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Trump Iran Attack : हमला करेंगे या नहीं? Iran को घेरे Trump, अब्राहम लिंकन तैनात

अमेरिका का सबसे ताकतवर युद्धपोत ईरान के नजदीक, मध्यपूर्व के देश युद्ध के विरोध में। ट्रंप बार-बार बदल रहे बयान, रणनीति को दे रहे समय।

The News Air Team by The News Air Team
शनिवार, 31 जनवरी 2026
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Trump Iran Attack
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Trump Iran Attack : मध्यपूर्व में एक बार फिर युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले को लेकर बार-बार बयान बदले हैं। कभी कहते हैं हमला करेंगे, कभी कहते हैं नहीं करेंगे। लेकिन जिस तरह से अमेरिका ने अपने युद्धपोतों की तैनाती की है, वह साफ संकेत दे रहा है कि स्थिति बेहद गंभीर है।

अमेरिका का सबसे शक्तिशाली एयरक्राफ्ट करियर “अब्राहम लिंकन” ईरान के करीब मध्यपूर्व के समुद्र में पहुंच चुका है। इसके साथ तीन मिसाइल विध्वंसक भी तैनात हैं। इस बेड़े की मौजूदगी से दहशत का माहौल बन गया है।

ईरान की रिपोर्ट पर भरोसा कम, पश्चिम में अमेरिकी नजरिया हावी

ईरान की तरफ से आने वाली रिपोर्ट की विश्वसनीयता कम होती है। पश्चिमी मीडिया में जो खबरें छपती हैं, उनमें अमेरिका के नजरिए की छाप होती है।

हर जगह अमेरिका का ही नजरिया दिखाई देता है और लगता है कि ईरान पर हमला करने का समय आ गया है। मगर ऐसा नहीं है।

इजरायल का दशकों पुराना प्लान रहा है ईरान को बर्बाद कर देने का। इजरायल अरब देशों को चुनौती के रूप में नहीं देखता, लेकिन ईरान का भूत उसे सताता है।

इसलिए इजरायल और अमेरिका को लग रहा है कि एक बार फिर से ईरान पर चढ़ाई का समय आ गया है।

ट्रंप के बयानों में भ्रम, रणनीति को मिल रहा समय

ट्रंप ने ईरान पर हमला करने को लेकर कई बार बयान दिए हैं। कभी कहते हैं हमला करेंगे, कभी कहते हैं नहीं करेंगे।

फिर से उन्होंने कहा है कि उम्मीद है ईरान पर हमले की नौबत नहीं आएगी। लेकिन ईरान के खिलाफ जिस तरह से युद्ध के बेड़ों की तैनाती की गई है, उससे कोई भी आश्वस्त नहीं हो सकता।

एक्सपर्ट कह रहे हैं कि ईरान को धोखे में नहीं रहना चाहिए। ट्रंप ने अपनी सेना को तैनात कर दिया है।

ईरान ने भी साफ कह दिया है कि अगर हमला हुआ तो इस बार ऐसा जवाब देंगे जो पहले कभी नहीं दिया।

अब्राहम लिंकन: समुद्र पर सबसे ताकतवर प्लेटफॉर्म

अखबारों में अब्राहम लिंकन को लेकर खूब चर्चा हो रही है। अमेरिका के 11 एयरक्राफ्ट करियर में से एक है अब्राहम लिंकन।

इसका आधिकारिक नाम CVN-72 है। यह बेड़ा परमाणु ऊर्जा से चलता है, इसलिए कई साल तक बिना ईंधन के चल सकता है।

यह अपने आप में युद्ध का पूरा मैदान है। समुद्र पर सबसे ताकतवर प्लेटफॉर्म माना जाता है।

इस पर 5000 से ज्यादा लोग आ सकते हैं और यह अपने आप में एक शहर के समान है। इसमें एयरबोर्न कंट्रोल एंड कमांड सिस्टम है।

60 से 70 लड़ाकू विमान इससे उड़ान भर सकते हैं। यहां अलग-अलग नाम और खूबियों वाले विमान पार्क रहते हैं।

इनके विवरण को पढ़कर लगता है कि हमले से पहले दुनिया के हथियार बाजार में इनकी नुमाइश की जा रही है।

तीन मिसाइल विध्वंसक भी तैनात

इस एयरक्राफ्ट के साथ तीन-तीन मिसाइल विध्वंसक भी ईरान की तरफ पहुंच चुके हैं।

ईरान से चलकर यह बेड़ा मध्यपूर्व के समुद्र में आ गया है। ईरान के बेहद नजदीक इस बार इतनी तैनाती हुई है कि उसी से दहशत हो रही है।

लगता है ट्रंप अवश्य ही ईरान पर हमला करेंगे। ट्रंप बार-बार बयान बदलकर अपनी रणनीति को समय दे रहे हैं।

हमला करने में देरी क्यों?

एक सवाल बार-बार आता है कि अमेरिका हमला करने में समय क्यों ले रहा है? वजह यह नहीं कि ईरान को लेकर ट्रंप नरम पड़ते जा रहे हैं।

बल्कि मध्यपूर्व के देश नहीं चाहते कि गजा के बाद ईरान को लेकर यह इलाका युद्ध के लंबे दौर में प्रवेश कर जाए।

संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ओमान युद्ध का विरोध कर रहे हैं। वे नहीं चाहते कि फिलिस्तीन के मसले के साथ बढ़ी हुई पुरानी पीढ़ी के बाद जो नई पीढ़ी आई है, उनका रुझान किसी भी तरह से वैचारिक मसले की तरफ जाए।

सऊदी अरब का स्टैंड

सऊदी अरब के रक्षा मंत्री ने भी अमेरिकी अधिकारियों से ईरान को लेकर बातचीत की है।

पिछले हफ्ते सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ईरान को आश्वासन दिया कि वे अपने एयर स्पेस का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ नहीं होने देंगे।

तुर्की ने ईरान से कहा है कि अगर अमेरिका का हमला टालना है तो अपने परमाणु प्रोग्राम में रियायतें करनी होंगी।

ईरान की चेतावनी

दूसरी तरफ ईरान कह रहा है कि इस बार वह निर्णायक लड़ाई लड़ेगा। मध्यपूर्व के देशों में अमेरिका के जो सैनिक अड्डे हैं, उन पर हमला करेगा।

अमेरिका चाहता है कि ईरान परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल कार्यक्रम और मिलिशिया को सपोर्ट करने की नीति त्याग दे।

क्या इन तीनों को मान लेना ईरान के लिए आसान होगा? इसके बाद ईरान के पास बचेगा क्या?

बातचीत नहीं, सरेंडर की मांग

ट्रंप सेना लेकर ईरान के दरवाजे पर खड़े हैं कि बात करो। लेकिन ईरान के पास बात करने के लिए अब कुछ भी नहीं।

अमेरिका चाहता है ईरान बातचीत की मेज पर सरेंडर कर दे। ईरान ने कहा है कि अमेरिका से कोई बातचीत नहीं होगी।

अगर युद्ध होगा तो युद्ध के लिए तैयार हैं। ट्रंप कह रहे हैं कि अगर ईरान ने परमाणु कार्यक्रम बंद नहीं किए तो युद्ध होगा।

पिछली बार के दावे पर सवाल

लोग याद दिला रहे हैं कि पिछली बार जब अमेरिका ने हमला किया तब ट्रंप ने ही दावा किया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को नष्ट कर दिया गया है।

फिर इस बार क्यों कह रहे हैं कि ईरान को परमाणु कार्यक्रम बंद करने होंगे, नहीं तो हमला कर देंगे?

दावोस में ट्रंप ने कहा कि हो सकता है ईरान फिर से परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करें, लेकिन इसके लिए उन्हें कहीं और जाकर करना होगा क्योंकि पुरानी साइट पूरी तरह से खत्म कर दी गई थी।

ईरान हमेशा से कहता रहा

ईरान हमेशा से कहता रहा है कि उसने परमाणु बम नहीं बनाया। तब भी उसके परमाणु संयंत्रों पर हमला किया गया। अब नष्ट करने के बाद ट्रंप कह रहे हैं कि ईरान फिर से परमाणु कार्यक्रम शुरू कर सकता है।

ट्रंप कभी परमाणु कार्यक्रम की बात करते हैं, कभी मानवाधिकार की, कभी लोकतंत्र की। अलग-अलग आवाजों में बात करते हैं ताकि पता करना मुश्किल हो जाए कि ईरान पर हमला क्यों करने जा रहे हैं।

असली वजह क्या है?

ट्रंप वो बात नहीं कहना चाहते जो सबको मालूम है। इस वक्त इजरायल और नेतन्याहू ने इलाके में अपना दबदबा कायम कर लिया है।

नेतन्याहू को भी लगता है कि यही मौका है इस इलाके में ईरान को घेरकर खत्म कर दिया जाए।

ट्रंप को भी यही लगता होगा कि ईरान से फुर्सत पाने का सही मौका है। इसके बाद वे फिर से “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” की डफली बजाने लगेंगे।

वे अपने समर्थकों को बता सकेंगे कि उन्होंने ईरान को कंट्रोल कर लिया और मध्यपूर्व में शांति कायम कर दी।

तख्तापलट की योजना?

रॉयटर्स ने कई सूत्रों के आधार पर रिपोर्ट किया है कि ट्रंप प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ाने के लिए ईरान के सुरक्षा बलों और नेताओं पर हमला करने की सोच रहे हैं।

इससे यह संदेश जाएगा कि अमेरिका प्रदर्शनकारियों के समर्थन में आ गया है। ट्रंप को इजरायल और अरब देशों ने भी कहा है कि सिर्फ हवाई हमले से सत्ता परिवर्तन नहीं हो सकता।

दो अमेरिकी सूत्रों ने कहा है कि ट्रंप चाहते हैं कि तख्तापलट की स्थिति बनाई जाए। हालांकि, अभी तक ट्रंप ने इसे लेकर अंतिम फैसला नहीं किया।

इजरायल और सऊदी के अधिकारी वाशिंगटन में

सूत्रों के हवाले से रिपोर्टिंग हो रही है कि हमले से पहले इजरायल और सऊदी अरब के अधिकारी वाशिंगटन में बातचीत के लिए पहुंचे हैं।

रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया है कि इजरायल के सैन्य इंटेलिजेंस के चीफ ने पेंटागन, CIA और व्हाइट हाउस में वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की।

एक्सियोस ने रिपोर्ट किया है कि उन्होंने ईरान के टारगेट्स को लेकर जानकारी साझा की है।

पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टिंग पर सवाल

ईरान पर हमले को लेकर पश्चिमी मीडिया की रिपोर्ट और इन रिपोर्ट में उठाए जा रहे सवालों को देखकर हंसी भी आती है।

यह समझ में आता है कि यह अखबार किस तरह से युद्ध को, किसी संप्रभु देश पर अटैक को लोगों के मन में जरूरी काम के रूप में बिठाते रहते हैं।

वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को अगवा कर लिया गया। पश्चिम के अखबारों के लिए यह घटना किसी देश की संप्रभुता के अतिक्रमण का उदाहरण नहीं रही।

बल्कि अब यह उनकी जिज्ञासा का हिस्सा है कि क्या ट्रंप ने जैसा वेनेजुएला में किया, वैसा ही ईरान में करेंगे?

ईरान इतना कमजोर नहीं

इस संभावना की तलाश में बड़े-बड़े अखबार एक्सपर्ट से बात कर रहे हैं। एक्सपर्ट कह रहे हैं कि ईरान के साथ ऐसा करना आसान नहीं होगा।

अमेरिका के अखबारों में चर्चा करने वाले यह एक्सपर्ट भूल जाते हैं कि अक्टूबर 2024 में जब इजरायल हमला कर रहा था, तब उसके बीच खामेनई सार्वजनिक रूप से सामने आए, नमाज पढ़ाई और अमेरिका के खिलाफ भाषण दिया।

ट्रंप के अपने देश में समस्याएं

अगर ईरान के भीतर के हालात अमेरिका को उकसा रहे हैं, तो कई बार लगता है कि ट्रंप भी अमेरिका के भीतर के हालात के कारण कभी ग्रीनलैंड, कभी ईरान की बात करने लगते हैं।

वेनेजुएला पर हमला किया तब कहा गया कि एपस्टीन फाइल से भटकाने के लिए किया गया। आज तक एपस्टीन फाइल से जुड़े कागजात सामने नहीं आए।

इस समय मिनेसोटा में कितने प्रदर्शन हो रहे हैं। दो अमेरिकी नागरिकों की मिनियापोलिस की सड़कों पर हत्या कर दी गई।

पूरी दुनिया देख रही है कि एक राज्य के लोग अपने राष्ट्रपति से भिड़ गए हैं। गवर्नर और मेयर ट्रंप से सीधे लड़ रहे हैं।

एक तरफ ICE है, दूसरी तरफ नेशनल गार्ड और इस सब के बीच ट्रंप अपने देश में चल रही मारामारी को छोड़कर ईरान को संभालने चले हैं।

ईरान- मध्यपूर्व का अकेला प्रतिरोधी

मध्यपूर्व के इलाके में ईरान अकेला ऐसा देश है जो अमेरिका के तमाम प्रतिबंधों के बाद भी अभी तक टिका हुआ है, लड़ रहा है।

इजरायल लंबे समय से ईरान के आसपास के देशों को वैचारिक और राजनीतिक रूप से खत्म कर चुका है।

ईरान को घेरने के लिए उसके सभी पड़ोसी देशों को बर्बाद कर दिया गया। तब भी ईरान को खत्म करने का मकसद अभी पूरा नहीं हुआ।

पिछली बार का हमला

पिछले साल जून में बातचीत हो ही रही थी, जब उसमें शामिल खामेनई के सलाहकार पर भीषण हमला किया गया।

जून 2025 में ईरान की सेना के शीर्ष अधिकारियों के घरों पर हमले हुए। चार दिन पहले कमांडर बने अली शादमानी की हत्या कर दी गई।

जनरल हुसैन सलामी की हत्या कर दी गई। कई और अधिकारी भी मारे गए। लेकिन एक दिन भी नहीं लगा कि ईरान की सेना या सत्ता बिखर गई हो।

लगता नहीं कि ईरान में नेतृत्व किसी एक के हाथ में है। सेना में भी और सरकार में भी अलग-अलग स्तरों पर नेतृत्व का ढांचा होगा जो ऐसे वक्त में आगे आकर संभाल लेता होगा।

पिछली कामयाबी भी सीमित रही

पिछली बार की कामयाबी कम नहीं थी। तब भी 12 दिनों तक हमला करने के बाद इजरायल को निकलने के लिए रास्ता खोजना पड़ा और अमेरिका से मदद लेनी पड़ी।

जब उसने B-2 बॉम्बर से 300 टन बम गिराकर दावा किया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को खत्म कर दिया गया है, मकसद पूरा हो गया है।

फिर अमेरिका और इजरायल दोनों ही पीछे हट गए। अगर ईरान इतना ही कमजोर हो गया था, तब उसी समय ईरान में सत्ता परिवर्तन भी हो जाता।

ईरान की क्षेत्रीय ताकत कमजोर हुई

ईरान ने सीरिया में 3 अरब डॉलर खर्च कर जो मिलिशिया खड़ा किया, अंत में वह काम नहीं आया।

गजा में हमास, लेबनान में हिजबुल्लाह और यमन में हौथी। तीनों अब कमजोर हो चुके हैं।

ईरान अपने पड़ोसी देशों के इन मिलिशिया को “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” बोलता था, जो अब ढह चुके हैं।

इनके दम पर ईरान अपनी जनता को बता रहा था कि तमाम प्रतिबंधों के बाद भी हम इस्लामिक सुपर पावर हैं। लेकिन यह दावा अब खोखला लग रहा है।

ईरान में असंतोष बढ़ा

ईरान के भीतर उसकी जो बाहरी छवि बनाई गई थी, वह खत्म हो गई है। यही कारण है कि ईरान के भीतर असंतोष बाहर आने लगा है।

ईरान भले ही अपने यहां हुए प्रदर्शनों के पीछे अमेरिका के हाथ का आरोप लगा रहा है, लेकिन वह इस सच्चाई को भी स्वीकार कर रहा है कि आर्थिक समस्या वास्तविक है।

ईरान ने प्रदर्शनों को काबू में कर लिया, कुचल दिया। लेकिन पहली बार दिख रहा है कि ईरानी सत्ता मान रही है।

खामेनई ने भी स्वीकार किया है कि हजारों लोग मारे गए। ईरान के राष्ट्रपति ने कहा कि मारे गए लोगों की सूची जारी की जाएगी।

युवा पीढ़ी सवाल पूछ रही

ईरान की सत्ता को जवाब देना पड़ रहा है क्योंकि ईरान की युवा पीढ़ी सवाल पूछ रही है कि आर्थिक हालत क्यों खराब है?

ईरान की क्रांति के ख्वाब से यह पीढ़ी अपनी पहचान नहीं जोड़ पा रही।

ट्रंप को इसी बात पर लगता है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन का श्रेष्ठ समय है। लेकिन यही बात ईरान को भीतर से एकजुट कर रही होगी।

ईयू ने ईरानी गार्ड को आतंकवादी बताया

यूरोपीय संघ (EU) ने ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड को आतंकवादियों की सूची में डाल दिया है। कहा है कि ईरान की सेना लोगों की हत्या कर रही है।

ईरान ने EU की निंदा की है। कहा है कि इजरायल ने गजा में नरसंहार मचाया, लेकिन उसकी सेना की तरफ EU का ध्यान नहीं गया।

इससे यह समझ में आता है कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के खिलाफ स्टैंड लेने वाला EU, ईरान को लेकर अमेरिका के साथ है।

अमेरिकी विदेश सचिव का बयान

अमेरिका के सेनेट में विदेश सचिव मार्को रूबियो ने कहा कि जो प्रदर्शन कमजोर हुए हैं, फिर से हो सकते हैं।

रूबियो के अनुसार, ईरान पर प्रतिबंध इसलिए लगते हैं क्योंकि वह हथियार बनाता है, आतंकियों को खड़ा करता है, पैसे खर्च करता है।

इस वजह से भी ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। रूबियो का यह भी कहना है कि ईरान में इस बार सत्ता परिवर्तन की अनुकूल परिस्थिति नजर आ रही है।

असली मकसद क्या है?

इस बात को लेकर क्लियर रहना चाहिए कि ट्रंप ईरान पर हमला करने के लिए कोई नैतिक आधार नहीं ढूंढ रहे।

न उन्हें जरूरत लगती है कि वहां प्रदर्शनकारी मारे गए। मानवाधिकार की रक्षा के लिए अमेरिका हमला करने नहीं जा रहा है।

उससे पहले अमेरिका को मिनियापोलिस जाना चाहिए। ईरान को कमजोर करने और उस पर कब्जा करने का मूल प्लान इजरायल का है।

30 साल से नेतन्याहू कह रहे हैं कि ईरान परमाणु बम बनाने ही वाला है। आज तक बनाया तो नहीं।

इजरायल की हालत भी अच्छी नहीं

अगर अमेरिका हमला करेगा तो इजरायल भी साथ आ सकता है। नेतन्याहू टॉप फॉर्म में हैं।

लेकिन लगातार युद्ध लड़ते-लड़ते इजरायल की हालत भी अच्छी नहीं। इजरायल की नेशनल इंश्योरेंस रिपोर्ट में सामने आया है कि इजरायल का हर चौथा बच्चा गरीबी रेखा के नीचे जी रहा है।

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21% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। यह हालत है इन देशों की जो दूसरे देशों में उत्पात मचाते हैं।

खामेनई के भागने की अफवाह

पश्चिम के अखबारों को पढ़ते हुए एक बात समझ में आती है कि उनके यहां भी अफवाह उड़ाने का रिवाज बहुत ज्यादा है।

कुछ दिन पहले खबरें छप गईं कि अमेरिकी हमले को देखते हुए खामेनई ईरान से भागने की तैयारी में हैं।

फिर से वही खबरें छपने लगी हैं कि एक सरकारी विमान तेहरान से उड़कर मॉस्को लैंड हुआ है। Twitter पर चल रहा है कि खामेनई ईरान से भाग गए हैं।

उनके भागने की खबर छापने वाला संवाददाता लगता है कि खामेनई के साथ प्लेन में भाग रहा है और वहीं से भागते-भागते भागने की खबर दे रहा है।

ट्रंप के समर्थक अरबपति फायदे में

युद्ध को लेकर ट्रंप ने ऐसा माहौल बना दिया है कि दुनिया बौखला गई है। लेकिन खबरों के दूसरे पहलू को भी देखना चाहिए।

इस हंगामे में लोग पैसे बना रहे हैं। अमेरिका में कई रिपोर्ट छप गईं कि ट्रंप के समर्थन में खड़े उद्योगपतियों की संपत्ति में कई गुना की वृद्धि हो चुकी है।

जो अरबपति सोशल मीडिया से लेकर दुनिया का 50% मीडिया कंट्रोल करते हैं, वही ट्रंप के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं।

एलन मस्क दुनिया के सबसे अमीर आदमी हैं। जेफ बेजोस दुनिया के पांचवें सबसे अमीर आदमी हैं। यानी ट्रंप समर्थक कॉर्पोरेट बहुत पैसे बना रहा है।

ट्रंप का पैटर्न साफ

ट्रंप का एक पैटर्न साफ-साफ समझ में आने लगा है। वे हंगामा चाहते हैं ताकि इसके शोर में उनके समर्थक मुनाफा कमाते रहें।

अगर ट्रंप के कारण दुनिया अस्थिर और अनिश्चित हो गई है, तो ट्रंप के समर्थक कॉर्पोरेट क्यों खामोश हैं? उनकी कमाई क्यों बढ़ रही है?

जाहिर है उनके हितों का नुकसान नहीं हो रहा।

फेडरल रिजर्व पर हमला

इस बीच ट्रंप ने ऐलान कर दिया है कि अमेरिका के फेडरल रिजर्व के नए चीफ के नाम की घोषणा की जाएगी।

फेडरल रिजर्व के चीफ जेरोम पॉवेल ने इंटरेस्ट रेट कम करने से मना कर दिया है। ट्रंप चाहते हैं कि इंटरेस्ट रेट कम हो।

अमेरिका के वित्तीय सिस्टम में फेडरल रिजर्व स्वायत्त संस्था मानी जाती है। लेकिन ट्रंप ने इस संस्था पर भी हमला बोल दिया।

वे ग्रीनलैंड, ईरान को लेकर धुआं पैदा करते हैं और आग अपने घर में लगाते हैं।

वित्तीय बाजार में तूफान की आशंका

अगर फेडरल रिजर्व के चीफ पॉवेल को हटाया गया तो यह बड़ी घटना होगी। अमेरिका और दुनिया के लिए, दुनिया के बाजारों में भयंकर तूफान आ सकता है।

इस समय की जो वित्तीय व्यवस्था है, उसमें दिखावे के लिए माना जाता है कि फेडरल रिजर्व एक स्वायत्त संस्था है।

ट्रंप चाहते हैं कि जैसा वे कहते हैं, वैसा ही किया जाए। जाहिर है ऐसी अस्थिरता और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण बाजार घबराएगा।

लोग पैसे निकालकर सोना, चांदी, तांबा, पीतल में लगाने लग जाएंगे। आज जिस तरह से चांदी के दाम में 48,000 की कमी आई, सोने के भाव भी टूटे हैं।

कौन समझाएगा ट्रंप को?

लगता है लोगों का दिमाग अभी लंबे समय तक इसी में खराब रहने वाला है। अगर ट्रंप को कोई समझा सकता है तो अब यह समझ में आ गया है कि ट्रंप को कोई नहीं समझा सकता।

युद्ध, राजनीति और आर्थिक अस्थिरता के बीच दुनिया एक अनिश्चित दौर से गुजर रही है।

मुख्य बातें (Key Points)
  • अब्राहम लिंकन तैनाती: अमेरिका का सबसे शक्तिशाली एयरक्राफ्ट करियर CVN-72 तीन मिसाइल विध्वंसक के साथ ईरान के करीब तैनात
  • ट्रंप के बयान: बार-बार बदल रहे बयान, कभी हमला करेंगे कहते हैं तो कभी नहीं करेंगे
  • मध्यपूर्व का विरोध: सऊदी अरब, UAE और ओमान युद्ध के खिलाफ, प्रिंस सलमान ने ईरान को एयर स्पेस न देने का आश्वासन दिया
  • सत्ता परिवर्तन की योजना: रॉयटर्स के अनुसार ट्रंप ईरान में तख्तापलट की स्थिति बनाना चाहते हैं
  • वित्तीय प्रभाव: फेडरल रिजर्व पर हमला, सोने-चांदी के दाम में उतार-चढ़ाव, ट्रंप समर्थक अरबपतियों की संपत्ति में वृद्धि
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