Om Birla No Confidence Motion को लेकर संसद की राजनीति में बड़ा मोड़ आ गया है। लोकसभा स्पीकर Om Birla ने विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के बीच सदन की कार्यवाही से खुद को अलग रखने का फैसला किया है। यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब बजट सत्र 2026 के दौरान संसद पहले से ही भारी हंगामे और गतिरोध का सामना कर रही है।
स्पीकर ओम बिरला ने साफ कर दिया है कि जब तक उनके खिलाफ दिए गए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक वह लोकसभा की कार्यवाही का संचालन नहीं करेंगे। इस फैसले को उन्होंने नैतिक आधार से जोड़ा है और इसे विपक्ष के आरोपों के जवाब में एक सख्त लेकिन संवैधानिक कदम बताया जा रहा है।
अविश्वास प्रस्ताव से शुरू हुआ पूरा विवाद
मंगलवार को विपक्षी दलों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंपा। इस नोटिस पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके समेत कई विपक्षी दलों के कुल 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। संसदीय नियमों के मुताबिक, स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं, ऐसे में यह प्रस्ताव तकनीकी रूप से वैध माना जा रहा है।
नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंपे जाने के बाद से ही संसद में माहौल और ज्यादा गरमा गया। इसके ठीक बाद मंगलवार को जब लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, तो स्पीकर ओम बिरला सदन में नजर नहीं आए। तभी यह संकेत मिलने लगा था कि इस मामले में कोई बड़ा फैसला आने वाला है।
स्पीकर का नैतिक आधार पर फैसला
सूत्रों के मुताबिक, ओम बिरला का मानना है कि जब सदन के अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लंबित हो, तो उनके लिए कार्यवाही चलाना नैतिक रूप से उचित नहीं है। इसी सोच के तहत उन्होंने यह निर्णय लिया कि जब तक नोटिस पर फैसला नहीं हो जाता, वह लोकसभा नहीं जाएंगे और न ही स्पीकर की कुर्सी पर बैठेंगे।
इस फैसले को विपक्ष के लिए एक सख्त संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है। एक तरह से स्पीकर ने यह साफ कर दिया है कि यदि उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई है, तो वह स्वयं को कार्यवाही से अलग रखेंगे और अंतिम निर्णय के बाद ही अगला कदम तय करेंगे।
राहुल गांधी ने क्यों नहीं किए हस्ताक्षर
इस पूरे मामले में एक अहम बात यह भी रही कि नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi ने अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को देखते हुए राहुल गांधी ने स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर साइन करना उचित नहीं समझा।
हालांकि विपक्ष के अन्य सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन राहुल गांधी की दूरी ने इस राजनीतिक घटनाक्रम को और ज्यादा चर्चा में ला दिया है। कांग्रेस के भीतर भी इस फैसले को लेकर अलग-अलग राय देखने को मिल रही है।
बजट सत्र में पहले से जारी था गतिरोध
यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब संसद का बजट सत्र पहले से ही लगातार बाधित हो रहा है। इससे पहले प्रश्नकाल के दौरान विपक्ष के हंगामे के कारण कार्यवाही ठप रही थी। स्पीकर की अनुपस्थिति में सदन की अध्यक्षता करने वाले सदस्य पीसी मोहन ने कुछ ही मिनटों के भीतर कार्यवाही स्थगित कर दी थी।
इसके बाद दोबारा सदन बैठा, लेकिन हंगामा जारी रहने के कारण फिर से कार्यवाही रोकनी पड़ी। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्षी सांसदों से बजट पर चर्चा होने देने की अपील भी की थी, लेकिन विपक्ष अपने रुख पर कायम रहा।
विवाद की पृष्ठभूमि क्या है
विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ओम बिरला ने सदन में कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया। खासतौर पर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान विपक्षी नेताओं को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिए जाने का आरोप लगाया गया है।
इसके अलावा हाल के दिनों में आठ विपक्षी सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए निलंबित किया गया था। इस कार्रवाई के बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं ने संसद परिसर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था। तभी से स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की रणनीति पर काम शुरू हो गया था।
अनुच्छेद 94(c) के तहत क्या है नियम
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रावधान है। इसके लिए सदन में प्रस्ताव लाया जाता है और उस पर बहुमत से निर्णय लिया जाता है। हालांकि इस प्रक्रिया में समय लगता है और अंतिम फैसला सदन के मत विभाजन के बाद ही होता है।
जब तक इस प्रस्ताव पर विचार नहीं हो जाता, तब तक स्पीकर अपने पद पर बने रहते हैं। लेकिन ओम बिरला ने इससे अलग रास्ता अपनाते हुए स्वयं को कार्यवाही से अलग रखने का फैसला किया है, जो कि संसदीय इतिहास में एक असामान्य लेकिन चर्चित कदम माना जा रहा है।
राजनीतिक मायने क्या हैं
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए रणनीतिक रूप से अहम है। विपक्ष इसे अपनी नैतिक जीत के तौर पर पेश कर सकता है, जबकि सरकार इसे विपक्ष के दबाव की राजनीति के रूप में दिखाने की कोशिश करेगी।
साथ ही, यह सवाल भी उठ रहा है कि स्पीकर की अनुपस्थिति में सदन की कार्यवाही कैसे आगे बढ़ेगी और बजट सत्र का भविष्य क्या होगा। अगर गतिरोध लंबा चला, तो इसका सीधा असर कानून निर्माण और वित्तीय कामकाज पर पड़ेगा।
आगे क्या हो सकता है
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि लोकसभा महासचिव अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर कब और कैसे निर्णय लेते हैं। अगर नोटिस स्वीकार होता है, तो आगे की प्रक्रिया शुरू होगी। वहीं अगर नोटिस खारिज होता है, तो ओम बिरला के दोबारा सदन में लौटने का रास्ता साफ हो जाएगा।
फिलहाल, संसद की राजनीति में यह मुद्दा सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बन चुका है और आने वाले दिनों में इस पर और तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
मुख्य बातें (Key Points)
- लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही से दूरी बनाई
- विपक्ष ने 118 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ अविश्वास प्रस्ताव सौंपा
- राहुल गांधी ने नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए
- अनुच्छेद 94(c) के तहत स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया
- बजट सत्र 2026 में बढ़ता संसदीय गतिरोध








