Trump India Deal: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने दुनिया के किसी भी राष्ट्राध्यक्ष का नाम इतनी बार नहीं लिया होगा जितनी बार वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम ले चुके हैं और लगातार ले रहे हैं। दो दिन पहले एयरफोर्स वन में सवार होकर भारत को निशाने पर लिया, कल कैनेडी सेंटर में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के कार्यक्रम में फिर मोदी का नाम लिया। ट्रंप ने खुलेआम कहा कि “मोदी को पता है मैं खुश नहीं था और मुझे खुश करना जरूरी है।” सवाल यह है कि आखिर कौन सी बड़ी डील ट्रंप चाहते हैं जो भारत देने को तैयार नहीं है और इसीलिए बार-बार भारत और मोदी का नाम लेकर अंतरराष्ट्रीय तौर पर दबाव बनाया जा रहा है?
कैनेडी सेंटर में ट्रंप ने क्या कहा?
कल जब ट्रंप कैनेडी सेंटर में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के कार्यक्रम में मौजूद थे तो बात अमेरिकी लड़ाकू विमानों और टैरिफ की हो रही थी। लेकिन एक झटके में बात भारत और प्रधानमंत्री मोदी पर आकर टिक गई।
ट्रंप ने कहा कि F-35 को पाने में काफी समय लगता है। अपाचे हेलीकॉप्टर को लेकर भारत मेरे पास आया और बोला कि सर हम इसका 5 साल से इंतजार कर रहे हैं। भारत ने 68 अपाचे हेलीकॉप्टर का ऑर्डर दिया था।
ट्रंप ने आगे कहा कि “प्रधानमंत्री मोदी मुझसे मिलने आए और पूछा कि सर प्लीज क्या मैं आपसे मिल सकता हूं? मैंने कहा हां क्योंकि मेरे उनके संबंध अच्छे हैं। हालांकि उनको जितना टैरिफ देना पड़ रहा है उसकी वजह से वह मुझसे खुश नहीं हैं। लेकिन अब उन्होंने बहुत हद तक रूस से तेल लेना बंद कर दिया है। हम टैरिफ की वजह से बहुत अमीर हो रहे हैं।”
एयरफोर्स वन में क्या हुआ था?
इससे पहले रविवार को एयरफोर्स वन में सफर करते वक्त भी भारत को निशाने पर लिया गया। अमेरिकी सेनेटर लिंडसे ग्राहम जो ट्रंप के सबसे करीबी हैं, उन्होंने खुलासा किया।
ग्राहम ने कहा कि “ट्रंप ने भारत पर रूस से तेल खरीदने पर 25% टैरिफ लगाया है। मैं लगभग एक महीने पहले भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा के घर पर था और वह सिर्फ यह बात करना चाहते थे कि कैसे वे अब रूस से बहुत कम तेल खरीद रहे हैं और मैं राष्ट्रपति से कहूं कि टैरिफ में राहत दे दें भारत को।”
ग्राहम ने आगे कहा कि “अगर आप सस्ता रूसी तेल खरीदते रहेंगे और पुतिन की वार मशीन को चलने देंगे तो हम राष्ट्रपति को यह क्षमता मुहैया कराएंगे कि वह टैरिफ के जरिए कठिन विकल्प चुने।”
इस बीच ट्रंप ने टोकते हुए कहा – “वे खुश करना चाहते थे। मूल रूप से मोदी बहुत अच्छे इंसान हैं। उन्हें पता है मैं खुश नहीं था और मुझे खुश करना जरूरी है।”
ट्रंप आखिर चाहते क्या हैं?
ट्रंप की मांगों की लिस्ट बहुत लंबी है और यही वो “बड़ी डील” है जिसके लिए बार-बार भारत को निशाने पर लिया जा रहा है। अमेरिका चाहता है कि भारत चीन के खेमे में न जाए और ब्रिक्स खत्म हो जाए। अमेरिका चाहता है कि रूस से नहीं बल्कि अमेरिका से हथियार खरीदे जाएं।
अमेरिका चाहता है कि हर हाल में भारत का एग्रीकल्चर सेक्टर खुल जाए और भारत के डेयरी प्रोजेक्ट्स अमेरिकी डेयरी प्रोजेक्ट्स के साथ जुड़ जाएं। अमेरिका चाहता है कि जियोपॉलिटिकल टेंशन के बीच उसकी सामरिक मौजूदगी भारत की जमीन पर रहे।
अमेरिका चाहता है कि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और डेवलपमेंट प्रोग्राम्स में अमेरिकी कंपनियों की भागीदारी बढ़े और भारत के बाजार पर उसका अपना सामान सबसे ज्यादा हो।
भारत ने रूस से तेल खरीदना कितना कम किया?
जनवरी के महीने में माना जा रहा है कि भारत का रूस से तेल आयात 1 मिलियन बैरल प्रति दिन से भी नीचे आ जाएगा। एक वक्त था जब भारत 6 मिलियन बैरल प्रति दिन तक तेल रूस से खरीदता था।
रिलायंस को बकायदा एक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा कि ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट गलत है और जनवरी के महीने से उन्होंने कुछ भी तेल नहीं लिया है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन ने भी अपने आंकड़े बताए कि वे बहुत कम ले रहे हैं।
सवाल यह है कि चीन सबसे ज्यादा रूस से तेल खरीदता है लेकिन उस पर कोई टैरिफ नहीं लगा। तुर्की भी खरीदता है, उस पर भी कोई टैरिफ नहीं लगा। फिर भारत पर ही सबसे ज्यादा टैरिफ क्यों लगाया गया?
भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है?
भारत की करेंसी को बचाने के लिए RBI लगातार डॉलर बेच रहा है। बीते एक वर्ष में सबसे ज्यादा डॉलर RBI ने करेंसी को मेंटेन करने के लिए खर्च किया है। RBI लगातार दो दिन से इंटरवेंशन कर रहा है ताकि किसी तरह रुपया डॉलर के मुकाबले 90 के नीचे आ जाए।
शेयर बाजार भी हिचकोले खा रहा है। HDFC दो दिन से लगातार नीचे है और लगभग 1.4% गिरा है। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्रीज 0.6% नीचे आई। मारुति सुजुकी 2.8% नीचे आया और टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल 1.6% नीचे आया। 16 में से 11 सेक्टर पर सीधा असर पड़ा है।
फ्री ट्रेड के बावजूद निर्यात घटा, आयात बढ़ा
नीति आयोग की नई रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल से जून के पहले क्वार्टर में भारत का एक्सपोर्ट 9% नीचे आ गया है जबकि इंपोर्ट 10% ऊपर चला गया है। एक्सपोर्ट 38.7 बिलियन डॉलर घट गया और इंपोर्ट 65.3 बिलियन डॉलर बढ़ गया। यानी व्यापार घाटा भारत का बढ़ चुका है।
एशियान देशों के साथ भारत का एक्सपोर्ट 16.1% कम हुआ है। मलेशिया के साथ 39.7% कम, सिंगापुर के साथ 13.2% कम, ऑस्ट्रेलिया के साथ 10.9% कम और UAE के साथ 2.1% कम हो गया है।
वहीं इंपोर्ट में UAE से 28.7% बढ़ा, चीन से 16.3% बढ़ा, अमेरिका से 16.9% बढ़ा और सिंगापुर से 14% बढ़ा है। यानी भारत बाहर माल नहीं बेच पा रहा लेकिन बाहर से माल खरीद रहा है।
कौन-कौन से सेक्टर प्रभावित हुए?
अमेरिका के साथ बिगड़ी टैरिफ परिस्थितियों के बीच भारत का फार्मा सेक्टर 1.9% कम हो गया। जेम्स एंड ज्वेलरी में 46.6% की भारी गिरावट आई है। ऑयल प्रोडक्ट्स में 16.7% की कमी आई है।
टेक्सटाइल और क्लोथिंग में 3.3% की कमी आई है। कारपेट में 14.3% और फिशरीज में 8.3% की कमी आई है। इसका सीधा असर लगभग 80 लाख कामगारों पर पड़ रहा है क्योंकि 2026 में ऑर्डर नहीं आ रहे हैं।
एग्रीकल्चर सेक्टर पर भी संकट
भारत में 60% आबादी एग्रीकल्चर पर टिकी हुई है। लेकिन यूरिया इंपोर्ट में लगभग 120% का इजाफा हो गया है। अप्रैल से नवंबर 2024-25 में भारत ने 3.26 मीट्रिक टन यूरिया बाहर से मंगाया था। इस बरस इसी अवधि में 7.17 मीट्रिक टन यानी डबल से ज्यादा आ रहा है।
वहीं घरेलू यूरिया उत्पादन 3.7% नीचे चला गया है। यह स्थिति बताती है कि भारत की खेती भी बाहरी निर्भरता की ओर बढ़ रही है।
अडानी और अंबानी का मामला
इस पूरी प्रक्रिया में अदाणी को लेकर अमेरिका में केस फाइल खुल गई है। यह एक तरह की चेतावनी है। वहीं अंबानी अकेले कतर मिलने गए थे और ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में भी अकेले गए थे जहां कॉर्पोरेट्स की बैठक में वे ट्रंप से बात करते नजर आए।
अंबानी ने एक झटके में कहा कि हम रूस से तेल नहीं लेंगे। लेकिन अडानी के खिलाफ अमेरिका में केस खुलना यह दिखाता है कि चेक एंड बैलेंस का खेल चल रहा है।
60 बिलियन डॉलर का लाभ चाहता है अमेरिका
अमेरिका टैरिफ के जरिए 60 बिलियन डॉलर यानी तकरीबन 53 लाख करोड़ रुपए (5,39,400 करोड़) का लाभ चाहता है। इसमें भारत पर शुरुआती दौर में ही तकरीबन 3 लाख करोड़ का सीधा असर पड़ सकता है।
शुक्रवार को अमेरिकी अदालत में टैरिफ को लेकर सुनवाई होनी है। इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने साफ इंडिकेट किया है कि टैरिफ एक पॉलिसीगत तरीके से काम करेगा।
विदेशी नेताओं की भारत यात्रा
इस तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय तौर पर नेताओं की मौजूदगी भारत में बढ़ रही है जो अमेरिका को चेताती भी है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज पहली बार एशिया आ रहे हैं और 11 जनवरी को भारत पहुंचेंगे। वे दो दिन यहां रहेंगे।
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची 15 से 16 जनवरी भारत में रहेंगे – ठीक उस समय जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है।
26 जनवरी को यूरोपीय यूनियन कमीशन के प्रेसिडेंट और यूरोपीय यूनियन के प्रेसिडेंट दोनों भारत के मेहमान होंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों फरवरी मध्य (13-14-15) में भारत आएंगे।
बैंकिंग सेक्टर में भी संकेत
बड़े-बड़े बैंकों की डिपॉजिट में कमी आई है जबकि लोन ज्यादा दिया गया है। पंजाब नेशनल बैंक में 11% लोन बढ़ा लेकिन डिपॉजिट सिर्फ 8.5% बढ़ी। इंडियन बैंक में 14.5% लोन और 12.5% डिपॉजिट।
बैंक ऑफ बड़ौदा में 14.6% लोन और 10.3% डिपॉजिट। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 19.6% लोन और 13.2% डिपॉजिट। HDFC में 12% लोन और 11.5% डिपॉजिट। यह ईयर टू ईयर ग्रोथ का आंकड़ा है जो आर्थिक तनाव को दर्शाता है।
चीन-पाकिस्तान के बीच नए समझौते
इसी बीच चीन और पाकिस्तान के बीच ट्रेड और सिक्योरिटी समझौते हुए हैं। इंडस्ट्री, एग्रीकल्चर, माइनिंग, ट्रेड, इन्वेस्टमेंट, IT, साइबर सिक्योरिटी और “रीजनल एंड ग्लोबल सिक्योरिटी” को लेकर समझौते हुए हैं।
यह भारत के लिए एक और चिंता का विषय है क्योंकि जियोपॉलिटिकल टेंशन और बढ़ रहा है।
विदेश मंत्री भी अमेरिका का नाम नहीं ले रहे
वेनेजुएला की घटना हो या कोई दूसरी घटना, विदेश मंत्री एस. जयशंकर प्रतिक्रिया देते हैं, चिंता व्यक्त करते हैं, लेकिन उनकी जुबान पर भी अमेरिका या ट्रंप शब्द नहीं आता है।
जयशंकर कहते हैं कि “हम मजबूत हुए हैं, हमारी इकॉनमी दुनिया की टॉप फाइव में है। लेकिन कॉन्सिक्वेंसेस को भी देखना पड़ेगा।” यह सतर्कता दिखाती है कि भारत सरकार अमेरिकी दबाव को लेकर कितनी सावधान है।
आम आदमी पर क्या असर?
अगर निर्यात घटता है और आयात बढ़ता है तो व्यापार घाटा बढ़ेगा। डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर होगा। महंगाई बढ़ेगी। 80 लाख कामगार पहले ही प्रभावित हो चुके हैं क्योंकि ऑर्डर नहीं आ रहे।
टेक्सटाइल, ज्वेलरी, लेदर जैसे सेक्टर में काम करने वालों की नौकरियां खतरे में हैं। अगर स्थिति और बिगड़ी तो इसका सीधा असर मध्यम वर्ग की जेब पर पड़ेगा।
क्या है पृष्ठभूमि
ट्रंप भारत के साथ जिस “बड़ी डील” को करना चाहते हैं, वह भारत की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ को हिला सकती है। अगर भारत यह डील करता है तो उसकी निर्भरता अमेरिका पर बढ़ जाएगी। अगर नहीं करता है तो टैरिफ और बढ़ाए जाएंगे जो भारत के कॉर्पोरेट और बिजनेस सेक्टर को तबाह कर सकते हैं। भारत ने अभी तक कोई ट्रेड डील अमेरिका के साथ नहीं की है लेकिन रूस से तेल खरीदना कम करने जैसी मांगें मान ली हैं। यह दुविधा की स्थिति है जहां दोनों रास्ते कठिन हैं। सवाल यही है कि ट्रंप और कितनी बार भारत और मोदी का नाम लेंगे और भारत उस डील को नहीं करेगा तो क्या होगा?
मुख्य बातें (Key Points)
- ट्रंप की मांग: भारत चीन के खेमे में न जाए, ब्रिक्स खत्म हो, रूस की जगह अमेरिका से हथियार खरीदे, एग्रीकल्चर और डेयरी सेक्टर खोले
- रूस से तेल: भारत का रूसी तेल आयात 6 मिलियन बैरल प्रति दिन से घटकर 1 मिलियन से भी नीचे आ गया, रिलायंस ने जनवरी से शून्य तेल खरीदा
- निर्यात संकट: जेम्स एंड ज्वेलरी में 46.6%, ऑयल प्रोडक्ट्स में 16.7%, फार्मा में 1.9% की गिरावट, 80 लाख कामगार प्रभावित
- विदेशी नेता आ रहे: जर्मन चांसलर 11 जनवरी, ईरान FM 15-16 जनवरी, EU हेड्स 26 जनवरी, फ्रांस के राष्ट्रपति फरवरी मध्य में आएंगे








