Adani Group US Sanctions Iran Probe: भारत के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में से एक अडानी ग्रुप पर अमेरिका का शिकंजा और कसता जा रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के Office of Foreign Assets Control (OFAC) ने अडानी एंटरप्राइजेज के खिलाफ ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों (Sanctions) के संभावित उल्लंघन की औपचारिक सिविल जांच शुरू कर दी है। यह जांच कथित रूप से ईरान से Liquefied Petroleum Gas (LPG) के आयात पर केंद्रित है। 4 फरवरी 2026 को कंपनी को ईमेल के जरिए Request for Information (RFI) भेजा गया, जिसमें आंतरिक रिकॉर्ड और शिपिंग डेटा की मांग की गई है।
यह जांच उस $265 मिलियन (करीब 2,200 करोड़ रुपये) के रिश्वत मामले से बिल्कुल अलग है जिसमें अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (SEC) पहले से गौतम अडानी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर मुकदमा चला रहे हैं। ईरान प्रतिबंध उल्लंघन की यह नई जांच अडानी समूह की अमेरिका में बढ़ती कानूनी मुश्किलों को और गहरा कर देती है।
OFAC ने क्या कहा — जांच का दायरा कितना बड़ा?
OFAC ने अपनी जांच में संकेत दिया है कि वह अडानी एंटरप्राइजेज के उन लेनदेन की जांच कर रही है जो अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के जरिए प्रोसेस हुए और जिनमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ईरान या ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले व्यक्तियों के हित शामिल हो सकते हैं।
अमेरिकी संघीय अधिकारी विशेष रूप से जून 2023 से अब तक की शिपमेंट्स की जांच कर रहे हैं। ये लेनदेन सबसे पहले वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रिपोर्ट किए थे। OFAC आमतौर पर चल रही जांच की सार्वजनिक घोषणा नहीं करता, लेकिन इस बार कंपनी को नियामक दायित्वों के तहत भारतीय शेयर बाजारों को इस संघीय जांच की जानकारी देनी पड़ी, जिससे यह मामला सार्वजनिक हुआ।
‘शैडो फ्लीट’ ऑपरेशंस पर है अमेरिका की नजर
यह जांच अमेरिका के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है जिसमें “शैडो फ्लीट” ऑपरेशंस पर शिकंजा कसा जा रहा है। शैडो फ्लीट उन टैंकरों के नेटवर्क को कहते हैं जो शिप-टू-शिप ट्रांसफर और ट्रांसपोंडर्स को बंद करके प्रतिबंधित तेल के मूल स्रोत को छिपाते हैं।
अमेरिकी प्रतिबंध कानून के तहत, विदेशी संस्थाओं को गंभीर दंड का सामना करना पड़ सकता है — जिसमें अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से पूरी तरह काट दिया जाना शामिल है — अगर यह पाया जाता है कि उन्होंने ईरान के ऊर्जा क्षेत्र को भौतिक रूप से सहायता प्रदान की या समर्थन दिया।
RFI का मतलब क्या — क्या यह दोषी ठहराना है?
एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि Request for Information (RFI) भेजना किसी सिविल जांच में एक मानक तथ्य-खोजी कदम है और यह किसी अंतिम दोष निर्धारण (finding of guilt) के बराबर नहीं है। हालांकि, यह इस बात का संकेत जरूर है कि अमेरिकी अधिकारियों ने पर्याप्त कारण (sufficient cause) जुटा लिया है कि कंपनी से आंतरिक रिकॉर्ड और शिपिंग डेटा की मांग की जा सके ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि उल्लंघन हुआ या नहीं।
10 फरवरी 2026 तक, अमेरिकी सरकार ने अडानी एंटरप्राइजेज को Specially Designated Nationals (SDN) लिस्ट में नहीं डाला है और इस विशेष मामले में कोई जुर्माना भी नहीं लगाया है। OFAC की जांच गोपनीय प्रशासनिक प्रक्रियाएं होती हैं और आमतौर पर तब तक सार्वजनिक नहीं होतीं जब तक कि कोई समझौता (settlement) न हो जाए या जुर्माना न लगा दिया जाए।
रिश्वत केस — पहले से चल रही दूसरी बड़ी कानूनी लड़ाई
ईरान प्रतिबंध जांच अडानी समूह की अमेरिका में पहली कानूनी मुसीबत नहीं है। एक अलग और कहीं ज्यादा आगे बढ़ चुके आपराधिक मामले में, अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और Securities and Exchange Commission (SEC) गौतम अडानी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर कथित $265 मिलियन की रिश्वत योजना के लिए मुकदमा चला रहे हैं।
नवंबर 2024 में न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालय ने इस आरोप पत्र को सार्वजनिक किया था। इसमें अधिकारियों पर सिक्योरिटीज फ्रॉड (प्रतिभूति धोखाधड़ी), वायर फ्रॉड (तार धोखाधड़ी) और षड्यंत्र के आरोप लगाए गए हैं। संघीय अभियोजकों का आरोप है कि आरोपियों ने आकर्षक सोलर ऊर्जा ठेके हासिल करने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को भारी रिश्वत दी और इसके बाद अमेरिकी निवेशकों से अरबों डॉलर की पूंजी जुटाने के लिए झूठ बोला।
एक साल का गतिरोध खत्म — कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी
जनवरी 2026 के अंत में इस मामले में एक अहम प्रगति हुई जब आरोपी अधिकारियों ने कानूनी समन की तामील स्वीकार करने पर सहमति जताई। इससे मोदी सरकार और अमेरिकी अदालतों के बीच एक साल से चल रहा प्रक्रियात्मक गतिरोध समाप्त हुआ। अगर दोषी ठहराए जाते हैं तो आरोपियों को लंबी जेल की सजा और भारी वित्तीय दंड का सामना करना पड़ सकता है।
आम निवेशक और भारत पर क्या असर?
अडानी ग्रुप पर अमेरिका की यह दोहरी कानूनी कार्रवाई — एक तरफ ईरान प्रतिबंध उल्लंघन की जांच और दूसरी तरफ $265 मिलियन का रिश्वत मुकदमा — भारतीय शेयर बाजार और आम निवेशकों के लिए चिंता का विषय है। अडानी ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में पहले भी हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद भारी गिरावट आ चुकी है। अगर OFAC की जांच में उल्लंघन साबित होता है तो अडानी ग्रुप को अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से काट दिया जा सकता है, जिसका असर कंपनी की अंतरराष्ट्रीय फंडिंग और कारोबार पर सीधा पड़ेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाने वाले इस भारतीय समूह पर अमेरिका की बढ़ती नियामक कार्रवाई भारत-अमेरिका संबंधों पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ा सकती है।
मुख्य बातें (Key Points)
- OFAC ने अडानी एंटरप्राइजेज के खिलाफ ईरान प्रतिबंध उल्लंघन की औपचारिक सिविल जांच शुरू की — 4 फरवरी 2026 को कंपनी को RFI भेजा गया
- जांच जून 2023 से अब तक की शिपमेंट्स पर केंद्रित है — अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के जरिए ईरानी LPG के कथित लेनदेन की जांच हो रही है
- यह $265 मिलियन के रिश्वत मामले से बिल्कुल अलग जांच है — DOJ और SEC पहले से गौतम अडानी पर आपराधिक मुकदमा चला रहे हैं
- अभी तक अडानी को SDN लिस्ट में नहीं डाला गया और कोई जुर्माना नहीं लगाया गया — RFI एक मानक तथ्य-खोजी कदम है
- अगर उल्लंघन साबित होता है तो कंपनी को अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से काटा जा सकता है — जो अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर भारी असर डालेगा








