Maharashtra Politics: महाराष्ट्र में एक बार फिर बड़ा सियासी खेल हो गया है और इस खेल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बड़ा झटका लगा है। वहां की राजनीति में एक बार फिर लोकल बॉडी की लड़ाई ने बड़ा सियासी संदेश दे दिया है। ठिकाना है भिवंडी, जहां सत्ता का खेल इतना दिलचस्प मोड़ ले गया कि भाजपा के अपने ही बागी नेता नारायण चौधरी कांग्रेस और शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी-शरद पवार गुट) के समर्थन से मेयर की कुर्सी तक पहुंच गए।
भिवंडी निगम चुनाव में क्या था समीकरण?
दरअसल जनवरी में हुए भिवंडी निजामपुर नगर निगम (बीएनएमसी) के चुनाव में 90 सीटों के लिए वोटिंग हुई थी। लेकिन किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। बहुमत का जादुई आंकड़ा 46 था, जो किसी के पास नहीं था। नतीजों में कांग्रेस 30 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा को 22 सीटें मिलीं, जबकि शिवसेना ने 12 सीटों पर जीत दर्ज की। समाजवादी पार्टी (सपा) को छह, पूर्णाग विकास आघाड़ी को पांच और भिवंडी विकास आघाड़ी को तीन सीटें मिलीं। ऐसे में मेयर का चुनाव सिर्फ संख्या का खेल नहीं, बल्कि रणनीति और रिश्तों की परीक्षा बन गया। और यहीं से शुरू हुई सियासी पलट-कथा।
भाजपा का वो फैसला जो भारी पड़ा
भाजपा ने पहले नारायण चौधरी को मेयर पद का उम्मीदवार घोषित किया था। लेकिन ऐन वक्त पर उनका टिकट काटकर स्नेहा पाटिल को मैदान में उतार दिया। यही फैसला पार्टी के लिए भारी पड़ गया। टिकट कटने से नारायण चौधरी नाराज हो गए और उन्होंने बगावत का रास्ता चुन लिया। उन्होंने कुछ अन्य भाजपा पार्षदों के साथ मिलकर अलग समूह बना लिया और कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार गुट) और समाजवादी पार्टी के ‘सेकुलर फ्रंट’ को समर्थन दे दिया।
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कैसे हुआ मेयर का चुनाव और क्या रहा नतीजा?
20 फरवरी को दोपहर 12 बजे विलासराव देशमुख ऑडिटोरियम में मेयर पद के लिए मतदान हुआ और नतीजा चौंकाने वाला रहा। नारायण चौधरी को 48 वोट मिले, जो बहुमत के आंकड़े (46) से दो अधिक हैं। भाजपा की स्नेहा पाटिल को सिर्फ 16 वोट मिले, जबकि कोडाक विकास आघाड़ी के विलास पाटिल को 25 वोट प्राप्त हुए। डिप्टी मेयर पद पर कांग्रेस के मोमिन तारिक बारी 43 वोट पाकर निर्वाचित हुए।
किसने क्या कहा?
इस जीत के बाद एनसीपी (शरद पवार गुट) के लोकसभा सांसद सुरेश म्हात्रे, जिन्हें ‘बलिया मामा’ के नाम से भी जाना जाता है, ने इसे जनता की जीत बताया और कहा कि हालात ऐसे थे कि सेकुलर फ्रंट बनाना जरूरी था। समाजवादी पार्टी के विधायक रईस शेख ने भी खुलकर इस गठबंधन का समर्थन किया। राज्य कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने साफ किया कि कांग्रेस ने भाजपा या एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना से हाथ न मिलाकर अपने वैचारिक रुख से समझौता नहीं किया।
वहीं भाजपा की तरफ से सख्त प्रतिक्रिया आई। राज्य भाजपा अध्यक्ष रवींद्र चौहान ने कहा कि नारायण चौधरी ने पार्टी लाइन का उल्लंघन किया है और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
भिवंडी की लड़ाई का बड़ा सियासी मतलब
भिवंडी की यह सियासी हलचल सिर्फ एक नगर निगम तक सीमित नहीं है। यह महाराष्ट्र की बदलती राजनीतिक बिसात का संकेत भी है। यहां स्थानीय स्तर पर वैचारिक रेखाएं धुंधली होती दिख रही हैं और समीकरण, विकास, वर्चस्व और नेतृत्व की लड़ाई के आधार पर बन रहे हैं।
खास बात यह भी है कि नारायण चौधरी पहले कांग्रेस में थे, फिर भाजपा में शामिल हुए और अब कांग्रेस, एनसीपी और सपा के समर्थन से मेयर बने हैं। यानी भिवंडी की राजनीति में ‘घर वापसी’ की भी चर्चा तेज है। मेयर बनने के बाद नारायण चौधरी ने कहा, “स्थानीय राजनीति आप जानते हैं, मैं सिर्फ विकास पर काम करूंगा।” लेकिन सवाल यह है कि क्या यह गठबंधन स्थिर रहेगा? क्या भाजपा अपने बागियों पर सख्त कार्रवाई करेगी? और सबसे अहम, क्या भिवंडी का यह सेकुलर फ्रंट महाराष्ट्र की बड़ी राजनीति में भी कोई नया संकेत दे रहा है?
भिवंडी से उठी यह सियासी चिंगारी आने वाले दिनों में और किस रूप में दिखेगी, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। फिलहाल इतना तय है कि स्थानीय चुनावों में भी राजनीति अब पूरी तरह से हाई वोल्टेज हो चुकी है।
मुख्य बातें (Key Points)
भिवंडी निजामपुर नगर निगम (बीएनएमसी) के मेयर चुनाव में भाजपा के बागी नेता नारायण चौधरी ने जीत दर्ज की।
भाजपा ने ऐन वक्त पर नारायण चौधरी का टिकट काटकर स्नेहा पाटिल को उम्मीदवार बनाया था, जिससे नाराज होकर उन्होंने बगावत कर दी।
नारायण चौधरी को कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार गुट) और समाजवादी पार्टी के ‘सेकुलर फ्रंट’ ने समर्थन दिया।
उन्हें 48 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार को सिर्फ 16 वोट से संतोष करना पड़ा।
भाजपा ने नारायण चौधरी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही है।








