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The News Air - Breaking News - Supreme Court Public Holiday: धार्मिक छुट्टी की मांग पर बड़ा फैसला

Supreme Court Public Holiday: धार्मिक छुट्टी की मांग पर बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा: अनुच्छेद 25 में सार्वजनिक अवकाश मांगने का अधिकार शामिल नहीं, छुट्टी घोषित करना सरकार का नीतिगत फैसला

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 2 अप्रैल 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, काम की बातें, राष्ट्रीय
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Supreme Court Public Holiday
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Supreme Court Public Holiday को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में किसी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग करने का अधिकार शामिल नहीं है। न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा की याचिका खारिज करते हुए यह अहम फैसला दिया है। माना जा रहा है कि शायद यह पहली बार है जब सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश की मांग पर इतना स्पष्ट फैसला दिया है।

क्या थी याचिका और क्या मांग की गई थी?

ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दाखिल की थी। बता दें कि अनुच्छेद 32 संविधान का वह प्रावधान है जिसके तहत किसी भी मौलिक अधिकार के हनन पर कोई भी नागरिक सीधे सुप्रीम कोर्ट में रिट दाखिल कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट में जितनी भी जनहित याचिकाएं (PIL) दाखिल होती हैं, वे सब इसी अनुच्छेद के तहत की जाती हैं।

इस याचिका में मांग की गई थी कि सिखों के 10वें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी के जन्मदिवस यानी प्रकाश पर्व को पूरे देश में राजपत्रित अवकाश (Gazetted Holiday) घोषित किया जाए। इसके साथ ही याचिका में यह भी मांग की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट पूरे देश के लिए Supreme Court Public Holiday घोषित करने के मामले में एक समान नीति या यूनिफॉर्म गाइडलाइन तय कर दे, ताकि किसी भी तरह के भेदभाव की स्थिति न रहे।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इस रिट याचिका के पीछे भावना तो बहुत सम्मानीय है, लेकिन यह अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल रिट में न्यायिक हस्तक्षेप का न्यायोचित आधार नहीं बनती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पूरी तरह से कार्यपालिका यानी सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसमें अदालत का दखल देना उचित नहीं है।

सीधे शब्दों में कहें तो कोर्ट ने यह माना कि किसी भी अवसर पर छुट्टी देना या न देना, यह सरकार का नीतिगत निर्णय है और अदालत इस मामले में सरकार को कोई निर्देश जारी नहीं कर सकती।

अनुच्छेद 25 पर कोर्ट की अहम व्याख्या

याचिकाकर्ता संगठन ने अपनी दलील में संविधान के अनुच्छेद 25 में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हवाला दिया था। इस पर Supreme Court Public Holiday से जुड़े अपने फैसले में कोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता जहां एक ओर हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देती है, वहीं दूसरी ओर यह अधिकार किसी धार्मिक अवसर को पूरे देश में अनिवार्य सार्वजनिक अवकाश के रूप में राज्य से मान्यता दिलाने तक विस्तारित नहीं हो सकता। यानी धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार इतना एक्सटेंड नहीं होता कि कोई भी व्यक्ति या संगठन सरकार को छुट्टी घोषित करने का आदेश देने की मांग अदालत से कर सके।

गुरु गोविंद सिंह जी के प्रति कोर्ट ने जताया गहरा सम्मान

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में गुरु गोविंद सिंह जी के प्रति अगाध सम्मान और श्रद्धा व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि उनका जीवन साहस, अनुशासन और कर्तव्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का उदाहरण है। कोर्ट ने आगे कहा कि उनका संपूर्ण जीवन न्याय और सांसारिक कर्तव्यों के निर्वाहन के लिए एक अथक संघर्ष था।

कोर्ट ने सिख धर्म के सिद्धांतों की भी सराहना की और कहा कि सिख धर्म स्मरण, ईमानदार श्रम और निस्वार्थ सेवा पर विशेष जोर देता है। कोर्ट ने कहा कि गुरु गोविंद सिंह जी की विरासत का सम्मान करने का सबसे उत्तम तरीका शायद यही है कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा के साथ पालन किया जाए, न कि केवल श्रद्धा की मांग करके सम्मान का कोई प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया जाए।

अवकाशों की बाढ़ आने की चेतावनी: कोर्ट ने दी सख्त नसीहत

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक बेहद अहम और दूरगामी बात कही। कोर्ट ने कहा कि अगर इस तरह की मांग को स्वीकार कर लिया जाता है तो अलग-अलग समूहों और समुदायों से इसी तरह की मांगों की बाढ़ आ सकती है। आज एक वर्ग ने सुप्रीम कोर्ट से धार्मिक अवसर पर छुट्टी की मांग की है, कल दूसरा समुदाय भी इसी तर्ज पर आ सकता है।

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कोर्ट ने चेतावनी दी कि इसका नतीजा यह होगा कि सार्वजनिक अवकाशों का अव्यवहारिक विस्तार होगा, जो पूरी तरह से इंप्रैक्टिकल होगा। इस अव्यवहारिक विस्तार का सीधा असर शासन और प्रशासनिक कामकाज पर पड़ेगा। कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत एक विकासशील राष्ट्र है और इसे उत्पादकता और काम की निरंतरता को प्राथमिकता देनी चाहिए। Supreme Court Public Holiday से जुड़े इस फैसले में कोर्ट ने साफ कर दिया कि अनावश्यक छुट्टियों का बोझ देश की प्रगति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

अनुच्छेद 14 और भारत के संघीय ढांचे पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार पर भी अपनी राय स्पष्ट की। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 14 तर्कसंगत भिन्नता यानी तार्किक वर्गीकरण (Reasonable Classification) को स्वीकार करता है। कोर्ट ने माना कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में पहले से ही अनेक धार्मिक अवसरों पर अवकाश दिए जाते हैं।

अलग-अलग राज्यों में स्थानीय परिस्थितियों और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुसार छुट्टियां निर्धारित की जाती हैं, जो भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) का अभिन्न हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि राज्यों द्वारा दाखिल हलफनामों और पेश की गई सामग्री से यह साफ होता है कि सार्वजनिक अवकाशों का निर्धारण स्थानीय जरूरतों और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों के आधार पर होता है। इसलिए अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग छुट्टियां होने को किसी भी तरह का भेदभाव नहीं कहा जा सकता। यह काम पूरी तरह कार्यपालिका के विवेक पर छोड़ना उचित है।

आम नागरिकों पर क्या होगा इस फैसले का असर?

Supreme Court Public Holiday पर दिया गया यह फैसला आम नागरिकों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब कोई भी व्यक्ति या संगठन धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की दुहाई देकर अदालत से किसी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग नहीं कर सकता। छुट्टियों का फैसला सरकार का नीतिगत अधिकार बना रहेगा और अदालतें इसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगी। इसका असर यह भी होगा कि अब विभिन्न समुदायों की ओर से अदालतों में इस तरह की याचिकाओं पर रोक लगेगी।

सरकारों के लिए क्या संकेत देता है यह फैसला?

यह फैसला भले ही सार्वजनिक छुट्टियों के बारे में सरकारों को कोई सीधा आदेश नहीं देता, लेकिन एक स्पष्ट दिशा जरूर दिखाता है। सरकारों को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की नीति किन आधारों पर और किन बातों को ध्यान में रखते हुए तय करनी चाहिए, यह बात इस फैसले से साफ तौर पर सामने आती है।

फिलहाल भारत में सार्वजनिक अवकाशों को लेकर पूरे देश के लिए कोई एक समान नीति या गाइडलाइन नहीं है। राज्य अपनी-अपनी स्थानीय परिस्थितियों, संस्कृतियों और धार्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए छुट्टियां तय करते हैं। ऐसे में सरकार को इस ओर गंभीरता से सोचने और एक आउटलाइन तय करने की जरूरत है, ताकि आए दिन विभिन्न समुदायों द्वारा सार्वजनिक अवकाश की मांगों पर भी लगाम लगे और सरकार भी किसी दबाव में न आए।

जानें पूरा मामला

दरअसल, भारत के संविधान में हर नागरिक को अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है, जिसका मतलब है कि हर व्यक्ति अपने धर्म का पालन, प्रचार-प्रसार करने के लिए स्वतंत्र है। ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा ने इसी अधिकार का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत रिट दाखिल की थी और गुरु गोविंद सिंह जी के प्रकाश पर्व को पूरे देश में राजपत्रित अवकाश घोषित करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक अवकाश की मांग तक विस्तारित नहीं होता और यह पूरी तरह सरकार का नीतिगत फैसला है।

मुख्य बातें (Key Points)
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में सार्वजनिक अवकाश की मांग करने का अधिकार शामिल नहीं है।
  • ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा की याचिका खारिज: गुरु गोविंद सिंह जी के प्रकाश पर्व को राजपत्रित अवकाश (Gazetted Holiday) घोषित करने की मांग ठुकराई गई।
  • कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसी मांगें मानने से अवकाशों की बाढ़ आ सकती है, जिससे देश की उत्पादकता और प्रशासन प्रभावित होगा।
  • सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पूरी तरह कार्यपालिका (सरकार) का नीतिगत अधिकार है, इसमें न्यायपालिका का हस्तक्षेप उचित नहीं।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सवाल 1: क्या धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक छुट्टी मांगना मौलिक अधिकार है?

नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में किसी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग का अधिकार शामिल नहीं है।

सवाल 2: भारत में सार्वजनिक अवकाश (Public Holiday) कौन घोषित करता है?

सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पूरी तरह कार्यपालिका यानी सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। केंद्र सरकार राजपत्रित अवकाश (Gazetted Holiday) घोषित करती है, जबकि राज्य सरकारें अपनी-अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रतिबंधित अवकाश (Restricted Holiday) तय करती हैं।

सवाल 3: सुप्रीम कोर्ट ने गुरु गोविंद सिंह प्रकाश पर्व पर छुट्टी की मांग क्यों खारिज की?

कोर्ट ने कहा कि यह मांग मानने पर अलग-अलग समुदायों से ऐसी ही मांगों की बाढ़ आ सकती है, जिससे अवकाशों का अव्यवहारिक विस्तार होगा और देश की उत्पादकता व प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होगा। साथ ही कोर्ट ने कहा कि यह सरकार का नीतिगत फैसला है, न कि न्यायपालिका का।

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