Social Media Ban For Children: आज बात एक ऐसे मुद्दे की जो हर घर से जुड़ा है, हर माता-पिता की चिंता है और हर बच्चे के भविष्य का सवाल है। क्या 15 या 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंस्टाग्राम, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बैन होने वाले हैं? क्या भारत भी ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस की राह पर चलने जा रहा है? इंडिया एआई समिट में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की एक टिप्पणी ने इस बहस को और तेज कर दिया है। मैक्रों ने साफ कहा कि फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन की तैयारी है और उन्होंने भारत से भी इसी तरह के कदम की उम्मीद जताई ।
क्यों उठ रहा है यह मुद्दा?
दुनिया भर में बच्चों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और ऑनलाइन खतरों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। सोशल मीडिया के एडिक्टिव एल्गोरिदम बच्चों में तनाव, नींद की कमी, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत, कम आत्मसम्मान, बॉडी इमेज से जुड़ी समस्याएं और यहां तक कि आत्महत्या जैसे खतरों को बढ़ा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने इन्हीं चिंताओं को देखते हुए दुनिया का पहला देश बनने का गौरव हासिल किया, जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया ।
ऑस्ट्रेलिया का मॉडल: कहां लागू, कहां छूट?
10 दिसंबर 2025 से ऑस्ट्रेलिया में यह कानून पूरी तरह लागू हो चुका है। इसके तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अकाउंट बनाने या रखने की अनुमति नहीं है। कंपनियों को सख्त उम्र सत्यापन लागू करना अनिवार्य किया गया है और नियम तोड़ने पर 49.5 मिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर (करीब 33 मिलियन अमेरिकी डॉलर) तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है ।
ऑस्ट्रेलिया के ई-सेफ्टी कमिश्नर ने जिन प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगाया है, उनमें शामिल हैं: फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब, स्नैपचैट, एक्स, रेडिट और ट्विच। इन प्लेटफॉर्म्स पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट डीएक्टिवेट या लॉक कर दिए गए हैं। हालांकि, कुछ ऐप्स को मैसेजिंग या गेमिंग फोकस्ड मानते हुए छूट दी गई है, जैसे व्हाट्सऐप, फेसबुक मैसेंजर, डिस्कॉर्ड, रोब्लॉक्स और पिनटेरेस्ट ।
फ्रांस और यूरोप की तैयारी
ऑस्ट्रेलिया के बाद अब कई देश इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। फ्रांस 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन का कानून बनाने की तैयारी कर रहा है। फ्रांस की संसद के निचले सदन ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसे अब सीनेट में पारित होना है। फ्रांस में पहले ही माता-पिता की सहमति के बिना 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया एक्सेस देने पर रोक लगा दी गई है । नॉर्वे, डेनमार्क और स्पेन भी इस तरह के कानून पर विचार कर रहे हैं । चीन में पहले से ही माइनर मोड लागू है, जहां उम्र के हिसाब से स्क्रीन टाइम और कंटेंट को ऐप स्तर पर ही ब्लॉक किया जाता है।
भारत में क्या स्थिति है?
भारत में फिलहाल सोशल मीडिया पर कोई देशव्यापी प्रतिबंध नहीं है। ज्यादातर प्लेटफॉर्म्स की न्यूनतम उम्र सीमा 13 साल है। लेकिन अब सरकार इस पर गंभीरता से विचार कर रही है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने साफ किया है कि समाज की सुरक्षा को लेकर सोशल मीडिया कंपनियों से बातचीत जारी है ।
कानूनी ढांचा: डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDPA), 2023 के तहत बच्चों (18 साल से कम) के पर्सनल डाटा को प्रोसेस करने के लिए माता-पिता की सत्यापन योग्य सहमति अनिवार्य है। साथ ही, बच्चों की ट्रैकिंग, बिहेवियरल मॉनिटरिंग और उन्हें टार्गेटेड एडवरटाइजिंग दिखाने पर भी रोक है। गैर-अनुपालन पर 200 करोड़ रुपए तक का जुर्माना हो सकता है ।
राज्यों की पहल: कर्नाटक सरकार ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 16 साल से कम उम्र के छात्रों के लिए मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की संभावना पर सभी राजकीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से राय मांगी है । सीएम ने कहा कि बच्चे सोशल मीडिया के प्रति जुनूनी होते जा रहे हैं और मोबाइल के जरिए नशीली दवाओं के संपर्क में भी आ रहे हैं, जो उनके भविष्य के लिए चिंता का विषय है ।
संसद में चर्चा: वहीं, आंध्र प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी टीडीपी के सांसद एलएसके देवरायालु ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन की मांग को लेकर निजी विधेयक पेश किया है। हालांकि यह सरकारी नीति नहीं है, लेकिन इससे संसद में बहस छिड़ सकती है ।
चुनौतियां और सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में इस तरह का प्रतिबंध लगाना आसान नहीं होगा और इसे कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
उम्र सत्यापन की समस्या: डिजिटल अधिकार कार्यकर्ता निखिल पहवा का कहना है कि उम्र सत्यापन इतना आसान नहीं है। इस तरह के प्रतिबंध का पालन करने के लिए, कंपनियों को इंटरनेट पर हर उपयोगकर्ता की पहचान सत्यापित करनी होगी । ऑस्ट्रेलिया में भी बच्चे फर्जी जन्मतिथि डालकर इस नियम को दरकिनार कर रहे हैं ।
राज्य स्तर पर प्रतिबंध की जटिलता: निकिल पहवा बताते हैं कि राज्य स्तर पर प्रतिबंध लगाना और भी जटिल है। “जहां राज्य की सीमाएं बहुत करीब हैं, वहां अगर एक राज्य सोशल मीडिया बैन करता है और दूसरा नहीं, तो टकराव पैदा हो सकता है” ।
प्लेटफॉर्म्स का सहयोग: टेक ग्लोबल इंस्टीट्यूट के प्रतीक वाघरे का कहना है कि प्रवर्तन प्लेटफॉर्म्स और बिचौलियों के सहयोग पर निर्भर करेगा। यह देखना बाकी है कि कंपनियां इस तरह के निर्देशों का पालन करेंगी या अदालत में चुनौती देंगी ।
माता-पिता की जिम्मेदारी: दिल्ली निवासी जितेंद्र यादव, जो दो बेटियों के पिता हैं, का मानना है कि असली समस्या कहीं और है। “माता-पिता खुद बच्चों को समय नहीं दे पाते और उन्हें व्यस्त रखने के लिए फोन थमा देते हैं – समस्या वहीं से शुरू होती है। मुझे नहीं लगता कि सोशल मीडिया प्रतिबंध से मदद मिलेगी। जब तक माता-पिता बच्चों को पर्याप्त समय नहीं देंगे या उन्हें रचनात्मक रूप से व्यस्त रखना नहीं सीखेंगे, वे हमेशा ऐसे प्रतिबंधों को दरकिनार करने के रास्ते खोज ही लेंगे” ।
आगे क्या?
तो सवाल बड़ा है: क्या सोशल मीडिया पर उम्र आधारित सख्त बैन ही बच्चों की सुरक्षा का एकमात्र रास्ता है, या फिर डिजिटल साक्षरता, पैरेंटल कंट्रोल और जिम्मेदार टेक्नोलॉजी डिजाइन इसका बेहतर समाधान हो सकते हैं? लेकिन इतना तय है कि दुनिया बदल रही है, कानून बदल रहे हैं और अब सोशल मीडिया कंपनियों पर भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर दबाव बढ़ता जा रहा है। क्या भारत भी जल्द बड़ा फैसला लेगा? फिलहाल सरकार सभी पहलुओं पर विचार कर रही है और आने वाला समय बताएगा कि भारत किस राह पर चलता है।
मुख्य बातें (Key Points)
ऑस्ट्रेलिया 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। इसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, स्नैपचैट जैसे 10 प्लेटफॉर्म शामिल हैं ।
फ्रांस 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए ऐसा ही कानून बनाने जा रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने भारत से भी ऐसा करने की अपील की है ।
भारत में डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के तहत बच्चों के डाटा प्रोसेसिंग के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य है ।
कर्नाटक सरकार 16 साल से कम उम्र के छात्रों के लिए मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध पर विचार कर रही है ।
विशेषज्ञों का मानना है कि उम्र सत्यापन और राज्य स्तर पर प्रतिबंध लागू करना भारत के लिए बड़ी चुनौती होगी ।








