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The News Air - NEWS-TICKER - जर्मनी में क्‍यों उठ रही है इस्लामी ख़लीफत बनाने की मांग?

जर्मनी में क्‍यों उठ रही है इस्लामी ख़लीफत बनाने की मांग?

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 3 मई 2024
in NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय
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इस्लामी ख़लीफत
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Demand to make Germany an Islamic Caliphate: यूरोप से लेकर अमेरिका तक के मीडिया में भारत की चर्चा या तो होती ही नहीं, और यदि होती है, तो उसे हेठा और स्वयं को ऊंचा दिखाने के लिए। भारत में इस समय हो रहे चुनावों की चर्चा हालांकि इस बार खूब होती दिखी, पर अपनी जनता को यह बताने के लिए कि बीजेपी कितनी ‘अंध हिंदू राष्ट्रवादी’ है और प्रधानमंत्री मोदी, हिटलर जैसे कितने बड़े ‘फ़ासिस्ट’ हैं।

लगभग हर रिपोर्ट और हर विश्लेषण का एक निष्कर्ष यह भी होता है कि भारत के बेचारे मुसलमान, मोदी के दमन और अत्याचार के आगे बिल्कुल लाचार हैं। लाखों यहूदियों के जातिसंहारक हिटलर के देश जर्मनी के इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में इस तरह का विषवमन इन दिनों अपनी पराकाष्ठा पर रहा है।

भारत के मुसलमानों की असीम पीड़ा से अधमरे हुए जा रहे जर्मनी के यही, परम ज्ञानी मीडिया समीक्षक, 29 अप्रैल से लेकिन गुहार लगा रहे हैं कि गाज़ा पट्टी के आतंकवादी संगठन ‘हमास’ का समर्थन करने वाले मुस्लिम प्रदर्शनों पर क़ानूनी प्रतिबंध लगना चाहिए। जर्मनी भी ‘हमास’ को एक आतंकवादी संगठन मानता है।

शनिवार 27 अप्रैल को जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में हुए एक उग्र प्रदर्शन ने इसकी पुनः पुष्टि भी कर दी है। उसमें नारा लगाया जा रहा था, ‘ख़लीफत ही समाधान है,’ ‘अल्ला हु अकबर’

‘इस्लामिक स्टेट (IS)’ की 10वीं वर्षगांठः ‘ख़लीफत ही समाधान है’ का अर्थ है, इराक़ी कुख्यात आतंकवादी अबू बक्र अल बगदादी की ख़लीफत को पुनर्जीवित करना। उसी ने 10 वर्ष पूर्व, जून 2014 में इराक़ और सीरिया के एक बड़े हिस्से को अपनी ‘ख़लीफत’ (खुदा का राज) घोषित किया था। ख़ुद को पैगंबर मोहम्मद का उत्तराधिकारी बताता था। उसकी ‘ख़लीफत’, जो ‘इस्लामिक स्टेट (IS)’ के नाम से भी जानी जाती है और अब नहीं रही, लाखों लोगों के मरने और शरणार्थी बनने का कारण बनी। उस समय के बहुत से शरणार्थी आज जर्मनी में भी रहते हैं

यानी, हैम्बर्ग के एक हज़ार से अधिक मुस्लिम प्रदर्शनकारी ‘इस्लामिक स्टेट (IS)’ बनने की 10वीं वर्षगांठ से ठीक पहले, वास्तव में यह कह रहे थे कि ईसाई जर्मनी को एक इस्लामी देश बना देना चाहिए। प्रदर्शन का आयोजन ‘मुस्लिम इन्टरऐक्टिव’ नाम के एक इस्लामी संगठन ने किया था। तख्तियों और बैनरों पर जर्मनी को झूठी ‘नैतिकता की तानाशाही’ वाला देश बताया गया था।

जर्मन अधिकारी स्तब्धः प्रदर्शन की हालांकि विधिवत अनुमति ली गई थी। पर उसमें लगाए गए नारों तथा तख्तियों और बैनरों पर लिखी बातों ने जर्मन अधिकारियों को स्तब्ध कर दिया। हैम्बर्ग शहर के पुलिस-प्रमुख फ़ाल्क श्नाबल ने जर्मन रेडियो-टीवी नेटवर्क ARD की स्थानीय शाखा NDR के साथ एक बातचीत में कहा कि प्रदर्शन के आयोजक इस्लामी संगठन ‘मुस्लिम इन्टरऐक्टिव’ पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। केवल तभी सोशल मीडिया पर उसके द्वारा हो रहे घृणा-प्रचारों पर भी लगाम लगाई जा सकती है। श्नाबल के अनुसार इन प्रचारों को रोकना बहुत ज़रूरी है, अन्यथा ‘मुस्लिम उग्रवाद का ख़तरा सर्वव्यापी हो जाएगा।’ प्रचारों में यह घृणित आभास दिया जाता है कि जर्मनी के कथित ‘मौलिक अधिकार मुसलमानों के लिए नहीं हैं’, इसलिए यहां एक ‘ख़लिफत’ (खुदाई राज) की ज़रूरत है।

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जर्मनी की आंतरिक गुप्तचर सेवा ‘संविधान रक्षा कार्यालय’ ने अपने एक आकलन में ‘मुस्लिम इन्टरऐक्टिव’ को ‘परिपुषट तौर पर उग्रवादी’ होने का दर्जा दे रखा है। उसका संबंध अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संस्था ‘हिज़्ब उत-तहरीर’ से जोड़ा है। इस संस्था पर जर्मनी में 2003 से प्रतिबंध लगा हुआ है। जर्मनी की आंतरिक गुप्तचर सेवा उसे एक ऐसी संस्था बताती है, जो लोकतंत्र और पंथनिपेक्षता (सेक्युलरिज़्म) को ठुकराती है और पूरी दुनिया को एक ख़लीफत बनाना चाहती है।

ख़लीफत क्या है: इसराइल से आकर जर्मनी में बस गए अरबी इस्लामविद अहमद मंसूर ने, जर्मनी के एक मीडिया ग्रुप को बताया कि ‘ख़लीफत एक ऐसी शासन प्रणाली है, जिसमें इस्लामी न्याय-संहिता ‘शरियत’ को ऐसा धर्मसिद्धांत (डॉग्मा)  बना दिया गया है, जिसके अनुसार सब को कुरान और सुन्ना के नियमों का पालन करना है। राज्य-सत्ता, जनता की देन नहीं होती। विधर्मियों को घटिया दर्जे के लोग माना जाता है। इस्लाम के विस्तार के लिए युद्ध लड़े जाते हैं। लोकतांत्रिक मौलिक अधिकारों को ठुकराया जाता है।’

अहमद मंसूर का कहना है कि ‘मुस्लिम इन्टरऐक्टिव’ जैसे संगठन, बाहरी तौर पर तो अपने आप को सलाफ़ी उपदेशकों की अपेक्षा आधुनिक और नरम विचारों वाला दिखाते हैं, पर मुसलमानों के साथ जर्मनी में होने वाले कथित भेदभाव का लाभ उठाकर उन्हें भड़काते हैं। स्थानीय समाज के साथ मेलजोल को वे इस्लाम से विमुख होने और अपनी पहचान लुप्त हो जाने का ख़तरा बताते हैं।

बहुत पहले ही प्रतिबंध क्यों नहीं लगाः 27 अप्रैल के दिन हेम्बर्ग में जो कुछ हुआ, उसके बारे में जर्मनी की गृह मंत्री नैन्सी फ़ेज़र का कहना था कि वह ‘असहनीय है।’ एक रोडियो इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ‘हमास’ के पक्ष में किसी प्रचार की अनुमति नहीं दी जा सकती।’ यहूदियों पर लक्षित ‘नफ़रती नारेबाज़ी और हिंसा का आह्वान जर्मन सड़कों पर नहीं होने दिया जा सकता।’  इस पर जर्मनी की ही महिला इस्लामविद क्लाउडिया दांच्के की टिप्पणी थी, ‘यह मेरे लिए अबूझ पहेली है कि मुस्लिम इन्टरऐक्टिव पर बहुत पहले ही प्रतिबंध क्यों नहीं लग गया?

उसने तो बहुत पहले ही (लाज-शर्म के) अपने सारे पर्दे उतार दिए हैं। ‘हिज़्ब उत-तहरीर’ पर पहले से ही लगे हुए प्रतिबंध को देखते हुए समझ में नहीं आता कि गृह मंत्रालय अब भी क्या जांच-परख कर रहा है?’

जर्मनी में वैसे तो 2003 से ही अल बगदादी के ख़लीफत आन्दोलन जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध है, पर ‘मुस्लिम इन्टरऐक्टिव’ जैसे ऑनलाइन मंच, समय के साथ अपनी सक्रियता बढ़ाते ही गए हैं। जर्मनी की सरकारों को परामर्श देने वाली ‘जर्मन इस्लाम कॉन्फ्रेंस’ के एक सदस्य, तुर्की मूल के एरीन ग्युवेर्सिन का कहना है कि ‘हमास’ पर इसराएली आक्रमण के बाद से इस सक्रियता में और अधिक तेज़ी आ गई है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे 2015 के बाद से आए शरणार्थी नहीं, ऐसे लोग हैं, जो जर्मनी में ही पैदा हुए हैं और यहीं के समाज का अंग हैं।’ गृह मंत्री महोदया उन के प्रति ‘कठोरता से पेश आने की बात करती हैं, पर प्रश्न यह है कि इस कठोरता के लिए उन्होंने अब तक किया क्या है?’

अरबी अमीरात के राजदूत की टिप्पणीः यहां तक कि जर्मनी में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राजदूत अहमद अल अत्तार ने भी, हैम्बर्ग में हुए प्रदर्शन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए X पर लिखा, ‘अविश्वसनीय, अस्वीकार्य, समझ से परे है कि ऐसे लोग, जर्मनी जिनका घर है, जर्मनी के विरोधी हो गए हैं। लेकिन, राजनीतिक इस्लाम के लिए यही तो लाक्षणिक (टिपिकल) है।’ यह प्रतिक्रिया एक ऐसे देश के राजदूत की है, जो स्वयं एक अरबी मुसलमान है और ऐसा उन लोगों के बारे में कह रहा है, जो अरबी फ़िलस्तीनियों के एक आतंकवादी संगठन हमास के समर्थन में जर्मनी की सड़कों पर उतर कर उसे इस्लामी ख़लीफत बनाने के नारे लगा रहे थे।

जर्मनी के न्याय मंत्री मर्को बुशमान ने भी X पर एक टिप्णी करते हुए लिखा, ‘जिस किसी को कोई ख़लीफ़त हमारे संवैधानिक देश से अधिक प्रिय है, उसे पूरी आज़ादी है कि वह वहां चला जाए।’ पाकिस्तान के बहाने से यही बात भारत में यदि कोई मंत्री किसी कथित अल्पसंख्यक से कह देगा, तो देश के सभी वामपंथी ही नहीं, यूरोप-अमेरिका तक का सारा पश्चिमी मीडिया भी उस पर टूट पड़ेगा। जर्मनी के मीडिया में जर्मन न्यामंत्री की इस सलाह पर किंतु कहीं कोई आलोचनात्मक टीका-टिप्णी देखने या सुनने में नहीं आई।

अमेरिका में धरनों-प्रदर्शनों की बाढ़ः अमेरिका में तो हमास के समर्थन में धरनों-प्रदर्शनों की बाढ़ आई हुई है। वहां कालेजों-विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले मुस्लिम छात्र-छात्राएं पढ़ाई छोड़ कर इन आन्दोलनों की अगुआई कर रहे हैं। पुलिस और उनके बीच हर दिन टकराव हो रहे हैं। वहां भी हमास समर्थकों से कहा जाता है कि उससे इतना ही प्रेम है, तो गाज़ा जाकर इसराइल से क्यों नहीं लड़ते? यहां क्यों शोर मचाते हो?

पीएम को हिटलर सिद्ध करने पर तुले: भारत में तो भारतीय ही देश के प्रधानमंत्री को हिटलर सिद्ध करने पर तुले रहते हैं, भूल जाते हैं कि ऐसी तुलनाओं से वे हिटलर को एक निरपराध साधारण आदमी सिद्ध कर रहे होते हैं। हिटलर ने लगभग पूरे यूरोप पर क़ब्ज़ा कर लिया था। 15 वर्षों के अपने खूनी शासनकाल में कम से कम 3 करोड़ लोगों की यातनापूर्ण मौतों के लिए ज़िम्मेदार था। भारत के विशुद्ध शाकाहारी प्रधानमंत्री को किसी देश पर क़ब्ज़े तो क्या, किसी साधारण-सी चिड़िया की यातनापूर्ण मौत के लिए भी उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

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