Al Jazeera style guide ने अपनी एडिटोरियल पॉलिसी में एक बड़ा और विवादास्पद बदलाव किया है। कतर स्थित इस अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान ने अपने 2023-2024 स्टाइल गाइड में स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि उसके पत्रकार ISIS, अल-कायदा और बोको हरम जैसे संगठनों को किस शब्दावली में संबोधित करें। इस गाइड में आतंकवाद या चरमपंथ से जुड़े शब्दों की जगह तटस्थ (न्यूट्रल) शब्दों के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी गई है।
स्टाइल गाइड के अनुसार, अल जजीरा ने अपने रिपोर्टर्स को ISIS और इसी तरह के अन्य समूहों को “आतंकवादी” (terrorist) या “इस्लामवादी” (Islamist) करार देने से रोक दिया है। इसके बजाय, गाइड “फाइटर्स” (लड़ाके) या “सशस्त्र समूह” (armed groups) जैसे शब्दों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करता है। यह बदलाव रिपोर्टिंग में कट्टरपंथी इस्लाम को चित्रित करने के व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
क्या कहती है नई गाइडलाइन?
अल जजीरा के स्टाइल गाइड में स्पष्ट रूप से लिखा है कि ISIS को “इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवेंट (ISIL)” के रूप में संदर्भित किया जाए। अल-कायदा को भी इसी तरह एक “सशस्त्र समूह” के रूप में श्रेणीबद्ध किया गया है। वहीं, बोको हरम के लिए गाइड में कहा गया है कि यह समूह पश्चिमी प्रभाव के खिलाफ लड़ रहा है और नाइजीरिया में इस्लामी कानून लागू करने का प्रयास कर रहा है।
उद्धरण और संदर्भ की शर्त
गाइड में यह भी निर्देश है कि “आतंकवाद” (terrorism) और “आतंकवादी” (terrorists) जैसे शब्दों का इस्तेमाल केवल उचित उद्धरण (attribution) के साथ ही किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक रिपोर्ट में यह कहा जा सकता है, “ISIL सशस्त्र समूह ने हमले की जिम्मेदारी ली है।” यह नीति बिना किसी निर्णयात्मक टिप्पणी के संदर्भ प्रदान करने के प्रयास को दर्शाती है।
ऐतिहासिक घटनाओं पर भी बदला नजरिया
स्टाइल गाइड ने ऐतिहासिक अत्याचारों को संबोधित करने के लिए भी संवेदनशीलता बरतने की सलाह दी है। उदाहरण के लिए, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान आर्मेनियाई लोगों के खिलाफ किए गए अत्याचारों पर चर्चा करते समय, अल जजीरा ने ‘नरसंहार’ (genocide) के बजाय ‘सामूहिक हत्याओं’ (mass killings) शब्द का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। गाइड में साफ किया गया है कि ‘नरसंहार’ शब्द का इस्तेमाल केवल दूसरों को उद्धृत करते समय ही किया जा सकता है। वहीं, 1995 में स्रेब्रेनिका में 8,000 से अधिक मुसलमानों के नरसंहार को स्पष्ट रूप से नरसंहार (genocide) का लेबल दिया गया है।
भाषा संबंधी अन्य निर्देश
गाइड में इस्लाम से जुड़े शब्दों पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं। “जिहाद” (jihad) शब्द के इस्तेमाल को हतोत्साहित किया गया है, साथ ही “इस्लामवादी” (Islamist) और “फंडामेंटलिस्ट” (fundamentalist) शब्दों के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई गई है। इसके बजाय, गाइड व्यक्तियों और समूहों के अधिक सूक्ष्म चित्रण के लिए उनके कार्यों और उद्देश्यों पर आधारित विवरण देने की वकालत करता है।
‘क्यों उठ रहे हैं सवाल?’
अल जजीरा के इस फैसले पर मीडिया जगत में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। समर्थकों का कहना है कि यह पत्रकारिता में निष्पक्षता और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की दिशा में एक कदम है, जिससे दर्शकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के खुद राय बनाने का मौका मिलेगा। उनका तर्क है कि ‘आतंकवादी’ जैसे शब्द भावनात्मक और निर्णयात्मक हैं, जबकि ‘सशस्त्र समूह’ तटस्थ है।
वहीं, आलोचकों का कहना है कि ISIS और अल-कायदा जैसे संगठनों ने दुनिया भर में हजारों मासूम लोगों की हत्या की है और उन्हें ‘आतंकवादी’ कहना सिर्फ एक तथ्य है, न कि पक्षपात। उनका मानना है कि इस तरह की तटस्थता आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर सकती है और पीड़ितों के प्रति असंवेदनशीलता दर्शाती है। आर्मेनियाई नरसंहार को लेकर गाइड में की गई टिप्पणी भी विवादों में घिरी हुई है, क्योंकि कई इतिहासकार इसे नरसंहार मानते हैं।
मीडिया जगत में बहस छिड़ी
अल जजीरा के इन दिशानिर्देशों ने एक बार फिर मीडिया में भाषा, प्रतिनिधित्व और जटिल मुद्दों के चित्रण की भूमिका पर बहस छेड़ दी है। क्या पत्रकारिता को पूरी तरह तटस्थ होना चाहिए, या फिर स्पष्ट रूप से बुराई का लेबल लगाना भी उसका कर्तव्य है? यह सवाल अब गंभीरता से उठने लगा है। जैसे-जैसे मीडिया परिदृश्य विकसित हो रहा है, अल जजीरा के ये दिशानिर्देश वैश्विक रिपोर्टिंग में भाषा के इस्तेमाल को लेकर चल रही बहस का एक अहम हिस्सा बन गए हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
Al Jazeera style guide में बड़ा बदलाव, ISIS, अल-कायदा को ‘आतंकवादी’ न कहने के निर्देश।
इन संगठनों के लिए ‘फाइटर्स’ या ‘सशस्त्र समूह’ जैसे तटस्थ शब्दों के इस्तेमाल की सलाह।
‘आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल केवल उद्धरण के साथ करने की अनुमति।
आर्मेनियाई नरसंहार के लिए ‘जेनोसाइड’ की जगह ‘मास किलिंग’ शब्द के इस्तेमाल पर जोर, स्रेब्रेनिका को जेनोसाइड बताया गया।
‘जिहाद’, ‘इस्लामवादी’ और ‘फंडामेंटलिस्ट’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर रोक।








