘अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को किया अमान्य, फिर भी जारी है दबाव’
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने रेसिप्रोकल टैरिफ के पूरे ढाँचे को अमान्य घोषित कर दिया। यहाँ तक कि कोर्ट ने यह भी कहा कि जो अतिरिक्त टैरिफ वसूला गया वह वापस किया जाए। लेकिन इसके तुरंत बाद अमेरिकी प्रशासन ने एक नया टैरिफ ढाँचा पेश किया, जिसमें पहले 10% और फिर अचानक 15% वैश्विक टैरिफ लागू कर दिया गया।
यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि किस तरह एक देश अपनी न्यायिक व्यवस्था को भी चुनौती देते हुए व्यापार नीति के नाम पर वैश्विक अनिश्चितता को बढ़ावा दे रहा है। अब जो भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की चर्चा चल रही है, उसके अनुसार भारतीय उत्पादों पर अमेरिका में 18% टैरिफ लगेगा जबकि अमेरिकी उत्पादों पर भारत में 0% टैरिफ होगा। पीयूष गोयल ने कहा है कि समय के साथ इस व्यापार समझौते को संतुलित किया जाएगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह पुनर्संतुलन पहले ही होना चाहिए था।
‘भारत के पास है लेवरेज, बस इस्तेमाल करने की ज़रूरत है’
एक अहम तथ्य यह है कि रिश्ता केवल एकतरफा नहीं है। अमेरिका भी भारत पर उतना ही निर्भर है। अमेरिका के कुल जेनेरिक दवा आयात में 40% तक की हिस्सेदारी भारत की है। टेक्सटाइल, ऑटोमोटिव कॉम्पोनेंट्स और अन्य क्षेत्रों में भी भारत का निर्यात अमेरिका के लिए अहम है। अमेरिका चाहता है कि उसके कृषि उत्पाद भारत में बिकें और भारत का बाज़ार उसके लिए खुले।
तो भारत के पास फार्मा का लेवरेज है, बड़े बाज़ार का लेवरेज है और एक मज़बूत वार्ता स्थिति है। ज़रूरत इस बात की है कि भारत इस लेवरेज का उपयोग करते हुए व्यापार समझौते को फिर से बेहतर शर्तों पर नेगोशिएट करे।
‘ऊर्जा विविधीकरण: भारत को खुद तय करनी होगी अपनी राह’
भारत ने वेनेज़ुएला तेल के ऑर्डर भी दिए हैं। रिलायंस और इंडियन ऑयल दोनों ने वेनेज़ुएला का हेवी ग्रेड तेल खरीदा है और भारतीय रिफाइनरियाँ इसे प्रोसेस करने में सक्षम हैं। साथ ही भारत ने रुपए में तेल भुगतान की व्यवस्था यानी Vostro Accounts का ढाँचा भी खड़ा किया है, जिससे डॉलर पर निर्भरता कम हो सके। लेकिन यह व्यवस्था अभी इतनी कुशल नहीं बनी है कि डॉलर पर निर्भरता को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।
यह वक्त का तकाज़ा है कि भारत अपनी ऊर्जा नीति खुद तय करे। किस देश से तेल खरीदना है, किस रूट से आना है, किस मुद्रा में भुगतान होगा, ये सब फैसले भारत को खुद लेने चाहिए, न कि किसी और देश की मंज़ूरी का इंतज़ार करना चाहिए।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- ईरान-इज़राइल युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पर संकट, जहाँ से भारत की 35-50% ऊर्जा आपूर्ति होती है।
- अमेरिका ने भारत को 30 दिन का वेवर दिया है जिससे भारतीय कंपनियाँ रूसी तेल खरीद सकती हैं, लेकिन यह भारत की संप्रभुता पर सवाल खड़े करता है।
- अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रेसिप्रोकल टैरिफ को अमान्य किया, फिर भी नया टैरिफ ढाँचा लागू, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर पुनर्विचार ज़रूरी।
- मध्य-पूर्व से रेमिटेंस घटने पर करंट अकाउंट डेफिसिट और रुपए के अवमूल्यन का खतरा।
- भारत के पास फार्मा और बाज़ार का बड़ा लेवरेज, ज़रूरत है इसे ऊर्जा और व्यापार वार्ता में इस्तेमाल करने की।








