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The News Air - Breaking News - मुख्तार अंसारी की मौत पर खूब सियासत, पर असल में चुनावों पर होगा क्या असर?

मुख्तार अंसारी की मौत पर खूब सियासत, पर असल में चुनावों पर होगा क्या असर?

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024
in Breaking News, NEWS-TICKER, उत्तर प्रदेश, राष्ट्रीय, सियासत
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Mukhtar Ansari
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नई दिल्ली, 5 अप्रैल (The News Air) गैंगस्टर-राजनेता मुख्तार अंसारी की मौत के बाद उनकी ‘प्रशंसा’ करने पर उत्तर प्रदेश में दो पुलिस कांस्टेबल को सस्पेंड कर दिया गया। पिछले हफ्ते मुख्तार अंसारी की मौत के बाद उन्हें दफनाने के दौरान 30 हजार से ज्यादा लोग जुटे थे। इन शोक मनाने वालों ने ‘माफिया नहीं मसीहा है’ का नारा भी लगाया गया था। हालांकि, मुख्तार की मौत पर चुपचाप जश्न मनाने वालों की संख्या कई गुना ज्यादा होगी। मोहम्मदाबाद के बीजेपी विधायक रहे कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय ने अंसारी की मौत पर कहा कि ये हमारे लिए असली होली है। कृष्णानंद राय ने 2002 के विधानसभा चुनावों में मुख्तार के बड़े भाई अफजल अंसारी को हराया था। 29 नवंबर 2005 को, कृष्णानंद राय और उनके छह सहयोगियों को कथित तौर पर अंसारी गैंग ने एके -47 गोलियों से छलनी कर दिया था। मुख्तार अंसारी ने मऊ दंगों में अपनी कथित भूमिका के लिए एक महीने पहले आत्मसमर्पण कर दिया था और वह जेल में था। अब सवाल यह है कि अंसारी की मौत से राजनीतिक तौर पर किसे फायदा होगा?

गाजीपुर-मऊ की जागीर

माफिया और गैंगस्टर, एक बार राजनीति में आने के बाद, अक्सर रॉबिनहुड मॉडल को फॉलो करते हैं। हरिशंकर तिवारी, वीरेंद्र प्रताप शाही, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी सभी ने इस टेम्पलेट का पालन किया। इस प्रकार, अंसारी को न केवल मुसलमानों, बल्कि गाजीपुर और मऊ के सबसे पिछड़े, दलितों और उच्च जातियों के एक हिस्से का भी समर्थन प्राप्त था। अपने रास्ते में आने वाली सभी चुनौतियों को खत्म करने के लिए हत्या करना अकसर ही मुख्तार का हथियार था। ‘786’ रजिस्ट्रेशन वाली एसयूवी की लंबी फाइल भी मौजूद थी। अंसारी के प्रभाव से राजनीतिक दलों, खासकर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को फायदा हुआ।

बीएसपी-एसपी का वॉकअराउंड

मुख्तार अंसारी पहली बार 1996 में मऊ से बसपा के टिकट पर विधायक बने और अगले दो चुनाव निर्दलीय के रूप में जीते। 2009 के लोकसभा चुनावों में, मायावती ने उन्हें ‘गरीबों का मसीहा’ कहा और उन्हें वाराणसी में बीजेपी के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा। जोशी बमुश्किल 17,000 वोटों के अंतर से जीत हासिल कर सके। अंसारी बंधुओं ने तब कौमी एकता दल का गठन किया। उनका राजनीतिक साम्राज्य पूर्वी यूपी के आधा दर्जन जिलों तक फैला हुआ था। 2012 के विधानसभा चुनाव में मुख्तार मऊ से और उनके सबसे बड़े भाई सिबगतुल्लाह मोहम्मदाबाद सीट से जीते थे। 2017 के यूपी चुनाव से पहले, उन्होंने कौमी एकता दल का एसपी में विलय करने की कोशिश की। यूपी के तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव की ओर से शुरू किए गए इस कदम का विरोध किया। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले अखिलेश ने खुद पूरे अंसारी परिवार का सपा में स्वागत किया। इसके बाद मुख्तार और उनके बड़े भाई सिबगतुल्लाह के बेटे अब विधायक हैं। अफजल 2024 में सपा उम्मीदवार के रूप में गाजीपुर लोकसभा सीट बरकरार रखने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं

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मुख्तार अंसारी ने बीते 18 साल जेल में बिताए। उसने जेलों को अपनी जागीर बना लिया। ताजी मछली की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए जेल के अंदर एक तालाब खोदा गया था। जिले के शीर्ष अधिकारी बैडमिंटन खेलने आते थे। लखनऊ में एक जेल अधीक्षक को विजिटर्स पर ‘नो-फ्रिस्किंग’ नियम लागू नहीं करने के कारण गोली मार दी गई। अंसारी पर 16 हत्या के मामले दर्ज थे। इनमें से छह तब दर्ज किए गए जब वह जेल में था। जब 2004 में एसटीएफ के डिप्टी एसपी शैलेन्द्र सिंह ने उन पर पोटा के तहत मामला दर्ज किया और मुख्तार को गिरफ्तार करने की अनुमति मांगी, तो उन्हें 15 दिनों के भीतर इस्तीफा देने के लिए कहा गया। मुलायम सरकार ने पूरे एसटीएफ अधिकारियों को हटा दिया था। दरअसल, इस घटनाक्रम के एक साल पहले, मुख्तार ने यूपी में मुलायम सिंह यादव की सरकार बनाने में मदद के लिए बीएसपी विधायकों के दलबदल में अहम भूमिका निभाई थी।

19 महीने में 8 केस में दोषी करार

मुख्तार की मौत से विपक्षी दलों को कोई अतिरिक्त फायदा मिलने की संभावना नहीं है, क्योंकि मुस्लिम वोट आने वाले लोकसभा चुनावों में सपा-कांग्रेस गठबंधन के सपोर्ट में जाते दिख रहे। अगर मुख्तार अंसारी के निधन से किसी को फायदा होगा तो वह यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार है। अपराधियों से निपटने की इस सरकार की सख्त नीति के कई आलोचक हैं, लेकिन यह 2022 में सीएम योगी के रिकॉर्ड दूसरे कार्यकाल के अहम कारणों में से एक है। यह इस बार भी मुख्य कैंपेन कार्ड है। सरकार दिखावा करती है कि इस मामले में उसकी ‘हॉट परस्यूट’ ने कैसे काम किया – अपने जीवन के दौरान जीरो प्रॉसीक्यूशन से लेकर, पिछले 19 महीनों में मुख्तार को आठ मामलों में दोषी ठहराया गया। दो में आजीवन कारावास की सजा हुई।

जब सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में आया मऊ

अक्टूबर 2005 में एक राम लीला पंडाल पर कथित हमले के बाद मऊ सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में आ गया था। मुख्तार पर कर्फ्यू वाले कस्बे में खुली एसयूवी में असलहा लेकर घूमने का आरोप भी लगा था। यह एक निर्णायक मोड़ था। अब तक, सांप्रदायिक सौहार्द उनका ‘मार्गदर्शक सिद्धांत’ रहा था और इसने कई गैर-मुस्लिम समर्थकों और गैंगस्टरों को उनके पाले में सुनिश्चित किया था। उनकी छवि अब एक ‘मुस्लिम भाई’ की थी। उन्होंने दंगों में अपनी भूमिका के सिलसिले में 25 अक्टूबर 2005 को मऊ अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और उसके बाद कभी जेल से बाहर नहीं निकले।

यूपी सरकार में मुख्तार के गैंग पर एक्शन

जब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने संगठित अपराध के खिलाफ ‘हॉट परस्यूट’ चलाया, तो यूपी पुलिस की टारगेट लिस्ट में 60 गैंगस्टर थे। मुख्तार, अतीक और विजय मिश्र जैसों पर खास नजर रही। अब तक, मुख्तार के अंतरराज्यीय गिरोह ‘आईएस 191’ (पुलिस फाइलों में) से संबंधित ₹900 करोड़ की ‘गलत कमाई’ संपत्ति या तो जब्त कर ली गई है या ध्वस्त कर दी गई है। उसके गिरोह के पांच सदस्य पुलिस मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं, लगभग 300 के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई है।

क्या मुख्तार को जेल में जहर दिया गया?

मुख्तार अंसारी ने राष्ट्रपति के समक्ष अपनी याचिका में खुद स्वीकार किया कि जेल में नवंबर 2019 से पहले उन्हें दो दिल के दौरे पड़े थे। अब यूपी पुलिस के उनके परिवार के उस दावे का खंडन कर रही है कि उन्हें जेल में धीरे-धीरे जहर दिया गया था।

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