Iran Pakistan History का एक ऐसा पन्ना है जिसे आज बहुत कम लोग जानते हैं। आज भले ही भारत-ईरान के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों की दुहाई दी जाए, लेकिन 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में ईरान खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा था। उस दौर में ईरान ने भारत के खिलाफ पर्दे के पीछे जो भूमिका निभाई, वो इतिहास के सबसे चौंकाने वाले अध्यायों में से एक है।
‘1965 की जंग: ईरान बना पाकिस्तान का हथियार खरीद एजेंट’
Iran Pakistan History में 1965 का युद्ध एक अहम मोड़ है। उस समय शाह मोहम्मद रजा पहलवी का ईरान पर शासन था और वो अमेरिकी खेमे का एक मजबूत सहयोगी था। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान को पश्चिमी देशों से सीधे हथियार मिलने में मुश्किलें आ रही थीं।
ऐसे में ईरान ने एक पश्चिम जर्मन हथियार कारोबारी से लगभग 90 F-86 लड़ाकू विमान, मिसाइलें, तोपें, गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स खरीदे। कागजों पर यह खरीद ईरान के नाम पर थी लेकिन असली इस्तेमाल पाकिस्तान ने किया। यह विमान पहले तेहरान पहुंचे और फिर वहां से पाकिस्तान भेजे गए। यानी Iran Pakistan History में ईरान ने खरीद एजेंट की भूमिका निभाते हुए भारत के खिलाफ पाकिस्तान को सैन्य रूप से मजबूत किया।
‘1971 की जंग: Nixon-Kissinger और Shah की तिकड़ी’
Iran Pakistan History का सबसे चौंकाने वाला अध्याय 1971 के युद्ध से जुड़ा है। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर चाहते थे कि पाकिस्तान को मदद मिले लेकिन अमेरिका सीधे तौर पर शामिल न दिखे।
4 दिसंबर 1971 को एक टेलीफोन बातचीत में पाकिस्तान के राष्ट्रपति की ओर से तत्काल सैन्य मदद की अपील की गई। फैसला हुआ कि ईरान के जरिए यह मदद पहुंचाई जाए। 5 दिसंबर को तेहरान में अमेरिकी अधिकारी ने शाह से मुलाकात की। शाह ने मदद पर सहमति दी लेकिन शर्त रखी कि जो भी सैन्य सामग्री पाकिस्तान को दी जाएगी उसकी भरपाई अमेरिका करेगा।
‘हेलीकॉप्टर, तोपें और ईंधन: पर्दे के पीछे की मदद’
Iran Pakistan History में 1971 की मदद की विस्तृत तस्वीर बेहद चौंकाने वाली है। ईरान ने पाकिस्तान को करीब एक दर्जन हेलीकॉप्टर उधार दिए। जब भारतीय सेना ने पूर्वी मोर्चे पर बढ़त बनाई तो अतिरिक्त तोपें, गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स भी भेजे गए।
कराची के तेल भंडार पर भारतीय हमलों के बाद ईंधन संकट की आशंका बढ़ी। ऐसे में ईंधन सप्लाई की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। एक और वैकल्पिक योजना बनाई गई जिसमें जॉर्डन के राजा हुसैन अपने F-104 लड़ाकू विमान पाकिस्तान भेजते और बदले में ईरान जॉर्डन की सुरक्षा संभालता।
‘CENTO: वो गठबंधन जो भारत के खिलाफ था’
Iran Pakistan History को समझने के लिए उस दौर के भू-राजनीतिक समीकरण को जानना जरूरी है। 1955 से ईरान, पाकिस्तान और तुर्की पश्चिम समर्थित CENTO यानी Central Treaty Organization के सदस्य थे। यह संगठन सोवियत प्रभाव को रोकने के लिए बनाया गया था और इसी गठबंधन ने Iran Pakistan History में ईरान को पाकिस्तान के करीब रखा।
शाह अपने पायलट और विमान सीधे पाकिस्तान भेजने को इसलिए तैयार नहीं थे क्योंकि भारत और सोवियत संघ के बीच मित्रता संधि हो चुकी थी और सोवियत टकराव का खतरा बन सकता था।
‘इतनी मदद के बावजूद पाकिस्तान हारा: भारत की जीत का गौरव’
Iran Pakistan History का सबसे गर्व करने वाला पहलू यह है कि इतनी बड़ी बाहरी मदद के बावजूद 1971 में पाकिस्तान को करारी हार का सामना करना पड़ा। बांग्लादेश का जन्म हुआ और भारत ने अपनी सैन्य क्षमता और रणनीति से पूरी दुनिया को दिखा दिया कि बाहरी समर्थन के बावजूद असली ताकत मैदान में तय होती है।
यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक थी क्योंकि एक तरफ अमेरिका, ईरान, जॉर्डन और चीन पाकिस्तान के साथ खड़े थे, दूसरी तरफ भारत ने सोवियत संघ के साथ मित्रता संधि की बदौलत कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा।
‘1979 के बाद पलट गया पूरा इतिहास’
Iran Pakistan History में 1979 की इस्लामी क्रांति एक बड़ा मोड़ साबित हुई। अयातुल्लाह खुमेनी के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति के बाद ईरान-अमेरिका के रिश्ते पूरी तरह टकराव में बदल गए। जो ईरान कभी अमेरिका के इशारे पर पाकिस्तान की मदद करता था, वही अब अमेरिका का सबसे बड़ा विरोधी बन गया।
यह Iran Pakistan History का वो सबक है जो बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्ती या दुश्मनी नहीं होती — सिर्फ बदलते हुए राष्ट्रीय हित होते हैं।
‘क्या है पूरी पृष्ठभूमि’
1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों के दौरान ईरान पर शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था जो अमेरिकी खेमे का हिस्सा था। CENTO गठबंधन के तहत ईरान, पाकिस्तान और तुर्की एक साथ थे। ईरान ने पश्चिमी देशों के हथियार पाकिस्तान तक पहुंचाने में खरीद एजेंट की भूमिका निभाई। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यह पूरा समीकरण उलट गया।
मुख्य बातें (Key Points)
- 1965 में ईरान ने पश्चिम जर्मनी से 90 F-86 विमान और हथियार खरीदकर पाकिस्तान को दिए, कागजों पर खरीद ईरान के नाम थी।
- 1971 में Nixon-Kissinger के इशारे पर शाह ने पाकिस्तान को हेलीकॉप्टर, तोपें और गोला-बारूद पहुंचाया।
- CENTO गठबंधन के तहत ईरान, पाकिस्तान और तुर्की 1955 से एक पश्चिम समर्थित सैन्य संगठन के सदस्य थे।
- इतनी बाहरी मदद के बावजूद 1971 में पाकिस्तान हारा और बांग्लादेश का जन्म हुआ।








