अकाली दल-बसपा के गठबंधन से बदले समीकरण, इन जिलों में बसपा का वोट ही हार-जीत करता है तय


चंडीगढ़, 14 जून

पहले शिरोमणि अकाली दल और बसपा के बीच हुए गठबंधन ने सियासत का समीकरण बदल दिया है। इस गठबंधन का अगले विधानसभा चुनाव में गहरा असर होगा, खासकर दोआबा इस गठबंधन का मुख्य केंद्र बनने जा रहा है। दोआबा में कई सीटों पर बसपा का पूरा प्रभाव है, क्योंकि बसपा के संस्थापक कांशी राम भी दोआबा से चुनाव जीतकर लोकसभा जा चुके हैं। होशियारपुर, कपूरथला, जालंधर, नवांशहर में बसपा का वोट ही हार-जीत तय करता है।

दोआबा की तमाम सीटों पर हाथी जीत हार में अहम भूमिका अदा करता आया है। 2012 के विधानसभा चुनाव में तो बसपा का वोट का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर गया। नतीजतन, कांग्रेस को कई सीटों पर हार मिली और सूबे में शिअद-भाजपा की सरकार बन गई।

पंजाब में भाजपा पहले ही एससी वोट बैंक को लेकर काफी गंभीर चल रही थी, इसलिए पंजाब में 2012 में चुनावों के बाद विधायक दल का नेता भगत चुन्नी लाल को बनाया गया था। भाजपा ने तो पंजाब में अपना सीएम एससी कैटेगरी से बनाने की घोषणा कर रखी है और अकाली दल ने डिप्टी सीएम की कुर्सी एससी के लिए रखी है। आम आदमी पार्टी भी एससी वोट को लेकर मैदान में है और एससी का सीएम बनाने की बात कही जा रही है।

पंजाब में 117 में से 34 सीटें आरक्षित हैं, जिसमें से पांच सीटों पर ही भाजपा चुनाव लड़ती आई है। बाकी सीटों पर शिअद ने अपना ही कब्जा रखा था। 1997 के पंजाब विधानसभा चुनाव में बसपा ने 67 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, लेकिन उसे केवल गढ़शंकर सीट पर जीत हासिल हुई। बसपा प्रत्याशी शिंगारा राम ने भाजपा के अविनाश को 801 वोट के अंतर से हरा दिया। शिंगारा राम को 21291 और अविनाश को 20490 वोट मिले थे, लेकिन बसपा का वोट बैंक दोआबा की काफी सीटों पर है।

2017 में खुद बसपा प्रधान अवतार सिंह करीमपुरी फिल्लौर से चुनाव लड़े थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में जालंधर में बसपा के उम्मीदवार को दो लाख से अधिक वोट मिले तो तमाम पार्टियों के नेताओं के माथे पर बल पड़ गए थे। बसपा के वोट के कारण ही अकाली दल व कांग्रेस की जीत हार 20 हजार वोट पर आकर सिमट गई।


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