US Supreme Court India Trade: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उनके टैरिफ हथियार पर सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। 20 फरवरी के फैसले में अदालत ने अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ को असंवैधानिक करार दे दिया। यह फैसला भारत के लिए राहत और सौदेबाजी की नई संभावनाएं लेकर आया है, क्योंकि इससे ट्रंप प्रशासन की मनमानी टैरिफ नीति पर संस्थागत अंकुश लगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टैरिफ लगाना टैक्स लगाने के दायरे में आता है और यह शक्ति अमेरिकी संविधान के तहत कांग्रेस को दी गई है, न कि राष्ट्रपति को। कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि व्यापार घाटा या फेंटानिल की तस्करी जैसे मुद्दे इतने व्यापक और स्थायी आपात हैं कि IEEPA के तहत दुनिया के लगभग हर देश पर 10 से 50% तक आयात शुल्क लगाया जा सके।
क्या है पूरा मामला?
टैरिफ को अपना नीतिगत हथियार मानने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने IEEPA के तहत कई देशों पर टैरिफ लगाए थे, जिनमें भारत भी शामिल था। ये टैरिफ उनके तथाकथित ‘लिबरेशन डे’ अभियान का हिस्सा थे, जिसकी आड़ में उन्होंने चीन से लेकर यूरोप, कनाडा, जापान और भारत तक हर साझेदार पर दबाव बनाया। सुप्रीम कोर्ट ने अब इन टैरिफ को असंवैधानिक करार देते हुए साफ कर दिया कि राष्ट्रपति की मनमानी से वैश्विक व्यापार व्यवस्था को नए सिरे से नहीं लिखा जा सकता।
फैसले का असर: अरबों डॉलर के रिफंड की संभावना
इस फैसले का सीधा असर यह हुआ है कि IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ हटने से अमेरिका का औसत लागू टैरिफ स्तर अचानक घट गया है। विभिन्न आर्थिक आकलनों के मुताबिक, इन टैरिफों की वापसी से 150 से 175 अरब डॉलर तक के रिफंड दावों की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह पहले से बढ़ते राजकोषीय घाटे के बीच ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ा राजनीतिक और आर्थिक सिरदर्द बन सकता है।
कोर्ट ने सिर्फ एक कानूनी व्याख्या नहीं दी, बल्कि व्हाइट हाउस की उस नीति के स्तंभ को हिला दिया, जो टैरिफ से आर्थिक उगाही और उसे हथियार के रूप में इस्तेमाल करने पर टिकी थी।
ट्रंप का जवाबी हमला: 15% ग्लोबल टैरिफ
फैसले के तुरंत बाद ट्रंप प्रशासन ने पलटवार करते हुए ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 के तहत नया दांव चला। उन्होंने सभी देशों से आने वाले आयात पर 10% अतिरिक्त वैश्विक सरचार्ज की घोषणा की, जिसे अगले ही दिन बढ़ाकर 15% कर दिया गया। ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘हास्यास्पद’, ‘बेहद खराब तरीके से लिखा गया’ और ‘असाधारण रूप से अमेरिका विरोधी’ बताकर न सिर्फ कोर्ट की वैधता पर हमला बोला, बल्कि यह भी संकेत दिया कि वह किसी भी संस्थागत अंकुश को राजनीतिक संघर्ष में बदल देंगे।
हालांकि, धारा 122, IEEPA की तरह असीमित गुंजाइश नहीं देती। इसके तहत अधिकतम 15% तक ही शुल्क लगाया जा सकता है और इसकी अवधि भी 150 दिन तक सीमित है। इसे बढ़ाने के लिए कांग्रेस की स्वीकृति जरूरी है। इस तरह धारा 122 के तहत लगा 15% वैश्विक टैरिफ 24 फरवरी से लागू होकर जुलाई के आखिर तक खुद ही खत्म हो जाएगा, जब तक कि कांग्रेस उसे आगे न बढ़ाए।
भारत के लिए क्यों है यह फैसला अहम?
यह फैसला भारत के लिए कई मायनों में अहम है। पिछले दिनों भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की बातचीत चल रही थी, जहां भारत पर 18% टैरिफ का प्रस्ताव था। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके बाद ट्रंप के 15% ग्लोबल टैरिफ ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया है।
यह फैसला दर्शाता है कि अमेरिका में संस्थागत व्यवस्था अभी भी कारगर है और किसी एक नेता की मर्जी से अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का पुनर्लेखन संभव नहीं है। ऐसे में, भारत इस गुंजाइश का इस्तेमाल अपने निर्यातकों के लिए बेहतर पहुंच, नियामकीय स्पष्टता और बहुपक्षीय मंचों पर ज्यादा सक्रिय भूमिका के लिए कर सकता है। यह फैसला अमेरिकी घरेलू राजनीति की घटना न रहकर भारत की दीर्घकालिक आर्थिक कूटनीति के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकता है।
भारत सरकार ने पहले ही कहा है कि वह अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके बाद के सभी घटनाक्रमों का गहराई से अध्ययन कर रही है। कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री ने साफ किया है कि हर डेवलपमेंट पर नजर रखी जा रही है। अब देखना यह है कि भारत इस कानूनी जीत को व्यापारिक सौदेबाजी में कैसे बदलता है।
मुख्य बातें (Key Points)
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने IEEPA के तहत ट्रंप के टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया।
इस फैसले से ट्रंप प्रशासन की मनमानी टैरिफ नीति पर संस्थागत अंकुश लगा है।
ट्रंप ने जवाब में ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 के तहत 150 दिनों के लिए 15% ग्लोबल टैरिफ लगाया।
भारत के लिए यह फैसला राहत और नई सौदेबाजी की संभावनाएं लेकर आया है, जिससे आर्थिक कूटनीति मजबूत हो सकती है।








