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The News Air - NEWS-TICKER - भारत में कब हिंदुओं से आगे निकल जाएगी मुस्लिम आबादी?

भारत में कब हिंदुओं से आगे निकल जाएगी मुस्लिम आबादी?

अंग्रेजों ने फैलाया झूठ एक दिन हिंदुओं का अंत

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 10 मई 2024
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मुस्लिम आबादी
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नई दिल्ली, 10 मई (The News Air): ‘हिंदुओं की आबादी लगातार कम हो रही है। मुस्लिमों की आबादी दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। एक दिन ऐसा आएगा, जब हिंदू अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाएगा और मुस्लिम बहुसंख्यक।’ दरअसल, ये एक सोशल मीडिया पोस्ट है। ऐसी ही तमाम पोस्ट है, जिनमें लोकसभा चुनाव, 2024 के दौरान ये दावे किए जा रहे हैं कि मुस्लिमों की आबादी एक दिन हिंदुओं से आगे निकल जाएगी। इन पोस्ट में ये भी कहा जा रहा है कि मुस्लिम ऐसी कौम है, जो बच्चे पैदा करने में आगे है और ये परिवार नियोजन के भी खिलाफ है। दरअसल, हाल ही में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की एक नई रिपोर्ट के बाद ऐसी भ्रामक पोस्ट सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रही हैं। अब जरा रिपोर्ट को समझते हैं और उस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बयान भी जान लेते हैं।

क्या है पीएम की सलाहकार परिषद की नई रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में 1950 से 2015 के बीच हिंदुओं की आबादी 7.82 फीसदी घट गई। वहीं मुस्लिमों की आबादी में 43.15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। हिंदुओं की आबादी हिंदू बहुल नेपाल में भी घटी है। इस रिपोर्ट के आते ही देश में बहस और विवाद का सिलिसला शुरू हो गया है। परिषद ने ये आंकड़े 167 देशों में 1950 से 2015 के बीच आए जनसांख्यिकी बदलाव के अध्ययन के बाद जारी किए हैं। इन देशों में बहुसंख्यक उन्हें माना गया है, जिनकी आबादी 75 फीसदी से अधिक है। वहीं, अमेरिका की शोध संस्था प्यू रिसर्च के 2020 के अनुमान के मुताबिक भारत में मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। पहले नंबर पर इंडोनेशिया और तीसरे पर पाकिस्तान है।

जनगणना के बिना हिंदू-मुस्लिम आबादी पर सवाल

इस रिपोर्ट पर कई पार्टियों ने सवाल उठाए हैं। राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि केंद्र सरकार ने जनगणना किए बिना हिंदू और मुस्लिम आबादी का निर्धारण कैसे कर लिया। केंद्र की भाजपा सरकार वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए हिंदुओं-मुसलमानों के बीच दरार पैदा कर रही है। आप बिना जनगणना कराए ही आंकड़ों पर कैसे पहुंच गए? क्या 2021 में जनगणना नहीं होनी थी? वहीं, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने मुस्लिमों की बढ़ती आबादी की रिपोर्ट पर कहा कि कांग्रेस ने 1971 के बाद वोट बैंक के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों, रोहिंग्या मुसलमानों के लिए बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश को धर्मशाला और चारागाह बना दिया।

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2024 में भारत में मुस्लिमों की आबादी कितनी

एक अनुमान के अनुसार, 2024 में भारत की कुल तकरीबन 147 करोड़ की आबादी में मुस्लिमों की जनसंख्या करीब 20 करोड़ है। वहीं, 1947 में आजादी के वक्त करीब 10 करोड़ मुस्लिम भारत में थे। बंटवारे के बाद इसमें से करीब 6.5 करोड़ मुसलमान पाकिस्तान चले गए, जबकि करीब 3.5 करोड़ मुस्लिम भारत ही रह गए। अब आइए-रिसर्च, रिपोर्ट और आंकड़ों की पड़ताल करते हुए मुस्लिमों को लेकर समाज में गढ़े गए झूठ की परतें खोलते हैं और हकीकत को सामने लाने की कोशिश करते हैं।

दावा: मुस्लिम आबादी एक दिन हिंदुओं से आगे निकल जाएगी

हकीकत: दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर राजीव रंजन गिरि कहते हैं कि हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने वाले लोग कहते हैं कि एक दिन मुस्लिमों की आबादी जनसंख्या में हिंदुओं को पीछे छोड़ देगी। इस बारे में दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी दिनेश सिंह और अजय कुमार ने दो गणितीय मॉडल पेश किए थे, जिसमें यह दावा किया गया था कि हजार साल के बाद भी ऐसी स्थिति नहीं हो पाएगी। ये मॉडल हैं पॉलीनॉमियल ग्रोथ मॉडल, जिसके मुताबिक, 1951 में हिंदू आबादी 30.36 करोड़ थी, जो 2021 में बढ़कर 115.9 करोड़ होने का अनुमान है। वहीं, 1951 में मुस्लिम आबादी 3.58 करोड़ थी, जिसके 2021 तक 21.3 करोड़ होने के अनुमान लगाए गए थे।

अंग्रेजों का फैलाया झूठ ढो रहे हैं हम, कहा-खत्म हो जाएगी हिंदू नस्ल

रिसर्च ‘ट्रांजीशन इन हिंदू एंड मुस्लिम पॉपुलेशन ग्रोथ रेट्स: मिथ एंड रियलिटी’ के लेखक प्रोफेसर आरबी भगत कहते हैं कि ब्रिटिश भारत में पहली बार 1901 की जनगणना के दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने ये बात फैलाई कि हिंदुओं की जन्मदर घट रही है, जिसे बाद में यह कहकर प्रचारित किया गया कि हिंदू प्रजाति का अपने अंत के करीब है। यह कहा गया कि मुस्लिमों की जन्मदर ऊंची है और इस्लाम यह इजाजत देता है कि एक मुस्लिम व्यक्ति 4 बीवियां रख सकता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा किए जा सकें। क्या यही पूरा सच है, यह अभी भी रिसर्च का विषय है।

दावा: बीते एक दशक में हिंदू आबादी घटी और मुस्लिमों की बढ़ी

हकीकत: प्रोफेसर भगत के अनुसार, आंकड़े एक अच्छे सेवक जैसे होते हैं, मगर वो बुरे मालिक भी हो सकते हैं। दरअसल, 2001 में हिंदू आबादी 80.5 फीसदी थी, जाे 2011 में घटकर 79.8 फीसदी रह गई। यानी हिंदू आबादी में बीते 10 साल में 0.7 फीसदी गिरावट देखी गई। वहीं, मुस्लिम आबादी जो 2001 में 13.4 फीसदी थी, वो 2011 में 0.8 फीसदी बढ़कर 14.2 फीसदी हो गई। जबकि, वास्तव में 1980 के दशक के बाद से ही मुस्लिम समुदाय की जन्मदर में लगातार गिरावट रही है। 1991 से 2001 के बीच हिंदुओं की दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर 20 फीसदी थी, जो 2001 से 2011 के बीच 3.2 फीसदी घटकर 16.8 फीसदी रह गई। वहीं, 1991 से 2001 के बीच मुस्लिमों की दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर 29.3 फीसदी थी, जो 2001 से 2011 के बीच 4.7 फीसदी घटकर 24.6 फीसदी रह गई। यानी बीते दो दशकों में मुस्लिमों की जनसंख्या वृद्धि दर हिंदुओं के मुकाबले ज्यादा कम हुई है।

दावा: मुस्लिम बहुल देशों में मुस्लिमों की तादाद ज्यादा

हकीकत: दुनिया में इंडोनेशिया के बाद भारत में सबसे ज्यादा मुसलमान रहते हैं। कुल जन्मदर के लिहाज से देखें तो भारत में जन्मदर 2.4 है, वहीं, मुस्लिम बहुल देशों जैसे बांग्लादेश में 2.2, ईरान में 1.8 जन्मदर है। सिर्फ इंडोनेशिया में 2.6 फीसदी, सऊदी अरब में 2.9 फीसदी और पाकिस्तान में 3.8 फीसदी जन्मदर है।

दावा: इस्लाम परिवार नियोजन के खिलाफ है

हकीकत: भारत में परिवार नियोजन की नीति धर्मनिरपेक्ष रही है। चूंकि मुस्लिमों की बड़ी आबादी आज भी अशिक्षित और गरीब है और समाज में हाशिए पर है, ऐसे में मुस्लिमों में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर जागरूकता की कमी भी है। ऐसे में लोगों को यह लगता है कि इस्लाम परिवार नियोजन के खिलाफ खड़ा है। जबकि हदीस जैसे मुस्लिम धर्मग्रंथों में भी परिवार बढ़ाने की बात करते वक्त इस बात पर जोर दिया जाता है कि ज्यादा औलाद होने से अच्छा है एक अच्छी औलाद का होना।

दावा: मुस्लिम ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं

हकीकत: 2011 की जनगणना के मुताबिक, कुल जन्मदर के लिहाज से देखा जाए तो हिंदुओं की कुल जन्मदर 2.0 के मुकाबले मुस्लिमों की जन्मदर 2.3 है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, 1992 से 2015 के बीच हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच फर्टिलिटी गैप 1.1 से घटकर 0.5 रह गई। 2015-16 से 2019-21 के बीच मुस्लिमों में कुल जन्मदर तकरीबन 10 फीसदी घटी है।

दावा: बहुविवाह के चलते मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है

हकीकत: एक जमाना था, जब मुस्लिम ही नहीं, हिंदुओं में भी बहुविवाह का चलन था। मगर, आधुनिक समय में साक्षरता बढ़ने और जागरूकता होने की वजह से इस पर रोक लगी है। मुस्लिमों में भले ही यह मान्य हो, लेकिन आम लोग इससे दूरी बनाकर रखते हैं। वो एक ही शादी में यकीन रख रहे हैं और बच्चे भी एक या दो ही पैदा कर रहे हैं।

दावा: मुस्लिम महिलाएं परिवार नियोजन के खिलाफ हैं

हकीकत: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार, धर्म के आधार पर केवल 2 फीसदी महिलाएं ही परिवार नियोजन के खिलाफ रही हैं। ये महिलाएं हर धर्म या समुदाय में हैं। मौजूदा वक्त में शादीशुदा महिलाएं परिवार नियोजन के आधुनिक तौर-तरीके आजमा रही हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज एंड मैक्रो इंटरनेशनल की 2007 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 50.2 फीसदी शादीशुदा हिंदू महिलाएं परिवार नियोजन के लिए आधुनिक तौर-तरीके अपना रही हैं। वहीं मुस्लिम शादीशुदा महिलाओं में यह प्रतिशत 36.4 फीसदी है। वहीं, फीमेल स्टरलाइजेशन हिंदू महिलाओं में जहां 39.9 फीसदी रहा है, जबकि मुस्लिम महिलाओं में यह 21.3 फीसदी है। यानी मुस्लिम महिलाएं इन मामलों में भी पीछे नहीं हैं।

क्या मुस्लिम आबादी भी स्थिर हो जाएगी

मुस्लिम महिलाएं भी ज्यादा बच्चे नहीं चाहती हैं, ये आंकड़े बताते हैं। 1992-93 में 22 फीसदी, 1998-99 में 30.2 फीसदी और 2005-06 में 36.2 फीसदी मुस्लिम महिलाओं ने परिवार नियोजन के नए तरीके आजमाए। भगत के अनुसार, अगर जन्म दर में ऐसी ही गिरावट होती रही तो हिंदू आबादी 2061 तक और मुस्लिम आबादी 2071 तक स्थिर हो जाएगी। कई इस्लामी विद्वान जैसे एमई खान ने अपनी किताब बर्थ कंट्रोल अमंग्स्ट मुस्लिम्स इन इंडिया में 1978 और एमएस तांतावी ने 1988 में छपी अपनी किताब बर्थ प्लानिंग एंड रिलीजियस पॉइंट ऑफ व्यू में कहा था कि इस्लाम परिवार नियोजन के खिलाफ नहीं है। हदीथ में कहा गया है कि अपने बच्चों को भिखारी बनाने से अच्छा है कि उन्हें दौलतमंद बनाया जाए।

दावा: मुस्लिमों में अपने ही सगे-संबंधी में ही शादी करने का चलन

हकीकत: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के अनुसार, 16 फीसदी मुस्लिम महिलाएं ही परिवार में ही शादी करती हैं, जबकि ऐसा माना जाता है कि मुसलमानों में अपने परिवार में शादी करने की प्रथा आम है। सर्वे के अनुसार, करीब 16 फीसदी मुस्लिम महिलाओं की शादी एक ही रक्त संबंध (पिता या माता की ओर से पहली या दूसरी चचेरी बहन, चाचा या अन्य रक्त संबंधियों) में हुई है। वहीं, 80% से अधिक मामलों में पति-पत्नी आपस में संबंधित नहीं थे। जबकि बौद्ध-नव बौद्ध समुदाय में सजातीय विवाह का यह आंकड़ा 14.5%, ईसाइयों में 11.9% और हिंदुओं में 10% रहा।

दावा: जहां साक्षरता ज्यादा, वहां मुस्लिमों की जन्मदर कम

हकीकत: शाश्वता घोष की किताब ‘हिंदू-मुस्लिम फर्टिलिटी डिफरेंशियल्स इन इंडिया’ के मुताबिक, 2011 में राजस्थान में मुस्लिमों की जनसंख्या वृद्धि दर 2.2 थी, जो 2001 में 4.2 थी। वहीं, यूपी में यह 2.6 थी, जो 2001 में 4.4 थी। बिहार में यह 4.5 थी, जो 2001 में 2.9 थी। पश्चिम बंगाल में 1.7 थी, जो 2001 में 2.6 थी। 2011 में महाराष्ट्र में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 1.9 थी, जो 2001 में 2.6 थी। मध्य प्रदेश में 3.9 से घटकर अब 2.6 रह गई। केरल में यह 1.8 थी, जो 2001 में 1.7 थी। यानी केरल में साक्षरता ज्यादा होने के बाद भी मुस्लिम आबादी की जन्मदर बीते एक दशक में बढ़ी है। तमिलनाडु में 2001 में यह वृद्धि दर 1.8 थी, जो 2011 आते-आते 1.6 हो गई।

2001 से 2011 के बीच हिंदुओं और मुस्लिमों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति

2001 में हिंदू आबादी का शहरीकरण 26.1 फीसदी था, जो 2011 में बढ़कर 29.2 हो गया था। वहीं, मुस्लिमों की इसी दौरान शहरीकरण 35.7 फीसदी से बढ़कर 39.9 फीसदी जा पहुंचा। साक्षरता दर के लिहाज से मुस्लिम महिलाओं ने अच्छी प्रगति की। जहां मुस्लिम पुरुषों में 2001 में 67.6 फीसदी साक्षरता दर थी, वहीं 2011 में यह 74.7 फीसदी हो गई। जबकि इसी दौरान मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता दर 50.1 से बढ़कर 62 फीसदी हो गई। सेक्स रेशियो के हिसाब से मुस्लिमों का प्रदर्शन हिंदुओं से बेहतर रहा है। हिंदुओं में 2001 में लिंगानुपात जहां 1000 लड़कों पर 931 लड़कियां थीं, वहीं यह 2011 में बढ़कर 939 हो गईं। मुस्लिम लड़कियों की प्रति 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या 936 थी, जो 2011 में बढ़कर 951 हो गई

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