टोक्यो का संदेश: जीतेगी बेटियां तभी जीतेगा देश

Sandeep-Pandit
पंडित संदीप

दुनिया को टोक्यो की धरती ये संदेश दे रही हैं कि बेटियों की जीत ही देश का सम्मान है। बेटियों के बहे पसीने से सोने की मेडल चमक रहे हैं। बेटियों के परिश्रम से राष्ट्रध्वज नभ के आंगन को चूम रहे हैं, बेटियां विजय पताका का सिरमौर बन आज दुनिया के सामने हैं। सम्मान से वरदान बनी बेटियों को जिस देश ने आगे बढ़ाया है आज उसका परचम उतना ही बुलंद उतना ही ऊंचा उतना ही शान से सरहदों के पार लहराया फहराया जा रहा है उसका जय गीत गर्व से गाया जा रहा है। बेटियां घर आंगन परिवार ही नहीं देश का स्वाभिमान भी हैं, यह संदेश जापान की जमीन बखूबी बयां कर रही है। यह महज शब्दों की लच्छेदारी नही बेटियों की भागीदारी, जिम्मेदारी, हिस्सेदारी की जीती जागती दास्तान जो दुनिया भर में गर्व से गूंज रही है। बेटियों के दम पर चमक रही है। चीन, जापान, अमेरिका, भारत के जीते सोना चांदी कासे के तगमे तक में जिस देश की बेटी ज्यादा लड़ी, ज्यादा जीती उस देश के झंडे की ऊंचाई उतनी ही बढ़ी है, उतनी ही बड़ी है। यह सच्चाई चीख चीख कर बता रही है क्यों भारत में राम से पहले सीता कृष्ण के आगे राधा का नाम है।

आइए इस असाधारण तथ्य को आंकड़ों की भाषा से समझते हैं। पहले बेटियों की बुलंदी के झरोखे से दुनिया को झांकते हैं, उपयुक्त आंकड़े अगस्त से पहले के ही सृजित किए गए हैं। चीनी मिठास मेडल पर सिर चढ़कर बोल रही है चीनी ओलंपिक बादशाहत का दबदबा बरकरार रखे हुए हैं। मेडल टैली में पहले पायदान पर खड़े चाइना की झोली में महिलाओं के द्वारा 42 मेडल जीते गए जबकि पुरुष कुल 30 मेडल के ही दम पर चमक रहे हैं यानी महिलाओं की जीत का प्रतिशत 64.6 है, जबकि पुरुष बेटियों से पीछे कुल 23 मेडल कब्जा जीत के आंकड़े में 35.4% का ही योगदान कर पाए हैं। दूसरे पायदान पर खड़े जापान की भी बेटियां पहले पायदान पर खड़ी हैं। अपनी ही जापानी जमीन से दुनिया को दूसरे नंबर पर खड़ा हो ललकार रहे हैं जापान की जीत 28 तगमे बेटियों ने झटक 58% जीत का आंकड़ा छुआ है जबकि जापानी पुरुष नारी शक्ति के मुकाबले 20 ही मेडल अपने नाम कर सके इस तरह उनकी जीत का दर 41% तक ही सीमित रह गया है। अमेरिका की बेटियों ने तो कमाल ही कर दिया, ऐसी बेटियों की जीत की धार शायद ही समय ने कभी देखी हो, पुरुष खिलाड़ियों की मुकाबले तीन गुना ज्यादा मेडल 60 मेडल बेटियो ने 76% हिस्सेदारी रखी जबकि अमेरिकी पुरुष खिलाड़ियों की 18 मेडल जीत के साथ मात्र 23 प्रतिशत पर पीछे पीछे बहुत पीछे खड़ा हो बेटियों की जीत पर ताली बजाता दिख रहा है। महिलाओं की जीत से ऑस्ट्रेलिया की महिलाओं ने 33 मेडल के साथ जीत प्रतिशत 56.9 रखा जबकि पुरुष खिलाड़ी उनके पीछे 25 मेडल ही जीते जो 43.1% है।

बेटियों की जीत की यह बानगी, जीत की यह जिम्मेदारी, जीत की यह जिद्द बताती है कि बेटियां ही वतन के इज्जत, सम्मान, मान की पहरेदार है। जीत के पांच सर्वोच्च देशों में 194 मेडल फाइटर बेटियों ने जीते जबकि लड़ाके लड़के महज 116 मेडल ही जीत पाए बेटियों के दम पर देश को बढ़ता देख रहे चीन की महिलाओं ने पुरुषो के मुकाबले दुगुने जबकि अमेरिका की महिलाओं ने 3 गुना ज्यादा मेडल पुरुषों के मुकाबले जीता है। यह बेटियों के दम, परिश्रम, बेटियों के जीतने के जुनून, जिद्द बेटियों के देश पर मर मिटने की कहानी का सर्वोच्च, शानदार, उत्कृष्ट पन्ना है। कुछ खास जो बेटियों की बड़ी जीत का एहसास कराता है टोक्यो में जुलाई तक दो से अधिक मेडल जीतने वाली 35 महिला खिलाड़ी है और महज 19 पुरुष खिलाड़ी ऐसे हैं जिनकी झोली में दो से ज्यादा मेडल आए हैं। टोक्यो ओलंपिक में चार मेडल जीतने वाले खिलाड़ियो में एकमात्र नाम ऑस्ट्रेलिया की महिला खिलाड़ी एमा का है, तीन मेडल जीतने वाले खिलाड़ी दुनियाभर से गिनती का आठ हैं जिसमें पांच बेटियां हैं। दो मेडल जीतने वालों में कुल 45 खिलाड़ियों में से 29 महिलाएं हैं। घोड़े की लगाम थाम सोना जीतने में भी लड़कियों ने लड़कों को पछाड़ दिया है, गौरतलब है कि ओलंपिक में घुड़सवारी एक ओपन प्रतियोगिता है जिसमें पुरुष या महिला कोई भी भाग ले सकता है। जुलाई तक कुल 12 घुड़सवारी के मेडल दाव पर लगाए गए, जिसमें से दस मेडल महिलाओं ने अपने नाम कर दुनिया को  बता दिया झांसी की रानी अभी जिंदा है।

भारत की बात करें तो पूरी की पूरी कहानी एक पंक्ति में ही सिमट जाती है कि जो भी जीता बेटियों ने ही जीता है। बेटियों के नाम सर्वस्व, बेटियों के मेडल बटोरने के दम पर ही सवा सौ करोड़ वाले हिंदुस्तान की आबरू बची है। बेटियों की जीत हिंदुस्तान में सौ प्रतिशत बन बेटियों की गुरु गाथा के गीत गा रहा है। ये बेटियों के बाहुबल का ही पराक्रम है जो आगे भी बेटियों के दम तिरंगे को ऊंचाई मिलेगी ये उम्मीद भी बेटियों के कांधे पर ही हम भारतीयों ने डाल रखा है। चानू ने देश की चांदी कर भारोत्तोलन में 21 साल बाद जीत का युग लौटाया, तो अपनी चिड़िया से चीनी को चित कर सिद्धू ने कांसे का ताज पहना। हॉकी में रानी की टीम ने तीन बार ओलंपिक चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को रौंद नये कीर्तिमान गढ़ने के साथ मेडल की उम्मीद भी बढ़ा दी है। जबकि 64 मीटर दूर चक्का फेंक कालप्रीत जीत से बस एक कदम पीछे अमेरीकी खिलाड़ी के पास खड़ी हैं, बाजी बदल गई तो कमलप्रीत सुनहरी जीत दर्ज कर तिरंगे का स्वाभिमान बढ़ा सकती हैं।

इतिहास रच रही है हिंदुस्तान की बेटियां, बेटी वंदना कटारिया की ओलंपिक हॉकी के इतिहास में गोल की हैट्रिक हो, भवानी का फेंसिंग में पहले दौर में धमाकेदार जीत के बाद दूसरे दौर में पहुंचना या सिद्धू की ओलंपिक में दोहरी सफलता, कमलप्रीत के चक्के की दूरी या फिर चानू की चांदी मतलब साफ है बेटियों की जीत ही वतन की शान है, वतन का वरदान है। तो फिर दो आजादी बेटियों को खेलने दो, बेटियों को जीतने दो, बेटियों को बढ़ने दो। बेटियों के पसीने से चमकता आज ही भारत का स्वर्णिम कल होगा।यह हमें सोचना ही होगा जानना ही होगा बेटियों की जीत में सहयोगी बनना ही होगा।

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