नई दिल्ली, 3 मई (The News Air) भारत के 11 करोड़ किसानों और 13.5 करोड़ खेत मजदूरों का सबसे बड़ा प्रतिनिधि निकाय होने के नाते संयुक्त किसान मोर्चा ने 18वीं लोकसभा चुनाव के पहले और दूसरे चरण के मतदान के आंकड़ें उपलब्ध कराने में भारत के चुनाव आयोग की विफलता पर गहरी चिंता व्यक्त की है। पहले चरण के मतदान के 11 दिनों बाद और दूसरे चरण के मतदान के 4 दिनों बाद की पूरी तरह से अस्वीकार्य देरी के बाद ही, चुनाव आयोग ने मतदान के आंकड़ें जारी किये हैं, लेकिन फिर भी प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की कुल संख्या के आंकड़ें जारी नहीं किए हैं। कुछ राज्यों में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों की तुलना में मतदान प्रतिशत में 5.75% की बढ़ोतरी ने भी संदेह पैदा कर दिया है और विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाया है, जिससे चुनाव के दौरान आयोग के आचरण की विश्वसनीयता के बारे में लोगों के बीच अविश्वास पैदा हुआ है। निर्वाचन क्षेत्र के अनुसार मतदाताओं की कुल संख्या के आंकड़ें प्रदान करने में अपनी हिचकिचाहट के बारे में चुनाव आयोग को मतदाताओं को स्पष्टीकरण देना होगा।
गुजरात के सूरत और मध्य प्रदेश के इंदौर में अपने विरोधियों के नामांकन में छेड़छाड़ करने वाली सत्तारूढ़ पार्टी पर चुनाव आयोग चुप है। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भाजपा की पूर्ण अवमानना और उनकि तानाशाही दृष्टिकोण को उजागर करती है । लेकिन साथ ही ईसीआई का समर्पण को भी उजागर करती है।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए नफरत भरे भाषण का मुद्दा संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा चुनाव आयोग के साथ उठाया गया था और उनके चुनाव लड़ने पर छह साल का प्रतिबंध लगाने और उन्हें प्रधान मंत्री पद से तत्काल हटाने सहित कार्रवाई की मांग की गई थी। यह मांग महत्वपूर्ण है, क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों में से एक पर कानून तोड़ने वाले का बैठा होना संवैधानिक संकट पैदा करता है। चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी को कोई नोटिस देने में भी विफल रहा है, जबकि लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इस मामले पर चुनाव आयोग को लिखित में शिकायत दी है। ऐसे उल्लंघनों पर आयोग जैसे वैधानिक निकाय द्वारा किसी ठोस कार्रवाई के अभाव में, प्रधान मंत्री और भाजपा के अन्य शीर्ष नेताओं द्वारा पिछले एक सप्ताह के दौरान पूरे भारत में लगभग सभी सार्वजनिक भाषणों में बार-बार आचार संहिता का उल्लंघन किया गया है। यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित आधुनिक नागरिक समाज में कानून के शासन की नींव को कुचलने के अलावा और कुछ नहीं है। यह संविधान और भारतीय गणराज्य की अवधारणा के खिलाफ अपराध है, इसलिए एक वैधानिक निकाय के रूप में चुनाव आयोग की ओर से इन उल्लंघनों को माफ नहीं किया जा सकता।
एसकेएम फिर से मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग के अन्य सदस्यों से अनुरोध करता है कि वे इन शिकायतों में शामिल गंभीर मुद्दों पर विचार करें और संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान करते हुए दृढ़ता से अपना कार्य करें और इस बुनियादी प्रावधान के साथ कड़ी कार्रवाई करें कि कानून के समक्ष हर कोई समान है।
सुप्रीम कोर्ट को भी कानून तोड़ने वालों और कानून के शासन के लगातार उल्लंघन की श्रृंखला को रोकने में विफल रहने वाले वैधानिक संस्थानों के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेना चाहिए और कार्रवाई करनी चाहिए। एसकेएम सभी लोगों को याद दिलाना चाहता है कि आज भारत अपने संविधान के साथ-साथ गणतंत्र के बुनियादी आधार के खतरे में होने की असाधारण स्थिति का सामना कर रहा है।








