Modi Israel Visit Trump Tariff: जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विमान तेल अवीव के हवाई अड्डे पर उतर रहा था, उसी समय हजारों किलोमीटर दूर वॉशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी पहली State of the Union स्पीच दे रहे थे — और उस स्पीच के केंद्र में कहीं न कहीं भारत ही था। भारत पर सोलर पैनल का टैरिफ 10% से बढ़ाकर 126% कर दिया गया, ऑपरेशन सिंदूर का श्रेय फिर अमेरिका ने लिया, और ट्रंप ने साफ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद टैरिफ नीति में एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे। प्रधानमंत्री मोदी इज़रायल के रास्ते अमेरिका से रिश्ते सुधारने गए थे, लेकिन इज़रायल पहुंचते ही अमेरिका से आई खबरों ने सारा हिसाब बिगाड़ दिया।
दो देशों की संसद, दो भाषण — और बीच में फंसा भारत
एक अनोखा संयोग देखिए — पहली बार प्रधानमंत्री मोदी इज़रायल की संसद (नेसेट) को संबोधित करने जा रहे थे, और ठीक उसी वक्त राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार ट्रंप अमेरिकी कांग्रेस में अपनी State of the Union स्पीच दे रहे थे। दोनों भाषण एक ही दिन, लेकिन दोनों के संदेश बिल्कुल अलग दिशाओं में जा रहे थे।
ट्रंप की स्पीच में तीन बातें सीधे भारत पर निशाना साधती दिखीं। पहली — सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अमेरिका की प्रगति पर कोई रुकावट नहीं आएगी और टैरिफ के जरिए ही पैसा लाया जाएगा। दूसरी — ऑपरेशन सिंदूर में युद्ध अमेरिका ने रुकवाया था, यह दावा फिर दोहराया गया। तीसरी — भारत जैसे देश जो पहले अमेरिका से ज्यादा कमाई कर रहे थे, अब ऐसा संभव नहीं होगा।
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सोलर पैनल पर 126% टैरिफ — भारत पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी का हथौड़ा
ट्रंप प्रशासन ने भारत पर सोलर पैनल का टैरिफ 10% से बढ़ाकर 126% कर दिया है। 2024 में भारत ने करीब 7,200 करोड़ रुपये के सोलर उत्पाद अमेरिका को एक्सपोर्ट किए थे, जिस पर सिर्फ 10% टैरिफ लगता था। लेकिन अमेरिका ने खुले तौर पर आरोप लगाया कि भारत चीन से सोलर पैनल लेता है, उसे अमेरिकी बाजार में बेचता है और मुनाफा कमा ले जाता है।
अमेरिका ने इसे “एंटी-डंपिंग ड्यूटी” बताया — यानी चीन का सामान डंप करने के लिए भारत एक माध्यम बन गया है। यही आरोप इससे पहले वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड पर लगाया गया था। अब भारत, इंडोनेशिया और लाओस भी इसी कतार में आ गए हैं। इसका सीधा मतलब है कि भारत का सोलर पैनल एक्सपोर्ट अमेरिका को अब लगभग ठप हो जाएगा — इस सेक्टर से जुड़े हजारों कारोबारियों और कामगारों पर सीधा असर पड़ेगा।
“ऑपरेशन सिंदूर में मैंने युद्ध रुकवाया” — ट्रंप का दावा, भारत की चुप्पी
ट्रंप ने अपनी State of the Union स्पीच में फिर से दावा किया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच का युद्ध उन्होंने ही रुकवाया था। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का नाम लेकर बताया कि उस वक्त पाकिस्तान के लिए कितनी संकटकालीन परिस्थितियां थीं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ट्रंप ने कहा — “हम अभी भी यह दावा कर रहे हैं और भारत का दावा गलत है।” यानी भारत जो लगातार अमेरिकी राष्ट्रपति के इस दावे को खारिज करता रहा कि उन्होंने युद्ध रुकवाया, आज अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी संसद में खड़े होकर कह रहे हैं कि भारत का दावा सही नहीं है, हमारा सही है। ऑपरेशन सिंदूर में भारत के रुख को कभी भी किसी भी तर्ज पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने मान्यता नहीं दी — यह बात गहरे सवाल खड़ी करती है।
इज़रायल के रास्ते अमेरिका पहुंचने का प्लान — तीन प्रयास, तीनों पर सवाल
प्रधानमंत्री मोदी की इज़रायल यात्रा के पीछे तीन बड़े प्रयास नजर आते हैं। पहला — इज़रायल यात्रा के जरिए अमेरिका तक संदेश पहुंचाना। दूसरा — इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के जरिए ट्रंप तक रास्ता खोलना, क्योंकि नेतन्याहू और ट्रंप के करीबी रिश्ते हैं। तीसरा — डिफेंस डील को रूस से अमेरिका की तरफ शिफ्ट करने में इज़रायल को पहला पड़ाव बनाना।
लेकिन तीनों प्रयासों पर सवालिया निशान लग गया जब ट्रंप ने अपनी स्पीच में साफ कर दिया कि भारत के साथ हुई ट्रेड डील में एक इंच भी खिसकने को अमेरिका तैयार नहीं है। इज़रायल के जरिए ट्रंप के साथ संबंध बेहतर बनाने की जो कोशिश हो रही है, वह भी अमेरिकी राष्ट्रपति को मंजूर नहीं दिखती। और ब्रिक्स और एससीओ को लेकर जो अमेरिकी दबाव है, उसमें भी अमेरिका भारत के खिलाफ ही खड़ा नजर आ रहा है।
ट्रंप की स्पीच से निकले छह संदेश — और हर एक में भारत फंसा
ट्रंप की State of the Union स्पीच को पॉइंट-दर-पॉइंट समझें तो छह बड़े संदेश निकलते हैं और हर एक में कहीं न कहीं भारत फंसा हुआ है।
पहला — ईरान को चेतावनी दी गई कि न्यूक्लियर प्रोग्राम खत्म करे और अमेरिका से डील करे। भारत ने डील तो कर ली, लेकिन उलझन बढ़ी क्योंकि इस दौर में जो मीटिंग होनी थी वो भारत ने टाल दी — और ट्रंप इसे काउंटर कर रहे हैं।
दूसरा — ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र कर “3 करोड़ लोग मारे जाते” कहकर अपना श्रेय लिया। भारत लगातार इस दावे को खारिज करता रहा, लेकिन ट्रंप ने अमेरिकी संसद में खड़े होकर कहा — “हमारा दावा सही है, भारत का नहीं।”
तीसरा — गाजा में सीजफायर और बंधक रिहाई का श्रेय अमेरिका ने लिया। जो पीस प्रोसेस अमेरिका लाना चाहता है उसमें भारत ने एक गवर्नर भेजकर संकेत दिया कि वो “पूरे मन से खड़ा नहीं है” — यह बात ट्रंप को नागवार गुजरी।
चौथा — अमेरिका में तेल उत्पादन रोजाना 6 लाख बैरल बढ़ चुका है। ट्रंप ने साफ संदेश दिया कि भारत को वेनेजुएला से तेल खरीदना होगा, रूस से नहीं। यह भारत के लिए सीधा आर्थिक बोझ है क्योंकि रूस का तेल 30% सस्ता था जबकि वेनेजुएला का 12% ज्यादा महंगा पड़ेगा।
पांचवां — सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और 15% वैश्विक टैरिफ के साथ हर तरह का नया टैरिफ लगाने का ऐलान किया।
छठा — चीन को न्यूक्लियर हथियारों को लेकर सबसे बड़ी चुनौती बताया और रेयर अर्थ के मुद्दे पर भी सख्ती का संकेत दिया।
अमेरिकी विपक्ष का रुख — ट्रंप का विरोध है, लेकिन भारत की डील का नहीं
अमेरिका के भीतर जो प्रतिक्रिया आई वो भारत के लिए और चिंताजनक है। डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता ट्रंप का विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन भारत के साथ हुई डील पर कोई सवाल नहीं उठा रहे। वर्जीनिया की गवर्नर एबीगेल स्पेनबर्गर ने कहा कि ट्रंप सिर्फ अपनी सफलताएं बताते हैं, रूस को आर्थिक ताकत सौंपते जा रहे हैं, चीन के आगे झुक रहे हैं, पुतिन तानाशाह है जिसके आगे अमेरिका नहीं झुकना चाहिए।
लेकिन ध्यान दीजिए — डेमोक्रेट्स की प्रतिक्रिया में रूस, चीन, ईरान और मिडिल ईस्ट का जिक्र है, भारत का कहीं नहीं। जो आवाज पहले उठती थी कि “भारत को अपने साथ रखो, ब्रिक्स और चीन-रूस की तरफ मत जाने दो” — वो आवाज ट्रंप की इस स्पीच के बाद डेमोक्रेट्स की प्रतिक्रिया में भी कहीं नजर नहीं आई। यानी अमेरिकी राजनीति में इस वक्त भारत किसी की भी प्राथमिकता में नहीं दिखता।
ईरान पर युद्ध के बादल — मोदी की यात्रा और टाइमिंग का सवाल
प्रधानमंत्री मोदी के इज़रायल पहुंचने के साथ ही नेतन्याहू ने ईरान को चेतावनी देने से गुरेज नहीं किया — “अगर ईरान ने हमला करने की सोची तो उसके लिए बहुत बुरा होगा।” उसी समय अमेरिका ने संकेत दिए कि ईरान को हर हाल में अमेरिका के साथ डील करनी होगी, वरना युद्ध के लिए तैयार रहे।
अब तीन मैसेज की तीन लकीरें खिंच गई हैं। भारत के प्रधानमंत्री की मौजूदगी में इज़रायल ने ईरान को धमकाया। अमेरिका ने ईरान को अल्टीमेटम दिया। और मिडिल ईस्ट में जो पहले चेक एंड बैलेंस चल रहा था — जिसमें ईरान, रूस और चीन एक तरफ थे — वो अब डगमगा चुका है क्योंकि भारत इज़रायल के साथ ऐसे मौके पर खड़ा है जहां हर कोई पूछ रहा है कि क्या मोदी के वापस लौटने के 24-36 घंटे बाद युद्ध की परिस्थितियां बन सकती हैं?
यूक्रेन शांति प्रस्ताव में भी भारत “एब्सेंट” — अमेरिका के साथ कदम से कदम
एक और संकेत जो इज़रायल यात्रा के दौरान ही सामने आया — संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन में शांति प्रक्रिया लाने का प्रस्ताव रखा गया। संयोग से उसमें भारत और अमेरिका — दोनों ही एब्सेंट रहे। यानी यहां भी भारत ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी हालत में वो अमेरिका से हटकर नजर न आए।
यह पैटर्न अब साफ दिखने लगा है — चाहे रूस से तेल खरीदना बंद करना हो, ईरान के चाबहार प्रोजेक्ट से किनारा करना हो, या यूएन में शांति प्रस्ताव से दूर रहना हो — भारत की हर कूटनीतिक चाल अमेरिका की लाइन पर चल रही है। लेकिन विडंबना यह है कि इतना सब करने के बावजूद अमेरिका 126% टैरिफ का झटका दे रहा है।
क्या नेतन्याहू और मोदी की निकटता अमेरिका को रास नहीं आ रही?
एक और गंभीर सवाल उभर रहा है — क्या इज़रायल और भारत की निकटता नहीं, बल्कि नेतन्याहू और मोदी की व्यक्तिगत निकटता अमेरिका को खटक रही है? इज़रायल अमेरिका के करीब है, नेतन्याहू ट्रंप के साथ करीबी रिश्ते रखते हैं — लेकिन अमेरिका में भी नेतन्याहू को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
जिस तरीके से ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी को लेकर टिप्पणी से नहीं चूक रहे, क्या अब उसी रास्ते वे नेतन्याहू को लेकर भी आएंगे? और यह नई परिस्थिति एक नए त्रिकोण को जन्म दे रही है — एक तरफ रूस, चीन और ईरान, दूसरी तरफ अमेरिका जो उन नए देशों के साथ खड़ा होना चाहता है जो “डील पर जुड़ दें, युद्ध पर नहीं।” इस पूरी प्रक्रिया में अमेरिका ने भारत और इज़रायल को एक साथ अपनी निगाहों में रख लिया है।
राहुल गांधी का दावा सच साबित हो रहा है?
देश के भीतर विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार यह ऐलान करते रहे हैं कि अब ट्रेड डील वापस करना प्रधानमंत्री मोदी के बस के बाहर हो चुका है। आज ट्रंप की स्पीच ने इस दावे को और मजबूत कर दिया। ट्रंप ने एक इंच भी पीछे न हटने की बात कही, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया, और साफ किया कि भारत जैसे देश जो पहले अमेरिका का पैसा अपने यहां ले जा रहे थे, अब ऐसा संभव नहीं होगा।
यानी भारत ने डील तो कर ली, लेकिन अमेरिका न सिर्फ डील से पीछे नहीं हटा बल्कि और नए टैरिफ लगा रहा है। सोलर पैनल पर 126%, कृषि क्षेत्र में दबाव, वेनेजुएला से तेल खरीदने का फरमान — यह सब दिखाता है कि “Compromised PM” का नारा जो कांग्रेस दे रही है, क्या अमेरिकी राष्ट्रपति के व्यवहार से भी वही तस्वीर उभर रही है?
तेल का संकट — रूस का 30% सस्ता तेल गया, वेनेजुएला का 12% महंगा आएगा
आम भारतीय के लिए सबसे सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ने वाला है। रूस भारत को लगभग 30% छूट पर कच्चा तेल दे रहा था। लेकिन अमेरिकी दबाव में भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर रहा है। अब अमेरिका कह रहा है कि वेनेजुएला से खरीदो — जो 12% ज्यादा महंगा पड़ेगा।
अगर ईरान पर हमला हुआ तो दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमत आसमान छू लेगी और भारत की अर्थव्यवस्था डगमगाने लगेगी। ऐसे वक्त में भारत का सबसे सस्ता तेल स्रोत (रूस) अमेरिकी दबाव में छूट गया है और सबसे महंगा विकल्प (वेनेजुएला) अपनाना पड़ रहा है। यह सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों, ट्रांसपोर्ट लागत और रोजमर्रा की महंगाई से जुड़ा है।
मोदी की इज़रायल संसद स्पीच पर दुनिया की नजर — क्या कहेंगे, क्या छोड़ेंगे?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मोदी इज़रायल की संसद में क्या कहते हैं। दुनिया देख रही है कि क्या वे रूस-यूक्रेन युद्ध का जिक्र करेंगे? क्या ईरान पर होने वाले संभावित हमले पर कुछ कहेंगे? क्या गाजा के नरसंहार की बात करेंगे? क्या चाबहार पोर्ट और ईरान पर सैंक्शन का मुद्दा उठाएंगे? क्या ब्रिक्स देशों और डॉलर को काउंटर करने की बात करेंगे? या फिर वाहवाही और दोस्ती के शोर में ये सारे सवाल फिर से हवा हो जाएंगे?
ट्रंप की तरफ से संकेत बहुत साफ है — एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे। सवाल भारत का है, भारत की जरूरतों का है, और भारत के आम नागरिक का है जो बढ़ती महंगाई, डूबती अर्थव्यवस्था और सिकुड़ते विकल्पों के बीच जवाब चाहता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- सोलर पैनल पर टैरिफ 10% से 126% किया गया — अमेरिका ने भारत पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाकर आरोप लगाया कि भारत चीन का माल अमेरिकी बाजार में डंप करने का माध्यम बन गया है; 7,200 करोड़ का सोलर एक्सपोर्ट ठप होने की कगार पर है।
- ट्रंप ने State of the Union में ऑपरेशन सिंदूर का श्रेय फिर लिया — अमेरिकी संसद में खड़े होकर कहा “हमारा दावा सही है, भारत का नहीं” और शहबाज शरीफ का नाम लेकर पाकिस्तान की संकटकालीन स्थिति बताई।
- मोदी इज़रायल के रास्ते अमेरिका तक पहुंचना चाहते थे, लेकिन ट्रंप ने साफ कर दिया — डील में एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे, सुप्रीम कोर्ट का फैसला “दुर्भाग्यपूर्ण” है, और 15% वैश्विक टैरिफ के साथ हर नए तरह का टैरिफ लगाया जाएगा।
- ईरान पर युद्ध के बादल गहराए — मोदी की मौजूदगी में नेतन्याहू ने ईरान को धमकाया, अमेरिका ने अल्टीमेटम दिया; भारत को रूस का 30% सस्ता तेल छोड़कर वेनेजुएला का 12% महंगा तेल खरीदना पड़ेगा जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा।








