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The News Air - Breaking News - Bharat Bandh Dispute: शशि थरूर का राहुल गांधी से खुला मतभेद, पार्टी लाइन से हटकर बोले वरिष्ठ नेता

Bharat Bandh Dispute: शशि थरूर का राहुल गांधी से खुला मतभेद, पार्टी लाइन से हटकर बोले वरिष्ठ नेता

केरल बंद को 'संगठित अत्याचार' बताते हुए शशि थरूर ने पार्टी स्टैंड से अलग रुख अपनाया, राहुल गांधी के समर्थन पर उठाए सवाल

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
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Bharat Bandh Dispute
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Bharat Bandh Congress stand को लेकर गुरुवार को कांग्रेस के अंदर ही एक नई बहस छिड़ गई। जहां एक तरफ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को इस देशव्यापी हड़ताल का समर्थन प्राप्त था, वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने इस बंद को लेकर न सिर्फ नाराजगी जताई, बल्कि इसे ‘दूसरों की आजादी पर हमला’ करार दे दिया। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर हुई इस हड़ताल में देशभर के करीब 30 करोड़ कामगार शामिल हुए, लेकिन थरूर का बयान पार्टी की आधिकारिक सोच से इतर माना जा रहा है।


‘केरल बंद’ बना ‘भारत बंद’ का पर्याय, थरूर ने जताई निराशा

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साफ किया कि आज का तथाकथित भारत बंद असल में सिर्फ एक और केरल बंद बनकर रह गया है। उन्होंने लिखा, यह दुख की बात है कि जहां बाकी भारत जबरदस्ती के विरोध प्रदर्शनों से आगे निकल चुका है, वहीं केरल आज भी खासतौर पर अल्पसंख्यकों के असंगठित बहुमत पर इस संगठित अत्याचार का बंधक बना हुआ है। थरूर के इस बयान को केरल की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर एक करारा कटाक्ष माना जा रहा है।

विरोध का अधिकार या रुकावट डालने का अधिकार? थरूर ने खींची लकीर

अपने लंबे राजनीतिक करियर का जिक्र करते हुए थरूर ने स्पष्ट किया कि उनका स्टैंड हमेशा एक जैसा रहा है। उन्होंने कहा, “मैं विरोध करने के अधिकार का समर्थन करता हूं, लेकिन रुकावट डालने के अधिकार का नहीं।” उन्होंने संवैधानिक पहलू पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी भारतीय को किसी दूसरे के आने-जाने की आजादी में रुकावट डालने का संवैधानिक अधिकार बिल्कुल नहीं है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब हड़ताल के दौरान कई राज्यों में सड़कों पर जाम और सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा।

‘मसल पावर’ से बिजनेस भगाने वाली आदत छोड़ने का वक्त

शशि थरूर ने अपने बयान में केरल की औद्योगिक नीतियों पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि हमने अपने मिलिटेंट यूनियनवाद (उग्र संघवाद) से इंडस्ट्री को दूर भगा दिया है। अब मसल पावर (ताकत के बल) के इन पुराने तरीकों से चिपके रहकर, जिसमें नागरिकों को उनके घरों में कैदी की तरह बंद कर दिया जाता है और दुकानदारों को दुकानें बंद करने पर मजबूर किया जाता है, हम यह पक्का कर रहे हैं कि हमारा राज्य युवाओं और बिजनेस के लिए अच्छा न रहे।

उन्होंने आग्रह किया, “अब वक्त आ गया है कि हम खुद इस नुकसान पहुंचाने वाली आदत से बाहर निकलें और इसे कंस्ट्रक्टिव असहमति (रचनात्मक असहमति) से बदलें।”


जब अपनी ही पार्टी उठ खड़ी होती है सवालों के घेरे में

यह पूरा मामला सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर बढ़ रहे वैचारिक मतभेदों की तस्वीर पेश करता है। एक तरफ संगठन और विपक्ष की सीट पर बैठे नेता जनहित के नाम पर हड़ताल को समर्थन दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ अपनी ही पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद इसे ‘अत्याचार’ और ‘नागरिक आजादी पर हमला’ बता रहे हैं। यह वह बिंदु है जहां थरूर ने न सिर्फ ट्रेड यूनियनों, बल्कि परोक्ष रूप से अपनी पार्टी की उस विचारधारा पर भी सवाल उठा दिया है जो इस तरह के आंदोलनों को शक्ति प्रदान करती है।

आम आदमी की आजादी बनाम संगठित ताकत

थरूर ने सबसे अहम सवाल उठाया कि आखिर विरोध प्रदर्शन की सीमा कहां तक होनी चाहिए। उनके मुताबिक, किसी राज्य को पंगू बनाना, रोजमर्रा की जिंदगी, कॉमर्स और आने-जाने में रुकावट डालना सीधे तौर पर आम नागरिक की आजादी पर हमला है।

आम पाठक पर असर: इस खबर का सीधा असर आप जैसे आम नागरिक पर पड़ता है। जब बंद या हड़ताल के नाम पर सड़कें जाम की जाती हैं, दुकानें जबरदस्ती बंद करवाई जाती हैं, तो सबसे ज्यादा परेशानी आपको ही होती है। डॉक्टर के पास जाना हो, बच्चे का स्कूल हो या ऑफिस की नौकरी, हर तरफ अड़चन आती है। थरूर ने उसी मासूम आम आदमी की आवाज बुलंद की है, जो इन राजनीतिक-संघीय लड़ाइयों में बेजा परेशान होता है।

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केरल की छवि को लेकर थरूर की चिंता

तिरुवनंतपुरम से सांसद होने के नाते शशि थरूर ने केरल की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि केरल की इज्जत को मिलिटेंट यूनियनिज्म से काफी नुकसान हुआ है, जो फैक्ट्री फ्लोर से निकलकर अब सड़कों और घरों तक फैल चुका है। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, “हम पुराने जमाने के आंदोलन को मानते हुए एक मॉडर्न इन्वेस्टर फ्रेंडली जगह बनने की उम्मीद नहीं कर सकते।” उनके इस बयान से साफ है कि वह केरल को वैश्विक निवेशकों के लिए बेहतर मंच बनाना चाहते हैं, लेकिन पुरानी सोच उसमें बाधा बन रही है।

असहमति और आजादी के बीच संतुलन जरूरी

अपनी बात को विराम देते हुए थरूर ने एक बार फिर दोहराया, “आइए हम असहमति के अधिकार का सम्मान करें, लेकिन हमें असहमत होने के अधिकार और काम करने तथा घूमने की आजादी का भी जोरदार बचाव करना चाहिए।” उन्होंने स्पष्ट किया कि विरोध एक नैतिक बात होनी चाहिए, न कि कोई फिजिकल नाकाबंदी। यानी विरोध का तरीका ही विरोध के मकसद को कमजोर न कर दे, यही उनकी मुख्य दलील है।


‘जानें पूरा मामला’

दरअसल, गुरुवार को हुआ भारत बंद केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ संयुक्त ट्रेड यूनियनों का एक बड़ा प्रदर्शन था। बैंकिंग, बिजली, परिवहन, स्वास्थ्य और गैस-पानी आपूर्ति सहित कई अहम सेवाओं पर इसका असर देखा गया। कांग्रेस पार्टी का आधिकारिक रुख इस बंद के समर्थन में था और राहुल गांधी ने भी इसे अपना समर्थन दिया था। ऐसे में शशि थरूर का अलग रुख सामने आना पार्टी के अंदर एक अलग विचारधारा को दर्शाता है, जहां वे सार्वजनिक जीवन को ठप करने वाले आंदोलनों के खिलाफ लगातार मुखर रहे हैं।


मुख्य बातें (Key Points)
  • शशि थरूर ने भारत बंद का विरोध करते हुए इसे ‘संगठित अत्याचार’ और ‘नागरिक आजादी पर हमला’ बताया।

  • उन्होंने राहुल गांधी के समर्थन से अलग रुख अपनाते हुए कहा कि विरोध का अधिकार, रुकावट डालने का अधिकार नहीं है।

  • थरूर ने केरल में मिलिटेंट यूनियनवाद को राज्य के विकास और निवेश में सबसे बड़ा रोड़ा करार दिया।

  • उन्होंने साफ किया कि विरोध नैतिक होना चाहिए, शारीरिक नाकाबंदी से आम नागरिक की आजादी छिनती है।

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