Weight Gain Problem Reasons: आप दिन में चार बार खाते हैं, थाली भर-भर कर खाते हैं, जो मन करता है वो खाते हैं — फिर भी वजन नहीं बढ़ता। दोस्त और परिवार वाले कहते हैं “कितने लकी हो, काश हम भी ऐसे होते।” लेकिन आरजेएन अपोलो हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. अनुग्रह दुबे की बात सुनें तो यह “वरदान” उतना बड़ा है नहीं जितना दिखता है। क्योंकि बाहर से दुबले दिखने वाले इंसान के अंदर भी फैट भर-भर कर जमा हो सकता है। चूंकि वो दिखता नहीं, इंसान खूब खाता रहता है और शरीर चुपचाप अंदर ही अंदर बीमार पड़ता रहता है।
तीन वजहें — खूब खाने के बाद भी क्यों नहीं बढ़ता वजन?
डॉ. अनुग्रह दुबे के अनुसार, कुछ लोग ज्यादा खाने के बाद भी मोटे इसलिए नहीं होते क्योंकि उनका कैलोरी एक्सपेंडिचर यानी कैलोरी बर्न आउट ज्यादा होता है। उनका बेसल मेटाबॉलिक रेट (BMR) ज्यादा होता है, जो जेनेटिकली प्रीडिटरमाइंड भी हो सकता है।
पहली वजह — जेनेटिक्स और हाई मेटाबॉलिक रेट: कुछ लोगों का शरीर पैदाइशी तौर पर कैलोरी तेजी से जलाता है। इसका मतलब है कि वे जितना खाते हैं, उनका शरीर उसे उतनी ही तेजी से ऊर्जा में बदल देता है — फैट के रूप में जमा ही नहीं होने देता।
दूसरी वजह — छिपी हुई बीमारियां: कई बार वजन न बढ़ने के पीछे कोई गंभीर बीमारी भी हो सकती है। डॉ. अनुग्रह ने बताया कि इंसुलिन की कमी, टाइप वन डायबिटीज, ट्यूबरक्लोसिस (टीबी), हाइपरथायरॉइडिज्म या कोई अंडरलाइन मैलिग्नेंसी (कैंसर) — इन सबमें भी वजन नहीं बढ़ता। ऐसे में सिर्फ “लकी” समझकर बैठे रहना खतरनाक हो सकता है।
तीसरी वजह — अर्ली सटाइटी (जल्दी पेट भरना): कुछ लोग थोड़ा खाते हैं और उनका पेट जल्दी भर जाता है। डॉ. अनुग्रह ने बताया कि डायबिटीज की एक कॉम्प्लिकेशन होती है — डायबिटिक गैस्ट्रोपैरेसिस — जिसमें आंतों की गति कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में थोड़ा सा खाने पर ही पेट भरा-भरा लगता है और डाइट कम हो जाती है। दिलचस्प बात यह है कि ओबेसिटी की जो भी दवाइयां हैं, वे भी इसी सिद्धांत पर काम करती हैं — ब्रेन में ऐसा महसूस कराती हैं कि भूख नहीं है।
TOFI — बाहर से दुबला, अंदर से मोटा — सबसे खतरनाक स्थिति
डॉ. अनुग्रह दुबे ने एक बेहद जरूरी मेडिकल कंडीशन के बारे में बताया जो ज्यादातर लोग नहीं जानते — TOFI (Thin Outside Fat Inside)। इसका मतलब है कि व्यक्ति बाहर से दुबला-पतला दिखता है, लेकिन अंदर से उसके अंगों के आसपास खतरनाक मात्रा में फैट जमा होता है।
शरीर में दो तरह का फैट होता है — विसरल फैट (अंगों के आसपास जमा होने वाला) और पेरिफेरल फैट (बाहर त्वचा के नीचे दिखने वाला)। जो बाहर से दिखाई देता है वो पेरिफेरल फैट है। लेकिन दुबले व्यक्ति का विसरल फैट बहुत ज्यादा हो सकता है। ऐसे लोगों को एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनियों में प्लाक जमना), हार्ट अटैक, प्लाक आना और कोरोनरी आर्टरी डिजीज होने के चांस कहीं ज्यादा होते हैं।
डॉ. अनुग्रह ने साफ कहा — “पतला होना कोई पैमाना नहीं है कि वो पूर्णतः स्वस्थ है।” इसलिए सिर्फ वजन पर नहीं, BMI (बॉडी मास इंडेक्स) पर ध्यान दें।
जीन्स बदल नहीं सकते, लेकिन आदतें बदल सकते हैं
डॉ. अनुग्रह से जब पूछा गया कि दुबला या मोटा होने में जीन्स ज्यादा जिम्मेदार हैं या आदतें, तो उनका जवाब बिल्कुल साफ था। उन्होंने कहा कि जीन्स जेनेटिकली प्रीडिटरमाइंड होते हैं और इन्हें बदलना आसान नहीं है। लेकिन आदतें जीन्स से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
मेटाबॉलिज्म तेज रखने के लिए डॉ. अनुग्रह ने कुछ जरूरी सलाह दीं। रेगुलर एक्सरसाइज करें जिसमें रनिंग, वॉकिंग, स्विमिंग और साइकिलिंग शामिल हो। थायरॉइड डिसऑर्डर्स की जांच कराएं कि कहीं हाइपोथायरॉइडिज्म तो नहीं है। महिलाओं को PCOS/PCOD की जांच करानी चाहिए। कोई एंडोक्राइन डिजीज तो नहीं है जिसकी वजह से BMR घट रहा हो — यह पता करना जरूरी है। बैलेंस डाइट लें और कैलोरी इनटेक और कैलोरी बर्न आउट को बराबर मेंटेन करें।
ओबेसिटी से संक्रामक बीमारियों से मौत का खतरा 70% ज्यादा — लैंसेट स्टडी
वजन न बढ़ने की समस्या एक तरफ है, दूसरी तरफ मोटापे का संकट और भी खतरनाक तस्वीर पेश कर रहा है। द लैंसेट जर्नल में छपी एक ताजा स्टडी ने चौंकाने वाले नतीजे सामने रखे हैं। इस स्टडी के लिए रिसर्चर्स ने फिनलैंड और यूके के लगभग 5,47,000 लोगों का डेटा खंगाला और इनकी सेहत को औसतन 13 से 14 साल तक ट्रैक किया।
नतीजे हैरान करने वाले थे — जिन लोगों का BMI 30 या उससे ज्यादा है यानी वे ओबीज हैं, उनके इनफेक्शन की वजह से हॉस्पिटल में भर्ती होने या जान जाने का रिस्क 70% ज्यादा है। इतना ही नहीं, साल 2023 में इनफेक्शन से हुई कुल मौतों में हर 10 में से एक मौत ओबेसिटी से जुड़ी हो सकती है।
मोटापा कैसे बनाता है संक्रामक बीमारियों को जानलेवा?
मणिपाल हॉस्पिटल गुरुग्राम में बेरिएट्रिक एंड रोबोटिक सर्जरी के एचओडी और चेयरमैन डॉ. सुमित शाह ने इसकी विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने बताया कि ओबेसिटी मेटाबॉलिज्म से जुड़ी एक बीमारी है जो शरीर के इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देती है। ऐसे में कोविड-19 और निमोनिया जैसे इनफेक्शन जानलेवा हो सकते हैं।
ज्यादा वजन अक्सर डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ा होता है। जब कोई ओबीज मरीज ICU में आता है तब शरीर इनफेक्शन से ठीक से लड़ नहीं पाता। इसके ऊपर अगर स्लीप एपनिया है तो फेफड़े पूरी ताकत से काम नहीं कर पाते और इनफेक्शन और ज्यादा गंभीर हो जाता है।
कोविड-19 के दौरान यह बात साफ तौर पर देखी गई कि ओबीज मरीजों में मौत की दर काफी ज्यादा थी। मोटापा फ्लू, कोविड-19, निमोनिया, गैस्ट्रोएंट्राइटिस, यूरिन इनफेक्शन और लोअर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इनफेक्शन — इन सभी संक्रामक बीमारियों को गंभीर बना देता है।
2050 तक भारत के 45 करोड़ लोग होंगे ओवरवेट — लैंसेट की चेतावनी
यह पूरी तस्वीर भारत के लिए और भी चिंताजनक है। मार्च 2025 में द लैंसेट में ही एक और स्टडी छपी थी जिसके मुताबिक साल 2050 तक भारत की करीब एक तिहाई आबादी मोटापे से ग्रसित होगी। देश के करीब 22 करोड़ पुरुष और 23 करोड़ से ज्यादा महिलाएं ओवरवेट होंगी — यानी लगभग 45 करोड़ लोग।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि 15 से 24 साल के युवाओं में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है और यह आगे और बढ़ेगा। अगर भारत में मोटापे की यही रफ्तार रही तो आने वाले समय में सामान्य संक्रामक बीमारियों से होने वाली मौतों की संख्या नाटकीय रूप से बढ़ सकती है। एक साधारण मौसमी फ्लू भी ओबीज व्यक्ति के लिए जानलेवा बन सकता है — यह बात अब रिसर्च से साबित हो चुकी है।
डाइट और एक्सरसाइज से वजन क्यों नहीं घटता? डॉ. सुमित का जवाब
डॉ. सुमित शाह ने एक बहुत जरूरी बात कही जो मोटापे से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए राहत की बात है। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति एक्सरसाइज कर रहा है, डाइट कर रहा है, फिर भी वजन कम नहीं हो रहा तो उसे किसी एक्सपर्ट से जरूर मिलना चाहिए। पता करना चाहिए कि डाइट और एक्सरसाइज काम क्यों नहीं कर रही।
ओबेसिटी में जेनेटिक्स और आसपास के माहौल का भी बहुत बड़ा असर पड़ता है। अगर कोई व्यक्ति आलस करता है, ज्यादा कैलोरीज वाली चीजें खाता है और लाइफस्टाइल अनहेल्दी है तो ओबीज होने का चांस ज्यादा है। घर का बना हेल्दी खाना खाएं, खूब चलें-फिरें, एक्सरसाइज करें और कोशिश करें कि BMI 18 से 25 के बीच रहे। डॉक्टर की सलाह से ओबेसिटी की दवाएं भी ली जा सकती हैं जो काफी असरदार साबित हुई हैं।
देसी खांड बनाम वाइट शुगर — क्या है सच्चाई?
सोशल मीडिया पर आजकल देसी खांड को वाइट शुगर का “हेल्दी विकल्प” बताया जा रहा है। लेकिन क्या यह दावा सच है? पारस हेल्थ गुरुग्राम की डाइटिशियन तृष्या आले ने इसकी पूरी सच्चाई बताई।
देसी खांड गन्ने के रस से तैयार की जाती है। पहले गन्ने से रस निकाला जाता है, फिर छाना जाता है ताकि गंदगी निकल जाए। इसके बाद रस को हाई टेम्परेचर पर उबाला जाता है जिससे वह गाढ़ा हो जाता है। फिर इसका क्रिस्टलाइजेशन किया जाता है यानी गाढ़े रस से छोटे-छोटे दाने बनाए जाते हैं। इन दानों को सुखाकर पैक कर दिया जाता है। इसका रंग हल्का भूरा, ऑफ वाइट या हल्का पीला होता है — वाइट शुगर की तरह एकदम सफेद नहीं।
देसी खांड वाइट शुगर से बेहतर क्यों है? दो वजहें
डाइटिशियन तृष्या आले ने दो मुख्य वजहें बताईं। पहली वजह — कम प्रोसेसिंग। देसी खांड बनाते समय न तो केमिकल्स डाले जाते हैं और न ही ब्लीचिंग एजेंट्स का इस्तेमाल होता है। लेकिन वाइट शुगर को रिफाइन करने के लिए भारी प्रोसेसिंग की जाती है — इससे रंग तो सफेद हो जाता है, लेकिन गन्ने में मौजूद पोषक तत्व लगभग खत्म हो जाते हैं।
दूसरी वजह — पोषक तत्व। वाइट शुगर में कोई खास पोषक तत्व नहीं होते, सिर्फ खाली कैलोरीज होती हैं। लेकिन देसी खांड में आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे मिनरल्स कुछ मात्रा में होते हैं। आयरन शरीर में खून की कमी नहीं होने देता। कैल्शियम हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है। मैग्नीशियम मांसपेशियों और नसों के ठीक से काम करने के लिए जरूरी है। पोटैशियम दिल का ख्याल रखता है।
मिठास की रैंकिंग — शहद सबसे ऊपर, वाइट शुगर सबसे नीचे
डाइटिशियन तृष्या आले ने मिठास के विकल्पों की एक रैंकिंग भी बताई। सबसे हेल्दी विकल्प शुद्ध शहद है — पहले नंबर पर। दूसरे नंबर पर है गुड़ क्योंकि इसे सबसे कम प्रोसेस किया जाता है। तीसरे नंबर पर आती है देसी खांड। और सबसे नीचे है वाइट शुगर जिसे सबसे ज्यादा प्रोसेस किया जाता है और जिसमें कोई पोषक तत्व नहीं बचता।
देसी खांड को चाय, कॉफी और दूध में डाल सकते हैं। खीर, हलवा और लड्डू बनाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। दही में डालकर भी खा सकते हैं। जहां-जहां मिठास की जरूरत हो, वहां वाइट शुगर की जगह देसी खांड इस्तेमाल करना समझदारी भरा कदम होगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- खूब खाने के बाद भी वजन न बढ़ने की तीन वजहें — हाई मेटाबॉलिक रेट (जेनेटिक), छिपी हुई बीमारियां (टाइप 1 डायबिटीज, टीबी, हाइपरथायरॉइडिज्म, मैलिग्नेंसी) और अर्ली सटाइटी; TOFI कंडीशन में बाहर से दुबला व्यक्ति अंदर से खतरनाक विसरल फैट से भरा हो सकता है।
- लैंसेट स्टडी के अनुसार BMI 30+ वालों में इनफेक्शन से मौत का खतरा 70% ज्यादा — 5,47,000 लोगों पर 13-14 साल की स्टडी में पाया गया कि 2023 की हर 10 इनफेक्शन मौतों में से 1 ओबेसिटी से जुड़ी थी; 2050 तक भारत के 45 करोड़ लोग ओवरवेट होंगे।
- देसी खांड वाइट शुगर से बेहतर विकल्प — कम प्रोसेसिंग और आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम जैसे मिनरल्स की मौजूदगी के कारण; लेकिन मिठास की रैंकिंग में शुद्ध शहद सबसे ऊपर, फिर गुड़, फिर देसी खांड और सबसे नीचे वाइट शुगर है।








