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The News Air - Breaking News - West Bengal Election 2026: लुंगी में वोट देने से मना, 27 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए, जानें बंगाल चुनाव के विवाद

West Bengal Election 2026: लुंगी में वोट देने से मना, 27 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए, जानें बंगाल चुनाव के विवाद

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में लुंगी-बनियान पहनकर वोटिंग से रोका गया, 2.5 लाख केंद्रीय बलों की तैनाती, ईवीएम छेड़छाड़ के 77 मामले - क्या यही है फ्री एंड फेयर इलेक्शन?

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West Bengal Election 2026
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West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 खत्म हो चुका है और 4 मई को नतीजे आने वाले हैं। लेकिन इस चुनाव को लेकर जो विवाद सामने आए हैं, वे भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर सवाल खड़े करते हैं। दो मतदाताओं – अली मंडल और गणेश मजूमदार – को लुंगी पहनकर वोट देने से रोक दिया गया। उन्हें 800 मीटर वापस जाकर पतलून पहनकर आना पड़ा, तब जाकर वोट मिला। यह केवल एक घटना नहीं है, बल्कि पूरे चुनाव में जिस तरह से केंद्रीय बलों की 2.5 लाख की अभूतपूर्व तैनाती की गई, 27 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए, ईवीएम छेड़छाड़ के 77 मामले सामने आए – इन सबने बंगाल के चुनाव को एक प्रयोगशाला बना दिया है जहां लोकतंत्र के militarization का परीक्षण हो रहा है।

अगर गौर करें तो Telegraph अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बलों ने दो मतदाताओं को किस आधार पर लुंगी पहनने पर रोका, यह सवाल आज तक अनुत्तरित है। क्या भारत में मतदान के लिए कोई ड्रेस कोड है? क्या आम आदमी के पारंपरिक कपड़े अब लोकतंत्र में अस्वीकार्य हो गए हैं?

लुंगी-बनियान में वोट देने से रोका गया: क्या है ड्रेस कोड?

पश्चिम बंगाल के दो नागरिकों – अली मंडल और गणेश मजूमदार – के साथ जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र में एक नई बहस का विषय बन गया है। जब ये दोनों मतदाता लुंगी और बनियान पहनकर अपने मतदान केंद्र पहुंचे, तो केंद्रीय बलों के जवानों ने उन्हें वोट देने से मना कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों को 800 मीटर वापस जाना पड़ा, घर जाकर पतलून पहनकर आना पड़ा, तब जाकर उन्हें मतदान का अधिकार मिला। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत के चुनाव आयोग के किसी भी नियम में मतदान के लिए किसी विशेष ड्रेस कोड का उल्लेख नहीं है।

Telegraph अखबार के संवाददाताओं की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना अकेली नहीं है। कई स्थानों पर आम लोगों के पारंपरिक कपड़ों को लेकर सवाल उठाए गए। तो फिर सवाल उठता है – क्या अब अरमानी सूट पहनकर नहीं आने वालों को भी वोटिंग लाइन से बाहर कर देना चाहिए? क्या वोटर के कपड़ों के ब्रांड की चेकिंग भी चुनाव आयोग की ड्यूटी है?

केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व तैनाती: बंगाल बना छावनी

पश्चिम बंगाल के चुनाव में जिस पैमाने पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की तैनाती की गई, वह भारतीय चुनावी इतिहास में अभूतपूर्व है। करीब 2.5 लाख केंद्रीय बलों के जवान बंगाल की गली-गली में तैनात किए गए।

TMC सांसद साकेत गोखले ने आंकड़े tweet किए हैं जो चौंकाने वाले हैं। 29 अप्रैल को मणिपुर में जहां महीनों से हिंसा चल रही है, वहां CAPF के केवल 18,500 जवान तैनात थे। लेकिन उसी दिन अकेले कोलकाता में 28,500 जवान तैनात किए गए।

समझने वाली बात यह है कि कोलकाता में मणिपुर से 10,000 जवान अधिक तैनात किए गए। पूरे मणिपुर की तुलना में सिर्फ एक शहर कोलकाता में अधिक अर्धसैनिक बल! यह आंकड़ा क्या संदेश देता है?

Frontline पत्रिका में अंकुश पाल के लेख “The Bengal Laboratory” के अनुसार, बंगाल का चुनाव आम जिंदगी के militarization की प्रयोगशाला बन गया है। सवाल है – क्या कोर्ट, प्रेस और जन आंदोलन इसके खतरों को पहचान कर आवाज उठा सकते हैं?

चुनाव आयोग का आदेश, गृह मंत्रालय का allocation

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग आदेश देता है, गृह मंत्रालय allocation करता है और CAPF के लाखों जवान बंगाल की गली-गली में पसर जाते हैं। Area Domination March करते हैं। उनके लिए क्लासरूम को कैंप में बदल दिया जाता है।

देखा जाए तो इस choreography की समझ आम जनता में कैसे बनेगी? बंगाल के चुनाव से लोगों में यह आदत डाल दी गई कि बंदूकों के साए में वोट डालना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। और ऐसी आदत आसानी से नहीं जाती – यह अब आगे के चुनावों का हिस्सा बनी रह सकती है।

शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के नेता आदित्य ठाकरे ने कहा है – “बंगाल ने जिसका सामना किया है, उसके बारे में एक पल के लिए तटस्थ होकर सोचिए। बंगाल के साथ इस तरह से क्यों किया गया जैसे हमला हो गया हो। भारत में सहकारी संघवाद के सम्मान से ज्यादा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं। इस चुनाव को जैसे कराया गया, उससे साबित होता है कि भारत का लोकतंत्र खत्म हो चुका है।”

60 दिन तक तैनाती: चुनाव के बाद भी जारी रहेगा सैन्यीकरण?

गृह मंत्री अमित शाह ने अपने भाषणों में कहा कि बंगाल में चुनाव के बाद 60 दिनों तक केंद्रीय बलों की तैनाती बनी रहेगी। CRPF के महानिदेशक जीपी सिंह ने tweet किया – “अगले आदेश तक CAPF की 500 कंपनियां बंगाल में तैनात रहेंगी।”

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Telegraph में खबर छपी है कि चुनाव के बाद 70,000 जवानों की तैनाती बनी रहेगी। सवाल उठता है – किस लिए? क्या राज्य की पुलिस किसी काम की नहीं रही? चुनाव के बाद 2 महीने तक की तैनाती की क्या जरूरत है?

चुनाव आचार संहिता लागू होने के साथ ही चुनाव के बाद भी तैनाती रहेगी, इसके आदेश जारी हो गए। यह सब पहले से क्यों हो रहा है? इस तरह की प्रक्रिया हमेशा इसी तरह शुरू होती है जैसे बंगाल में हुई और फिर पूरे देश में लागू की जाती रहेगी – जैसे उत्तर पूर्व और कश्मीर में AFSPA लगाकर सुरक्षा बलों को जो शक्तियां दी गईं, उनका इस्तेमाल देश के दूसरे इलाकों में भी किया गया।

27 लाख वोटर्स के नाम काटे गए: SIR का सच

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग हर बार बताता है कि इस बार 92-93% मतदान हुआ जितना आजादी के बाद कभी नहीं। लेकिन आयोग यह क्यों नहीं बताता कि इस रिकॉर्ड मतदान के पीछे का सच क्या है?

Summary Revision of Electoral Roll (SIR) के कारण करीब 27 लाख वोटर के नाम काट दिए गए। कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.76 करोड़ हो गई। पिछली बार की तुलना में 11% वोटर कम हो गए।

The Hindu अखबार के data experts के अनुसार, अगर इस हिसाब से देखें तो पिछली बार की तुलना में इस बार बंगाल में केवल 3.6% मतदान ही अधिक हुआ। 27 लाख लोगों को वोट देने का मौका मिलता तो कितना मतदान प्रतिशत बढ़ जाता – यह आंकड़े चुनाव आयोग क्यों नहीं बताता?

2001 में जब SIR हुआ तब केवल 1% वोटर ही कम हुआ। लेकिन उसके बाद 2006 के विधानसभा चुनाव में voter turnout पश्चिम बंगाल में 7.7% बढ़ा। इस बार केवल 3.6% ही बढ़ा है।

दिलचस्प बात यह है कि आयोग कह रहा है आजादी के बाद पहली बार 92% से अधिक मतदान हुआ। लेकिन आजादी के बाद पहली बार 27 लाख वोटर के नाम वोटर लिस्ट से काटे गए। उन्हें वोट नहीं देने दिया गया। क्या आयोग यह आंकड़ा बार-बार बताता है?

ईवीएम छेड़छाड़ के 77 मामले: कहां गई सुरक्षा?

पश्चिम बंगाल में ईवीएम से छेड़छाड़ के 77 मामले दर्ज हुए। बंगाल के निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि 25 मामलों में छेड़छाड़ की पुष्टि हो चुकी है। इशारा किया गया कि इन मामलों में 2 मई तक फिर से मतदान हो सकता है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जब सभी मतदान केंद्रों का live webcast किया जा रहा था और तीनों चुनाव आयुक्त खुद निगरानी कर रहे थे, हर मतदान केंद्र के चारों तरफ 100 मीटर का सुरक्षा घेरा बनाया गया था – इसके बाद भी ईवीएम मशीनों से छेड़छाड़ की शिकायतें कैसे आ गईं?

फाल्ता विधानसभा में ईवीएम से छेड़छाड़ की 32 शिकायतें आईं। BJP के बटन पर टेप लगाए जाने की शिकायत हुई। फाल्ता में 20 शिकायतों की पुष्टि हो चुकी है। डायमंड हार्बर में 29 शिकायतें, मोगराहाट से 13 शिकायतें, बजबज में 3 शिकायतें मिलीं।

बाली में ईवीएम में तकनीकी गड़बड़ी की खबर आई जिसके बाद सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। लाठीचार्ज हुआ और किसी तरह मामले को शांत किया गया। यहां की मशीन में वोट रिकॉर्ड नहीं हो रहा था जिसे ठीक करने में कई घंटे लगे।

रघुनाथपुर के एक बूथ से खबर है कि यहां कमल के निशान पर स्याही लगा दी गई। BJP ने फाल्ता में दोबारा मतदान कराने की मांग की है और बकायदा पत्र लिखा है।

IPack डायरेक्टर की गिरफ्तारी और तुरंत बेल: सियासी दांवपेच?

चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस के लिए काम करने वाली IPack कंपनी के निदेशक विनेश चंदेल को 13 अप्रैल को ED ने गिरफ्तार किया। चुनाव के समय ED ने कहा कि कई करोड़ का घोटाला पकड़ा है और मीडिया में बड़े-बड़े आरोपों की सुर्खियां छपीं।

लेकिन 30 अप्रैल को, दूसरे चरण के मतदान के बाद, विनेश चंदेल को जमानत मिल गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ED ने उनकी जमानत का विरोध तक नहीं किया।

देखा जाए तो गिरफ्तारी के समय जो आरोप मीडिया में छपे, क्या उनके जरिए ममता बनर्जी के खिलाफ माहौल बनाया गया? IPack जो पिछले कई वर्षों से बंगाल के चुनाव के लिए TMC को तैयारी करा रही थी, जिनके पास सारी strategy थी, सारी planning थी, एक-एक candidate के profile थे – उन पर चुनाव से कुछ दिनों पहले छापा मारा गया।

बताया गया है कि IPack ने अपने ज्यादातर employees को छुट्टी पर भेज दिया ताकि वे तृणमूल कांग्रेस का काम न कर सकें। और चुनाव खत्म होने के अगले ही दिन ED के विरोध के बिना बेल मिल गई।

Form 17C की मांग: पारदर्शिता कहां है?

RTI कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने अपील की है कि चुनाव आयोग को तुरंत ही Form 17C जारी कर बताना चाहिए कि हर बूथ पर कितने लोगों ने मतदान किया। Turnout का कानूनी प्रमाण यही है।

यही फॉर्म आयोग को बताना चाहिए कि शाम 6:00 बजने पर हर बूथ पर कितने लोगों को token दिया गया। इतने विवादपूर्ण चुनाव में इतना करना पारदर्शिता का सबसे न्यूनतम फर्ज अदा करना है।

TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि पूरी रात उनके कार्यकर्ता 17C जमा करने में लगे रहे। इस फॉर्म को digitized भी कर दिया गया है और अब Returning Officer के साथ इनकी scrutiny होगी जहां data मिलान किया जाएगा।

तो यह तैयारी थी तृणमूल के चुनाव लड़ने की। जब केंद्रीय बलों के 2.5 लाख जवानों की तैनाती एक राज्य में की जा सकती है, हर 100-150 मतदाताओं पर एक जवान तैनात हो सकता है, तब turnout का पूर्ण आंकड़ा देने में ढिलाई किस बात की?

ममता बनर्जी के आरोप: लोकतंत्र पर हमला

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 29 अप्रैल को सुबह से ही भवानीपुर की अपनी सीट के राउंड लगाए। केंद्रीय सुरक्षा बलों और चुनाव आयोग के observers पर पक्षपात के आरोप लगे। आरोप लगाया कि BJP के लिए काम किया गया, आम लोगों के साथ मारपीट की गई, महिलाओं-बच्चों को निशाना बनाया गया।

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि कोर्ट के आदेश की अवमानना करते हुए उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। TMC का आरोप है कि उदयनारायणपुर में केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों द्वारा की गई धक्कामुक्की के कारण एक 81 वर्षीय व्यक्ति की मौत हो गई।

अभिषेक बनर्जी ने video जारी कर कहा कि बुजुर्ग व्यक्ति अपना वोट डालने आए थे, बिना सहायता नहीं चल सकते थे। इसलिए अपने बेटे की मदद से बूथ तक पहुंचने की कोशिश की। मगर सुरक्षा बलों के जवानों ने उन्हें धक्का दे दिया और बुजुर्ग बेहोश होकर गिर गए। अस्पताल ले जा रहे थे मगर मृत घोषित कर दिए गए।

अभिषेक बनर्जी ने कहा – “अमित शाह ने सुरक्षा बलों को अपनी निजी सेना में बदल दिया है। बंगाल के लोगों पर licensed ठगों को थोप दिया गया है।”

काउंटिंग सुपरवाइजर पर विवाद: राज्य के अधिकारी अयोग्य?

30 अप्रैल को कल्याण बंधोपाध्याय ने कोलकाता हाईकोर्ट में याचिका दायर की कि काउंटिंग सुपरवाइजर केवल केंद्रीय सरकार और PSU के अफसरों को बनाया जा रहा है।

सवाल उठता है – क्या राज्य सरकार का कोई भी अधिकारी नहीं मिला जो काउंटिंग सुपरवाइजर के लिए योग्य रहा हो? अगर इस तरह का अविश्वास जताया जा रहा है तब फिर जीतने के बाद BJP क्या बंगाल चलाने के लिए केंद्र से अफसरों और कर्मचारियों को लेकर आएगी?

यह मामला यह भी बताता है कि तृणमूल कांग्रेस कितनी बारीकी से एक-एक चीजों पर नजर रख रही है और अदालत के पास दौड़ लगा रही है। कितने मामलों में कोर्ट ने उन शिकायतों को सही पाया और कितने मामलों में समय पर फैसला नहीं हुआ।

मतदान प्रतिशत का गणित: क्यों गिरा दूसरे चरण में?

दूसरे चरण के लिए 91.96% मतदान हुआ। पहले चरण में 93.19% मतदान हुआ। दूसरे चरण में NIA की तैनाती कर दी गई, 11 अतिरिक्त पुलिस observer बुलाए गए तो मतदान करीब 2% कम हुआ। यह कमी क्यों आई?

जितने भी मतदान केंद्र बनाए गए उन सभी का live webcast किया जा रहा था और उन सभी की निगरानी तीनों चुनाव आयुक्त खुद कर रहे थे। इसके बाद भी पश्चिम बंगाल में ईवीएम से छेड़छाड़ के 77 मामले दर्ज हुए।

The Hindu में दिव्याशी बिहानी, सांभवी, पार्थस, पवन, बसंत पी.ए. का जो विश्लेषण छपा है – क्या आम लोगों तक यह बात पहुंच पाएगी कि 92-93% मतदान होने के दावों में कितना झोल है?

The Hindu के data experts का कहना है कि पश्चिम बंगाल में पिछले 10 विधानसभा चुनाव से तुलना करेंगे तो इस बार सबसे कम मतदान प्रतिशत बढ़ा है। क्या यही बात चुनाव आयोग नहीं बता सकता ताकि एक बार में देश जान जाए?

Exit Poll बनाम Reality: 2021 का सबक

TMC सांसद डेरेक ओ’ब्रायन और कीर्ति आजाद ने exit poll की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। 2021 के बंगाल चुनाव के exit poll के आंकड़े दिखाए और असल नतीजे से तुलना करते हुए कहा – exit poll अंतिम आंकड़ों से उलट थे।

BJP को जितनी सीटें दी जा रही थीं उसकी आधी मिली और TMC को 215 सीटों का प्रचंड बहुमत। इसी तरह लोकसभा चुनाव के दौरान TMC को अनुमान से 10 सीटें ज्यादा आईं।

Exit poll वैसे 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को 350 से लेकर 400 सीटें दे रहे थे। तृणमूल कांग्रेस तमाम घेराबंदी के बाद भी दावा कर रही है कि जीतने जा रही है।

डायरेक्ट एक्शन के वीडियो बयान में प्रधानमंत्री मोदी को चैलेंज किया गया है कि हार जाने के बाद क्या वे इस्तीफा देंगे। ममता बनर्जी भी दावा कर रही हैं कि उन्हें दो तिहाई बहुमत मिलेगा – 196 से ज्यादा सीटें आएंगी।

BJP के शुभेंदु अधिकारी कह रहे हैं 180 सीटें BJP को मिलेगी। 4 मई को नतीजे आएंगे और तब सब साफ हो जाएगा।

बंगाल का सबक: आज बंगाल, कल पूरा देश?

पश्चिम बंगाल का नतीजा कुछ भी हो, किसी की तरफ हो – इस चुनाव को जैसे कराया गया, उन प्रक्रियाओं को, उन खबरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

Frontline के अंकुश पाल के अनुसार, असल मुद्दा यह है कि बंगाल में जिस तरह से तैनाती की गई वह नियमों से हटकर कुछ भी करने की संस्कृति को बढ़ावा देती है। Military की मौजूदगी को इस तरह आम बना देती है कि चुनाव के बाद भी तैनाती का असर रह जाता है।

बंगाल के चुनाव से लोगों में इसकी आदत डाल दी गई कि बंदूकों के साए में वोट डालना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। और ऐसी आदत आसानी से नहीं जाती – यह अब आगे के चुनावों का हिस्सा बनी रह सकती है।

इस तरह की प्रक्रिया हमेशा इसी तरह शुरू होती है जैसे बंगाल में हुई और फिर पूरे देश में लागू की जाती रहेगी – जैसे उत्तर पूर्व और कश्मीर में AFSPA लगाकर सुरक्षा बलों को जो शक्तियां दी गईं, उनका इस्तेमाल देश के दूसरे इलाकों में भी किया गया। आज भी AFSPA के नियम इन इलाकों में लागू हैं।

सवाल है – क्या हमारे courts, press, जन आंदोलन इसके खतरों को पहचान कर इसके खिलाफ आवाज उठा भी सकते हैं? रोक सकते हैं? बंगाल में जो हुआ उसे आप बीतने नहीं दे सकते। उन घटनाओं की तरफ बार-बार लौटना होगा, देखना होगा, समझना होगा कि बंगाल में क्या हुआ, क्यों किया गया।

बंगाल के चुनाव का militarization भारत के लोकतंत्र का लंबे समय तक पीछा करेगा। यह सिर्फ ममता बनर्जी की बात नहीं जिसे सब कुछ अकेले सामना करना पड़ा। यह बंगाल की बात है और भारत नाम के विचार की बात है। दुनिया में भारत के लोकतंत्र की साख की बात है।


मुख्य बातें (Key Points)

• 27 लाख वोटर्स के नाम SIR में काटे गए, 92-93% मतदान के दावों में सच केवल 3.6% वृद्धि
• 2.5 लाख केंद्रीय बलों की तैनाती – कोलकाता में मणिपुर से 10,000 जवान अधिक
• ईवीएम छेड़छाड़ के 77 मामले, 25 की पुष्टि – फाल्ता में 32 शिकायतें
• IPack डायरेक्टर को चुनाव से पहले गिरफ्तार, चुनाव के बाद ED ने जमानत का विरोध नहीं किया


 

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