Jaggery Farming Success Story बिहार के भोजपुर जिले से सामने आई है, जहां किसानों ने पारंपरिक खेती से हटकर ऐसा मॉडल खड़ा किया है, जो पूरे प्रदेश के लिए मिसाल बनता जा रहा है। आरा के संदेश प्रखंड अंतर्गत बागा पंचायत के नूरपुर गांव में गन्ना किसानों ने बिना किसी चीनी मिल और बिना किसी बिचौलिए के सीधे गुड़ बनाकर बेचने का रास्ता अपनाया है। इस प्रयोग ने न सिर्फ किसानों की आमदनी कई गुना बढ़ाई है, बल्कि गांव को पहचान भी दिलाई है।
आमतौर पर किसान जब फसल उगाते हैं, तो उसका बड़ा फायदा बिचौलिए ले जाते हैं। लेकिन नूरपुर गांव में तस्वीर बिल्कुल अलग है। यहां किसान खुद उत्पादक भी हैं और विक्रेता भी।
चीनी मिल नहीं, फिर भी गन्ने की पहचान
भोजपुर जिले या आसपास कहीं भी चीनी मिल नहीं है। इसके बावजूद नूरपुर गांव गन्ना की खेती और गुड़ उत्पादन के लिए जाना जाता है। गांव के आधा दर्जन किसान मिलकर गन्ने की खेती करते हैं और वहीं उसका शुद्ध गुड़ तैयार कर सीधे ग्राहकों को बेचते हैं।
यहां किसानों और ग्राहकों के बीच कोई बिचौलिया नहीं है। यही वजह है कि किसान को उसकी मेहनत का पूरा दाम मिल रहा है और ग्राहक को शुद्ध और ताजा गुड़।
₹100 किलो के गुड़ के लिए लगी रहती है भीड़
नूरपुर गांव में तैयार होने वाला ताजा गुड़ ₹100 प्रति किलो तक बिक रहा है। खास बात यह है कि इस कीमत पर भी खरीदारों की कमी नहीं है। जिले भर से लोग यहां गुड़ खरीदने पहुंचते हैं।
यहां मिलने वाला गुड़ सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि सेहत के लिहाज से भी पसंद किया जा रहा है। खासकर गुड़ का पाउडर, जिसे लोग चीनी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, उसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
धीरज सिंह से शुरू हुई बदलाव की कहानी
इस मॉडल के पीछे अहम भूमिका निभाने वाले प्रगतिशील किसान Dheeraj Singh हैं। वे पिछले दो वर्षों से नसीरगंज–सिकड्डी मुख्य सड़क किनारे अपने गांव में करीब तीन एकड़ जमीन पर गन्ने की खेती कर रहे हैं।
धीरज सिंह बताते हैं कि पहले वे भी परंपरागत खेती करते थे, लेकिन कोरोना काल के बाद चीनी की जगह गुड़ के बढ़ते इस्तेमाल ने उन्हें नई दिशा दिखाई। उन्हें लगा कि अगर सही तकनीक और सही मार्केटिंग हो, तो गन्ना और गुड़ से अच्छी आमदनी संभव है।
ट्रेनिंग ने बदली सोच और तरीका
उन्नत खेती और शुद्ध गुड़ निर्माण की बारीकियां समझने के लिए धीरज सिंह ने Rajendra Prasad Central Agricultural University में एक सप्ताह का प्रशिक्षण लिया।
इसके बाद बिहार गन्ना विभाग की पहल पर नूरपुर और फुलहाड़ी गांव के किसान, जिनमें बब्बन सिंह भी शामिल थे, प्रशिक्षण के लिए बाहर गए। किसानों ने गन्ने की रोपाई, लाइनिंग, मेंटेनेंस, उन्नत बीज चयन, रस निष्कर्षण, शुद्ध गुड़ निर्माण और पैकेजिंग की पूरी जानकारी हासिल की।
यूपी के शोध केंद्र से सीखी नई तकनीक
प्रशिक्षण का एक अहम हिस्सा उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर स्थित गन्ना शोध केंद्र में हुआ। यहां बिहार, शाहाबाद और मगध क्षेत्र के करीब 40 किसान पहुंचे।
किसानों को सिखाया गया कि कम लागत में ज्यादा मुनाफा कैसे कमाया जाए। पुरानी पद्धति से खेती करने पर जहां घाटा हो रहा था, वहीं नई तकनीक अपनाने से खेती फिर से फायदे का सौदा बन गई।
लागत कम, मुनाफा कई गुना
धीरज सिंह के मुताबिक, गन्ने की खेती में प्रति एकड़ करीब ₹1.5 लाख की लागत आती है। लेकिन गुड़ निर्माण और बिक्री के बाद इससे ₹12 लाख तक की आमदनी हो रही है।
वहीं किसान अजीत कुमार बताते हैं कि एक एकड़ में लगभग ₹1500 की शुरुआती लागत के बाद प्रति हेक्टेयर ₹1 लाख तक की कमाई संभव हो रही है। यह आंकड़े दिखाते हैं कि सही तकनीक और सीधी बिक्री से खेती कितनी लाभकारी हो सकती है।
खेत से सड़क तक दिखता है कारोबार
नूरपुर गांव में खेतों में तैयार हरी-भरी ईख और सड़क किनारे लगी गुड़ निर्माण इकाइयां राहगीरों का ध्यान खींचती हैं। लोग रुककर गुड़ खरीदते हैं और कई बार सीधे खेत से बने ताजे उत्पाद ले जाते हैं।
गुड़ निर्माण के दौरान ईख का रस निकालने के बाद बचा हुआ ढंडल भी बेकार नहीं जाता। इसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे लागत और कम हो जाती है।
सिर्फ गुड़ नहीं, कई वैल्यू एडेड प्रोडक्ट
नूरपुर गांव के किसान सिर्फ साधारण गुड़ तक सीमित नहीं हैं। वे जैगरी पाउडर, गुड़ की बर्फी, सौंफ गुड़, तिल गुड़, बादाम गुड़, गुड़ की चीनी और अदरखी जैसे कई उत्पाद तैयार कर रहे हैं।
इन सभी उत्पादों की खासियत है उनकी शुद्धता और स्वाद। यही वजह है कि बाजार में इनकी मांग लगातार बढ़ती जा रही है और ग्राहक बार-बार यहां लौटकर आते हैं।
बिचौलियों से आजादी, यही असली ताकत
इस पूरे मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि किसान पूरी तरह बिचौलियों से मुक्त हैं। उन्हें अपनी उपज का दाम खुद तय करने का अधिकार मिला है।
ग्राहक भी जानते हैं कि वे सीधे किसान से खरीद रहे हैं, इसलिए भरोसा बना रहता है। यह भरोसा ही नूरपुर गांव के गुड़ की सबसे बड़ी ब्रांड वैल्यू बन चुका है।
बिहार के लिए क्यों है यह मॉडल खास
यह कहानी सिर्फ नूरपुर गांव की नहीं, बल्कि पूरे बिहार के किसानों के लिए एक सीख है। जहां एक ओर किसान आय के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं यह मॉडल दिखाता है कि अगर उत्पादन के साथ प्रोसेसिंग और सीधी बिक्री जोड़ी जाए, तो खेती से सम्मानजनक कमाई संभव है।
आगे की योजना और उम्मीदें
अब नूरपुर गांव के किसान अपने उत्पादों को और बड़े बाजार तक पहुंचाने की योजना बना रहे हैं। पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर भी काम शुरू हो चुका है, ताकि गुड़ और उससे बने उत्पादों को राज्य के बाहर भी पहचान मिल सके।
मुख्य बातें (Key Points)
- आरा के नूरपुर गांव में बिना बिचौलिया गुड़ का कारोबार
- ₹100 किलो बिक रहा शुद्ध और ताजा गुड़
- प्रति एकड़ लाखों की आमदनी, लागत अपेक्षाकृत कम
- वैल्यू एडेड उत्पादों से बढ़ी किसानों की कमाई








