India US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच हुई व्यापार डील को लेकर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर जहां अमेरिका खुलकर कह रहा है कि इस डील से अमेरिकी किसानों के गांवों में कैश आएगा, उनके फार्म प्रोडक्ट्स भारत के विशाल बाजार में बिकेंगे, वहीं भारत के मंत्री साफ-साफ नहीं बता पा रहे हैं कि भारतीय किसानों को इससे क्या फायदा होगा। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि कोई बड़ी चीज अचानक से भारत के बाजार में नहीं आएगी। तो क्या कोई बड़ी चीज धीरे-धीरे आएगी? अगर खेती को लेकर कोई समझौता नहीं हुआ तो फिर अमेरिका की कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस इतनी खुश क्यों हैं? विपक्ष ने इसे “ट्रैप डील” करार दिया है और डील की पूरी डिटेल सार्वजनिक करने की मांग की है।
2 फरवरी की रात घोषणा हुई कि डील हो गई और आज 6 फरवरी है। लेकिन किसी को पता नहीं कि डील की शर्तें क्या हैं। जब लोगों ने पूछा तो जवाब बदलने लगे। पहले कहा गया अभी डिटेल वर्कआउट हो रहे हैं। फिर जवाब आया कि चार दिन तो लग ही जाएंगे साझा बयान आने में। लेकिन मार्च के मध्य में डील पर कानूनी रूप से साइन हो पाएगा। तो अभी क्या हुआ? इतनी जल्दी में माला क्यों पहना दी गई? एनडीए के सांसदों ने डील का ड्राफ्ट देखे बिना ही प्रधानमंत्री मोदी के गले में माला डाल दी। जैसे प्री वेडिंग पार्टी होती है, उसी तरह प्री डील पार्टी भी हो गई है।
अमेरिकी किसानों को 60 लाख की सब्सिडी, भारतीय किसानों को 6000 रुपये
स्टेट बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर भारत के डेयरी सेक्टर को अमेरिका के लिए खोल दिया गया तो भारत के किसानों को 1 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो जाएगा। यह रिपोर्ट पिछले साल जुलाई की है, जब यह बात चल रही थी कि अमेरिका चाहता है कि भारत अपने डेयरी सेक्टर को उसके लिए खोल दे।
भारत का कहना है कि डेयरी सेक्टर सुरक्षित है। लेकिन यही आश्वासन काफी नहीं। कांग्रेस के सांसद संसद भवन के परिसर में एक बैनर लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, जिस पर लिखा है “ट्रैप डील” यानी ऐसी डील जिसमें भारत फंस गया है। जब तक सरकार डील के डिटेल जारी नहीं करती, बिना डिटेल के जश्न मनाएगी तो विपक्ष भी सवाल करेगा।
भारत के किसानों को बताना चाहिए कि क्या उन्हें अब अमेरिका के किसानों से मुकाबले के लिए तैयार हो जाना चाहिए। और अगर वह दिन आ गया है तो क्या वे मुकाबला कर पाएंगे? अमेरिका में एक किसान को एक साल में औसतन 60 लाख रुपये के बराबर सब्सिडी मिलती है।
सचिन कुमार शर्मा, कमलिनी मुखर्जी, स्वायन नियोगी की एक रिपोर्ट है डाउन टू अर्थ में। इस रिपोर्ट में भारत और अमेरिका के कमोडिटी एग्रीकल्चर में मिलने वाली सब्सिडी की तुलना की गई है। भारत के किसानों की आय से 122 गुना ज्यादा सब्सिडी अमेरिका के किसानों को मिलती है। इतनी असमानता और अंतर है। क्या भारत का किसान अमेरिका के किसानों के सामने टिक पाएगा?
अमेरिकी किसानों को क्या-क्या मिलता है
2023 में एक किसान को अमेरिका में औसतन $183,488 की सब्सिडी मिली। यानी 1.5 करोड़ रुपये के करीब। कपास, चीनी, चावल, कॉफी वगैरह पर 50 से 215% तक की सब्सिडी मिलती है।
अब आपके सामने तस्वीर साफ हो जानी चाहिए कि भारत का किसान कहां खड़ा है और अमेरिका का किसान कहां है। भारत का किसान अमेरिका के किसानों का मुकाबला अपने दम पर नहीं कर सकता। प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत जो 6,000 रुपये मिलते हैं, उसके भरोसे अमेरिका के किसानों से मुकाबला नहीं कर सकता जिसे साल में 60 लाख से लेकर 5 करोड़ रुपये तक की सब्सिडी मिलती है।
इसीलिए जब डील की खबर आई तो यह सवाल उठने लगा कि बताइए खेती और डेयरी को लेकर क्या-क्या समझौता हुआ है?
मंत्रियों के आश्वासन और अमेरिका के दावे में अंतर
संसद में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने आश्वस्त किया है कि डेयरी सेक्टर के हितों को सुरक्षित रखा गया है। उन्होंने कहा, “इन वार्ताओं के दौरान भारतीय पक्ष अपने संवेदनशील क्षेत्रों, विशेषकर कृषि और दुग्ध क्षेत्रों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने में सफल रहा है।”
लेकिन अमेरिका की प्रेस सचिव कह रही हैं कि भारत अमेरिका से तेल लेगा। खेती, ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट में 500 बिलियन डॉलर का आयात करेगा। यह तो बहुत बड़ी राशि है। यह आखिर कैसी ट्रेड डील है कि सब कुछ भारत ही करेगा?
आयात के बारे में मीडिया से पीयूष गोयल ने कहा है कि भारत अमेरिका से हर साल 100 बिलियन डॉलर का सामान खरीदेगा। गोयल ने मीडिया को लगता है गोलगोल हिसाब समझाया है। कहा है कि बोइंग से इस समय ही जो ऑर्डर हैं और भविष्य में जो ऑर्डर दिए जाएंगे, वही मिलाकर 70 से 80 बिलियन डॉलर के हो जाते हैं। इसके अलावा इंजन और स्पेयर पार्ट्स वगैरह मिलाकर 100 बिलियन तो हो ही जाएंगे।
क्या गोयल कुछ छिपा रहे हैं? इस हिसाब से 100 बिलियन डॉलर तो केवल एक सेक्टर में खप जाएगा। अगर सारा पैसा बोइंग सेक्टर में, विमानन सेक्टर में खप रहा है, तब फिर अमेरिका की कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस क्यों जश्न मना रही हैं कि अमेरिका के किसानों के लिए यह बड़ी जीत है?
अमेरिकी कृषि सचिव का जश्न, भारतीय किसानों की चिंता
अमेरिकी एग्रीकल्चर सेक्रेटरी ब्रुक रोलिंस ने कहा, “New US India Deal will export more American farm products to India’s massive market, lifting prices and pumping cash into rural America.”
यानी अमेरिका के रूरल लोगों को, एग्रीकल्चरिस्ट को फायदा इससे मिलता है। वह बात साफ-साफ बता रही हैं कि अमेरिका के किसानों के पास कैश आएगा। कहां से आएगा? जाहिर है भारत के किसानों की कीमत पर आएगा। भारत के किसानों का कैश जाएगा तो उनकी हालत और खराब होगी।
भारत के मंत्री इस तरह की बात क्यों नहीं कर रहे हैं? सरकार इस स्टेज पर यही बात बार-बार कह रही है कि किसानों के हितों से समझौता नहीं किया गया। प्रेस नोट में अन्नदाता, जीवनदाता, किसान की सेवा, भगवान की पूजा जैसी बातें भर दी गई हैं। टेरिफ कम होने के कारण चावल, मसालों, टेक्सटाइल, कॉटन का निर्यात बढ़ेगा। कुल मिलाकर जनरल सी, भावुक सी बातें कही जा रही हैं। प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर नहीं मिल रहा।
फल-सब्जी का सेक्टर खुला या नहीं?
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अमेरिका के कृषि सचिव के बयान के बाद प्रेस नोट जारी किया। इसमें उन्होंने कहा है कि कृषि और डेयरी सेक्टर के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। लेकिन उन्होंने इस बयान में एक और बात कही है। कहा है कि “कोई बड़ी चीज अचानक से भारत के बाजार में नहीं आएगी।”
हमारी सभी मुख्य फसलें, मुख्य अनाज, फल और डेयरी सेक्टर सुरक्षित हैं और किसी भी ऐसे क्षेत्र के लिए बाजार नहीं खोला गया जो भारतीय किसानों के लिए नुकसानदेह हो। जब मंत्री जी को यह पता है कि किसी ऐसे क्षेत्र के लिए बाजार नहीं खोला गया है, तो यह भी पता होना चाहिए कि किस क्षेत्र के लिए बाजार खोला गया है। कम से कम अपने बयान में उसकी जानकारी दीजिए।
और उनका यह कहना कि “कोई बड़ी चीज अचानक भारत के बाजार में नहीं आएगी” चिंता पैदा करता है। वह कौन सी बड़ी चीज है जो भारत के बाजार में धीरे-धीरे आएगी? उसका क्या असर होगा?
भारत के कृषि मंत्री कह रहे हैं फल का सेक्टर सुरक्षित है। लेकिन अमेरिका के व्यापारिक प्रतिनिधि जेमिसन ग्रियर ने सीएनबीसी चैनल से कहा है कि कागज पर फाइनल करना रह गया है, लेकिन हमारे पास सारी डिटेल मौजूद है। एक तरफ हम भारत पर 18% टेरिफ जारी रखेंगे क्योंकि उनके साथ हमारा काफी बड़ा व्यापार घाटा है। दूसरी तरफ भारत हमारे लिए कई तरह के उत्पादों पर लगने वाला टेरिफ कम करने को राजी हो गया है। कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, केमिकल, मेडिकल डिवाइस इत्यादि को इसका लाभ होगा।
वे आगे कहते हैं कि भारत ने नट्स, फल, सब्जी, वाइन और स्पिरिट्स पर टेरिफ हटा दिया है, जो कि अमेरिका के किसानों के लिए बड़ी जीत है। उनके लिए एक अरब उपभोक्ताओं का बाजार खुल गया है।
भारत के मंत्री कहते हैं कि फल को टच नहीं किया गया। अमेरिका कह रहा है फल-सब्जी का सेक्टर खोल दिया गया है। हालांकि ग्रियर ने भी यह नहीं बताया कि भारत के बाजार में और कौन-कौन से नए सेक्टर अमेरिका के लिए खुल गए हैं। उन्होंने डेयरी, शुगर या चावल का नाम नहीं लिया।
कपास का उदाहरण: जब टेरिफ हटा तो क्या हुआ
पिछले साल अगस्त में भारत ने अमेरिका से आने वाले कपास पर जो टेरिफ लगता था, 11% उसे खत्म किया। जीरो कर दिया। कपास का आयात 95% बढ़ गया। 21 अगस्त 2025 की खबर है, जैसे ही भारत ने अमेरिका से आने वाले कपास पर आयात शुल्क जीरो किया, 2 दिन के भीतर कपास के दाम में 1,100 रुपये की कमी आ गई।
उस समय की एक और रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि अगर कपास के दाम गिरते रहे तो भारत के किसान कपास का उत्पादन छोड़ देंगे और भारत दाल और खाद्य तेलों की तरह कपास के आयात पर पूरी तरह निर्भर हो जाएगा।
दूसरी तरफ अमेरिका से आने वाला कपास सस्ता हुआ तो टेक्सटाइल कंपनियां खुश हो गईं। कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने 8.89 करोड़ का डिविडेंड दिया। उसका राजस्व बढ़ गया। टेक्सटाइल कंपनियों के मुनाफे और संघर्ष को आप अलग से देखिए और कपास के किसानों के संघर्ष और समस्या को अलग से। दोनों एक नहीं।
जब भारत ने कपास पर टेरिफ जीरो किया तब महाराष्ट्र में इसके खिलाफ प्रदर्शन हुए, जिसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।
भारतीय किसानों को 111 लाख करोड़ का नुकसान
पिछले 25 साल में OECD की जो रिपोर्ट है (ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट, जो कि दुनिया का रिचेस्ट ट्रेडिंग ब्लॉक है), उनकी जो रिपोर्ट कह रही है, वो कहती है कि इस 25 साल में भारत के किसानों को 111 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
इससे स्पष्ट हो जाना चाहिए कि एग्रीकल्चर किस क्राइसिस सिचुएशन से गुजर रहा है भारत में। और उसके ऊपर जब हम अपने बाजार को खोल देंगे तो ऑब्वियसली बाहर से जब सस्ता अनाज आएगा तो जैसा कि कहा गया है – “Importing food is importing unemployment.”
यह एक बात हमें जाननी है और दूसरी बात यह है कि “What India, a country like India needs is production by the masses, not production for the masses.” अगर बाहर से फ्रूट्स एंड वेजिटेबल्स आते हैं और हम अपने लोगों को सप्लाई करते हैं at a cheaper price also, तो that is not the kind of economic model जो हमारे देश को फॉलो करना चाहिए।
सेब, सोयाबीन और एथेनॉल की चिंता
अगर हम सेब की बात करें तो सेब इतनी बड़ी इकॉनमी है हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की। और वहां पर तो आज एक तरह का डर लोगों के अंदर है क्योंकि उनको दिखता है कि न्यूजीलैंड से सेब आएगा, यूरोपियन यूनियन से सेब आएगा। वो तो चलो फिर भी कम ड्यूटी पे आएगा। लेकिन यहां पर जो अगर अमेरिका को हमने कहीं जीरो ड्यूटी पे एग्री कर लिया तो आप देखिए यहां तो सारा फ्लड हो जाएगा।
अभी हमने देखा है कपास का। कपास का सितंबर या अक्टूबर में गवर्नमेंट ने ड्यूटीज को वेव ऑफ कर दिया। 11% ड्यूटी है जब बाहर से अमेरिका से कॉटन आता है तो उसके ऊपर 11% ड्यूटी हटा दी, जीरो पे आ गया। तो दिसंबर तक 30 लाख बेल्स कॉटन के भारत में आयात हुए। और ये हम जानते हैं कि ये इंडस्ट्री ने उसमें ये भी किया कि स्टॉकिंग कर ली। इसकी जितना ज्यादा मंगा सके उन्होंने मंगा के स्टॉक कर लिया। और इंडस्ट्री को तो फायदा हुआ लेकिन किसान जो है उनका जो प्राइस है, मिनिमम सपोर्ट प्राइस से कम उनको तकरीबन 1,000 से 1,500 रुपये कम प्रति क्विंटल मिला है।
मेज के माध्यम से एथेनॉल की बात हो रही है। क्योंकि एथेनॉल अभी तक तो हम सिर्फ इंडस्ट्रियल यूज के लिए इंपोर्ट करते हैं। लेकिन अब कारों के लिए भी प्रेशर है कि इसको ओपन किया जाए। क्योंकि अमेरिका में तकरीबन 80% जो मेज वो ग्रो करते हैं, वो एथेनॉल की प्रोडक्शन में जाता है।
फ्रांस का उदाहरण: उपभोक्ता किसानों के साथ खड़े हुए
फ्रांस में एक बहुत ही इंपॉर्टेंट डेवलपमेंट हुई है। फ्रांस में देखा गया है कि पिछले दो-तीन-चार सालों से जो डेयरी फार्म्स हैं, वो बंद हो रहे थे। क्यों बंद हो रहे थे? कि जो डेयरी फार्म्स हैं, उनका जो प्राइस है वो फॉल कर गया और बाहर से इंपोर्ट्स आ रहे थे तो वो उसके बराबर नहीं, वो अपने उसको सस्टेन कर पाए डेयरी फार्म्स को, तो बंद होने शुरू हो गए।
तो एक सज्जन ने निकोलस चने, उनका नाम है। उन्होंने ये सोचा कि भाई ये तो बड़ा अन्याय हो रहा है। तो क्यों नहीं जो रिटेल मार्केट में जो दूध बिक रहा है, उसकी प्राइस से उन्होंने नापा कि कितना कम, अगर जो शॉर्टफॉल है अगर कंज्यूमर वो दे पाए तो जो डेयरी फार्म्स बंद हो रहे हैं, वो खुलने शुरू हो जाएंगे।
आपको यकीन नहीं होगा, दो-तीन सालों में इतनी बड़ी मूवमेंट वो हो गई कि जो कंज्यूमर है वहां का फ्रांस का, उसने अपने दूध के किसान के लिए एक जो छह पेंस, मात्र एक यूरो में छह पेंस का गैप था, उन्होंने छह पेंस दिया अधिक और वो दूध लेना शुरू कर दिया। आज वो इतनी बड़ी मूवमेंट हो गई है कि फ्रांस का जो दूसरा जो बिगेस्ट सेल जो हो रही है, वो उस दूध की हो रही है जहां पर की कंज्यूमर छह पेंस अधिक देके वो दूध खरीद रहा है।
हमारे कंज्यूमर को भी सोचना चाहिए कि अगर फ्रांस में कंज्यूमर जो है, इस बात को रिथिंकिंग या रिथिंक कर सके हैं तो हमारे देश को भी कंज्यूमर को किसान के साथ खड़े होना चाहिए और उसकी सपोर्ट में आगे आना चाहिए। अगर थोड़ा सा ज्यादा भी कीमत देनी पड़े तो उनको देनी चाहिए।
किसानों को तैयार क्यों नहीं किया जा रहा
पीयूष गोयल के अनुसार डील होने में मार्च के मध्य तक का समय लग जाएगा। क्या इस दौरान मंत्रियों को भारत के किसानों को तैयार नहीं करना चाहिए कि किस सेक्टर में असर पड़ने वाला है? किस सेक्टर में अवसर खुलने वाला है? तो उनकी तैयारी क्या होनी चाहिए?
उनके साथ बच्चे जैसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है? चिंता नहीं करना, सब ठीक हो जाएगा। अन्नदाता हैं, जीवनदाता हैं। हम भगवान की तरह पूजा करते हैं। अगर सोयाबीन के लिए सेक्टर खोला गया है तो सोयाबीन से जुड़े भारत के लाखों किसानों के लिए क्या संदेश है?
किसान संगठनों को कृषि मंत्री और वाणिज्य मंत्री के बयान से आश्वासन नहीं मिल पा रहा। मौजूदा समय में किसानों को एमएसपी से 30 से 40% कम कीमत मिल रही है। अमेरिका से होने वाली डील में प्रावधान है कि आयात शुल्क हटा दिया जाएगा। नॉन टेरिफ बैरियर भी हटाए जाएंगे। जबकि अमेरिका भारत के उत्पादों पर 18% टेरिफ लगाए रखेगा।
इंडियन एक्सप्रेस में हरीश दामोदरन ने लिखा है कि पिछले साल जनवरी से नवंबर के बीच अमेरिका से आने वाले कृषि उत्पादों में 34% से अधिक का उछाल आया है। 2024 में 2.13 बिलियन का आयात था जो 2025 के 11 महीनों में 2.85 बिलियन का हो गया। और इस दौरान अमेरिका से क्या आया? सोयाबीन तेल, कपास, बादाम का आयात बढ़ गया।
किसानों को डिटेल बताना जरूरी
पहाड़ी इलाकों के किसानों को डर है कि उनके लिए अपनी खेती को बचाना मुश्किल हो सकता है। अगर अमेरिका को सेबों के निर्यात की अनुमति दे दी गई तो भारत के किसान टिक नहीं पाएंगे। कपास, सोया और प्याज के किसानों को पहले से ही सही दाम नहीं मिल रहे। अगर अमेरिका के किसानों से कंपटीशन करना पड़ा तो किसान इन फसलों को उगाना छोड़ देंगे।
किसान संगठनों को भी डील से जुड़ी सूचनाओं का इंतजार है। अगर किसानों के हित को ध्यान में रखकर फैसला लिया जा रहा है तो फैसले की जानकारी देने में क्या दिक्कत हो सकती है? बताइए।
मुख्य बातें (Key Points)
- भारत-अमेरिका व्यापार डील पर 2 फरवरी को घोषणा हुई, लेकिन 6 फरवरी तक डिटेल सार्वजनिक नहीं
- अमेरिकी कृषि सचिव कह रही हैं कि अमेरिकी किसानों के गांवों में कैश आएगा
- भारतीय मंत्री साफ नहीं बता पा रहे कि भारतीय किसानों को क्या फायदा होगा
- अमेरिकी किसानों को साल में 60 लाख रुपये सब्सिडी, भारतीय किसानों को 6,000 रुपये
- स्टेट बैंक की रिपोर्ट: डेयरी सेक्टर खुला तो 1 लाख करोड़ का नुकसान
- कपास पर टेरिफ हटाने से 2 दिन में 1,100 रुपये दाम गिरे
- अमेरिका कह रहा फल-सब्जी सेक्टर खुला, भारत कह रहा सुरक्षित है
- OECD रिपोर्ट: पिछले 25 साल में भारतीय किसानों को 111 लाख करोड़ का नुकसान
- विपक्ष ने इसे “ट्रैप डील” करार दिया, पूरी डिटेल की मांग
- मार्च मध्य तक डील पर कानूनी साइन होंगे








