नई दिल्ली, 02 अगस्त (The News Air): उत्तर प्रदेश में नजूल बिल के लटकने पर राजनीति तेज हो गई है। बीजेपी के अंदर ही इस बिल का विरोध देखने को मिला, जिससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार को इसे विधान परिषद में रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस घटनाक्रम से यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि सरकार से बड़ा संगठन है, क्योंकि बिल के विरोध में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने अहम भूमिका निभाई। आइए, इस पूरे मामले को 10 बिंदुओं में समझते हैं:
- बिल का प्रस्ताव: योगी सरकार ने नजूल भूमि (लोक प्रयोजनार्थ प्रबंधन और उपयोग) विधेयक, 2024 को विधानसभा में पेश किया था।
- विधानसभा में विरोध: विधानसभा में सपा विधायकों के साथ बीजेपी के विधायक भी बिल का विरोध कर रहे थे।
- विरोध के बावजूद पास: विरोध के बावजूद, विधानसभा में योगी सरकार ने इस बिल को पास करवा लिया।
- विधान परिषद में प्रस्तुति: विधानसभा से पास होने के बाद, बिल को विधान परिषद में पेश किया गया।
- बीजेपी अध्यक्ष का विरोध: विधान परिषद में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने बिल का विरोध किया और इसे प्रवर समिति को भेजने की मांग की।
- प्रवर समिति को भेजा: विधान परिषद के सभापति ने भूपेंद्र चौधरी के अनुरोध को मानते हुए बिल को प्रवर समिति को भेज दिया।
- सियासी अदावत: डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के ‘सरकार से बड़ा संगठन’ वाले बयान को लेकर सियासी अदावत का मुद्दा उठा।
- लोकसभा चुनाव का प्रभाव: उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी में आंतरिक कलह बढ़ी।
- बीजेपी विधायकों की आपत्ति: बीजेपी विधायकों ने प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से बिल के पास होने पर संभावित नुकसान की आशंका जताई।
- प्रवर समिति की रिपोर्ट: प्रवर समिति दो महीने में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी, जिससे बिल का भविष्य अधर में लटक गया है।








